हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://www.vmanant.com/?m=1
प्रबंधन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रबंधन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्वागत है नव वर्ष २०१४ … तुम्हारा स्वागत है

पुरानी डायरी के पन्नो से निकली "नये साल १९९८ के स्वागत में लिखी गयी कुछ पंक्तिया" जो शायद आज पुन: २०१४ में मेरे लिए फिर से उतनी ही मायने हो गयी है जितनी आज से १६ साल पहले वो मेरे लिए जवान थी.....

लक्ष्यहीन हो जायें उससे पहले हमें पहुँचना है ,
कर्महीन हो जायें उससे पहले हमें बदलना है। 
कांतिहीन हो जायें उससे पहले हमें चमकना है,
भावहीन हो जायें उससे पहले हमें निखरना है। 
दयाहीन हो जायें उससे पहले हमें सिसकना है ,
महत्वहीन हो जायें उससे पहले हमें निकलना है। 

खण्ड-खण्ड हो जायें उससे पहले हमें सिमटना है ,
प्राणहीन हो जायें उससे पहले हमें सम्भलना है। 
हाँ केवल बाते कहने से अब काम नहीं चलना है ,
संकल्पहीन हो जायें उससे पहले कर्म को करना है। 
पथहीन हो जायें उससे पहले नयी राह पर चलना है ,
नववर्ष के इन संकल्पो को संकल्पित हो करना है। 

आप सभी को नववर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाए …। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 5 मई 2013

अब भी है समय...

जीवन में कभी कभी , कुछ पल ऐसे आते है ।
जहाँ हम प्रायः: अपनी , मर्यादाओ को भूल जाते है ।
और भुलाकर मर्यादाओ को , जो कुछ भी हम करते है ।
आज नहीं तो कल हम , कही न कही उसकी भरपाई करते है ।
और अगर हमको कभी , होता नहीं गलती का एहसास ।
तो किसी अपने के दिल पर , निश्चित होता है बज्रपात ।

तो 

अब भी है समय , संभल जा ओ राहगीर ।
फिर ने नए भरोसे को , बना तू आस-पास ।
वो गलतिया तुम्हारी , जो तुमने की थी कभी ।
गर हो सके मानो , तुम जाकर उसके पास ।
जिसको लगी थी चोट , मूर्खता से त्तुम्हारी ।
शायद इसी तरह से , फिर बने नया विशवास ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 7 जून 2012

तुम रखना याद...

समय कहाँ टिकता है कभी, जो रुकता वो अबकी बारी ।
चलना होगा तुम्हे सदा , संग संग करके उससे यारी ।
समय की गति को थाम सके , उसको बाँहों में बांध सके ।
बलशाली नहीं ऐसा कोई , क्षणभंगुर जग में है हर कोई ।
बेहतर है समय के साथ चलें , पछताकर कभी ना हाथ मलें ।
हर क्षण है सुनहरा दरवाजा , आगे बढ़ना हो तो तू आ जा ।

है कर्म के संग ही भाग्य तेरा , देखो ना भटके लक्ष्य कहीं ।
हर कदम सजग होकर रखना , अवसर ना चूके कोई कहीं ।
हर बात समझकर तुम कहना , न उठे प्रश्न उस पर कोई ।
हर कार्य धैर्य से तुम करना , ना हो उसमे नादानी कोई ।
संयत रखना वाणी को , ना तुम्हे कहे अभिमानी कोई ।
हक भले छीनना पड़ जाये , करना नहीं बेईमानी कोई ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

एक शब्द..

बस एक शब्द ही काफी है , भाव भंगिमा बदलने को ।
बस एक शब्द ही काफी है , रिश्तो की दिशा बदलने को ।
हर एक शब्द सक्षम है , किसी वाक्य का अर्थ बदलने में  ।
हर वाक्य भी सक्षम है , अभिव्यक्ति का भाव बदलने में  ।
सोचो कैसा अवसर है , और तुमको क्या कहना है यहाँ ।
है कौन शब्द नैसर्गिक और , है भाव कौन उपयुक्त यहाँ ।

किस मोड़ पर जाने अनजाने , तुमने किससे क्या बोला था ।
वो चाह रहा था सुनना क्या , और तुमने उससे क्या बोला था ।
है नहीं जरूरी शब्द सदा , अभिव्यक्ति को तेरे सम्बल दे ।
है नहीं जरूरी वाक्य सदा , भाव एक सा हर पल दे ।
महत्वपूर्ण है शब्द चयन , और वाक्य में कैसे पिरोया गया ।
कब किससे क्या कहना था , कैसे उन शब्दों को बोला गया ।

चूक गए यदि उचित शब्द , चूक जाओगे अवसर से  ।
बोले गए हर शब्दों का , परिणाम पाओगे जीवन से ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

शराफत की सीमा ?

