हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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रविवार, 23 जनवरी 2011

आवो तुम्हे पालतू बनायें...

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।

हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।

परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है ।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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