हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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रविवार, 17 अगस्त 2014

मिले जो राह में कांटे..

मिले जो राह में कांटे , कदम वापस ना लेना तुम ।
उन्हें समेट कर आगे , कदम अपने बढ़ाना तुम ।
मिले जो राह में ठोकर , कदम धीमे ना करना तुम ।
कदम की ठोकरों से ही , राह खाली कराना तुम ।
खड़े अवरोध हों आगे , ना घबड़ाकर रुक जाना तुम ।
मिटाकर हस्तियाँ उनकी , मंजिल अपनी पाना तुम ।

मिले जो संगी साथी तो , उन्हें भी साथ ले लेना ।
मगर घुटनों पे रेंग कर , कभी ना साथ तुम देना ।
निभाना दोस्ती या दुश्मनी , आगे ही बढ़कर तुम ।
मगर कभी पीठ में छुरे को , ना अवसर देना तुम ।
लगी हो जान की बाजी , अगर मंजिल को पाने में ।
कभी भूले से ना मन में , हिचकिचाहट लाना तुम ।

भले ही लोग करते हों , तुम्हारी कैसी भी निंदा ।
भूल कर जग की बाते , साथ सच का ही देना तुम ।
ना खाना खौफ तूफानो से , हौंसला साथ तुम रखना ।
भले ही कुछ भी हो जाए , साथ तुम अपनो के रहना ।
दिखे कुछ भले मुश्किल , मगर मुश्किल कहाँ कुछ भी ।
अगर तुम ठान मन में लो , कहाँ कुछ भी तुम्हारे बिन ।

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शनिवार, 19 जुलाई 2014

खुले दिल दिमाग से....

अपने पक्ष की कमियों को सदैव खुले दिल दिमाग से स्वीकार करना चाहिए 
और उसे बताने वाले को इसके लिए धन्यवाद का पात्र मानना चाहिए कि 
उसने आपकी कमियों को आपको बताकर आपको सुधार का अवसर दिया।
ठीक इसी प्रकार विरोधियो और शत्रुओं के गुणों की भी खुले मन और हृदय से 
सराहना करनी चाहिए और उन्हें उनके गुणों के लिए प्रशंसा का पात्र मानना चाहिए।


 सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

गुरुवार, 5 जून 2014

समय फिर लौट आता है...

समय सदैव ही अपने को दोहराता है ,
हमारा अतीत फिर भविष्य बन कर सामने आता है ।
जो बोया था हमने हमारे भूत काल में ,
वो ही आगे नयी पौध बनकर लहलहाता है ।

जो नापसंद था हमें हमारे अतीत में हमेशा ,
कि कोई क्यों वैसा करता है जो हमें नहीं भाता है ,
वही बाते वही आदते काल पात्र स्थान बस बदल कर ,
ये समय किसी और के लिए हमसे भी करवाता है ।

और देखो तमाशा समय का यारो हमेशा ही ,
कौन सही था कौन गलत अतीत में ,
ये वर्तमान ही हमें बता पाता है और ,
यूँ ही समय हमसे हमारे भावनाओं से खेलता जाता है ।

समय अपने बीतने के साथ साथ ,
हमें तमाम नए सबक सिखाता है ,
और यूँ ही कभी पछतावा तो कभी ,
एक नयी संतुष्टि का एहसास कराता है ।

जो बीता था अतीत जब फिर वर्तमान बन कर सामने आता है ,
बस एक ही अफसोस दिल में रह जाता है ,
हम बदल नहीं सकते उसे जो अतीत बन जाता है ,
भले ही समय काल-पात्र-स्थान-चाल-चरित्र-चेहरा बदल कर फिर लौट आता है ।

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बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्वागत है नव वर्ष २०१४ … तुम्हारा स्वागत है

पुरानी डायरी के पन्नो से निकली "नये साल १९९८ के स्वागत में लिखी गयी कुछ पंक्तिया" जो शायद आज पुन: २०१४ में मेरे लिए फिर से उतनी ही मायने हो गयी है जितनी आज से १६ साल पहले वो मेरे लिए जवान थी.....