मुझसे पूँछा किसी ने शरारत में .. 
क्या है मेरी शराफत की सीमा ?

मैंने मुस्कराकर जबाब दिया.. 
गोया अब क्या कहे अपने मुह से हम...
लोग कहते है.... 
शरीफ हूँ मै इतना कि.. 
शराफत मेरे चेहरे पर झलकती ही नहीं चेहरे से टपकती भी है ।

सुनकर वो मुस्कुराये और बोले , 
यार तब तो बड़ी मुश्किल होती होगी गुजर बसर करना....!
मैंने कहा... 
खुदा का शुक्र है यारों.. ,
शराफत अपने से टपक जाती है सारी , 
और फिर आप जैसो से निपटने में मुझे नहीं होती है लाचारी ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 23 जनवरी 2011

आवो तुम्हे पालतू बनायें...

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।

हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।

परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है ।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

शक्ति संतुलन

गुरुदेव ने कहा था 
" आग को पानी का भय , सदा रहना चाहिए ।
यूँ धरा पर शक्ति संतुलन , सदा रहना चाहिए ।"
तो
बने ना कोई एकक्षत्र  , शासक कभी इस भूमि का ।
शक्तियां करती निरंकुश , ध्वंस होता राज्य का ।
आज है जो नम्र दिखता , कल निरंकुश हो सकता है ।
इस धरा पर जल बिना , जग आग में जल सकता है ।
तो अगर सुख चाहिए , शक्ति सदा बिखराइये ।
यूँ जगत में सभी को , संतुष्ट करते जाइये ।
आग को पानी का भय , बना रहना चाहिए ।
शांति का ये मूलमंत्र , सदा याद रहना चाहिए ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

बस तुमको इतना ध्यान रहे...

कब किससे क्या कहना है , किस तरह से उसको कहना है ।
कितना कहना कितना सुनना , कब कुछ पल चुप रहना है ।
यदि तुमको इतना ध्यान रहे , ना आहत कोई इन्सान रहे ।
फिर औरों का भी मान रहे , संग अपना भी सम्मान रहे ।

बात प्रेम की हो चाहे , या आहत मन की बात कहें ।
सम्बन्ध प्रगाढ़ हो करना , या आरोपों की बात करें ।
लेन देन ही करना हो , या कडुवे सच को कहना हो ।
अपनो से कुछ कहना हो , या राजनीत में रहना हो ।

ना बात अधूरी रह जाये, ना अर्थ अनर्थ हो जाये ।
ना लाग लपेट रहे ज्यादा , ना भाषा लठ्ठमार रहे ।
बस तुमको सदा यह ध्यान रहे, ना शब्दों में अपमान रहे ।
फिर कटुता हो चाहे मन में , ना शब्दों में छुपा बाण रहे ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

जल में रहकर मगर से बैर ?

मित्रों      
आप सभी ने एक कहावत बहुत बार सुनी होगी :-
 
"जल में रहकर मगर से बैर"
अर्थात
जल में रहने पर मगर से बैर मोल नहीं लिया जा सकता है ।
क्यों ?
अरे आप नहीं जानते क्या ?
मगर जल का सबसे ताकतवर प्राणी होता है , उसके आगे जल में हाथी भी कमजोर पड़ जाता है ( वैसे सार्क और व्हेल और भी ताकतवर होती है मगर वो नदी , नालों में नहीं पाई जाती है , जिसके आसपास मनुष्य ही अपने दैनिक कार्य हेतु ज्यादा घूमता है) ।

तो कहते है कि :-  एक बार तो स्वं भगवान विष्णु को अपने प्रिय भक्त "गजराज" को बचाने की आकस्मिक आवश्यकता के तहत नंगे पाँव ही दौड़ कर आना पड़ा था तब जाकर वो मगर से बच पाया था ।

