हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

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सोमवार, 18 जुलाई 2011

एक सीख जो हमें सिखा गयी...

एक दिन यू ही सोंचा मैंने , क्यों न प्रभु का ध्यान धरे ।
प्रभु में अपना ध्यान लगाकर , क्यों न धर्म का काम करें ।
प्रीति लगाकर प्रभु में अपनी , उसको अपना मीत बनाऊ ।
मीत बनाकर उसको अपना , जग में थोड़ा पुन्य कमाऊ ।

इसी आस को लेकर मन में , पहुँच गया एक जंगल में ।
अपनी चादर वहां बिछाकर , ध्यान धरा मैंने प्रभु में ।
यूँ कुछ पल ही बीता होगा , मुझे बिछाये अपना आसन ।
आया एक पागल दीवाना , और रौंद गया मेरा आसन ।

यह देख मुझे जो आया क्रोध , मैंने उसको धर-रपटाया     ।
पकड़ के गर्दन उसकी मै , वापस आसन तक ले आया ।
मैंने पूंछा  उसे पटककर , क्यों दिखी नहीं तुझे मेरी चादर ।
या फिर तुझको आता नहीं , करना औरों का आदर ।

सुना जो उसने हँसा जोर से , फिर बोला वह मुझे रोंक कर ।
मै भी दिवाना तू भी दिवाना , यही लगता है मुझे तुझे देखकर । 
मै हूँ नश्वर नारी का दीवाना , फिर भी मुझको जग नहीं दिखता ।
तू तो है उस प्रभु का दीवाना , फिर भी तुझको चादर दिखता ?

समझ गया मै उसकी बात , प्रभु ने मारी मेरे अहम् पे लात ।
व्यर्थ था  आगे करना उससे , अब किसी तरह को कोई बात ।
प्रभु की लगन अगर है दिल में , क्यों हम करे दिखावा जग में ।
क्यों भाग कर जाये हम जग से , रहें प्रेम से क्यों न जग में ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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