हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

द्वन्द..

भटक रहा क्यों मन मेरा , मै जान न पाता हूँ स्वयं ही ।
मन के द्वन्द बढाकर मै , क्यों हर्षित होता हूँ स्वयं ही ।
मै स्वयं ही बनाता भंवरे हूँ , फिर नाव फँसता उसमे मै ।
लाभ हानि की बातो को , फिर व्यर्थ उठता मन में मै ।
खोज रहा उन भावो को , जो मुझको आहत कर जाते है ।
मेरे मर्मस्थल पर जो , अपनी छाप छोड़ कर जाते हैं ।
इसका कोई अर्थ नहीं , वो आहत कितना करके गए ।
क्या मूल में भावो के , क्या वो मुझसे कह के गए ।

मै तो बैठा था पहले से , किसी कारण से कुछ जला-भुना ।
जो बही अचानक पुरवाई , फिर आग बढ़ गयी कई गुना ।
मै खोज रहा था रेतीले , टीलो पर पिछले पदचिन्हों को ।
एक हवा की आहट ने आकर , भुला दिया सब चिन्हों को ।
क्या है सच क्या झूँठ यहाँ , मै स्वयं ही जान न पाता हूँ ।
मन के इस भटकाव को मै , क्यों रोंक नहीं अभी पाता हूँ ।
फिर देता हूँ विस्तार निरंतर , अपने मन के द्वंदों को ।
देख रहा हूँ बनते बिगड़ते , अपने ही प्रतिबिम्बों को ।
सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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