तो अब तो आप समझ ही गए होंगे ।

क्या कहा ?
ये सब तो आप पहले से जानते है !
तो मैंने कब कहा कि मै अब तक कुछ नया बता रहा था ।

जो नया है, वो अब आने जा रहा है, विशुद्ध रूप से मेरी शोध।

तो दिल थम कर बैठे ..!
क्षमा कीजियेगा मेरे कहने का अर्थ है आँख फाड़ कर पढ़े  और मेरे प्रवचनों को अपने दिल, दिमाग में बिठाकर अपने अंतर्मन से गुने ...........   

" जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "


अब जो मेरी जीव्हा  से निकल गया उसे खरा भी साबित करना होगा वर्ना कौन मानेगा ..?
आजकल तो वैसे भी मुफ्त की सलाह पर कोई ध्यान नहीं देता है , भले ही वो कितने ही काम की क्यों ना हो ।
तो चलिए अपने कथन को विसुद्ध तार्किक रूप से किसी निर्मेय , प्रमेय की तरह साबित करता हूँ  :-

कथन :- " जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "
अर्थ    :- जल में सुरक्षित रहना हो तो मगर से बैर करके रहो ।
कारण :- मगर अपनी आदत से मजबूर है । अगर आप उससे दोस्ती भी कर लो या नहीं करके गुटनिरपेक्षता का राग अलापो ,  तो भी वो ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है क्योंकि जिस दिन उसे कहीं और से कुछ खाने को नहीं मिलेगा वो घास खाकर या केवल जल पीकर व्रत  रहने वाला नहीं है । उस समय उसके सबसे नजदीक (दोस्ती की है तो),  या आसपास (अगर गुटनिरपेक्ष  है तो) जल में कौन होगा ?  आप !
और आप अनजाने में, प्यार मोहब्बत में , गुटनिरपेक्षता में या कहें कि मगर के प्रति अपने गफलत में होंगे।
तो फिर समझ लीजिये कि आप का काम तमाम !!!
पढ़ा है ना आपने बचपन में "मगर और बन्दर वाली कहानी" जिसमें मगर की सह्धर्मनी  जिद कर बैठती है कि आपके मित्र का कलेजा बहुत मीठा है , आज वो उसी की दावत करेगी और मजबूरन ही सही मगर बन्दर को मारने के लिए उसे धोखे से अपने घर ले आता है । (वैसे यहाँ मै मगरानी  को दोष नहीं दूंगा क्योकि ज्यादातर स्त्रियाँ स्व्भावगत रूप से या किसी अनजाने जलन के कारण अपने पतियों को उनके मित्रों से किसी ना किसी बहाने अलग करना ही चाहती है।..इस पर फिर कभी अपनी शोध प्रकाशित करूँगा )
और
अगर आप उससे बैर करके रहेंगे अर्थात सदा उससको अपना दुश्मन मान कर रहेंगे तो खुदा कसम दुनिया जानती है कि लोग अपने दुश्मनों को ज्यादा गहराई से जानते है मुकाबिल अपने  दोस्तों के ।
तो उस हालत में आप उससे सोते - जागते सदैव सावधान रहेंगे और हो सकता है कि आप अपने सामर्थ भर उससे निपटने का इन्तिजाम भी कर लें। इस तरह शायद आप ज्यादा देर सुरक्षित रह सकें ।
निष्कर्ष :-  यदि कोई यह सोंचता है कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं करना चाहिए तो  उसे जल को छोड़ कर कहीं और निवास-प्रवास करना चाहिए वर्ना आपकी जान को ज्यादा जोखिम होगा ।
[ इत-श्री ]
नोट :- वैसे यह बहुत ही गूढ़ और गुप्त सिद्धांत था जिसको सभी के सामने तो नहीं प्रकट करना चाहता था मगर जन-कल्याण हेतु मुझे त्याग करना ही पड़ा ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG ।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

हवा के पुल बनाने वाले...

