हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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मंगलवार, 29 जुलाई 2014

तकनीकी का आया युग है..

देखो देश तरक्की पर है , तकनीकी का आया युग है ।
चोरी चोरी चुपके चुपके , कल तक बिकता था ईमान ।
आज बिक रहा है वो देखो , खुल्लम खुल्ला इंटरनेट पर ।
कल तक भाव लगा करता था , गिनकर खोखा पेटी को ।
आज बिक रहा है ईमान, नेतागण का लेकर नाम । 

देखो देश तरक्की पर है , तकनीकी का आया युग है ।
कल तक बिकते थे जनसेवक , सत्ता के तंग गलियारों में ।
आज बिक रहें है वो देखो  , खुल्लम खुल्ला इंटरनेट पर ।
पहले भाव बताते थे कुछ , सत्ता के घुसपैठ दलाल ।
आज लगाता भाव है देखो , इंटरनेट पर ओलेक्स डाट काम ।

देखो देश तरक्की पर है , तकनीकी का आया युग है ।
कल तक बिकती थी अस्मिता , लाल रोशनी की बस्ती में ।
आज बिक रही है वो देखो , खुल्लम खुल्ला इंटरनेट पर ।
पहले तो कुछ चुपके चुपके , लोग दलाली करते थे ।
आज कर रहा है सब खुलकर , इंटरनेट पर बाजी डाट काम ।

देखो देश तरक्की पर है , तकनीकी का आया युग है ।
कल तक रात अँधेरे में जो , लूट रहे थे राज पथो को ।
आज डकैती डाल रहे है  , खुल्लम खुल्ला इंटरनेट पर। 
कल तक गली मोहल्लो में जो , चोर सिपाही खेल रहे थे ।
आज खेलते हैं अब देखो , साइबर क्राईम डाट डाट काम ।

देखो देश तरक्की पर है , तकनीकी का आया युग है ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

सोमवार, 2 जून 2014

यूँ ही टाइम पास..

लो चली आज फ़िर से आंंधी चली , राहे अपनी वो खाली कराती चली । 
शाखे सूखी हो या हो हरे पेड़ों की, तोड़ कर वो पीछे गिराती चली ।
फ़ूल पत्तो के बारे मे क्या मै कहूँ  , उनकी तो हस्ती पूरी मिटाती चली।
राह मे जो भी आयेगा मिट जायेगा , तिनके तिनके को देखो उडाती चली।
घाव मेरे भी दिल पर लगाती चली, जुल्मो सितम जब वो तुम पर ढाती चली।
आंसूओ की कहाँ है उसको कदर , वो तो सागर को पोखर से मिलाने चली ।

बात करते हो क्यों तुम अभी धूप की, वो तो दिनकर की सत्ता झुकाने चली ।
कुटियों की अब मांगें हम खैरात क्या, वो तो महलो को भी खण्डहर बनाने चली।
रोंक पाओ अगर तो अभी रोंक लो , वर्ना हस्ती वो तुम्हारी मिटाने चली ।
क्यों छिपाते हो अब तुम मेरे राज को , वो सारी दुनिया को हकीकत बताने चली।
आग दिल मे लगे चाहे बस्ती जले , वो तुमको फ़िर मुझसे मिलाने चली ।
क्यों दिखाते हो तुम खौफ़ बाहुबलियों का, वो तो सूबो की पलटन हराने चली।

थी मेरे भी मन मे हसरत कहीं , आओ तिनको को आंधी से लडाने चले ।
जो उठी थी आहें कभी मेरे दिल से ,वो ही बनकर के आंधी है देखो चली ।
न्याय सबको वो सबसे दिलाने चली , नयी बस्तियो को फ़िर से बसाने चली।
ढांंप दिनकर को रैना बनाने चली , तेज भारत का सबको दिखाने चली।

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मंगलवार, 11 मार्च 2014

श्रापित...

