हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

सत्य है इतिहास दोहराता है ...

इतिहास बताता है कि जे.पी. के आन्दोलन में उस समय के कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने पहले आरोप लगाया की सी.आई.ऐ. का हाथ है फिर आर.एस.एस. को भी जोड़ दिया , 

और वर्तमान में अन्ना के आन्दोलन में भी कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ( जिनकी सबने बारी बारी उतारी ) ने भी पहले अमेरिका का हाथ बताया फिर आर.एस.एस. को भी जोड़ दिया...


मगर न इतिहास में कांग्रेस के पास समझ थी न वर्तमान में बुद्धि समय से आयी.... 
अफसोस चिड़िया चुग गयी खेत !


जे.पी.आन्दोलन में भी बात चली थी... " यह अन्दर की बात है , पुलिस हमारे साथ है "
अन्ना के आन्दोलन में भी ... " यह अन्दर की बात थी , पुलिस जनता के साथ थी "


हाँ इतिहास हमेशा अपने को दोहराता है और इस क्रम में सभी को अक्सर दो-राहे पर लाता है , पर रास्ता तो एक ही सही होता है......!
तो जो समझदार होते है वो इतिहास से सबक लेकर पहले दिन से ही सही राह चुनते है, बाकी जो बने हुए नादान (ज्यादा बुद्धिमान) होते है वो लतियाये,जुतियाये जाने के बाद अपनी आन-मान-मर्यादा गवां कर सही रस्ते पर आते है .


और अब कुछ मन की भड़ास...जिसे फेसबुक पर कुछ देर पहले ही निकला है...

क्षमाँ करे माननीय प्रधानमंत्री जी ,
आपकी योग्यता और ईमानदारी पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता है पर क्या करियेगा....?
काजल की कोठारी में कतनो जतन करो , कालिख तो तन पर लागे ही लागे मनमोहन भैया...
जैसे
कोई कितना हो जती , कोई कितना हो सती , कामनी के संग काम जागे ही जागे राहुल भैया...

राहुल बाबा का बस यही है नारा ...
हमें देखा था , हम देख रहे है , हम आगे भी देखेंगे..
ये नहीं हुवा है , ये नहीं हो रहा है , ये आगे भी नहीं होगा...
तभी तो जनता ने पहले यू.पी. और बिहार में कांग्रेस को पछाड़ा , आगे देखो कहाँ कहाँ है 
जाना लथाड़ा।

अरे हाँ स्वामी अग्नीवेश जी......परनाम (शब्द सही लिखा है) 
जब सब त्याग दिया तो ई मोबाइलवा का मोह कब छोड़ियेगा....? 
अब देखिये न इसके कारन आपकी बुढौती मा,
भगवा चुनरी में लागा हाईटेक चोर , 
ओ बाबा देखो खुल गया तेरा पोल..
बेहतर है स्वामी जी आप कोयले की दलाली में हाथ अजमावो और बंधुवा मजदूरी में नाम कमावो


और अब एक पत्र चोरो के नाम....
.
.
.
अरे अभी कहाँ लिखा , लिख रहा हूँ जल्दी ही पोस्ट करूँगा..
फ़िलहाल सोने का समय हो रहा है तो शुभ रात्रि...
पर चलते चलते....दोहरा दूँ 


एक अंगारा ही जंगल को जला देता है , नादां है वो जो शोलो को हवा देते है...!


शनिवार, 27 अगस्त 2011

तुझको बारम्बार सलाम ऐ अन्ना...

रात के अंधेरो में जो बिजलियाँ चमकती हैं ,
रास्तो पर वो अन्ना के रोशनी ही करती हैं।

चिलचिलाती धूप में जो बवंडर आते है ,
अन्ना के बदन को वो ठंडक पहुँचाते है ।

कडकडाती ठण्ड में जो कोहरे घने होते है ,
घेर कर अन्ना को मक्कारों से बचा लेते है ।

कौन कहता है की ज्वार कश्तियाँ डुबो देते है ,
वो सरफरोशो के जहाजो के रास्ते बना देते है ।

बदलो के झुण्ड जो सूरज यूँ को छुपा लेते है ,
आसमान के सीने पर इन्द्रधनुष दिखा देते है ।

कौन कहता है कि अँधेरा बस सबको निगल जाता है ,
घर की चौखट पर वो अन्ना सा दिया जला जाता है।

पूजता हूँ मै नहीं उगते सूरज को अकेले ,
डूबता सूरज भी हमें राह दिखा जाता है ।

पूजे वो बलवानो को जो चलते है औरो के बल पर ,
अन्ना जैसे भीषम पितामह चलते है अपने बल पर ।



तुझको बारम्बार सलाम ऐ अन्ना,

है तुझपर दिल कुर्बान ऐ अन्ना...

कुरुक्षेत्र में अडिग है तू भीष्म पितामह के जैसा...
मन मोहे तू सारे जग का कृष्ण कन्हैया के जैसा...

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अरे देखो रे देखो भैया..

अरे देखो रे देखो भैया , दस दिन बाद आज अचानक देश में राहुल गाँधी नजर आये है..... माँ  के आँचल से निकल कर लोकपाल पर संसद में जादू की छड़ी घुमाने आये है !

तो राहुल गाँधी कहते है संसद में...
अन्ना का अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है !अरे ये लोकतंत्र के लिए खतरा हो या न हो स्विस बैंक में खाता रखने वालो के लिए जरूर खतरा है।

लोकपाल को संविधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए !
अरे पहले लोकपाल बनाने की तो बात कीजिये राहुल बाबा... आगे का हाल आगे देखा जायेगा ।

संसद सर्वोपरि है !
कौन मना कर रहा है कि संसद सर्वोपरि नहीं है ? देश लोकपाल मांग रहा है और संसद में मात्र तफरीह हो रही है क्या ये साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संसद सर्वोपरि है ।

चुनी हुयी सरकार को अलग नहीं रखा जा सकता है !
अरे जनता की क्या औकात कि "सरकार" को अलग रखे... सरकार तो सरकार होती है । तभी तो अन्ना ने कहा है... " मॉल खाए मदारी , नाचे बन्दर "

अकेला लोकपाल भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं कर पायेगा , और लोकपाल भी भ्रष्ट हो सकता है !
अरे तो क्या यह सोंच कर भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए पहला कदम भी न उठाया जाय । और भ्रष्ट तो प्रधानमंत्री भी होते है तो क्यों नहीं उस पद को समाप्त कर देते हो ।

टैक्स चोरी रोंकने और राशन कार्ड, पेंशन आसानी से प्राप्त होने के लिए जैसे  भी ध्यान दिए जाने और कानून बनाये जाने की जरुरत है !
अरे राहुल बाबा सब सब चोरो का एक ही अब्बा...भ्रष्टाचार वही  ख़त्म करने का प्रयास करो सब अपने आप सही हो जायेगा  

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

क्या जन लोकपाल आ जाने से भ्रस्टाचार ख़त्म हो जायेगा..

बहुत से लोग पूंछते है....
क्या जन लोकपाल आ जाने से भ्रस्टाचार ख़त्म हो जायेगा...?
सारे लोग ईमानदार हो जायेंगे ?

तो मै इतना ही कहना चाहूँगा मेरे दोस्तों  यूँ तो सनातन काल से देश में पुलिस की भी व्यवस्था है तो क्या चोरी हत्या या बलात्कार रुक गया है......?
नहीं ना...!
मगर जिस दिन पुलिस  की व्यवस्था को ख़तम कर दिया जाय तो... सरे शाम चोरी होगी, सरे बाज़ार बलात्कार होगा...