हवा के पुल बनाने वाले, कभी धरातल पर पैर नहीं रखते।
वो ठोस जमीनी हकीकतों से, कभी वास्ता भी नहीं रखते।

सोंचते   हैं  वो हवा में  ,  सब कार्य   भी   करते   हवा   में ।
कार्य का परिणाम भी , जग को दिखाते बस हवा में ।

पूँछो अगर सीखा कहाँ से, तुमने बनाना पुल हवा में ।
बस मुस्कुरा देते है वो , उंगली दिखाते फिर हवा में ।

तो

वो जब बनाते पुल हवा में, स्वं भी हवा में रहते है ।
हाथों से करते इशारे,  कुछ अनबूझे  से वो हवा में ।

फिर रात को सोते में भी , बाते  करते  वो  हवा में ।
अनगिनित फरमान भी, वो जारी करते है हवा में ।

इस तरह से जब कभी , वो बनाते पुल हवा में ।
मेहनत का पैसा किसी का , वो लुटाते है हवा में ।



© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

प्रगति तभी प्रगति है जब वह निरंतर हो...।

प्रगति है सच्ची वही , जिसमे निरंतरता रहे ।
कल-कल बहती हुयी नदी सी, निर्मल स्वच्छ धारा बहे।
रुक गयी धारा अगर , विषाक्त हो जायेगा जल।
संचित हुए सब पुण्य का , खर्च हो जायेगा फल।।

चाहे प्रगति हो राष्ट्र की , या हो प्रगति वह धर्म की ।
चाहे प्रगति हो सामूहिक , या हो प्रगति निज लाभ की ।
शांति और सुख है वहीँ  , संतुष्टि हो मिलती जहाँ ।
संतुष्टि होती है वहीँ , निरंतर प्रगति होती जहाँ।।



© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

पांडव बन कर रहें....

दोस्तों यदि आपको अपने जीवन में सफल होना है तो आपको पांडव बनना होगा अर्थात :-
  1. युधिष्ठिर :- युद्ध में स्थिर रहने वाला धर्म ,विवेक , बैराग्य।
  2. भीम      :- दृढ संकल्प, बल ।
  3. अर्जुन    :- एकाग्रता, एकनिष्ठा ।
  4. नकुल    :- कुलहीन ज्ञान ।
  5. सहदेव  :- लगन (भक्ति) ।
इस प्रकार हम अपने अन्दर सभी पांडवों के प्रतीक धर्म , संकल्प , एकाग्रता , ज्ञान और लगन को वास्तविक अर्थो में समाहित करना होगा क्योंकि बिना इन सभी को सम्मलित किये आप राष्ट्र को रोकने वाले 'धृतराष्ट्र' और उसके 'दु: ' नामधारी पुत्रों से लोहा नहीं ले सकते है ।

"काल का चक्र जब,
                          रच रहा कुचक्र हो ।
और उससे बचने का ,
                          हो ना कोई रास्ता ।
द्वार सब बंद हो ,
                         और रास्ते भी तंग हों ।
बढ़ रहा कुचक्र हो ,  
                         चल रहा नित चक्र हो ।
                                           तब
बचने को काल से ,
                         दो ही हैं रास्ते ।
रोंक दो चक्र को ,
                        और तोड़ दो कुचक्र को।
या तोड़ दो चक्र को ,
                         और रोंक दो कुचक्र को ।
फिर ना कोई चक्र होगा ,
                          ना ही कुचक्र होगा ।।"
 ध्यान रहे कि कुरुक्षेत्र की लडाई केवल द्वापर तक सीमित ना रहकर आज भी हमारे जीवन की दिन प्रतिदिन की घटना है ।
  

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हे अधिकारी..

दोस्तों,
         जो यहाँ कहने जा रहा हूँ उसके लिए वैसे तो आपके सामने किसी भूमिका की जरुरत नहीं है, मगर फिर भी बता दूँ यह लोकतंत्र है, यहाँ सब राजा है , सब रंक भी है , सब सत्ता में है सब सेवक भी है, यह श्रंखला अनंत अपार असीम आकाश के समान विशाल है, । यहाँ भांति-भांति के स्वामी है और भांति-भांति के सेवक भी । उन्ही में से कुछ लोग ऐसे भी होते है जो मात्र आदर्श बघारते है और अपने लिए अपने अधिकारियों से कुछ और व्यव्हार चाहते है और अपने अधिनस्थो से कुछ और व्यव्हार करते है। यह किसी एक विभाग या व्यक्ति की बात नहीं है वरन आजकल के ६० से ७० प्रतिशत लोग इसी बीमारी से ग्रसित है तो प्रस्तुत है " हे अधिकारी"........... साथ ही अनुरोध है कि इसे मेरी निजता से ना जोड़े हालाँकि यह मात्र फलसफा भी नहीं है............