क्या कहे किससे कहें , क्यों कहे हम निज व्यथा। 
व्यर्थ है कहना यहाँ कुछ , जहाँ लोग सुनते हैं कथा। 
हाँ कथा ही सुन रहे सब , भूल कर निज संवेदना। 
हो गए जड़वत जहाँ सब , क्या वो समझेंगे वेदना। 
यदि सत्य को भी सत्य का , जब पड़े देना प्रमाण। 
समझ लीजै तब वहाँ , बस निकलने वाले हैं प्राण। 

आम क्या और खास क्या , जब यहाँ दोनों व्यथित। 
कौन पोंछे आँसू किसके , राज्य ही हो जैसे श्रापित। 
किस लिए किसके लिए , हम करें फिर कुछ यहाँ। 
मृत्यु का ही उत्सव मानते , लोग हों जब सब यहाँ। 
फिर कौन शोषित कौन शोषक , ये प्रश्न ही बेकार है। 
स्वछंदता से कर रहे जब , सब यहाँ व्याभिचार हैं। 

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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

जो भी हूँ मै जैसा हूँ...

जो भी हूँ मै जैसा हूँ , अपने आप में वैसा हूँ। 
लाख कमी हो मुझमे , फिर भी अपने जैसा हूँ। 
कभी ख़ुशी कभी गुस्से में , अपनी बातें कहता हूँ।
अपनो की सब सुनता पर , अपने दिल की करता हूँ।

ना बनने की कोशिश की , ना औरो जैसा दिखने की। 
यूँ जो भी हूँ मै जैसा हूँ , बस अपने आप में सच्चा हूँ। 


कोई साथ चले या दूर रहे , अपनो के संग सदा रहता हूँ। 
अच्छा कहो या बुरा मुझे , मै अपने दिल की करता हूँ। 
गुण हो ये या दुर्गुण हो , बात ना दिल में रखता हूँ। 
हो खुशहाल या टूटा  दिल , नहीं दिल पर बोझ मै रखता हूँ। 

फिर भली लगे या लगे बुरी , मै  बात सामने कहता हूँ। 
जो भी हूँ मै जैसा हूँ , स्वय में निश्छल भाव से वैसा हूँ।  


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बुधवार, 29 जनवरी 2014

करते रहेंगे नौटंकी यार...

एक था राजा एक प्रजा थी , 
प्रजा पर सदा राजा की कृपा थी। 
यूँ राजा से पहले भी प्रजा थी , 
पर भूंखी नंगी वो सदा थी। 
था राजा का एक राजकुमार , 
जो था राजा से भी ज्यादा सुकमार। 
यूँ वो सदा विदेश ही दौड़ा करता , 
पर कभी कभी जनकल्याण का भी दौरा पड़ता। 
फिर जब देख प्रजा को उसे आता तरस , 
लगता जैसे स्वाती नक्षत्र में पड़े बादल बरस। 

जब भाव-विभोर हो जाता वो , 
समरसता लाने गरीबो के घर जाता वो। 
भूंखी-नंगी खानदानी प्रजा को ,
फिर आकर गले लगाता वो। 
खाना खाकर उनके घर में ,
लेकर डकार भूल सब जाता वो। 
चेले-चापड़ कलछुल-चमचे ,
जब जय-जयकार मचाते थे। 
देख कुँवर की पप्पूगिरी ,
राजा-रानी संग मंत्री हर्षाते थे। 

तभी ना जाने कहाँ किधर से ,
एक नया बहुरुपिया देश में आया। 
स्वॉँग बनाकर तरह तरह का ,
जनता के दिल को हर्षाया। 
बोला ख़तम करेंगे हम ,
राजा-रानी मंत्री-संतरी का भ्रष्टाचार। 
फिर बीच सड़क पर चलाएंगे ,
हम जनता की चुनी सरकार। 
लोक-लुभावन नारे देकर ,
सदा करते रहेंगे नौटंकी यार। 

यूँ जनता तो जनता ही है ,
सदा बनना मूर्ख भाग्य में है। 
करे विधाता भी क्या तब ,
जब चूतिया नन्द,चन्द,घोड़ी सब। 
अब आगे की क्या कहें कहानी ,
घाल-मेल ज्यों दूध और पानी। 
आप-साँप की जोड़ी मिलकर ,

करते है देखो मनमानी। 
यही दुआ है देश की खातिर ,
जनता हो जाये थोड़ी सयानी। 


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रविवार, 12 जनवरी 2014

बकवास...