तो जन लोकपाल भारत में राम राज्य या राजा हरिश्चंद्र का योग नहीं लायेगा मगर पता चलने पर भ्रष्टाचारियो के मुह में डंडा जरूर डाल कर जरूर उलट देगा.
और बाबा तुलसीदास ने भी भगवान रामचंद्र के हवाले से कहा है... "भय बिन होय ना प्रीत"

"मुह में डंडा" लिखने के लिए प्रबुद्ध जनो से आदर सहित खेद है.



अशोक रावत जी ने सच ही कहा है..
हम गुजरे कल की आँखों का सपना ही तो है....
क्यों माने सपना कोई साकार नहीं होता....

तो शिशुपाल सिंह जी की पंक्तियों के माध्यम से कहूँगा...
अगर चल सको साथ चलो तुम..
लेकिन मुझसे यह मत पूंछो , 
कितना चलकर आये हो तुम,
कितनी मंजिल शेष रह गयी.

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

ये क्रांति नहीं अब रुकनी है...


जैसा मन भावन रूप तेरा , 
वैसी मन भावन बात तेरी ।
अन्ना तुझको नाम दिया , 
गाँधी का तुझे काम दिया ।

लो आज सजा फिर मंच तेरा , 
जनता बिछाती पलक पांवड़े ।
स्वागत है हे जनता जनार्दन , 
कर दो तुम सत्ता का मर्दन ।

अफसोस, नहीं हम पास तेरे , 
फिर भी हर पल हैं साथ तेरे ।
ये क्रांति नहीं अब रुकनी है , 
यहाँ विश्व की निगाहें टिकनी है ।



यह सम्राट अशोक की धरती है , 
सत्य,अहिंसा की यह जननी है ।
यहाँ गाँधी ने उपवास किया ,
और बुद्ध ने यहाँ वास किया ।

नमन तुझे है आज के गाँधी , 
आभार तेरे पथ प्रदर्शन को ।
मेरी आँखे तरस रही हैं कबसे  ,
तेरा दर्शन प्रत्यक्ष करने को ।

कटिबद्ध है तेरे संग हम सब , 
जन लोकपाल को लाने को ।
बिना रक्तमय क्रांति किये , 
भारत से भ्रष्टाचार मिटाने को ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

त्रिकाल

१. 


अब मनमोहन 'सिंह' जैसे प्रधान मंत्री से यही सुनना बाकि रह गया था ..
" अन्ना के अनशन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है.." 
अरे मै यह नहीं कहता कि यह असंभव है, कुछ भी हो सकता है....
मगर अगर एसा है तो बात गंभीर है , इसे साबित करो ना प्रधानमंत्री जी...
केवल जुबानी जमाखर्च क्यों ?
अरे तुम्हारी दर्जन भर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसिया क्या हिजड़ो कि तरह से अपना हाथ ताली बजाने में लगाये हुए है...जो उन्हें आपकी विदेशी हाथ के बात को प्रमाण सहित साबित करने के लिए सबूत नहीं मिल रहा है ?

२. 

देखा आदरणीय योग गुरु बाबा रामदेव जी...
अगर आप उस दिन डरकर "सलवार समीज" पहन कर महिलाओं के झुण्ड में न भागते
और अपनी गिरफ़्तारी होने देते तो जो हाल आज दिल्ली का है और जो जन-सैलाब उमड़ा हुआ है..
वो तब उसी दिन आपके गिरफ़्तारी के साथ हो जाता और आपको भी यू बे-आबरू होकर अपना अनसन न तोड़ना पड़ता...
आपकी ये एक छोटी सी भूल आपके राजनैतिक कैरियर और आपके दम-ख़म पर हमेशा एक बदनुमा दाग की तरह रहेगा इसका मुझे हमेशा अफसोस होगा..पर क्या करे.. आपमें वो नैतिक बल नहीं था जो पहले "महात्मा गाँधी और जे.पी" में था और अब अन्ना हजारे में है...

३.



बाबा तुलसीदास ने सही कहा था...
"विनय न मानत जलधि जड़,गए तीन दिन बीत..
बोले राम सकोपि तब , भय बिन होय न प्रीति "
तो लीजिये आज फिर
रामलीला मैदान की साफ सफाई हो रही है..
जिनके अहंकार को फूँका जाना है वो अपने पुतलो के साथ तैयार खड़े है...
और जिन्हें फूँकना है वो भी धनुष बाण लेकर दल-बल के साथ आने ही वाले है...
जनता भी आ रही है...
संग
जनता जनार्दन भी आ रहे है...
देखते है ये आग कितने देर धधकती है और अपनी लपटों में कितनो को जलाती और झुलसाती है...


बुधवार, 17 अगस्त 2011

प्रश्नकाल...अन्ना अन्ना

मित्रो अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो केवल दूसरो के भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखने चिल्लाने और कानून बनवाने भर से  यह कार्य पूरा नहीं हो सकता जब तक सबसे पहले इसकी शुरुवात हम अपने आप से नहीं करते है, आत्मिक रूप से स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं करते है.. ।

तो क्यों ना सबसे पहले स्वयं शपथ लीजिये कि.... 
हम आज से अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में ना तो शामिल होंगे ना हीं उसका कारण बनेगे । भले ही उससे हमारा किसी भी प्रकार का हित क्यों न प्रभावित होता हो....।

मै शपथ पूर्वक पूरी तरह से तैयार हूँ......।
पर क्या आप सचमुच पूरी तरह तैयार है ?    
या सिर्फ टाइम पास करने के लिए, दूसरो पर रोब डालने के लिए "पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तरह  से बस " हम अन्ना अन्ना चिल्ला रहे है  ।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

राष्ट्र का वही पुराना पर्व...

लो फिर आ गया मौसम , राष्ट्र के लिए नया कुछ कर जाने का ।
पुराने हो चुके भूले-बिसरे , चित्रों को साफ कर फिर लगाने का ।
पुरानी धूल-धूसरित मालाओं को , बदलकर फिर नयी लगाने का ।
खोजकर सिकुड़े-गुमचे पड़े झंडे को , धुलाकर फिर इस्त्री कराने का ।
कटे फटे बदरंग झंडे की जगह , गाँधी आश्रम से एक नया मंगाने का ।
और इस तरह राष्ट्रीयता से सराबोर , राष्ट्र का वही पुराना पर्व मनाने का ।

ये मत पूछो किस कारण से , ये पर्व आज मनाया जाने लगा ।
आजाद हुआ था गुलाम राष्ट्र , या संविधान नया बनाया गया ।
गड-मड हो गए हैं अंतर , परिभाषाये नव जनमानस भूल गया ।
छब्बीस जनवरी पंद्रह अगस्त , बस झंडा-रोहण  में बदल गया ।
उठे जागे और तैयार हुए , रो-गाकर पहुँच गए ध्वज-स्थल पर ।
फहराया झंडा गाया जन-गण-मन , आ गए पुन: वापस घर पर ।

जो अंतर है इन दोनों में , वो दूर-दर्शन पर जाकर सिमट गया ।
किसी एक में सज-धज कर , देखा दिल्ली में झांकी निकल गया ।
किसी एक में लाल किले से , देश के मुखिया का भाषण गुजर गया ।
और हमें नाहक क्या लेना-देना , जो इतिहास में पुराना बीत गाया ।
बस आज सबेरे सबको गाना , वही पुराना रटा रटाया भूला तराना ।
जनगणमन अधिनायक जय हे , आओ हमको देश की लाज बचाना ।

जल्दी करो देर हो रही जय है..., 
लड्डू तुरंत बंटाओ जय हे...।
कम से कम कुछ घंटों को जय हे.. ,
राष्ट्रीयता मिलकर निभाओ जय हे... ।
कल फिर करना काम हमें जय हे... ,
आज तो छुट्टी मनाये जय हे.....।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन ,मैं बेनक़ाब सही,बेनक़ाब रहने दे।"

पुन: स्वागत है आप सभी का 

इस समय मेरी शाम ढल रही है (निशाचर हूँ ना भाई..लंकापति रावण मेरे लकड़-दादा थे ) मगर आधी दुनिया गहन निद्रा में सो रही है...और आधी कुछ घंटों बाद जागने की वाली है , तो मुझे पता नहीं कि इस समय आप सभी से शुभ प्रभात कहूँ या शुभ रात्रि.. ?