लक्ष्यहीन हो जायें उससे पहले हमें पहुँचना है ,
कर्महीन हो जायें उससे पहले हमें बदलना है। 
कांतिहीन हो जायें उससे पहले हमें चमकना है,
भावहीन हो जायें उससे पहले हमें निखरना है। 
दयाहीन हो जायें उससे पहले हमें सिसकना है ,
महत्वहीन हो जायें उससे पहले हमें निकलना है। 

खण्ड-खण्ड हो जायें उससे पहले हमें सिमटना है ,
प्राणहीन हो जायें उससे पहले हमें सम्भलना है। 
हाँ केवल बाते कहने से अब काम नहीं चलना है ,
संकल्पहीन हो जायें उससे पहले कर्म को करना है। 
पथहीन हो जायें उससे पहले नयी राह पर चलना है ,
नववर्ष के इन संकल्पो को संकल्पित हो करना है। 

आप सभी को नववर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाए …। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 30 नवंबर 2013

ना बेकल हो मेरे मन...

ना बेकल हो मेरे मन तू  इतना , समय की धारा  बहने दे। 
जो चीज लिखी जिस समय तुझे , वो समय पास तो आने दे। 
तेरे बस में केवल इतना , कर्तव्य निभाता अपना चल।
कंकर पत्थर काँटों को हटा , तू राह बनाता अपना चल।
है फूलो से जो प्यार तुझे , कलियो को ना मुरझाने दे। 
डाल से तोड़ कर उनको तू , राहों में कुचल ना जाने दे। 

हो अगर जरूरी तेरे लिए , कुछ मोहरों को पिट जाने दे। 
दो कदम हटा कर पीछे तू , फिर अपनी बारी आने दे। 
मोर्चे पर डटे रहना ही सदा , नहीं समय की होती माँग कभी। 
हो अगर जरूरी पीछे हट , दुश्मन को पहले पहचान अभी।   
मत जोश में खोना होश कभी , हर शब्द तौल कर तुम कहना। 
हर शब्द के कितने अर्थ यहाँ , तुम उसका ध्यान सदा रखना। 

क्या मिला है किसको अब तक , इससे तुमको लेना क्या ?
जो तुम्हे चाहिए उसके लिए , सोंचो तुमको करना क्या ?
तैयार रहो हर पल के लिए , कब कैसी समय की धार बहे। 
मझधार में नाव को खेने का , तुमसे समय की मांग रहे। 
ना बेकल हो मेरे मन तू  इतना , समय की धारा बहने दे। 
जो चीज लिखी जिस समय तुझे , वो समय पास तो आने दे। 

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बुधवार, 27 नवंबर 2013

कृपा करो...

चाह  रहा हूँ लिखना कुछ , अंत काल तक साथ रहे । 
बनकर वो इतिहास सदा , सदियो तक याद रहे। 
हर एक शब्द अनमोल रहे , हर शब्दो से नव प्राण जगे।
धूसर हो चुकी व्यवस्था में , हर एक शब्द नव क्रांति बने।
हर एक शब्द जो लिखे लेखनी , वो मेरी आत्मा से निकले। 
मानव मन के सभी भावो की , युगो युगो की प्यास बुझे। 

शोषित पीड़ित मानव की , वह एक सशक्त आवाज बने। 
देश काल  की सीमा से हट , वह सबका अधिकार बने। 
खण्ड-खण्ड कर दे वह जग में , फ़ैल रहे पाखण्डों को। 
झाड़ पोंछ कर करे सुसंस्कृत , सब धर्मो के पण्डो को। 
दे वह नूतन परिभाषाये , सब जीर्ण हो चुके ग्रंथो को। 
छाँट अलग कर दे सारे , कुत्सित जोड़े गए छेपक को। 

हर एक शब्द में प्राण रहे , हर एक शब्द में धड़कन हो। 
हर एक शब्द स्वयं गीत बने , हर शब्दो में संगीत बसे। 
हर एक शब्द स्वयं गोचर हो , हर शब्दो से नव राह दिखे। 
हर राह में वो सहयात्री बने , हर पथ के वो अन्वेषक हो। 
है यही चाह मेरे मन में अब , हे मातु सरस्वती कृपा करो। 
मुझ जैसे तुच्छ विचारक पर , तुम अपने अभय हाथ धरो। 

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शनिवार, 27 जुलाई 2013

समय...

