हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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सोमवार, 16 अगस्त 2010

हर बार वही कहानी

एक अजब सी प्यास है मन में , एक अजब सी तड़फ है दिल में ।
मै व्यक्त नहीं कर पाता हूँ , ना शब्दों में लिख पाता हूँ ।
शायद मै समझ ना पाता हूँ , या स्वयं से छिपाता जाता हूँ ।
बेचैन मुझे वो करती है , अस्थिरता मुझमें भरती है ।

मेरे तन-मन में वो हर पल , आग जलाये रखती है ।
भुला जगत की मर्यादा , वो आगे बढ़ने को कहती है ।

जाने कब मुक्ति मिलेगी , मुझको इन व्याकुल भावों से ।
या जाने कब तृप्ति मिलेगी , मुझको इनकी बाँहों से ।

जो भी हो पर मेरे लिए , हर पल है अग्नि-परीक्षा ही ।
हर बार उतरना खरा मुझे , है अंतत: मेरी मजबूरी भी ।

शब्द जबाँ तक आते है , फिर ओंठ सिये क्यों रहता हूँ ?
जानबूझ कर सब कुछ मै , अंजान बना क्यों रहता हूँ ?

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

2 टिप्‍पणियां:

nilesh mathur ने कहा…

वाह! क्या बात है, बहुत सुन्दर !

Coral ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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