हे अधिकारी जगत मुरारी , नाच रहा तेरे आगे  मै ।
सुनकर तेरी वाणी को ,  स्वध्न्य सदा रहता हूँ मै ।
तेरे आने के पहले मै, रण-भूमि 'कुरुक्षेत्र' में आता हूँ ।
चक्रव्यूह के सब द्वारों का, मै  भेद तुझे बतलाता हूँ ।।

तेरे   खिलाफ लोगों का ,  मै कच्चा चिठ्ठा लाता हूँ ।
तेरी गर्दन  झुके कभी ,  उससे पहले मै झुक जाता हूँ ।
नाराज हो सको मुझ पर तुम, अवसर मै ले आता हूँ ।
तेरी डांट को सुनने में भी, मै हित ही सदा बताता हूँ।।

तेरी हाँ में हाँ मिलाकर , मै आनंद तुझे दिलाता हूँ ।
तेरी मूर्खता को भी मै, नित सिद्धांत नया बताता हूँ ।
तेरे  घर  के राशन को भी ,  मै   ही सदा मांगता हूँ ।
खाकर जो तुम डकार गए, उसको भूल मै जाता हूँ ।।
तेरे आगे अपनी बुद्धि ,  मै  कभी  नहीं  अजमाता हूँ ।
तुझसे ज्यादा सुन्दर बनकर, कभी नहीं मै आता हूँ ।
तेरे  बच्चो  के  लिए खिलौना ,  मै खरीदने जाता हूँ ।
भूलकर अपना जन्मदिवस, बस तेरा रटता जाता हूँ ।।

कलयुग के अवतार हो तुम, ये सबको सदा बताता हूँ ।
अपनी   नवीन खोजों को   मै ,   तेरे नाम चढ़वाता   हूँ ।
तेरी कमियों को आगे बढ़ , मै अपनी कमीं बताता हूँ ।
खुशहाल रहो तुम सदा यहाँ, ये पाखंड रोज रचाता हूँ ।।


यूँ चक्रवर्ती  सम्म्राटों सा मै , एहसास तुझे   कराता  हूँ ।
इस लोकतंत्र में राजतन्त्र का , घालमेल  करवाता हूँ ।
इतने पर भी अगर ना तुम , खुश हो पाओ  मेरे भगवान।
करबद्ध प्रार्थना है मेरी, अब तो ले जाएँ तुझको भगवान।।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

चिराग तले अँधेरा...।

दोस्तों

हम दीपक या चिराग जलाते है अपने आस पास के अंधकार को दूर करने के लिए और इसी लिए हम कहते है कि "जलाओ  दिये रह ना जाये अँधेरा..." 

और दूसरी तरफ कहावत है "चिराग  तले अँधेरा होता है।" जिसे आप सभी ने जरुर सुना होगा।

और ये मात्र कहावत ही नहीं है इस हकीकत को आपने अपनी आँखों से भी देखा भी होगा।
मगर क्या आपने कभी ध्यान दिया कि -
"जैसे जैसे, जिस अनुपात में दीपक का आकार बड़ा होता है और उससे निकले वाले प्रकाश और उर्जा की मात्रा बढ़ती  है वैसे वैसे उसी अनुपात में उसके तले में अन्धकार की मात्रा भी बढ़ती जाती है।"
अर्थात छोटे चिराग तले कम अँधेरा और बड़े चिराग तले ज्यादा अँधेरा दिखता है।

और "चिराग तले अँधेरा का सिद्धांत केवल दीपक पर ही नहीं लागू होता है वरन यह मानव जीवन पर भी सदैव लागू होता है। मैंने ना जाने कितने लोगों को दूसरों के बारे में कहते सुना है कि - यार इतना बड़ा व्यक्ति और ऐसी ओछी हरकत , ऐसी छोटी मानसिकता , छोटी छोटी चीजों के लिए ऐसी लिप्सा आदि आदि... और बहुत बार मै भी यही कहता हूँ कुछ तथाकथित विराट लोगों के लिए ।