समय बड़े बड़े घावो  को  भरने की सामर्थ रखता है ।
आज  जिन बातो से हम द्रवित एवं विचलित होते है कल वही बाते हमारे लिए सामान्य से भी कम महत्त्व की हो जाती है ।
यही मानव स्वभाव और संसार का नियम है ।

फिर चाहे वह सांसारिक रिश्ते हो या प्राणों से प्रिय प्रेम सम्बन्ध ,चाहे भौतिक सुख की चाह हो या मानसिक असंतुष्टिया ।
समय हर किसी के प्रति हमारी सोंच एवं एहसास को बदलता रहता है ।
और अंत में हमें उसके बिना या उसके साथ जीना सिखा ही देता है…!

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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

सच ही कहा किसी ने...

सच ही कहा किसी ने , मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।
रहती अधूरी हसरते , कुछ भी बेइंतिहा नहीं मिलता ।
ऐसा नही है इस जहाँ में , कभी कुछ भी नहीं मिलता ।
लेकिन तड़फते जिसके लिए , वो अक्सर नहीं मिलता ।
यहाँ अनगिनत हैं चाहते , और अनगिनत है ख्वाहिशे ।
इल्तिजा सबकी करें , इतना भी समय नहीं मिलता ।

जी रहे मन मार कर , जीना कहें कैसे इसे ।
जाना था जिस राह पर , इत्तदा नहीं मिलता ।
ऐसा  नहीं संग साथ में , कोई नहीं चलता ।
साथ जिसका चाहिए , वो हमराह नहीं मिलता ।
जब तक जहाँ में हम हैं , हमें खुदा नहीं मिलता ।
सच ही कहा किसी ने , संग जमी आसमां नहीं मिलता ।

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शुक्रवार, 28 जून 2013

अलविदा वर्ष २०१२-२०१३....

समय कितनी तेज गति से गुजरता जा रहा है ,
बंद मुठ्ठी से रेत ज्यों फिसलता जा रहा है..!
बस अभी कुछ साल पहले तक तो मै बच्चा ही था ,
फिर ना जाने दबे पाँव कब जवानी छा गयी..!
डूब और उतरा रहा था मै अभी आगोश में ,
कि ये देखो पौढ़ता द्वार पर मेरे आ रही..!
सोंचता हूँ अब तो समझ लूँ बीतते हर वक्त को ,
हो रहा तैयार होगा कही अंत भी "अनंत" का...!

अलविदा वर्ष ...२०१२-२०१३
स्वागत है नव वर्ष २०१३-२०१४....

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मंगलवार, 7 मई 2013

रिश्तो की डोर...

रिश्तो की डोर कोई , उलझ गयी ऐसी ,
ना तोडे से टूटे , ना सुलझाई जाए ही..

रिश्ता भी ऐसा , जिसे दिल ही निभाए ,
ना छोड़े से छूटे , ना अपनाया जाए ही.. 

सांप और छछुंदर सी , हो गयी स्थिति ,
ना निगल ही सके , ना उगला जाए ही..  

रिश्तो की डोर जब , उलझ जाए ऐसी ,
कितना ही बचाओ , गाँठ लग जाए ही..

जितना ही समझो , ना बात समझ आये ,
सुलझाते सुलझाते , बात उलझ जाए ही..

अटक गयी बात जो , वो दिल से ना जाय ,
कितना ही भुलाओ , फिर से याद आये ही..