खैर होता है छोटे-छोटे और बड़े-बड़े जगहों पर... ठीक वैसे ही जैसे एक बेचारी महिला के चिठ्ठी में हुआ था कभी...

तो आईये एक खुला पत्र पढ़ा जाय और कुछ देर हंसी का आनंद उठाया जाय ....

गांव में एक स्त्री थी । उसके पतिदेव कही बाहर कार्यरत थे । 
वह आपने पती को जब भी पत्र लिखना चाहती थी अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं होता था कि पूर्णविराम(full stop) कहां लगेगा । इसीलिये उसका जहां मन करता था वहीं पूर्ण विराम  लगा देती थी ।
कुछ इसी तरह से उसने एक चिट्टी इस प्रकार लिखी--------

मेरे प्यारे जीवनसाथी 

मेरा प्रणाम आपके चरणो मे । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नौकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेडीया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खुबसूरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी मां । तुमको बहुत याद कर रही है एक पडोसन । हमें बहुत तंग करती है

तुम्हारी मां की । बहू

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अब क्या करे... कई दिनों से टल रहे प्रोग्राम के बाद आज डेल्ही वेळी देख कर आया हूँ तो यही सब पोस्ट लगेगी ना.. वैसे अब पता चला कि आज और हमेशा के मेगा स्टार अमित जी की "बुड्ढा होगा  तेरा बाप" जैसी शानदार मूवी.. की बीप..बीप  को छोड़कर लोग इसके पीछे क्यों दीवाने है । भाई जब आप खुलेआम लोगो की माँ..बहन की जै-जयकार करने में संकोच नहीं करते है तो पिक्चर हाल में सुनने में क्या बुराई .... आखिर कब तक हिन्दुस्तानी अपने चेहरे और भावनाओ पर नकाब पहन कर चलेगा ?

और आज जब पश्चिम पूरब होने को व्याकुल हो रहा है तो ध्रुवों का सामंजस बनाये रखने के लिए पूरब को भी पूरी तरह कल का पश्चिम बनना ही होगा 

तो सभी को हार्दिक बधाईयाँ........

वैसे टी.वी. ओपरा तो पहले से ही व्यस्क हो गया था ... हर दूसरे सीरियल में किसी ना किसी का तीसरे से अफेयर चल रहा है ... और तो और बहू का राज खुले तब तक सास की सास के पुराने रिश्ते वहां खुल जा रहे है और घर तोड़ने की सभी सोलह कलाए वो सिखा ही रहा है  तो भारतीय सिनेमा ही क्यों सम-सामयिकता से पीछे रहता..

तो अब किसी के कहे (नाम याद नहीं ) दो लाईनों के साथ एक अल्प विराम ..

 "किसी जगह के लिए इंतख़ाब रहने दे ,मैं एक सवाल हूँ मेरा जवाब रहने दे।
मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन ,मैं बेनक़ाब सही,बेनक़ाब रहने दे।"


गुरुवार, 23 जून 2011

तख़्त बदल दो , ताज बदल दो ....

तख़्त बदल दो , ताज बदल दो , 
बेईमानो का राज बदल दो । 
देखो जनता आती है ,
परिवर्तन की आँधी लाती है । 
जन-जन अब हाल बदल दो , 
मिलकर सत्ता की चाल बदल दो । 


जाने कब ये बना था नारा , लेकिन अब भी लगता प्यारा । 
सत्ता पाकर भी जनता को , नहीं किसी ने कभी दुलारा । 
जाने कितने तख़्त बने , जाने कितने इतिहास बुने । 
जाने कितने नेताओं को , अदल बदल कर हमने चुने । 
मगर आज तक जनता का , नही कोई कल्याण हुआ । 
जो भी सत्ता में जाकर बैठा , वो अपने में ही भार हुआ । 
जाने कितने बदले ताज , जाने कितने बदले राज । 
निरीह असहाय जनता का, बनता नहीं है कोई काज । 
भूँखी-नंगी जनता का , उन्होंने भी नहीं हाल सुना ।
बड़े अरमानो से हमने , जिनको  अपना नेता चुना ।
बदल गयी सब मर्यादाएं , भूल गयी पिछली भाषाए ।
केवल सत्ता याद रही , और याद रही उसकी भाषाए ।

भूल सभी जन-संघर्षो को , नेताओं ने बस दुराचार किया । 
जनता की आकंक्षाओ से,खुल्लम-खुल्ला व्यभिचार किया ।
याद रहे नहीं वादे उनको , भूल गए सब नाते उनको ।
बीते थे कुछ एक माह ही , जब सत्ता में जाते उनको ।
सत्ता है कुछ ऐसी ठगनी , मति-भ्रम वो कर देती है ।
अच्छे अच्छो के मन में , लालच वो भर देती है 
फिर भी हमको लगता प्यारा , नारा ये कितना है न्यारा ।
खाकर लाठी-डंडो को भी , जनता ने इसे सदा दुलारा ।
मन में आश जगाता है , कभी मृग-तृष्णा सा बहलाता है ।
आज नहीं तो कल निश्चित ही , बदलेगा हाल बताता है ।
सत्ता सुख का बँटवारा , आखिर जन-जन तक पहुंचेगा ।
आएगा एक दिन वो भी , जब सबका चेहरा चहेंकेगा ।

मत आश करो नेता,बाबाओं का , ये सब चाटुकार हैं सत्ता के ।
तुम स्वयं ही अपने नेता हो , और योग्य भी हो तुम सत्ता के ।
मत देखो तमाशाई बन कर , कल घर तेरा भी जल सकता है ।
हम जैसी बेबस जनता से ही , कोई जन आँधी बन सकता है ।
तो आवो फिर से जोर लगाओ , क्यों बैठे हो तुम भी आ जाओ ।
आओ धरने पर तुम भी आओ , अपना भी दुःख-दर्द सुनाओ ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

रविवार, 23 जनवरी 2011

आवो तुम्हे पालतू बनायें...

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।

हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।

परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है ।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

वाह क्या हुनर है......?

वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?
पोर-पोर उँगलियों के भरे है अनुभव से ।
और क्यों ना हों ऐसा जब वर्षों से ,
आपको महारथ है हवाई किले बनाने में ।

पहले भी बहुत से फर्जी रजवाड़ों के , बनाये थे ठेके पे किले आपने हवावों के ।
आज भी अपने नेता और युवराज से  , मिले हैं ठेके हवाई किले बनाने के ।
आपके बनाये किले सब अनोखे हैं , उनमे हवा के ईंटो की हवा से चुनाई है ।
हवा के दरवाजे पर हवा की सफाई है , हवा के कमरों में हवा की रंगाई है ।

कोई भी चले हवा , किले को ना छु पाई है ।
अंदर और बाहर की हवा , आपस में ना मिल पाई है ।
भेद सब हवा के , हवा ही समेटे है ।
हवाई किलो में देखो , हवा के ही बेटे हैं ।
निश्चित ही किसी दिन आपको , निशाने पाक भी मिल जायेगा ।
आपके मकबरे पर एक ना एक दिन , लादेन भी फातिया पढने आएगा ।
महाराज जयचंद जैसा ही , आदर से आपका नाम जग में लिया जायेगा ।
अफ़सोस मगर तब तक आप जैसों के कारण , यह देश कई टुकड़ों में बँट जायेगा  ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी तक ।

ना ना .... जरा दो मिनट रुक जाइये  
पोस्ट पढ़े बिना सिर्फ टाइटिल देख कर यह मत सोंच लीजिये कि मैं किसी हालीवुड की  'XX' या 'XXX' श्रेणी की फिल्म का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहा हूँ या किसी भोजपुरिया फिल्म का शीर्षक अपने ब्लाग पर लगा दिया है।

वैसे भी मै वही कहता या लिखता हूँ जो मेरे दिल की बात होती है और दिल की बात कहते समय मै शब्दों पर कम अपने भावों पर ही ध्यान देता हूँ , तो जो दिल में बात उठती है वो लगभग वैसी की वैसी ही सामने प्रगट हो जाती है बिना सेंसर हुए ...
सुना है ना आपने " पर्दा नही जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या ...."

और आज तो मै "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" के मध्य देश और समाज में हुए विकास की भी बात करने जा रहा हूँ ....
अब आप भी सोच रहे होंगे कि "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" तक के जुमले का देश और समाज के विकास से क्या वास्ता....?
चलिए ज्यादा भूमिका बाँधे बिना पहले यह बताता हूँ कि आज अचानक यह विषय लेकर मै क्यों बैठ गया...

हुआ यह कि आज मै इतना त्रस्त हो गया कि मजबूरन यह पोस्ट लिखने के लिए बैठ गया....
और त्रस्त भी क्यों हुआ... हर पाँच मिनट पर मुन्नियों के बदनाम होने से ।

क्या ? आप सोच रहे है कि मै फिर शब्द जाल में उलझाने लगा...
नही नही ऐसा कदापि नही है...
वास्तव में यदि काल पात्र समय का सही से विवरण ना दिया जाय और बात को सन्दर्भ से अलग कर के एकतरफा देखा या प्रस्तुत किया जाय तो अर्थ का अनर्थ होने लगता है । और मै तो वैसे ही अनर्थकारी चर्चा छेड़ने जा रहा हूँ इसीलिए  प्रयास कर रहा हूँ कि इसमे अनर्थ की जगह अर्थ ही आप के समक्ष प्रस्तुत हो ..

आगे आपका विचार , उस पर मेरा नियंत्रण नही है ,

[ अरे जब लोकतंत्र के ज़माने के ऐ. राजा और स्थायी रोजगार की तलाश में लगे अंग्रेजो के ज़माने के दिग्गी राजा पर आज देश के सर्वश्रेष्ट शक्तिमान व्यक्तियों में शामिल सोनिया जी और मनमोहन जी का नियंत्रण नही है और जिसके जो मन में आ रहा है वो अनाप सनाप तरीके से बेधड़क  होकर कर रहा है या रात नशे में किसी पुरातन धटना से सम्बन्धित कोई सपना देख कर देश का लाभ-हानि विचारे बिना सुबह महज अपनी कब्जियत दूर करने के लिए और अपना तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने हेतु कुछ भी बेशर्मो की तरह बक दे रहा हो और वो दोनों चुपचाप तमाशबीन बने रह जाय वहां हमारा आपका एक दूसरे पर क्या नियंत्रण...? ]

तो फिर चलिए " लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक.... हुए देश और समाज के विकास" पर सीधी बात...
आज १५ दिसम्बर की रात थी , और हिन्दू धर्म के लिए इस माह की यह आखिरी रात थी जब भोले-भाले नवयुवको को बलि-वेदी पर चढ़ाया जा सकता हो मतलब विवाह-वेदी पर बैठाया जा सकता हो, भोले-भाले नवयुवको की बात इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि आजकल बेचारे भोले-भाले नवयुवक ही घर परिवार,धर्म और समाज के कहने (उकसाने) पर बेदी पर बैठते है वरना जो भोले-भाले नहीं है वो घर-परिवार और समाज को ठेंगा दिखाकर ठसके से "लिव-इन" जैसे सम्बन्ध को अपनाने लगे हैं (हमारे ज़माने में तो जीवन साथी पाने का यह तरीका केवल अमेरिका जैसे देशो में ही था और बेचारा अपना मुल्क तब बहुत पिछड़ा हुआ था.., यह मत सोंचिये की अगर तब सुविधा होती तो मै क्या करता, यहाँ सवाल सुविधा होने और ना होने का है ) ।

तो समाज में रहने के कारण मुझे भी आज तीन-चार शादियों में शामिल होने का निमंत्रण मिला था, कहीं निमंत्रण वर पक्ष से था तो कहीं कन्या पक्ष से ।
हालाँकि आज मै अपनी रोजी-रोजगार के कार्य से कुछ ज्यादा ही थका था , साथ ही कुछ एसिडिटी की समस्या भी शायद ठण्ड की वजह से पैदा हो गयी थी और कुछ मौसम भी सर्द था जिसके कारण कुछ भी खाने का मन भी नही था तो पहले सोचा कि कहीं ना जाऊं और बाद में ना आ पाने का कोई उचित कारण खोज कर क्षमा मांग लूँगा (क्योंकि मात्र थका होना,एसिडिटी होना और मौसम सर्द होना जैसे कुल तीन कारण किसी को ????-वेदी पर चढ़ाये जाने के अवसर पर ना शामिल होने हेतु शायद पर्याप्त नही है ) मगर फिर ख्याल आया कि कम से कम कन्या पक्ष के निमंत्रण का तो आदर किया ही जाना चाहिए तो मै तैयार हो गया ।

संयोग से कार्यालय की कार और उसका चालक भी अभी साथ ही था जिससे मुझे स्वयं से ज्यादा तकलीफ भी नही करनी थी बस अपना भार उस पर ( कार पर भौतिक रूप से और उसके चालक पर मानसिक रूप से ) लाद देना था और एक जगह से दूसरी जगह उपस्थिति दर्ज कराकर वापस आ जाना था । और संयोग से मेरे एक अजीज बड़े भाई साहबान  भी साथ ही थे तो सफर में बात करने वाला भी मिल गया,फिर क्या था चल पड़े सवार और सवारी।

यात्रा की शुरुवात करते समय तक जो दुश्वारियां गिनाई वो तो थी ही अब गोरखपुर जैसे पुराने शहर की असली समस्या सामने आने लगी कि,  हर सड़क-हर गली और शायद पूरा शहर आज बारात और उसके बारातियों से जाम है , तो कार से किया जाने वाला सफ़र भी पैदल यात्रा के समान ही था और फिर जैसे ही एक बारात या मैरज-हॉउस से आगे बढ़े वैसे ही फिर अगला मिल जाय.... 