और ये परखा हुवा सत्य है कि जैसे जैसे किसी व्यक्ति का पद, प्रतिष्ठा, प्रभुत्त्व बढ़ता है  अर्थात उसका बाह्य व्यक्तित्व बड़ा होता है वैसे वैसे उसके अन्दर की खामियां भी विराट स्वरुप धारण करती जाती है

इसके दो मुख्य कारण हों सकते है-

१. छोटे बाह्य व्यक्तित्त्व में पाई जाने वाली कमियों की तरफ कम ही ध्यान जाता है या हम उसे देख कर भी नजरंदाज कर देतें है। मगर जब उसी व्यक्ति का बाह्य व्यक्तित्त्व बड़ा हो जाता है तो हम सभी का और सारे समाज का ज्यादा ध्यान उस व्यक्ति की तरफ केन्द्रित होने लगता है और चाहे-अनचाहे बरबस ही उसकी कमियां हमारी नजर आँख में चुभने लगाती है। तो ये है देखने के नजरिये का नियम ...

२. कुछ गिने चुने महान लोगों को छोड़ दिया जाय तो जैसे जैसे छोटे बाह्य व्यक्तित्त्व वाले व्यक्ति की पद, प्रतिष्ठा, प्रभुत्त्व बढ़ता है अर्थात उसका बाह्य व्यक्तित्व बड़ा होता है वैसे वैसे उसके अन्दर अपने लोभ , लिप्सा , लालसा , और भूंख को जल्दी से जल्दी पूरी करने की तीब्र इच्छा उठने लगाती है और वो अन्दर से और ज्यादा कुटिल होने लगता है। तो यह है जैव विकास का नियम ...

इसलिये अगर आगे से आपको ऐसा कोई बड़े बाह्य व्यक्तित्व का तथाकथित विराट पुरुष, स्त्री या नपुंसक दिखे तो उसके कमियों के बारे में कहे जरुर मगर ज्यादा हैरान और अचम्भित ना हों क्योंकि यह प्रमाणित है कि "चिराग तले अँधेरा होता है।"

तो नमस्कार,
चलता हूँ ,  मुझे भी अपने अंतरतम के अंधकार में अपने व्यक्तित्व के अनुरूप अपने लोभ , लिप्सा आदि की पूर्ति के लिए कुछ देर खोना है।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG


रविवार, 18 जुलाई 2010

नक्कारखाने में तूती की आवाज

नक्कारखाने में तूती की आवाज भले दब कर रह जाती हो,
भीड़ के शोर में लूटे-पिटे लोगों की चीख न सुनी जाती हो ।

रात के अँधेरे में कुछ काले साये नजर बचाकर निकल जाते हों,
झूंठ को बचाने की जद्दोजहद में सच को भले लोग भूल जाते हों।

परोपकार का मुलम्मा लगाकर स्वार्थी अपना भला करते जाते हों, 
बेंचकर अस्मिता देश की नित नेता अपनी राजनीत चमकाते हो।

साधुवों के भेष में चोर-डाकू लम्पट छुप जाते हों,
बेचने को ईमान अपना  लोग बाजार सजाते हों।

फिर भी कभी महत्व तूती का नहीं मिट जाता है, 
ना ही सच की जगह, झूंठ दूर तक चल पाता है।

लगे भले ही देर मगर इन्साफ मिल ही जाता है, 
अंत में! सुखद अंत देर से ही सही पर आता है......।। 22/01/2005

शनिवार, 17 जुलाई 2010

साम दाम और दंड भेद - प्रबंधन के चार सूत्र

"साम दाम और दंड भेद, हैं  चार विधाए संचालन की
इनसे ही चलता आया , मानव सदा पुरातन से ।"

वेदों में लिखा है "साम दाम और दंड भेद" वह अचूक मन्त्र हैं जिससे तीनों लोकों के महिपलों , दसों दिशावों के लोकपाल , समस्त महिपाल एवं उनके अधीन समस्त भू-पाल एवं सामान्य जान को अपने अधीन करने में समर्थ है।
जी हाँ मनु कि समस्त सन्ताने चाहे वो हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों, यहूदी हों, जैन  हों, बौध हो या उनका कोई भी धर्म ना हों और वो परम नास्तिक ही क्यों ना हों और उनकी संख्या कुछ भी हों सभी पुरातन काल से वर्तमान तक इन्ही चार विधावों से सदा संचालित और नियंत्रित होते आयें है।