गैर कोई हो तो , कुछ बतलाया जाए भी ,
अपनो को यारो , ना कुछ कहा जाए ही..

रिश्तो की डोर एक , उलझ गयी ऐसी ,
ना तोडे से टूटे , ना सुलझाई जाए ही..

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रविवार, 14 अप्रैल 2013

चलते पाँव थके...

अब चलते चलते पाँव थके , तलुओ में पड़  गए छाले है ।
हम इतनी दूर निकल आये , अब नहीं पास घर वाले है ।
सोंचा था यूँ चलते चलते , पहचान स्वयं को जायेंगे ।
चाह रहा क्या मन बौरा , यह जान स्वयं हम जायेंगे ।
पर व्यर्थ हुआ आयोजन सब , मन अब भी लगता अंजाना है ।
यह जन्म गँवाकर भी देखो , ना स्वयं को अब तक पहचाना है।

हाँ ठीक कहा था तुमने 'अनंत' ....

सागर में ऊपर ऊपर , कब मोती किसी ने है पाया ।
शीश गँवाए भला कहाँ , ईश्वर में है कोई समाया ।
मन का क्या ? मन बौरा , कुछ दिल की भी तुम सुन लो ।
मत अपनी ही तुम करो सदा , कुछ औरो की भी सुन लो ।
आ लौट चले हम फिर वापस , घर अपने ओ परदेशी ।
कब तक यूँ ही भटकोगे , अब तो बन जाओ स्वदेशी ।

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गुरुवार, 21 जून 2012

पुराने रोग..

जाने कैसी तपिश है , वर्षो से मन में मेरे ।
गीली लकड़ी सी सुलगती , ये सदा मन में मेरे ।
चाहता हूँ मै बुझा दूँ , एक पल में बस इसे ।
पर रोंकता है मन मेरा , जाने क्यों इससे मुझे ।
हो गयी आदत मुझे , शायद पुराने रोग की ।
या अभी भी है जरूरत , व्यर्थ के कुछ ढोंग की ।
जो भी हो अच्छी नहीं , मन में सुलगती चाहते ।
बस छोड़ देनी चाहिए , अब सारी पुरानी आदते ।
रोग बन जाये अगर , तन-मन की कोई जरूरत ।
फिर नहीं किसी बाहरी , शत्रु की कोई जरूरत ।
ज्वार का धर रूप जब , मुझको बहा ले जाये लहरे ।
उससे पहले जाना होगा , छोड़ कर अठखेलती लहरे ।

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बुधवार, 25 जनवरी 2012

आखिर क्यों ?

ये आपके कदम जो,  डगमगाने लगे हैं ।
मंजिल से वो आपको , बहकाने लगे हैं ।

डरता हूँ कहीं राह ही , भटका ना दे आपको ।
आवारगी की हदे , दीवाना ना कर दे आपको ।

हमने चुना था जिसे , अपनी राहों का रहबर ।
एक तेरी नादानी में , वो हो ना जाये रहजन ।

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बुधवार, 27 जुलाई 2011

मेरा मयखाना...


मत रोको मुझे इस पर अभी , उस पार मेरा दीवाना है ।
इस पार क़यामत बरस रही , उस पार मेरा मयखाना है ।

हो रहा समय अब पूजा का , क्यों डाल रहे हो विघ्न अभी ।
इससे पहले मेरी नजर झुंके , मुझे शीश नवाना है अभी ।
नजरो से नजर मिलाकर , मुझे साकी से कुछ कहना है ।
अपने अंतर्मन में उसको , पुरजोर बिठा  कर रखना है ।

वो देखो बँटने लगा है जाम ,  और छलक रहे कुछ पैमाने ।
है तड़फ उठी मेरे दिल में भी , मुझे बुला रहे मेरे मयखाने ।
मै नहीं पियक्कड़ उनमे सा , जो पीकर राह में गिरते हैं ।
ज्यों-ज्यों मै पीता जाता हूँ , त्यों-त्यों मै होश में आता हूँ ।

