हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शनिवार, 31 जुलाई 2010

स्वंबली ही है बलशाली

जिन्हें चाहिए बल औरों का ,
वो पूजा करें बलवानों का ।
मुझको अपने बल का भरोसा, 
क्यों मान  रखूँ अभिमानों का ।  

जो लोग पूजते हैं उनको ,
जो हों चढ़ते सूरज की तरह ।
वो क्या आश्रय देंगे तुम्हे ,
तुम ढलते हुए सूरज की तरह ।

वो स्वं निर्भर हैं औरों पर ,
औरों से बल पाते हैं ।
औरों के बल पर अब तक ,
कौरव बनकर जी पातें हैं।

जो लोग बनाते सूरज है ,
वो लोग ही बल दे पातें हैं ।
निज बुद्धि और बाहुबल से ,
रक्षित जग को कर पातें हैं ।

चाहे जितने बलशाली हों , 
ये शूर-वीर कौरव दल के ।
नहीं टिके हैं नहीं टिकेंगे ,
पांडव के आगे छल बल से।

ये कथा नहीं महाभारत की ,
हर युग का लेखा-जोखा है ।
स्वंबली के बल के आगे,
पराश्रितों ने घुटना टेका है।।  

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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