यह सत्य है कि हर काल खंड और देश-काल का अलग रहन सहन और नियम विधान होता है मगर चाहे वो भूत काल रहा हों या वर्तमान हों चाहे वो भारत हों या पाकिस्तान , चाहे अमेरिका हों या यूरोप 'साम दाम और दंड भेद' ही समस्त जन और समाज को नियंत्रित और संचालित करता आया है और करता रहेगा। 

"साम दाम और दंड भेद हैं चार विधाए शासन की
ये अमोघ अस्त्र है जन मानस के संचालन की । "

इसमें कुछ भी नया नहीं है, ये चिर पुरातन नियम है ।

मगर

"साम दाम और दंड भेद" चतुर्मुखी हथियार है जो जन मानस के संचालन हेतु तभी अमोघ है जब इनका प्रयोग सजगता से किया जाय। ये मानव द्वारा प्रयोग किये जाने के अस्त्र हैं ना कि किसी मशीन के द्वारा। इसका प्रयोग कब, कहाँ,किस पर और किसके द्वारा किया जा रहा है उसके आधार पर निर्धारित किया जाता है कि इसके किस मुखाग्र से प्रहार किया जाय। इन्हें अचूक बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि इनका प्रयोग किये जाते समय काल पात्र और स्थान का ध्यान रखा जाय। क्योंकि ये चारो अस्त्र सदैव एक सामान सभी पर प्रभावी नहीं होते है ना ही सभी व्यक्ति इसे समस्त रूपों में चलने के योग्य होते है ।
यदि 'साम' से कोई समाज संचालित होता है तो कभी उसपर नियंत्रण हेतु 'भेद' का नियम अपनाना होता है ,
कभी 'साम और भेद' का प्रयोग असफल होने पर 'दाम' का लोभ दिखाना पड़ता है तो कभी "साम दाम और भेद" तीनो के असफल होने पर दंड का भय दिखाना पड़ता है।

ध्यान रखें :-  'साम' श्रेष्टतम है , 'दाम और भेद' मध्यम और 'दंड' निकृष्टतम कोटि का अस्त्र है। 

जो समूह 'साम' से संचालित हों रहा हो  वहां अन्य का प्रयोग करने से साम धीमे-धीमे अप्रभावी होने लगता है।
जहाँ 'दाम' का लोभ देने पर समाज पतित होता है, 'भेद'  से समाज विघटित होता है और  लम्बे अवधि के 'दंड' से बिद्रोही हो जाता है।

और जब 'साम' अप्रभावी हों जाय तो पहले भेद को अपनाया जाना चाहिए (जिससे दाम भी बचा रहे और समाज पतित भी ना हो) क्योंकि विघटित समूह और समाज प्राय: तेज प्रगति करते है और उनके आगे पुन: एक होने कि संभावना बनी रहती है मगर पतित तेजी से और पतन की और बढता है और उसका वापस लौट पाना मुश्किल होता है।

