हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

पहले चार पंक्तिया ओशों की फिर कुछ आगे अपनी बात ....

"मयकदा था - जाम था , साकी भी थी ।
जाम थे ओंठो पे जिनके , वो मै ना था ।
दूर कोने में अकेला , मै खड़ा था ।
शर्बते दीदार से , समझिये पाला पड़ा था ।"

पहली चार पंक्तिया ओशों की अब कुछ आगे अपनी बात ....

लेकर मै आया बोतल होश के शराब की , जितना चाहो पी लो आकर बेहिसाब का ।
बांटता हूँ निमंत्रण मै सारे समाज को , लक्ष्य़ है नींद में चलते हुए समाज का ।
बुलाया है मैंने सभी योगीराज को , संग दर दर भटकते सन्यासी समाज को ।
उन्हें भी जो पिए हैं नशीले पदार्थ को , नशेड़ी, गंजेड़ी और भंगेड़ी समाज को ।

आयेंगे वो भी जो हैं पतित समाज के , भोगते है जो यहाँ औरों के भाग को ।
निमंत्रित यहाँ सारा सज्जन समाज भी , जो मन में दबाये कुंठा और राज को ।
नर ही नहीं नारी जगत भी बुलाया है , माँ, बहन, बेटी सब उसमें समाया है ।
यार,दोस्त,रिश्ते-नाते को भी निमंत्रण हैं, आयोजन स्थल पर आज अभिमन्त्रण है ।

एक ही शराब की बोतल है पास में , जितना पिलाओ नहीं चुकती कभी प्यास से ।
सोमरस भरा है इसमे ऋषियों के पास से , सुरा भी मिली है इसमें असुर समाज से ।
मयकदा , जाम और साकी भी आज हैं , आवो और चख लो तुम भी थोड़ा पास से ।
नया जीवन ये देती अमरता के साथ ही , मृत्यु को मैं बाँटता नये जीवन के आस से ।
 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG
 

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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