हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

जिन्दगी शोलों में तप-तप के...."ओशो"

जिन्दगी शोलों में तप-तप के निखरती ही गयी
जितनी ताराज हुयी, और सँवरती ही गयी ।
तल्खियाँ जैसे फिजाओं में घुली जाती हैं ।
जुल्मते हैं कि उमड़ती ही चली आती हैं ।
आशियाने के करीं बिजलियाँ लहरातीं हैं ।
आग और खून के तूफां भी चले आते है ।
मुह कि खाते हैं,पछड जाते है,जक पाते है ।
जितनी तराज हुई जिंदगी , संवरती ही गयी ।
आग के शोलों में तप तप के निखरती ही गयी ।
आगें जलती ही रहीं , शोले बरसते ही रहे ।।

(द्वारा ओशो रजनीश )

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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