ओ मुसाफिर इस तरह तू , है यहाँ हैरान क्यों। 
लगता है पहली दफा , इस देश में आया है तू। 
दूध की ये नालियां जो , दिख रही बहती तुझे। 
ये हकीकत में लहू है , जो लाल रह पाया नहीं। 
दिख रही तुझको यहाँ जो , हर तरफ ही होलिका।
वो हकीकत में है जलती , नव बधुओं की डोलियां।  

दिख रही तुमको यहाँ जो, होलिहारियो की टोलियां। 
वो हकीकत में खेलकर , आ रहीं खून की होलियां।
और ये जो भद्र पुरुष , तेरी बाँह में बाँह डाल रहे।
वो हकीकत में तुम्हारी , गर्दन को नापने जा रहे। 
ओ मुसाफिर दिख रहा , क्यों हैरान है इस तरह। 
लिख रहा क्यों व्यर्थ में , बकवास मै  इस तरह। 

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सोमवार, 6 जनवरी 2014

एहसान फरामोश कठपुतलिया...

ये दौर है एहसान फरामोश कठपुतलियों का ?
या बागी होने को बेताब कठपुतलियों का ?

कल तक जिनके दामन में , मैंने फूल बरसाए थे। 
वो देखो आज बिछाते है , मेरी राहो में अब अंगारे। 
कल तक मेरी नूर से जो , रोशन हो बने सितारे थे।
वो देखो आज बुझाते है , मेरी राहों के ही उँजियारे।
कल तक जिनकी राहें मै , समतल करता चलता था। 
वो देखो आज बनाते है , अब मेरी राहों को ही पथरीले। 

कल तक मेरी साँसों से , जो राहत की साँसे पाते थे। 
वो देखो बोझिल करने को , तत्पर है मेरी साँसों को। 


कल तक मेरी नीयति से जो , अपनी शाख चलाते थे। 
वो देखो आज उठाने लगे , अब उंगली मेरे दामन पर। 

कल तक पाला था जिनको , अपनी ही अस्तीनो में।
वो देखो आज चुभोने को , हैं करते जहरीले दांतो को। 


क्या भूल गए वो मेरी क्षमता , या मद में आकर बौराये है ?
अपनी कठपुतली की डोरो को , शायद वो भाँफ ना पाये है ? 

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बुधवार, 11 सितंबर 2013

मह्त्वकांक्षाये किसे प्रिय नहीं होती...

मह्त्वकांक्षाये किसे प्रिय नहीं होती , कौन रहना चाहता है उसके बिना ?
और बिना मह्त्वकांक्षाओं के कहो , मिला है किसी को कहाँ कुछ यहाँ ।
भले हो वो शासक किसी देश का , या हो वो सिपाही किसी भेष का ।
वो करता हो चाहे व्यापार कोई , या हो वो किसी का खरीददार कोई ।
देता भले हो जगत को वो शिक्षा , या लेने वो जाता हो स्वयं ही दीक्षा ।
चाहे लुटाता जगत को धरम हो , या अकेले निभाता अपना करम हो ।

अगर है जीवन में हमें कुछ करना , मह्त्वकांक्षी निश्चित ही होगा बनना ।
मगर ये तभी तक ख़ुशी हमको देती , जब तक गुलामी नहीं इसकी होती ।
बनता ये जिस दिन हमारा व्यसन है , उसी दिन गुलामी में शवसन है ।
फिर नचाने ये लगता पोरों पे अपनी , चलाने ये लगता राहों पे अपनी ।
जब हम लुटाते हैं आजादी अपनी , तभी हम बुलाते है बर्बादी अपनी ।
अच्छे और बुरे का हम अंतर भुलाते , किसी भी तरह से विजयश्री लाते ।

फिर मिटाते उन्ही को जो कल थे अपने , हमारे लिए जो बुनते थे सपने ।
फिर आता है वो पल हमारे लिए भी , जहाँ हम अपने किये को जिए भी ।
अच्छा है होना मह्त्वकांक्षी यारो , मगर उतना ही जो हित में हमारे ।
तभी हमको मिलती उससे ख़ुशी है , वही सबको देती सच्ची ख़ुशी है ।
उसी से हमारा वा जगत में सभी का , होता है सच में कल्याण थोड़ा ।
वरना भुलाकर हमको हमी से , मह्त्वकांक्षाये ही याद रहती है सारी ।

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सोमवार, 19 अगस्त 2013

कब ? कौन ? कहाँ ? कैसे ?

