हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

शराफत की सीमा ?

मुझसे पूँछा किसी ने शरारत में .. 
क्या है मेरी शराफत की सीमा ?

मैंने मुस्कराकर जबाब दिया.. 
गोया अब क्या कहे अपने मुह से हम...
लोग कहते है.... 
शरीफ हूँ मै इतना कि.. 
शराफत मेरे चेहरे पर झलकती ही नहीं चेहरे से टपकती भी है ।

सुनकर वो मुस्कुराये और बोले , 
यार तब तो बड़ी मुश्किल होती होगी गुजर बसर करना....!
मैंने कहा... 
खुदा का शुक्र है यारों.. ,
शराफत अपने से टपक जाती है सारी , 
और फिर आप जैसो से निपटने में मुझे नहीं होती है लाचारी ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 24 जुलाई 2011

कुछ और ही लिखा जाना आज किस्मत में है शायद...

उफ़ बड़ी देर से कुछ लिखना चाह रहा हूँ... शब्द भी मेरे जेहन में है , भाव भी मेरे मन में है पर उसे धरातल पर आने से न जाने कौन सी बात रोंक दे रही है....
चलिए कुछ और ही लिखा जाना आज किस्मत में है शायद... तो यही सही
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जीवन में बहुत सी बाते है , होती कुछ और दिखाती कुछ है ।
जीवन के बहुत से राग है , बजते कुछ और लगते कुछ है ।
यह तो है हम पर ही निर्भर , कैसे सुने और देखें उनको ।
है यदि इच्छा सच की तुमको  , दिल से सुनो मन से देखो ।
दिल जो कुछ भी सुनता है , वो सदा हकीकत होता है ।
मन भी जो करता महसूस , वह कपट नहीं हो सकता है ।
नहीं कहोगे तब तुम ये , दिया है तुमको जग ने धोखा ।
और कहूँ क्या तुमसे ,  बस बनाना नही तुम कोई सोखा ।

जीवन में बहुत सी बाते होती , जो होकर भी नहीं होती जैसे ।
जीवन के बहुत से रंग है ऐसे , जो होकर भी बदरंग हो जैसे ।
यह तो है हम पर निर्भर , हम कब क्या और कैसे उन्हें देखें ।
है अगर भूंख सच्चाई की , हो अजर अमर अविनाशी देखें ।
है अजर अमर अविनाशी जो , सदा तुम्हारे अन्दर रहता है ।
जो भी करता वो महसूस , सत्यम शिवम् सुन्दरम होता है ।
नहीं कहोगे तब तुम ये फिर , कुछ तुमसे छिपाकर होता है ।
और कहूँ क्या मै अब तुमसे , तुममे भी तो  ईश्वर रहता है ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

पाँच बाते..."आर्ट ऑफ़ लिविंग "

पाँच बाते जो आज श्री श्री रविशंकर जी के "आर्ट ऑफ़ लिविंग-२२,२३,२४ जुलाई २०११" में भगवान/आचार्य रजनीश (ओशो) के इस हमसफ़र ने जानी...

१. "विरोधाभाषी मूल्य एक दुसरे के पूरक होते है ।" ....इन्हें व्यर्थ अलग अलग करने का प्रयास न करें .......।

२. "वर्तमान अटल है।" ....भूत और भविष्य काल में न भटके , वर्तमान को स्वीकार करे....।

३. "दूसरों के गलतियों में नीयत या इरादा न ढूंढे ।" ....अपने को उसके स्थान पर रख कर सोंचे....।

४. "व्यक्ति और परिस्थितिया जैसी है वैसा स्वीकार करें । " ....पूर्णता से स्वीकार करने के बाद ही आप बेहतर कुछ कर सकते है....।

५. "दूसरों के मंतव्यो का शिकार न बने ।" ....प्रतिक्रिया के पहले अपने दिमाग का प्रयोग करे...।


हो सके तो कभी इसे भी अजमा कर देखिएगा .... (द्वारा स्वामी महेश गिरी जी) 

" किसी टोल टैक्स वाले बैरियर पर जब कभी आप अपनी गाड़ी रोंको और पैसा लेने वाला आये तो....

उसे अपनी गाड़ी के साथ अपने पीछे लगी किसी भी अंजान गाड़ी का भी पैसा अपने पास से दे दे !और साथ ही टोल टैक्स वाले को बता दे कि वो पीछे लगी गाड़ी से पैसा न ले ... बस उसे इतना बता दे की उसकी गाड़ी का पैसा मिल गया है बदले में वो बस एक बार मुस्कुरा दें ....!

इसके बाद एक पल के लिए भी आप वहां न रुके और अगर पीछे वाली गाड़ी आपको ओवरटेक करने का प्रयास भी करे तो भी उससे तेज चलिए और उसे अपना चेहरा न देखने दीजिये......और उसे पुरे रस्ते यूं ही हैरान रहने दीजिये कि किसने और क्यों उसका पैसा दिया है.......

फिर देखिये कमाल...

जब जब आप या वो अंजान गाड़ी वाला किसी भी कारण से दुखी होगा और उस पल आप दोनों में से किसी को भी ये घटना यद् आएगी आप वापस प्रशन्न हो जायेगे.... "

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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