जो पीने वाले हैं प्रतिदिन , वो प्रतिपल होश में रहते हैं ।
जो पीते हैं कभी यदा-कदा , वो ही मदहोशी में गिरते हैं ।
और 'मय' तो यारों चीज है वो , जो 'मै' को भुला मेरी देती है ।
'प्रियतम' की नजरो में मुझको , 'अमृत' का मजा वो देती है ।

मत रोको मुझे इस पार अभी , उस पार इबादत करनी है ।
इस पार बसे सब काफ़िर हैं , उस पार मोहब्बत करनी है ।

उस पार मै जाकर पी आऊ , इस पार मै तौबा कर लूँगा ।
इस रात मै छककर पी आऊ , कल दिन में तौबा कर लूँगा ।
तौबा-तौबा-तौबा है मुझे , इस बार न तौबा तोडूंगा मै ।
आज पिऊँगा नजरो से , न जाम छुऊंगा ओंठो  से  मै ।

जो आज मिली ना नजर मेरी , कुछ पल में ही मर जाऊँगा ।
बस रहे सलामत मधुशाला   , बाकी तो मै जी जाऊँगा ।
न रूठे मेरा साकी मुझसे , न मुझसे नजर हटाये कभी ।
न केश समेटे अपना वो , न मेरे ओंठो को तडफाये अभी ।

एक नजर देख ले मुझको वो , फिर 'मय' की मुझे जरुरत क्या ।
एक बार पिला दे छककर के , फिर 'मै' की मुझे जरुरत क्या ?
उस पार पहुँच बस जाऊ मै , इस पार लौट के ना आऊँगा ।
जिस पार मिले महबूब मेरे , उस पार ही मै रह जाऊँगा ।

मत रोको मुझे इस पर अभी , उस पार मेरा परवाना है ।
इस पार क़यामत बरस रही , उस पार इबादतखाना  है ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 24 जुलाई 2011

पाँच बाते..."आर्ट ऑफ़ लिविंग "

पाँच बाते जो आज श्री श्री रविशंकर जी के "आर्ट ऑफ़ लिविंग-२२,२३,२४ जुलाई २०११" में भगवान/आचार्य रजनीश (ओशो) के इस हमसफ़र ने जानी...

१. "विरोधाभाषी मूल्य एक दुसरे के पूरक होते है ।" ....इन्हें व्यर्थ अलग अलग करने का प्रयास न करें .......।

२. "वर्तमान अटल है।" ....भूत और भविष्य काल में न भटके , वर्तमान को स्वीकार करे....।

३. "दूसरों के गलतियों में नीयत या इरादा न ढूंढे ।" ....अपने को उसके स्थान पर रख कर सोंचे....।

४. "व्यक्ति और परिस्थितिया जैसी है वैसा स्वीकार करें । " ....पूर्णता से स्वीकार करने के बाद ही आप बेहतर कुछ कर सकते है....।

५. "दूसरों के मंतव्यो का शिकार न बने ।" ....प्रतिक्रिया के पहले अपने दिमाग का प्रयोग करे...।


हो सके तो कभी इसे भी अजमा कर देखिएगा .... (द्वारा स्वामी महेश गिरी जी) 

" किसी टोल टैक्स वाले बैरियर पर जब कभी आप अपनी गाड़ी रोंको और पैसा लेने वाला आये तो....

उसे अपनी गाड़ी के साथ अपने पीछे लगी किसी भी अंजान गाड़ी का भी पैसा अपने पास से दे दे !और साथ ही टोल टैक्स वाले को बता दे कि वो पीछे लगी गाड़ी से पैसा न ले ... बस उसे इतना बता दे की उसकी गाड़ी का पैसा मिल गया है बदले में वो बस एक बार मुस्कुरा दें ....!