आखिर कुछ खींझ कर और कुछ अपनी बोरियत मिटाने हेतु मैंने भाई साहेब को छेड़ा "देख रहे है भाई साहेब आज भाई-बंधू और समाज के लोग कितने स्वार्थी और दूसरों के भावी दुःख में खुश होने वाले हो गए है कि बेदी पर चढ़ने जाते हुए एक मासूम के भावी परिणाम को सोच कर मारे ख़ुशी के नाच- नाच कर "चांस पे डांस" का अवसर नही खोना चाहते है ।
भाई साहेब ने भी मेरे बे-सिर पैर के दर्शन पर बजे कोई सीधी प्रतिक्रिया देने के अपने चुटीले अंदाज में एक नया ही राग छेड़ दिया कि, ध्यान दो ..! आजकल कोई बारात बिना "यह देश है बीर जवानो का,अलबेलों का,मस्तानो का..... यहाँ  चौड़ी छाती बीरो की... इस देश का यारों क्या कहना ..." जैसा जोशीला गाना सुने बिना जोश में आती ही नही है ? और कम से कम एक बार यह गाना हर बारात में बजता जरुर है ।

मै इससे पहले इसपर अपनी कोई प्रतिक्रिया देता, मुझे ध्यान आया कि पिछले पौन घंटे से हर पाँच मिनट पर जो गाना सबसे ज्यादा, बार-बार बज रहा है वो तो "मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए" है । और यह ध्यान आते ही मेरे मन में ख्याल आया कि पहले तो बचपन में मै जब किसी शादी-बारात में जाता था तो ज्यादातर लोग "बारात में नाचने गाने वाली नचनियों की पार्टी जिसमे शामिल महिलाओं को उस ज़माने में 'पतुरिया' कहा जाता था" को ले जाते थे और फिर पूरी रात नाच गाना चलता रहता था, वर और कन्या पक्ष दोनों तरफ के लोग खा-पी कर शुरू से अंत तक नाच गाना देख-सुन कर आनंदित होते रहते थे और उस ज़माने में वो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त मर्यादित आचरण ही था हाँ नचनियों को ना लाना जरुर वर पक्ष को अपमानजनक स्थित में पहुंचा देता था ....

तो उस ज़माने कुछ प्रचलित गानों में में जो गाना सबसे ज्यादा प्रचलित था वो "लौंडा बदनाम हुवा नसीबन तेरे लिए" था क्योंकि वो आज भी मुझे याद है, और मुझे यह भी याद है की बचपन में मैंने किसी से इस गाने का अर्थ जब पूंछा था तो जबाब में शायद डांट ही सुनने को मिला था, गाने का अर्थ तो समय ने समझाया ।

तो दोनों गानों के बोल एक साथ जेहन में आते ही एकाएक मुझे ख्याल आया कि मेरे बचपन से लेकर अब तक वास्तव में देश और समाज ने क्या क्या प्रगति कर ली है और क्या क्या परिवर्तन हो चुके हैं ? मैंने भाई साहेब से कहा देखिये पहले की शादी-बारात और आज की शादी-बारात में क्या क्या अंतर आ गया है ...

पहली प्रगति:- पहले लौंडा बदनाम होता था और अब मुन्नी बदनाम होने लगी है ....  अर्थात पुरुष वर्चस्व समाप्त हो गया , महिला वर्ग की भी खुले आम भागेदारी सामने आने लगी है ।

दूसरी प्रगति:- 'सट्टा बंधा कर' अनावश्यक 'पतुरियों' पर पैसा खर्च कर एक-दो नाचने वालियों की जगह समाज में आये ज्यादा खुलेपन,आत्मनिर्भरता और सहयोग की भावना  के कारण अब घर-परिवार, दोस्तों के परिवार और मोहल्ले से बारात में शामिल होने हेतु सज-धज कर आने वाली भांति-भांति के उम्र की महिलाएं ही बारात में नाच कर बराती,घराती और मार्ग पर चलने वाले यात्रियों के मनोरंजन की जिम्मेदारी अपने कंधो (मतलब अपने कमर पर) ले चुकी हैं ,जिसका एक सामाजिक प्रभाव यह हुआ है कि पतुरिया जैसा भौड़ा शब्द भी कहीं ना कही अपनी मान्यता खो चुका है, और उस विरादरी को अपनी रोजी रोटी हेतु भले ही लाले पड़ गए हों पर वर पक्ष का खर्चा कम हो गया है क्योंकि नाच गाने हेतु किराये के नचनियों पर निर्भरता समाप्त हो गयी है । इस प्रगति से कृपया महिलाएं नाराज ना हों क्योंकि पुरुष तो पहले भी जन्मजात नचनिया था आज भी है ।

तीसरी प्रगति :- पहले प्राय: बेचारे घराती अपना पेट पकडे  और मुह बाँधे चुप-चाप तब तक इंतिजार करते थे जब तक बाराती ना डकार ले लें , मगर अब ज्यादातर बारात आने के पहले ही घराती डकारता है फिर जूठे-कूठे मेज , स्टाल पर बेचारा बराती भोजन करता है अर्थात घरातियों पर बारातियों की श्रेष्ठता लगभग समाप्त हो गयी है

चौथी प्रगति :- पहले बिकाऊ दुल्हे के पिता द्वारा दहेज़ मांगे जाने पर और उसे उचित मूल्य ना चुका पाने पर ना केवल कन्या का पिता वरन कन्या पक्ष के अन्य सम्मानितगण भी वर पक्ष को रिझाने-मानाने के लिए अपना शीश नवाने लगते थे, अपनी पगड़ी उतरने लगते थे, मगर अब ज्यादा मोल भाव करने पर दुल्हे, उसके पिता, भाई-बंधू और लगे हाथ बारात में शामिल बे-सहारा बाराती ( बाराती सदैव बेसहारा ही होते है.. उनका मोल केवल तब तक होता है जब तक बारात दुल्हन के घर ना पहुँच जाय, फिर सड़क के कुत्ते और लौटे बाराती में कोई अंतर नही रह जाता) भी दो पल में लतिया-जुतिया दिये जा रहे हैं , और जो मौके से भाग नहीं पाते उनका आगे का सत्कार सरकारी ससुराल में होने लगता है , तो दहेज़ की समस्या का भी कुछ-कुछ निदान हो रहा है

पाँचवी प्रगति :- जैसा की पहले ही कह चुका हूँ कि जो लोग भोले-भाले नही है, उनको इन सब बन्धनों से दूर कहीं शांति और ज्यादा खुलेपन से अभी तो भारत के मेट्रो शहरों में ही लागू लिव इन रिलेशन को अपना लेने की सुविधा मिलने लगी है, और आगे उम्मीद है कि जल्द ही पूरे देश में इसकी मान्यता मिल ही जाएगी ।

और सबसे अंत में
छठवीं प्रगति :- अब तो भारत में भी शादी करने और हनीमून मनाने हेतु एक कन्या और एक युवक के जोड़े के होने की बाध्यता समाप्त हो रही है , राजधानी के एक अदालत के मध्यम से कुछ माह पहले कानूनन अप्रत्यक्ष  रूप से सहमति देश का विधान दे ही चुका है , आगे भारत के भावी कर्णधार पूत और कुछ समाज सेवी पेट दर्द से परेशान एन.जी.ओ. उसे नवीन दिशा और मंजिल दे ही देंगे, तो पूरब और पश्चिम का अधिकांश अंतर समाप्त हो गया है और जो शेष रह गया है वो भी जल्दी ही समाप्त हो जायेगा और फिर पूरब पश्चिम से निश्चित ही हर मामले में आगे होगा

