हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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सोमवार, 19 जुलाई 2010

झूंठा सच्चा, सच्चा झूंठा

लोग कहते हैं झूंठ के , पैर नहीं होते हैं ।

सच है, मैंने उसे घिसटते हुए देखा है ।
लोग कहते हैं  झूंठ, सच के बल पर चलता है ।
झूंठ है, मैंने उसे सच को चलाते देखा है ।
लोग कहते हैं अंत में, सच की जीत होती है ।
सच है, खरगोस को मैंने रस्ते में सोते देखा है ।

ऊपर के शब्दों में मैंने, कुछ झूंठ कहा बाकी सच है ।
ये बात जान लो फिर भी तुम, झूंठ का हिस्सा इसमें कम है ।
तुमको जैसा भाए वैसा, तुम इसको स्वीकार करो ।
सच झूंठ अलग करने में, ना व्यर्थ कोई विवाद ।
क्या कहते है जग वाले , ना अपना समय बर्बाद करो ।
बस अपने मन की सुनकर तुम , अपने मन की बात करो ।
०५/०५/२००४

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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