हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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बुधवार, 8 सितंबर 2010

जिंदगी कागज की नाव

जिंदगी है बरसाती नदी सी , इन्सान कागज की नाव है ।
है नहीं पतवार कोई , कस्ती बहती धारा के साथ है ।

कहीं भँवर है उसे घुमाती , कभी हैं लहरे उसे हिलती ।
कभी भिंगोती बारिस की बूंदे , कभी पवन से वेग वो पाती ।

जिस मोड़ पे लहरें मुडती है , वो मुड जाती उसके साथ है ।
जीवन चक्र को पूरा कर , कस्ती खो जाती नदी के साथ है ।


कर्म है उसका चलते रहना , भाग्य है सब कुछ सहते रहना ।
जन्म से लेकर अंत समय तक , प्रतिपल धारा संग बहते रहना ।
सहना रोज थपेड़े को , नित अवरोधों से टकराते रहना ।
हर होनी अनहोनी को , बरदान मान कर चलते रहना ।
कागज की हर नाव का , अंत ही उसका भाग्य है ।
बहती रहे अगर निश्चल हो , तो यह उसका सौभाग्य है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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