तो चलिए बात समाप्त करता हूँ , आगे मुझसे सहमत होना ना होना आपकी मर्जी ... वैसे भी मुझे इससे कभी फर्क नही ही पड़ता है.. क्योंकि मेरे कहने के पूर्व ही हम जैसो के लिए ओशो ने कह दिया था " मुझे सही समझे जाने की कोई जिज्ञासा नहीं। यदि कोई सही नहीं समझता तो यह उसकी समस्या है,उसका दुख है। मैं अपनी नींद नहीं खराब करूंगा "

अब रात भी बहुत ज्यादा हो गयी है, साथ ही कई शादियों में शामिल होने के बाद भी मुझे भूंखे पेट (एसिडिटी के कारण) सोना भी है ।..... तो नमस्कार , शुभ रात्रि

आपका अपना (यही लिखा जाता है कूटनीतिक तौर पर जबरदस्ती अपनापन दिखने के लिए)
विवेक (मिश्र..अनंत)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 1 नवंबर 2010

एकै साधे सब सधे

साथियों
              आज हर तरफ भ्रष्टाचार,लूट-घसोट  का बोलबाला है, हर कोई इससे व्यथित है। जिसको देखो वही कहता है कि फलां विभाग में बड़ा भ्रष्टाचार,लूट-घसोट का बोलबाला है मगर उसी व्यक्ति जब उसके अपने कार्य-क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार,लूट-घसोट के बारे में पूंछो तो वो अपना मुह घुमा लेता है या मात्र मुस्कुराकर रह जाता है ।

प्रशासन से लेकर शासन तक के सभी जिम्मेदार अधिकारी,पदाधिकारी सदैव यही कहते है कि वो लगातार (नीचे व्याप्त) भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयास कर रहें है मगर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं लेता है।
आखिर क्यों ?
कहाँ किस स्तर पर कमी रह जा रही है भ्रष्टाचार का नाश करने में ?
कहीं हमारा प्रयास " पर उपदेश कुशल बहुतेरे " वाला तो नहीं है ?

तो जनाब
ये जगत का नियम है कि धारा प्रवाह की दिशा सदैव ऊपर से नीचे की तरफ होती है।

अत: यदि श्रोत निष्कलंक हो तो मध्य या अंत में चाहे जितना मिलावट क्यों ना हो जाय , पूरी धारा को कभी पूर्णतया कलुषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि पवित्र उदगम लगातार नयी उर्जा , नयी शक्ति और पवित्रता का प्रवाह करता रहता है जिसके संचरण से मार्ग में होने वाले परिवर्तन कभी स्थाई स्वरुप नहीं लेने पाते है ।

परन्तु

यदि उदगम ही दूषित,जहरीला हो जाय तो पूरी धारा दूषित हो जाएगी और कोई लाख कोशिश  करे,वो कछारों पर पवित्रता नहीं बनाये रख सकता क्योंकि वो उदगम का स्वरुप नहीं बदल पायेगा ।

और ये सिद्धांत केवल नदी, झरनों पर ही नहीं वरन मानव समाज पर भी लागू होती है ।

अत: यदि भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो देश,समाज,धर्म  के शीर्ष  शिखर पर बैठे लोगों को पहले अपनी पवित्रता बनाये रखना होगा और फिर कहा गया है कि "एकै साधे सब सधे,सब साधे सब जाय" ।


                                                     © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

प्रिय राहुल और माननीय गृह मंत्री जी, मैंने भगवा ओढ़ लिया है...

जहाँ माननीय गृह मंत्री भगवा आतंकवाद का सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे है, वहीँ कांग्रेस के युवराज संघ और सिमी को एक ही तराजू में तौल रहें है, मुझे दोनों की क्षमता और नीयति पर कोई शक नहीं है मगर ऐसा भी नहीं है कि वो अनजाने में नादानी नहीं कर सकते है ! 
आखिर भारत वर्ष की शान और रणचंडी सी महान नेता श्रीमती इंदिरा गाँधी ने भी कई नादानियाँ की और पूर्वोत्तर और पंजाब में मात्र राजनैतिक बढ़त हासिल करने के चक्कर में अनजाने में आतंकवाद को एक नया चेहरा प्रदान कर दिया था । और कुछ इसी तरह आज कश्मीर के हुक्मरान भी वहां कर रहें है ........
इसी तरह अगर राहुल गाँधी और चिदम्बरम साहेब के बोलने और सोंचने का अंदाज ना बदला तो कहीं ऐसा ना हो जाय कि सामान्य जनमानस भी वही कहने लगे जो.... डॉ. जय प्रकाश गुप्त ने  http://bhadas.blogspot.com/2010/09/blog-post_1394.com पर कहा है , और वो मेरे जेहन और जबान पर ना चाहते हुए भी चढ़ा रह रहा है
जरा देखें....

शीश शिखा होने से पक्का हिन्दु था ही,
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।
आतंकी है भोर, है गोधूलि आतंकी ,
वह्नि की ज्वाला है दीपशिखा आतंकी ।
आतंकी है यज्ञ वेदमन्त्र आतंकी,
आतंकी यजमान पुरोहित भी आतंकी।
मैं इन सब का आदर करता पूज्य मानता इन्हें,
अत: मैं मान रहा मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।
आतंकी है राम और कृष्ण आतंकी ,
विश्वामित्र वसिष्ठ द्रोण कृप हैं ।
आतंकी बृहस्पति भृगु देवर्षि नारद आतंकी,
व्यास पराशर कुशिक भरद्वाज आतंकी ।
मेरे ये इतिहास पुरुष पितृ ये मेरे ,
वंशज इनका होने से मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।
नामदेव नानक और दयानन्द आतंकी ,
रामदास (समर्थ) विवेकानन्द आतंकी ।
आदिशंकराचार्य रामकृष्ण आतंकी ,
गौतम कपिल कणाद याज्ञवल्क्य आतंकी ।
ये मेरे आदर्श सदा सर्वदा रहे हैं,
इसीलिए मैं कहता हूँ मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।
भगवा तो भारत की है पहचान कहाता ,
प्रिय तिरंगा भी भगवा से शोभा पाता ।
भारतमाता के कर में भगवा फहराता ,
भारत की अस्मिता से है भगवा का नाता ।
बोध यदि भगवा का उग्रवाद से हो तो,
 अच्छा यही कि सब बोलें मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ। 

तो
हे माननीय शासक गण
आपसे अनुरोध है की कृपया ये स्थिति ना आने दे ,
शब्दों का सूक्षमता और संजीदगी से चयन और प्रयोग करें  
और कुछ गिने चुने मूर्खों के कारण समस्त हिन्दू जनमानस की भावनावों को
नाहक विभन्न तरीकों से आहत कर किसी नये आतंकवाद को जबरदस्ती ना खड़ा करें ।
हिन्दुवों के लिए यह धरती उनकी माँ के समान है, भले वो हत्या , लूटपाट , चोरी जैसे अन्य जघन्य अपराध में शामिल हो सकते हो मगर वो कभी राष्ट्र द्रोही नहीं हो सकते है और वो राष्ट्र के लिए अपना धर्म भी छोड़ सकते है।
आपकी जनता और भारत मां की एक संतान , विवेक मिश्र .. अनंत  

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

अयोध्या का सर्व-सम्मत हल न्याय-तन्त्र ने ही दिया है और आगे भी देगा...