इसके बाद एक पल के लिए भी आप वहां न रुके और अगर पीछे वाली गाड़ी आपको ओवरटेक करने का प्रयास भी करे तो भी उससे तेज चलिए और उसे अपना चेहरा न देखने दीजिये......और उसे पुरे रस्ते यूं ही हैरान रहने दीजिये कि किसने और क्यों उसका पैसा दिया है.......

फिर देखिये कमाल...

जब जब आप या वो अंजान गाड़ी वाला किसी भी कारण से दुखी होगा और उस पल आप दोनों में से किसी को भी ये घटना यद् आएगी आप वापस प्रशन्न हो जायेगे.... "

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

मनुष्य और भावनाएं..

भावनाए अगर न हों तो जटिलता , अगर हों तो जटिलता और इन्ही के कम,ज्यादा होने या न होने के बल पर ही चलती है ये सारी संसार रूपी माया जिसे पुरखो ने कहा है महामाया या माया ठगनी

तो कुछ वर्षो पहले कुछ आज जैसी ही रात थी और कुछ कुछ आज जैसी ही बात थी...
मै था , मेरा मन था और थी मेरी भावनाए...
मझधार में कस्ती कहीं थी .. 
और थी कुछ उपमाये 

तो फिर उस रात मैंने अपना मनो-विज्ञानं और मानव-विज्ञानं दोनों अपने पर ही आजमा डाला और फिर भावनाओ को समझने के प्रयास में तब जो मिला था आज किस्मत से दुबारा डायरी के पन्ने पलटते हुए मिल गया ..
मेरे लिए मौका भी था और कारण भी.. तो मैंने सोचा की आज इसे डायरी से ब्लाग पर लिख कर फिर से "अपने आप को अपनी ही कही बात रटाने और पढ़ाने" का प्रयास करू और क्यों न आपको भी अपना साझेदार बना लू ..
तो आईये देखते है मैंने क्या बोधि-ज्ञान पाया था.. और क्या वो सही पाया था ,,, या अभी खोज जरी रखना है ..

१. "भावनाओ की कमी मनुष्य को क्रूर और और कठोर बनाती हैं , समुचित मात्रा में होने पर संयमित और बलवान बनाती हैं परन्तु भावनाओं की प्रचुरता मनुष्य को सदैव निर्बल और मूढ़ बनाती हैं ।"
विवेक मिश्र 'अनंत'..१८/१०/०२

२. "भावनाओं की हिलोरे मनुष्य को सदैव ही आनंदित कराती हैं पर अगर ये हिलोरे भँवर का रूप लेने लगे तो उससे तत्काल बाहर निकलने में ही मनुष्य की भलाई है ।
विवेक मिश्र 'अनंत'..१८/१०/०२

३.  भावनाओं को अपनी कमजोरियों एवं असफलताओ के लिए दोषी ठहराना उसी प्रकार से अनुचित है जैसे अपने दुखों को भुलाने के लिए मदिरा का सेवन करना ।
विवेक मिश्र 'अनंत'..१८/१०/०२

और अंत में इतना ही कहना है ...

बुद्धि प्रधान है जगत हमारा , भावों से इसको भरना है ।
बुद्धि - भाव के मेल से ही , मानवता को आगे बढ़ना है ।

शुभ रात्रि ...
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 28 जून 2011

तेरी रजा....

वाह कितने प्यारे शब्द कहे गए है ...
"मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे ,
बाकी न मै रहूँ न मेरी आरजू रहे ।"
और आज इन्ही शब्दों और भावो से मै ईश्वर को धन्यवाद देना चाहूँगा कि उसने मुझे मेरे जीवन के एक और वर्ष की शुरुवात करने का अवसर दिया और जीवन में वह सब दिया जिसे जब जब मैंने बेक़रार होकर पाना चाहा ...


