हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

पांडव बन कर रहें....

दोस्तों यदि आपको अपने जीवन में सफल होना है तो आपको पांडव बनना होगा अर्थात :-
  1. युधिष्ठिर :- युद्ध में स्थिर रहने वाला धर्म ,विवेक , बैराग्य।
  2. भीम      :- दृढ संकल्प, बल ।
  3. अर्जुन    :- एकाग्रता, एकनिष्ठा ।
  4. नकुल    :- कुलहीन ज्ञान ।
  5. सहदेव  :- लगन (भक्ति) ।
इस प्रकार हम अपने अन्दर सभी पांडवों के प्रतीक धर्म , संकल्प , एकाग्रता , ज्ञान और लगन को वास्तविक अर्थो में समाहित करना होगा क्योंकि बिना इन सभी को सम्मलित किये आप राष्ट्र को रोकने वाले 'धृतराष्ट्र' और उसके 'दु: ' नामधारी पुत्रों से लोहा नहीं ले सकते है ।

"काल का चक्र जब,
                          रच रहा कुचक्र हो ।
और उससे बचने का ,
                          हो ना कोई रास्ता ।
द्वार सब बंद हो ,
                         और रास्ते भी तंग हों ।
बढ़ रहा कुचक्र हो ,  
                         चल रहा नित चक्र हो ।
                                           तब
बचने को काल से ,
                         दो ही हैं रास्ते ।
रोंक दो चक्र को ,
                        और तोड़ दो कुचक्र को।
या तोड़ दो चक्र को ,
                         और रोंक दो कुचक्र को ।
फिर ना कोई चक्र होगा ,
                          ना ही कुचक्र होगा ।।"
 ध्यान रहे कि कुरुक्षेत्र की लडाई केवल द्वापर तक सीमित ना रहकर आज भी हमारे जीवन की दिन प्रतिदिन की घटना है ।
  

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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