मित्रों इलाहाबाद उच्च न्यायलय से अयोध्या समस्या का बहु प्रतिक्षित फैसला आ चुका है....जिसके लिए उच्च न्यायलय ने विभिन्न साक्ष्य,पुरातात्विक प्रमाण  और गवाहियां देखा है
मगर अब इसकी अलग अलग व्यक्तियों, समुदायों, धार्मिक और राजनैतिक नेतावों और उनके दलों के द्वारा व्याख्या, समालोचना, प्रतिक्रियावों का दौर भी चालू हो गया है.... जो विभिन्न प्रिंट और लाइव मीडिया चैनलों के माध्यम से जनमानस के सामने आ रहा है ।
कोई कह रहा है कि यह बहुत ही बेहतर फैसला है, कोई कह रहा है कि यह फैसला कम एक समझौता ज्यादा है, कोई कह रहा है कि इसमे तर्क और साक्ष्य के मुकाबले आस्था को ज्यादा महत्व दिया गया, किसी को यह पूर्णतया मान्य है तो कोई उच्चतम न्यायलय जाने की बात कह रहा है।

चलिए उच्चतम न्यायलय भी देख लेते है वहां से भी देर सबेर आवश्यकतानुसार इसी से मिलता जुलता फैसला आने की ९९.९९ प्रतिशत उम्मीद है , कारण आगे समझ में आ जायेगा ।

वैसे यह आज के भारत के परिपक्व सोंच का ही नतीजा है कि ९९ प्रतिशत लोगों की प्रतिक्रिया सीधी साधी, एकदम संयत, सधी हुयी और भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने वाली ही है सिवाय वर्षों से पेट्रो डालर के बल पर फलने - फूलने वाले और अपनी राजनैतिक जमीन खो चुके कुछ तथाकथित ढोंगी राजनैतिक नेतावों  के जो महज अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के चक्कर में ना केवल न्यायिक अवमानना करने की मूर्खता कर रहें है वरन अपने आप को एक समुदाय विशेष का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की लालच में देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक देने का प्रयास कर रहे है।
इनसे सावधान रहने की जरुरत है......क्योंकि पुरखों ने कहा है कि जो अपनो का नहीं होता है वो कभी गैरों का नहीं हो सकता है

इसके अलावां कुछ लोगों ने फैसले का स्वागत तो किया है मगर उनके द्वारा कहा जा रहा है कि "अयोध्या समस्या का सर्व-सम्मत हल न्यायिक-तन्त्र नहीं दे सकता और इसके लिए दोनों समुदायों को आपस में वार्ता करके कोई सर्व-सम्मत हल निकलना होगा" यह भी निहायत ही मूर्खता पूर्ण तर्क है क्योंकि यदि ऐसा होना होता तो पिछले २००-२५० सालों में हो गया होता

अब कुछ अन्य बातें
१. सारे पौराणिक ग्रन्थ और समस्त जनमानस  मानता हैं कि भारत वर्ष में अयोध्या ही भगवान् श्री रामचंद्र जी की जन्म-भूमि है और इस देश में कोई दूसरी अयोध्या भी नहीं है तो भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में जन्म लिया था इसमे कोई शंका ना है ना ही किया जा सकता है।  हाँ काल की गणना पर अलग अलग धर्मो के लोग हिन्दू गणना पद्धति पर प्रश्न लगा सकतें है मगर मूल विषय निर्विवाद ही है , और आप विवाद तब ही खड़ा कर सकते है जब आप की उपस्थिति विवादित विषय के प्रारम्भ समय से ही हो । और हिन्दू धर्म ने जब अपना दो तिहाई से अधिक समय पूर्ण कर लिया तब वर्तमान के धर्म प्रतिपादित हुए है तो यदि वो ये कहें की आप भगवान राम का जन्म प्रमाणित करें तो यह वैसा ही है जैसे कोई बच्चा कहे मै परदादा को नहीं जानता आप प्रमाणित करें ।

२. मगर भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में किस स्थान पर जन्म लिया था इसका साक्ष्य वास्तव में नहीं है  अर्थात भगवान राम की जन्म स्थान/भूमि तो प्रमाणित है मगर जन्म स्थान आज हिन्दू धर्म या कोई भी इतिहास प्रमाणिक तौर पर नहीं बता सकता है और बताये भी कैसे......आज उस समय का कोई  भी नक्शा किसी के पास नहीं है तब से ना जाने कितनी बार अयोध्या बसी है, उजड़ी है, जाने कितने बार सरयू नदी ने अपना प्रवाह मार्ग परिवर्तित किया है तो यह असंभव है, और ये बात ना केवल भगवान राम हेतु लागू है वरन भगवान कृष्ण, देव-दूत ईशा मसीह, और पैगम्बर साहेब हेतु भी लागू है ।

३. उक्त विवादित परिसर पर मस्जिद बाबर के सेनापति मीर बांकी खां ने बनाया था इस पर दोनों पक्ष सहमत हैं । इस तथ्य पर विवाद हो सकता है कि मस्जिद मंदिर को गिरा कर बनाया गया या मंदिर के भग्नावशेष पर ? मस्जिद बनाये जाने हेतु भूमि स्वामी से अनुमति ली गयी या नहीं ?
४. हुमायु, शाहजहाँ,अकबर, और औरंगजेब जैसे शाशक भले ही विसुद्ध रूप से भारत वासी हों मगर बाबर निश्चित रूप से बाहरी और आक्रमणकारी ही था इसमे कोई शंका नहीं है

5. अगर सामान्य आक्रमणकारी मनोविज्ञान से सोंचे तो आज भी हमला करने वाला ना केवल अपने पराजित शत्रु के जन-धन की हानि करता है वरन उसके मनोबल को भी हर तरह से तोड़ने का प्रयास करता है क्योंकि तभी उसकी विजय ज्यादा स्थाई रह सकती है । तो परिस्थिति जन्य साक्ष्य यही है कि बाबर ने मंदिर ( अयोध्या में था तो राम मंदिर ही होगा, अब यह कैसा मंदिर था ? जन्म भूमि थी या कोई सामान्य विशेष पूज्य मंदिर था यह तो उस ज़माने के लोग ही जाने या भगवान राम जाने ) को ध्वस्त कराकर ही वहां मस्जिद बनवाई और वहां के हिन्दू निवासियों का मान मर्दन किया ( अगर खंडहर पर बनाना होता तो उस ज़माने में भूमि की कोई कमी नहीं थी वह उसे किसी खाली जगह पर भी बनवा सकता था। और उसने जो किया कहीं से गलत नहीं किया।

6. मै सपथ पूर्वक कहता हूँ कि अगर मै आक्रान्ता बाबर होता तो  निश्चित तौर पर अपने विजित स्थानों पर अपनी जीत को चिर स्थायी बनाने और अपने दुश्मनों के मनोबल का दमन करने हेतु उनके महत्वपूर्ण स्थलों सहित उनके पूजा स्थल को भी खंडित कराता और वहां अपना कुछ बनाता और सारे विश्व में विजेता सम्राट यही करते है , यह ना पाप है ना अधर्म है यही विजेता की मानसिकता है  । और अगर कोई तथाकथित महान सज्जन पुरुष,महिला अथवा दोनों के बीच वाला प्राणी यह कहें कि वो अगर बाबर होते तो एसा नहीं करते तो या तो वो झूंठ बोलेंगे या वास्तव में यह बात कहते समय अपने अन्दर एक आक्रामक सेनापति के भाव नहीं ला पा रहे होंगे।