कब ?
        कौन ?
                 कहाँ ?
                          कैसे ?
                                   क्यों ?
                                           किसलिये ?
                                                      किसके लिये ?
                                                                   किसके कारण ?
                                                                              किसके साथ ?                                      
                                                                                         कब तक ?
               
हों जितने भी प्रश्न तुम्हारे मन में ,
उन सबको मुझे बताओ तुम !

काँटे से निकालता हूँ मै काँटा , 
प्रश्नों से मुक्त हो जाओगे तुम ।

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शनिवार, 1 जून 2013

प्राण प्रतिष्ठा...

सदियों पहले आदिवासी इलाको में ,
चलन था कुछ कुरूप से मुखौटो का।
ज्यादातर ख़ुशी में और कुछ दुखो में ,
पहनते थे लोग मुखौटो को चहरे पर।
पहनकर उसे ख़ुशी से नाचते थे अक्सर ,
या फिर दुखो में प्रकृति से माँगते कृपा थे ।

फिर न जाने क्यों प्रगति की राह पर ,
रूठ कर टूट सी गयी नैसर्गिक परम्परायें ।
याद रह गए चहरे और खो गए मुखौटे सब ,
भूल ही गए हम अपने निर्जीव आवरण को।
पर मानव तो मानव है उसने जल्द ही ,
विकसित कर ली फिर से नयी विधाए ।

इस बार मुखौटे चुना जो उसने वो दिखते सुन्दर है ,
और झलकती है अब उसमे झूँठी मानवतायें ।
पहले तो सांकेतिक थे ये मुखौटे ,
जब कुछ अवसर पर ही चेहरो पर होते थे ।
अब तो उनमे भी सचमुच जीवन है ,
और हम मुखौटे बन कर ही जीते है ।

सदियों पहले जो हो ना सका वो ,
आज है हमने कर दिखलाया ।
एक निर्जीव मुखौटे को मानव सा ,
हमने जीवन जीना है सिखलाया ।
यह कला भी अदभुद न्यारी है ,
अब सब लोको में यह प्यारी है ।

मानव ने प्राण प्रतिष्ठा कर ही दिया ,
अब पालन करने को ईश्वर की बारी है ।

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सोमवार, 20 मई 2013

सपने और अपने..

"औरंगजेब"  कल झेल़ा इसे, एकदम थर्ड क्लास बकवास मूवी , सिवाय सिर्फ एक बेहतरीन डायलाग के -
"सपनों से ज्यादा अपनो की कीमत होती है" , बात तो सच है पर क्या ये बात नहीं अधूरी ?

कहते तो सच हो सारा , पर कही बात अधूरी है यारा ।
सपनों से ज्यादा अपनो की , जीवन में कीमत होती है ।
पर अपने ही अपने ना हो तो, सपनों की बात करे हम क्या ?
सपने और अपने दोनों ही , कुछ सच कुछ आभासी होते है ।
कुछ दिखते अपनो के जैसे , पर सपनों के जैसे होते है ।
कुछ सपने सपने होते है , पर अपनो के जैसे होते है ।

मत हँसो मेरी इस बात पर तुम , मै बात घुमाता नहीं यारा ।
दिल की बात जो दिल से निकले , वही बात मै कहता हूँ यारा ।
सपने और अपने दोनों ही , अपने और पराये होते है ।
जो निभा सके संग तेरे अपना , बाकी सब पराये होते है ।
सपने बस सपने होते है , अपने बस अपने होते है ।
कुछ अपने सपने होते है , कुछ सपने अपने होते है ।

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मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

मन मेरा खाली-खाली है...