तूने मुझे बनाया जग में , तू ही मुझे चलाता है ।
मै तो हूँ कठपुतली तेरी , तू ही मुझे नाचता है ।

क्या मै माँगू क्या चाहूँ , कुछ समझ नहीं आता है ।
मेरी तो हर साँस में ही , बस बसती तेरी माया है ।

अच्छे बुरे यहाँ है जो भी , सारे कर्म तुम्हारे है ।
तू ही सच्चा कर्ता है , और तू ही सबका भर्ता है ।
मेरी क्या समर्थ यहाँ जो , करूँ कार्य अपने बल पर ।
मै तो बस कठपुतली हूँ , जो नाच रहा तेरे बल पर ।


तेरे बनाये इस जग में , क्या मेरा कौन पराया है ।
चाह रहा हूँ जो भी दिल में , वो सब तेरी माया है ।
सुख दुःख जो जग में आता , वह कहाँ हकीकत होता है ।
जो समझ नहीं इसे पाता है , वो ही जग में रोता है ।

जब यही सत्य है जग का , फिर कहाँ सत्य मेरी काया है ।
दसो दिशा में जहाँ भी देखो , बस फैली तेरी माया है ।
इसी तरह से इस जग को , तुमने सदा चलाया है ।
तेरी रजा ही मेरी रजा है , और तू ही मेरी काया है ।
। © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 28 मार्च 2011

रिश्ते...नाते

'अनंत' तुम्हे समझाता हूँ , 
थोड़ा सा चालाक बनो ।
है दुनिया अपने मतलब की ,
ज्यादा न बेताब बनो ।
यहाँ खून के रिश्ते भी ,
अपना मतलब ढोते हैं ।
बिना किसी मतलब के यहाँ ,
कब कोई रिश्ते होते हैं ।
है हाल बुरा सम्बन्धों  का , 
नातों को सब भूले हैं ।
ठोक-बजाकर,मोल-भाव कर ,
रिश्तों को सब जीते हैं ।
दिल में कुछ चेहरे पर कुछ ,
भाव सदा सब रखते हैं ।
भूले-भटके गलती से ही ,
कुछ रिश्ते सच्चे होते हैं ।
वो भाग्यवान होते हैं जिनको ,
सच्चे रिश्ते मिलते हैं ।
रिश्तो के बाजार में जिनको ,
काँच में हीरे मिलते हैं ।


© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 23 मार्च 2011

चिरंतर..

जाने कब मै प्रश्नों का ,
पाउँगा कोई उत्तर ?
जाने कब मेरे प्रश्नों के ,
लायक होंगे कुछ उत्तर ??
=====================

वो शायद एक भूँख  है ,
जो अक्सर सर उठा लेती है ।
या फिर वो अतृप्त प्यास है ,
जो पूरी तरह बुझती नहीं है ।

यूं तो सब कुछ ठीक ही ,
महसूस होता है सदा ।
पर कहीं किसी कोने से ,
डर लगता मुझको सदा ।

न जाने कब किस मोड़ पर ,
वह फिर उठा ले अपना सर ।
फिर उससे निपटने के लिए ,
मुझको भटकना पड़े किधर ।

साथ ही कुछ सोच कर ,
मै डरता हूँ उनके लिए ।
वो जिन्हें देना है पड़ता  ,
निज बलिदान मेरे लिए ।

 मेरा क्या मेरे लिए ये ,
बन गयी अब आदत है ।
सोंचता हूँ अक्सर अकेला ,
क्या यह मेरी हवस है ?

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

आप सभी के लिए कहीं से कुछ खास....

1.
Anybody can become angry. That is easy.
But to be angry with the right person
And to the right degree
And at the right time
And for the right purpose
And in the right way
That is not within everybody power , and is not easy.

2.
There are two types of persons
One who believe in work
And
Other who believe in getting credit
Try to be in first group
There is less competition.

3.
Nobody can go back and start a new beginning
But
Everyone can start today and make a new ending.

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


क्रिएटिव कामन लाइसेंस
अनंत अपार असीम आकाश by विवेक मिश्र 'अनंत' is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 3.0 Unported License.
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