और अंत में जब पूर्व के तीनो से काम ना बने तो... दंड है ही।

और कुछ लोग दंड भय से ही चलते है जैसे - बाबा तुलसीदास जी ने कहा है-
'सूद्र,गंवार,ढोल,पशु,नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी'
हालाँकि कुछ लोग उपरोक्त पाँच में सूद्र और नारी के नाम पर नाराज हो जाते है और कहते है की वास्तव में सूद्र और गंवार दो ना होकर एक ही अर्थात गँवार-सूद्र (सूद्र जो पड़ा लिखा ना हो) एवं पशु नारी अलग-अलग ना होकर 'पशु नारी' है अर्थात वो नारी जो पशु सामान हो 'जैसे रामचंद्र जी के ज़माने की ताड़का' समझा जाना चाहिए। इस प्रकार इनकी संख्या पाँच से तीन ही रह जाती है। मगर पुन: कुछ लोग को इसमे पशुवों को हटाने और किसी भी प्रकार की  नारी को शामिल करने पर आपत्ति है और वो पशु को अलग और नारी का संधि बिच्छेद कर नार+अरि=जो नारी का शत्रु हो कहते है। खैर अभी इस विवाद पर विस्तार से चर्चा करने का मन नहीं है अतः: जो  बाबा ने कहा हो वो जाने जो , जो बच्चो को समझाना हो वो समझे ..........!
समूह के साथ ही "साम दाम और दंड भेद" के व्यक्तिगत प्रयोग में भी उपरोक्त सावधानी बरती जानी आवश्यक है क्योकि-
प्रत्येक व्यक्ति एक समान नही होते है, भगवान ने सभी को अलग-अलग बनाया है, भले ही हम उन्हें समूह में कितना ही अभ्यास कराकर एक जैसा बनाने की कोशिश करें मगर आतंरिक मनोभाव, आचार विचार और सोंचने का तरीका अलग-अलग ही रहता है। कौन सा व्यक्ति किस प्रकार के अस्त्र और उसकी कितनी मात्र के प्रयोग से नियंत्रित होगा और किस मात्रा और किस अस्त्र के प्रयोग के बाद वो पूरी तरह से अनियंत्रित, बिद्रोही, पशु समान अथवा मूक बधिर, निर्जीव  बन जायेगा इसका ध्यान रखा जाना जरुरी है और एक बेहतर शाशक/प्रबंधक वही है जिसको इस बात का सदैव घ्यान रहता है ना की वो जो अपने सत्ता के घमंड में जबरन एक ही तरह से सबको हांकने की कोशिश करता रहे।
अतः प्रबंधन के चार सूत्र 'साम दाम और दंड भेद' का प्रयोग करें परन्तु संयम और सजगता के साथ....!


बुधवार, 14 जुलाई 2010

कसौटी

किसी ने क्या खूब कहा है -
" आप जिस कसौटी पर परखते है हमको,
अगर आपको परखा जाय तो अंजाम क्या होगा "

हम इस संसार में,मानवीय रिश्तों के मायाजाल में और शुद्ध व्यवसायिक लेन देन में जिन कसौटियो पर दूसरो को परखते है और उनके बारे में जितनी सरलता से कोई भी निष्कर्ष निकाल लेते है कभी हमने सोंचने की जरुरत महसूस की कि अगर हमे भी उन्ही कसौटियो पर परखा जाय तो वास्तव में क्या निष्कर्ष होगा ?

शायद वही जो हम दूसरो के लिए निकालते है ...!

और अगर अपने बारे में यह मानने को हमारा मन तैयार नहीं है और इसके लिए हमारे पास तरह तरह के तर्क है तो इसका अर्थ है कि हमारे अन्दर का अहंकार झुकने को तैयार नहीं हो रहा है!

तो आगे से यह कहने के पहले कि " अगर मै उसकी जगह होता तो मै एसा करता या वैसा नहीं करता" दो पल के लिए इमानदारी से स्वय को अपनी उन्ही मान्यताओ,काल पात्र समय और संबंधो की जटिलताओं के दायरे में रखकर विचार करें और निर्विकार भाव से तमाशा देखें ।

आपको अपने आप अपनी असलियत पता चल जायेगी । क्योंकि ......

खोखले आदर्श और कोरे सिद्धांत, 
दूर से बड़े मनोहारी लगते है ।
इनके आगे छटा बिखेरते सप्तरंगी, 
इंद्र धनुषो के रंग भी फींके लगते है ।
लेकिन क्या सच में ऐसा ही होता है,
शेर कि खाल में सियार नहीं चलता है?
पूंछो जरा उनसे जिन पर गुजरता है,
ढोल कि पोल का उनको पाता होता है।
जब तक है किस्मत बिकेगा हर मॉल,
फिर कौन पूंछता क्या है तेरा हाल ।
फिर तो लगनी है दोनों की बोली,
किसी अजायबघर में सजनी है डोली ।
०८/०५/२००४
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


क्रिएटिव कामन लाइसेंस
अनंत अपार असीम आकाश by विवेक मिश्र 'अनंत' is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 3.0 Unported License.
Based on a work at vivekmishra001.blogspot.com.
Permissions beyond the scope of this license may be available at http://vivekmishra001.blogspot.com.
Protected by Copyscape Duplicate Content Finder
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...