एक जाम तो पीने दो मुझको , मन मेरा खाली-खाली है ।
बेगानों सा लगता ये जग , यह रोज मनाता दिवाली है ।
मेरी समाधि मिटाकर के , वो चाह रहे हैं भवन बनाना ।
तुम उन्हें बता दो जाकर के , है शेष मुझे जग से जाना ।
पैमानों से क्या नाप रहे , बस जी भरकर मुझे पीने दो ।
मत रोंको टोंको मुझको , मुझे आज हकीकत कहने दो ।

जो नोंच रहे बेदर्दी से , अभी मेरे मण्डप के फूलो को ।
तुम उन्हें बता दो जाकर , मेरी डोली उठनी बाकी है ।
मेरे जाते ही मेरा सब कुछ , उनका ही होने वाला है ।
मयखाना देख मै ठहर गया , मुझको आगे जाना है ।
अपनी ही बगिया से क्यों , नफ़रत करता माली है ।
एक जाम पिला दो मुझको, मन मेरा खाली-खाली है ।


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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

सन्नाटा...

रात  का सन्नाटा ख़ामोशी से , जब चारो तरफ पसरता है ।
बस्तियों को सुनसान कर , वो जंगलो को आबाद  है ।
भेड़ बकरियों की खोज में , भेड़ियों  का दिल मचलता है ।
उनके पीछे पीछे ही कहीं , गीधड़ो  का झुण्ड भी चलता है ।
पेट भले ही भर जाये , मन नहीं कभी भी भरता है ।
इन्सान के अन्दर छुपा , शैतान कभी नही मरता है । 
रात के सन्नाटे का , यह फायदा भी होता है ।
सफेद्पोसो के सब , करतूतों को छुपा लेता है ।
जुल्म और बेईमानी की , रंगत को बढ़ा देता है ।
कमजोर और कायरो को , बहादुर मर्द बना देता है ।
बेबस लाचार शिकारों को , दुल्हन सा सजा देता है ।
मन में छुपी कुंठाओ को , भरपूर ये मजा देता है । 
रात के सन्नाटे का , अपना ही नशा होता है ।
भीड़ के सूरमाओ की , रोंगटों को कंपा देता है ।
अपनी ही परछाहियों से , बहुतो को डरा देता है ।
भेड़ियों और गीधडों के , झुण्ड ये बना देता है ।
बदला  लेने वालो को , मौका ये दिला देता है ।
जुल्म करने वालों के , हस्तियों को मिटा  देता है ।

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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

क्षमा करे श्री राम मुझे...

क्षमा करे श्री राम मुझे , पर सहमत नहीं हूँ मै तुमसे ।
कहने को तो कहता हूँ , मर्यादा पुरषोत्तम भगवान तुम्हे ।
पर कभी खटकती है दिल में , कुछ छोटी छोटी बात मुझे ।
यूँ तो वो भी सतयुग था , जो सत को समझ न पाया था ।
मै तो कलयुग का प्राणी हूँ , क्या समझ सकूँगा तेरे सत को ।
वो भी क्या था राज्य कोई , जो अबला की रक्षा कर न सके ।
तुम भी क्या थे पुरुष कोई , जो नारी का आश्रय बन न सके ।
केवल समाज के कहने पर ,पति धर्म का ना निर्वाह किया ।
बिना ठोस कारण के ही , एक अबला पर अत्याचार किया ।

मारा था तुमने बाली को , पर नारी गमन के कारण ही ।
पर क्या निज नारी को , उसका अपना सम्मान दिया ।
सुग्रीव भी एक अपराधी था , जिससे भय ने भ्रात द्रोह का पाप कराया ।
पर तुमने उसको गले लगाकर , छल से किष्किन्धा का राज्य दिलाया ।
इन्द्रजीत के यज्ञ को क्यों , लक्ष्मण के हाथो विध्वंस कराया ।
वो तो केवल यज्ञ ही था , क्यों धर्म कार्य जबरन रुकवाया ।
तुम तो केवल निभा सके बस , उस समय की कुछ मर्यादा को ।
क्यों नहीं रचा तुमने नूतन , सत पुरुष के नव प्रतिमानों को ।
क्षमा करे श्री राम मुझे , मै सहमत नहीं हो पाया तुमसे....... ।


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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

पीने दो...

