हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

त्याग

काम क्रोध मद लोभ का , तज सको अगर व्यापार ।
मिल जायेगा तुम्हे जगत में , सुखमय जीवन का सार ।
काम नहीं है पाप जगत में , अगर प्रेम हो उसमे शामिल ।
सदा समर्पित करो स्वयं को , अंतर्मन के प्रेम की खातिर ।
बिना प्रेम के काम-क्रिया क्या , समस्त कर्म होते व्यभिचार ।
जिस क्षण  प्रेम समर्पित होगा , मिल जायेगा मुक्ति का द्वार ।

ये क्रोध कहाँ स्वयं स्वामी है , मद-लोभ पर रहता है वो निर्भर ।
जब जब लगती ठेस अहम् को , मन को आता क्रोध है उस क्षण ।
लोभ भी जब जब संवर न पाता, मन को क्रोधित है कर जाता ।
सतर्क हो सको अगर जरा सा , क्रोध को समझो मरा हुआ सा ।
यह 'मद' है रिश्ते में पौत्र लोभ का , जग में उसके है दो पालक ।
समस्त दुखो का मूल है लालच , धर्म-अधर्म दो उसके बालक ।

लोभ अगर तुम छोड़ सकोगे , सुख-दुःख को तुम जोड़ सकोगे ।
जिस क्षण ख़त्म हुआ बँटवारा , स्वयं को प्रभु से जोड़ सकोगे ।  
बिना लोभ के बन जाते है, समस्त अ-कर्म योग के जैसे ।
भले रहो सदा ग्रहस्त जगत में , बन जाओगे योगी जैसे ।
फिर जो भी भोगोगे इस जग में , भोग नहीं कहलायेगा ।
जो बिना भोग के आएगा , वही सच्चा सुख कहलायेगा ।

। © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

दो बाते

भाई दो बाते कहनी तुमसे है , दो बात सुनानी तुमको है ।
जो बात चुभी मेरे दिल में है , वो बात सुनानी तुमको है ।

हम दोनों ही इन्सान यहां , हम दोनों की कमजोरी है ।
सम्बन्ध बनाये रखने की , शायद अपनी मज़बूरी है ।

तुम भूल गए हम दोनों ही , अभिमान पाल कर रखते हैं ।
पर शब्दों में सदा एक दूजे का , सम्मान पाल कर रखते है ।

फिर भी तुमने निज शब्दों में , मेरा कम क्यों मान किया ?
मुझे मान कर निज प्रतिद्वन्दी , मेरा क्यों अपमान किया ?

जब बात चुभी है दिल में तो , अब बहुत दूर तक जाएगी ।
आज नहीं तो कल निश्चित , रिश्तो में खटास ये लाएगी ।

निश्चित ही बस क्रोध में ही , जुबान नहीं वो फिसली थी ।
तेरे दिल के अन्दर से ही , वो बात कहीं से निकली थी ।

बेहतर है सच उसे मान , मै आगे नीति निर्माण करूँ ।
मगर जताकर ही तुमको  , अपने तीरों पर शान धरूँ ।  

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सुप्रसिद्ध शायरा शबीना 'अदीब' की एक ग़ज़ल के दो शे'र लगा रहा हूँ । 

"जो खानदानी रईस हैं वो मिज़ाज़ रखते हैं नरम अपना
तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है 
ज़रा सा कुदरत ने क्या नवाज़ा, के आके बैठे हो पहली सफ़ में
अभी क्यों उड़ने लगे हवा में, अभी तो शौहरत नई नई है 
।"

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

कलयुग

मत कमजोर बनो इस जग में , ये दुनिया है बलवानो की ।
भगवान नहीं रहते हैं यहाँ , ये दुनिया है शैतानो की ।

जो लोग तुम्हे सज्जन लगते , वो डरकर ऐसे रहते हैं ।
अपने अंतर्मन को वो , दुनिया से छुपाकर रखते हैं ।

जो भी जितना दुर्जन होता , उसका जग में पूजन होता ।
जो प्रतिदिन पाखंड रचाता , जग उसके आगे शीश नवाता ।

जो हक़ सबका  दबाता है , वो महाबली कहलाता है ।
जिसकी भाषा जितनी ओछी , वो वक्ता निपुण कहाता है ।

झूंठ और पाखंड के बल पर , जो शासन सत्ता चलता है ।
वही सर्वश्रेष्ट शासक का दर्जा , जग में निश्चित पाता है ।
  
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

प्रतिध्वनि

सुनो इन गूंजती प्रतिध्वनियों को , 
जो थाती हैं हमारे शब्दों की ।
इंसानों सा ये नहीं मरती हैं ,
अनंतकाल तक ये यूँ ही विचरती ।

सुन पाओ तो ये हमें बताती हैं ,
हमारा इतिहास हमें सुनाती हैं ।
भेद कर ये हमारे मुखौटों को ,
असली चेहरा हमें दिखाती हैं ।

ये याद दिलाती हैं हमने ,
कितने वादे करके भुला दिये ।
पल-पल बदलते जीवन में ,
कितने मुखौटे प्रयुक्त किये ।

कितनी कसमे लेकर हमने ,
उन्हें बेशर्मी से छोड़ दिया ।
कितने दिलों को बेदर्दी से ,
हमने अब तक तोड़ दिया ।

हर गूँज हमारे शब्दों की , 
फिर लौट कर वापस आती है ।
भूली बिसरी बातों की ,
ये याद हमें दिलाती है ।

गलत सही का भेद हमें ,
शायद समझाना चाहती है ।
इसी लिए ये अनंतलोक का ,
विचरण कर वापस आती है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

बारम्बार अनेको बार ।

रचा गया यदि मुझे यहाँ तो , नियति को था मंजूर यही ।
बिना नियति की मर्जी के , कैसे बनता नियति नियंता ।

रचा नियति ने जगत यहाँ ,
बारम्बार अनेको बार ।
मिला जन्म है मुझको भी ,
बारम्बार अनेको बार ।

कभी बनाया उसने मुझको ,
धर्म-ध्वजा का पहरेदार ।
कभी बसाकर राज-पाठ को ,
सौप दिया मुझे उसका भार ।

कभी जगत के सभी तत्व का ,
करने दिया मुझे व्यापार ।
कभी चरण-रज धोने को मुझे ,
उसने झुंकाया बारम्बार ।

कभी उगाकर पंख बदन में ,
उसने दिया व्योम उपहार ।
कभी तैरना मुझे सिखाकर ,
पाने दिया सागर का प्यार ।

जितनी बार रचा जग उसने , किया जन्म मेरा उद्धार ।
यही चलता रहेगा अनंत काल तक , बारम्बार अनेको बार ।


© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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