हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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रविवार, 15 अगस्त 2010

किसका होता जयघोष यहाँ ?

किसका होता जयघोष यहाँ , जिससे गुंजित है दशो दिशा ?
किसके स्वागत में फूलों से , पटी  हुयी है समस्त धारा ?
किसकी अगवानी करने को , कतार बद्ध है लोग यहाँ ?
किसकी आरती करने को , व्याकुल हैं सब लोग यहाँ ?
दशों दिशाओं कहो जरा , है कौन बीर जो वहां खड़ा ?
क्या विजयी होकर आता है , या रण-भूमि को जाता है ?

छोड़ो तुम जयघोष करो , मै स्वयं  ही देखता हूँ जाकर ।
निश्चय ही भारत मां का वो , होगा कोई बीर सपूत ।
हर लाल प्रतिज्ञाबद्ध यहाँ , माता की शान बढ़ाने को ।
अपना शीश कटाकर भी , माता की आन बचाने को ।
फिर चाहे आता होकर विजित, या जाता हो रण करने को ।
चरण-धूलि पाने को उसकी , है आतुर  आज मेरा मन भी ।






© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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