पीने दो मुझको जी भर , ना रोंको मुझको आज अभी 
दो चार ही प्याले टूटे है , मदिरा का है अम्बार अभी ।

मै तो आकर बैठा हूँ , दो चार पलो के पहले ही 
कुछ लोग यहाँ बैठे है , जो बिता चुके हैं युग ही ।
अब भी वो देखो प्यासे है , फिर माँग रहे हैं जाम अभी ।
मैंने तो बस चखा ही है , तर भी न हुए है ओंठ अभी ।
कैसे मै छोड़ कर उठ जाऊ , कैसे उस पार चला आऊ 
उस पार क़यामत व्यापी है , इस पार ही क्यों न बस जाऊ ।

तुम व्यर्थ में ही घबराते हो , क्यों उस पर मुझे बुलाते हो 
इस पार नहीं कोई बंदिश है , क्यों बंधन में फँसाते हो ।
इस पार बरसती हाला है , उस पार हर तरफ ज्वाला है ।
इस पार अभी मै होश में हूँ , उस पार सभी मदहोश ही है ।
फिर पीने दो कुछ जाम अभी , न व्यर्थ में नापो पैमानों से 
पहचान मै अपनी भूल गया , न पहचानो तुम मयखाने में ।

है अगर साथ देने का जज्बा , आओ बैठो साथ मेरे ।
वो देखो साकी आती है , देने को हाथो में जाम तेरे ।
आओ कुछ पल जी लो , तुम भी थोडा सा पी लो ।
अहंकार को भुला कर तुम , थोड़ी सादगी जी लो ।
पीकर ही तुम नमन करो , वर्ना तो झुंकता है बस तन ।
जब तक आँखे पुरनम ना हों , व्यर्थ झुंकाना है ये तन ।

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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

दोस्ती और दुश्मनी..

दोस्ती और दुश्मनी , दोनों को निभाने के लिए दिल में जज्बा , दिमाग में पैनापन और हौसले (जिगर) में मजबूती की जरूरत होती है..।

दोस्ती और दुश्मनी दोनों सीखने के लिए , महसूस करने के लिए और निभाने के लिए हमें एक दूसरे के नजदीक जाना पड़ता है , बीच की दूरियों को मिटाना पड़ता है और अपने दिल , दिमाग और नजर में उसे बसाना पड़ता है।

अगर दोस्ती दो दिलो को मिलाती है , दो जज्बातों के बीच एक पुल बनाती है........ तो दुश्मनी दो दिमागों को नजदीक लाती है और उनके इरादों के बीच की दीवार गिराती है।

जहाँ एक अच्छी दोस्ती कभी कभी हमारी रातो की नींद हराम करती है... वही एक बेहतरीन दुश्मनी अक्सर हमें चैन की नींद उपहार में देती है ।

ये हो सकता है कि आपके अच्छे दोस्त भी आपका साथ बुरे दिनों में छोड़ दे.... पर यह कभी नहीं होता है कभी आपके दुश्मन आपको भूल जाये ।

दोस्ती एक कमजोर और खोखली नींव पर भी खड़ी हो जाती है पर ... दुश्मनी सदैव एक मजबूत आधार पर ही टिकती है ।

दोस्ती में लोग अपनी आदतों को दूसरे पर थोपने की कोशिश करने लगते है और दुश्मनी में खुद से दूसरो की आदतों को जानने की कोशिश करते हैं ।

दोस्ती की चाहत रखना सरल है , करना आसान है पर वास्तव  में उसे निभाना कठिन है पर ..दुश्मनी की चाहत रखना कठिन है , करना आसान है और निभाना अत्यंत ही सरल है ।


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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

मेरे मुखौटे...

कुछ लोग मुखौटे पहन रहे ,
कुछ लोग मुखौटा जीते हैं ।
जो लोग जमीं को तरस रहे ,
वही लोग आसमां जीते हैं ।

कुछ लोग सियासत करते हैं ,
कुछ लोग सियासत पहन रहे ।
कुछ लोग नजाकत रखते हैं ,
कुछ लोग नजाकत  ओढ़ रहे ।

यूँ हम भी अपने चहरे पर , कुछ एक मुखौटे रखते हैं ।
जिसने जैसा चाहा हमसे , वैसा ही हम उसे दिखते हैं ।
क्यों जिद करते हो तुम मुझसे, मेरे किसी और ही चेहरे को ।
तुम अभी गुलाब के आदी हो , मत माँगो के कमल फूलों को ।
इसको ही तो कहता हूँ  मै , सज्जनता सादगी मेरे जीवन की ।
एक बार जो तुमने देख लिया, वह मुखौटा न बदलेगा पुन: कभी ।

तुम चाहे जो भी नाम रखो , मै तो गिरगिट कहता हूँ ।
जो भी जैसी शाख मिली , मै वैसा ही रंग रखता हूँ ।

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बुधवार, 6 जुलाई 2011

मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन ,मैं बेनक़ाब सही,बेनक़ाब रहने दे।"

पुन: स्वागत है आप सभी का 

इस समय मेरी शाम ढल रही है (निशाचर हूँ ना भाई..लंकापति रावण मेरे लकड़-दादा थे ) मगर आधी दुनिया गहन निद्रा में सो रही है...और आधी कुछ घंटों बाद जागने की वाली है , तो मुझे पता नहीं कि इस समय आप सभी से शुभ प्रभात कहूँ या शुभ रात्रि.. ?

खैर होता है छोटे-छोटे और बड़े-बड़े जगहों पर... ठीक वैसे ही जैसे एक बेचारी महिला के चिठ्ठी में हुआ था कभी...

तो आईये एक खुला पत्र पढ़ा जाय और कुछ देर हंसी का आनंद उठाया जाय ....

गांव में एक स्त्री थी । उसके पतिदेव कही बाहर कार्यरत थे । 
वह आपने पती को जब भी पत्र लिखना चाहती थी अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं होता था कि पूर्णविराम(full stop) कहां लगेगा । इसीलिये उसका जहां मन करता था वहीं पूर्ण विराम  लगा देती थी ।
कुछ इसी तरह से उसने एक चिट्टी इस प्रकार लिखी--------

मेरे प्यारे जीवनसाथी 

मेरा प्रणाम आपके चरणो मे । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नौकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेडीया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खुबसूरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी मां । तुमको बहुत याद कर रही है एक पडोसन । हमें बहुत तंग करती है

तुम्हारी मां की । बहू

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अब क्या करे... कई दिनों से टल रहे प्रोग्राम के बाद आज डेल्ही वेळी देख कर आया हूँ तो यही सब पोस्ट लगेगी ना.. वैसे अब पता चला कि आज और हमेशा के मेगा स्टार अमित जी की "बुड्ढा होगा  तेरा बाप" जैसी शानदार मूवी.. की बीप..बीप  को छोड़कर लोग इसके पीछे क्यों दीवाने है । भाई जब आप खुलेआम लोगो की माँ..बहन की जै-जयकार करने में संकोच नहीं करते है तो पिक्चर हाल में सुनने में क्या बुराई .... आखिर कब तक हिन्दुस्तानी अपने चेहरे और भावनाओ पर नकाब पहन कर चलेगा ?

और आज जब पश्चिम पूरब होने को व्याकुल हो रहा है तो ध्रुवों का सामंजस बनाये रखने के लिए पूरब को भी पूरी तरह कल का पश्चिम बनना ही होगा 

तो सभी को हार्दिक बधाईयाँ........

वैसे टी.वी. ओपरा तो पहले से ही व्यस्क हो गया था ... हर दूसरे सीरियल में किसी ना किसी का तीसरे से अफेयर चल रहा है ... और तो और बहू का राज खुले तब तक सास की सास के पुराने रिश्ते वहां खुल जा रहे है और घर तोड़ने की सभी सोलह कलाए वो सिखा ही रहा है  तो भारतीय सिनेमा ही क्यों सम-सामयिकता से पीछे रहता..

तो अब किसी के कहे (नाम याद नहीं ) दो लाईनों के साथ एक अल्प विराम ..

 "किसी जगह के लिए इंतख़ाब रहने दे ,मैं एक सवाल हूँ मेरा जवाब रहने दे।
मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन ,मैं बेनक़ाब सही,बेनक़ाब रहने दे।"


सोमवार, 2 मई 2011

तलब

चाहतें हद से जब गुजरने लगी , 
न चाहते हुए भी नजर तुझपे पड़ने लगी ।
प्यासा था मै बहुत पहले से साकी,
अब दिल में भी तड़फ उठने लगी ।

यूँ तो खायी थी कसम न आयेंगे इधर , 
पर कदम मेरे खुद आ गए तेरे पास ।
अब आ ही गए हैं तो पिला दो मुझे , 
फिर करते रहना तुम बाकी हिसाब ।

पहले जब आकर पिया था यहाँ ,
मैंने माँगी थी तुमसे केवल शराब ।
गया जब घर और उतरा उतरा नशा ,
मैंने जाना कि उसमे मिली थी शबाब ।

तो आ ही गए हम अब फिर से यहाँ ,
आज नज़रों से ही तुम पिला दो शराब ।
बस आँखों ही आँखों से पिलाना मुझे ,
जाम छलके नहीं ना ही टूटे गिलास ।

कहो तो खुदा की मेहर गिरवी रखूँ ,
भरोसा रखो मुझ पर साकी तुम आज ।
आँखों ही आँखों से मै पीता रहूँगा ,
छुऊँगा नहीं जाम हाथों से आज ।

तमन्ना है मेरी यही बस ओ साकी ,
जो पहले पिया था फिर से पिला दो ।
कहो तो दुबारा नहीं आऊँगा मै ,
बस अबकी छका कर मुझे तुम पिला दो ।।


© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 17 मार्च 2011

आज और अब तक का बासी, गिद्ध-वाणी-3

नमस्कार

अनंत अपार असीम आकाश की गिद्ध-वाणी में आप सभी विचरण कर रहे प्राणियों का स्वागत है....

आज की गिद्ध वाणी में अब आप के समक्ष समाचार जगत से आज और अब तक  का बासी पर गिद्ध दृष्टि से देख कर गिद्ध उवाच प्रस्तुत है....

बासी खबर : राजा के करीबी बाशा की रहस्यमय मौत।
गिद्ध उवाच : शायद यह एक शुरवात है, मामलों को अंत तक न पहुचने देने का  ।

बासी खबर : चीन की सैन्य ताकत से भारत सतर्क
गिद्ध उवाच : हाँ और कुछ नहीं तो हम जागते रहो तो चिल्ला ही सकते हैं ।

बासी खबर :  सरकार को अदालत की फटकार
गिद्ध उवाच : सरकार को फटकार चिकने घड़े पर पानी गिराने जैसा है ।

बासी खबर : साझा चुनाव चिह्न नहीं-सुप्रीम कोर्ट
गिद्ध उवाच : क्यों भाई , जब साझा सरकार हो सकती है तो चुनाव चिन्ह क्यों नहीं ?

बासी खबर : 2जी मामला, राजा पर लगेगा अभियोग
गिद्ध उवाच : पक्का ना ! कहीं चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के समीकरणों से इरादा ना बदल जाय।


बासी खबर : हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के प्रयास
गिद्ध उवाच : वाह जी आज तक पूरे भारत की तो भाषा बना नहीं पाए , चले संयुक्त राष्ट्र का सपना देखने ।


बासी खबर : भारत में सुनामी का खतरा नहीं: सरकार।
गिद्ध उवाच : यह गारंटी अन्य सरकारी वायदों जैसी ही है , जब सुनामी आएगी सब बहा ले जाएगी  ।


बासी खबर : चरम पर है क्रिकेट का बुखार।
गिद्ध उवाच : चलो इससे कुछ दिनों तक भ्रस्टाचार के बुखार से जनता का ध्यान हटा रहेगा ।


बासी खबर : जापान को मिली थी चेतावनी-विकीलीक्स।
गिद्ध उवाच : मिली होगी चेतावनी , मगर सरकारे अपने तरीके से ही काम करती हैं ।

तो इसी के साथ अगली गिद्ध वाणी के प्रकाशन तक गिद्ध हस्त प्रणाम..

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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