५. और जब मस्जिद बनी होगी तो निश्चित तौर पर वहां नमाज भी पढ़ी जाती रही होगी हाँ समय के साथ जैसे-जैसे स्थानीय हिन्दुवों ने अपनी शक्ति वापस पायी वो अपनी खोई हुयी जमीन को वापस पाने हेतु प्रयासरत हुयी यह भी कहीं से गलत नहीं है फिर चाहे वहां राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए , दोनों ही उचित है आखिर वो स्थल छीना  हुवा ही था और पराजित को हक़ है कि वो अपनी सम्पत्ति को वापस पाने का जैसे भी हो सके प्रयास करे । और अगर ये अनुचित है तो सबसे पहले तो आज वक्फ बोर्ड को भंग कर देना चाहिए।

६. और जब राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए तो वहां पूजा अर्चना भी हुयी ही और वो हिन्दू स्थल कि गरिमा पुन: पाया भले ही बंद रहकर ही सही ।
७.  हाँ उक्त विवादित परिसर को गिराया जाना  जरुर अनुचित और गैर क़ानूनी कहा जा सकता है मगर जरा विचार करें कि क्या आज भी सामान्य जन अपने भाई-भतीजों, पट्टीदारों या किसी बाहरी कब्जेदारों से निपटने के लिए ये तरीके नहीं अपनाता है ?

८. पहले भी बातचीत का प्रयास किया गया मगर जहाँ एक तरफ हिन्दू कहता था कि हमें गर्भ गृह ही चाहिए ( मेरे अनुसार यह आस्था से ज्यादा जैसे आत्म सम्मान का विषय था , सोंचे क्या हम आज भी हम लोग पूरी तरह से अंग्रेजों की गुलामी से उबर पाये है ? ) तो दूसरी तरफ मुस्लमान कहता था अगर उसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद चाहिए तो मुख्य गुम्बद के के नीचे ही चाहिए वर्ना नहीं चाहिए ( यह भी आस्था से ज्यादा विजेता के गुरुर का ही मामला था वर्ना क्या मक्के और मदीने जैसे पवित्र स्थलों के शहर में कुछ मस्जिदों को केवल शहर के विकास के नाम पर अलग स्थानांतरित नहीं किया गया ? तो भारत में क्यों नहीं हो सकता था ?)

९. तो इस तरह से हिन्दू और मुस्लमान दोनों के दावे उक्त स्थल हेतु अलग अलग काल खंड के अनुसार सत्य हैं  , जो लोग चिल्ला रहे है कि उनके तर्कों और साक्ष्य  को पूरी तरह से नहीं देखा गया वो वास्तव में अनर्गल प्रलाप कर रहें है । अरे अदालत और क्या देखती ? केवल तुम्हारी एकतरफा सुनती तभी सही थी ? उसने सब तर्कों और साक्ष्य  को वास्तव में ईमानदारी से देखा तभी तो दोनों पक्ष का अधिकार माना और भूमि को १/३,१/३,१/३ के अनुसार बँटा । और यही उचित भी था वर्ना अगर वो किसी भी पक्ष को पूरी तरह से भूमि दे देता तब वास्तव में अन्याय करता।

१०. अब मान लेते है कि अगर पूरी भूमि मुसलमानों को ही अदालत देने का कागजी  आदेश जारी कर देती तो जरा सोंच कर देखें कि प्रदेश के मुख्य मंत्री , देश के प्रधानमंत्री, तीनो सेना के सेनापति, सभी धर्म गुरुवों से लेकर राजनेतावों तक किसकी सामर्थ है कि वहां वर्तमान में स्थापित राम लला को हटवा देता और वहां मस्जिद बनवा देता ? अगर ऐसा हो सकता तो पहले के पदों पर पद-स्थापित लोग ऐसा अपनी ताकत और सत्ता का प्रयोग कर के ना कर देते फिर चाहे वो नेहरू हो, इंदिरा जी हों, राजीव गाँधी हो, बाबा अटल बिहारी हो, चंद्रशेखर हो, या मनमोहन सिंह हो, आडवाणी हो, कल्याण सिंह हो, मुलायम सिंह हो, बुखारी हो, जिलानी हो या मोहन भागवत हो ?

११. और ये बात केवल राम लला बिराजमान हेतु ही नहीं लागू होती है यही बात बात दुसरे पक्ष हेतु भी लागू है , पूरी भूमि हिन्दुवों को ही अदालत द्वारा देने का कागजी आदेश जारी हो गया होता और वहां पुराना वाला ढांचा आज भी होता तो  किसकी औकात थी कि वहां उसे गिराकर वहां मंदिर बनवा देता ?

१२. कुछ भी कहना आसान है मगर उसे जमीनी धरातल पर कार्य करना मुश्किल होता है ? तो अगर वो ढांचा गिरा तो मै तो यही कहूँगा कि ईश्वर और पैगम्बर की यही इच्छा थी जिससे कम से कम आज खाली जगह का बँटवारा तो दीवानी मामले की तरह से हो सके ?

१३. तो अब क्यों नहीं दोनों पक्ष के लोग उसी जगह पर मंदिर मस्जिद एक साथ अपने अपने मिले जगह पर बना लेते है ?

१४. और अगर अब भी दोनों पक्ष के कुछ स्वार्थी, चोर, बेईमान, लालची, मक्कार, पापी, अधर्मी, अज्ञानी , राजनैतिक रोटी सेंकने की चाहत वाले लोग झगड़ना चाहते है तो स्वागत है, मगर जन सामान्य को बक्स दो भैया !! मेरी राय है की जैसे डब्लू डब्लू एफ होता है या फ्री स्टाइल की कुस्ती होती है वैसे ही हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्ष के लोग दो अलग अलग झगडालू दल बना ले और उसमे मार करने वाले स्वयं सेवको, जिहादियों को आमंत्रित कर ले, और इसमे सामिल होना वाला एक घोषणा पत्र भर के दे कि वो अपने पूरे होशो हवास में अपने प्राणों कि बाजी लगाने जा रहा है और यदि उसके प्राण जाते है तो इसके लिए किसी भी व्यक्ति, समुदाय को जिम्मेदार ना माना जाय ना ही उसके परिवार को इसका कोई मुवावजा ही चाहिए ना उन्हें भारत का नागरिक माना जाय, और फिर मरने दो, दोनों तरफ के पागलों को, शायद इसी तरह कुछ शांति आ जाय और देश कि जनसंख्या भी कम हो जाय । मेरा दावा है कि झगडालू दल से कोई भी दावेदार जीवित नहीं बचेगा क्योंकि यहाँ कोई किसी से कम नहीं है।
जरा यहाँ भी देखे http://vivekmishra001.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html 
१५. दोनों पक्ष ने कहा था कि कोर्ट का फैसला मानने के लिए बाध्य होगे....तो अब क्यों किस मुह से बेमतलब में सुप्रीम-कोर्ट की रट लगा रहे हैं अब जो फैसला अदालत ने दिया है उसे चुप-चाप शराफत से सभी लोग माने और इस देश को आगे जाने दें । इस देश की अदालत के अलावां और कोई भी इसका समाधान नहीं कर सकता है और जो फैसला आया है उससे बेहतर कोई और फैसला नहीं हो सकता है भरोसा ना हो तो नये सिरे से वार्ता का नाटक कर के देख लीजिये या उच्चतम न्यायलय में भी जाकर अपना सर पटक लीजिये आपको अपने आप पता चल जायेगा।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

रघुपति राघव राजा राम

रघुपति राघव राजा राम , कलियुग व्यापा है श्री राम ।
राजनीति का बना अखाडा , जन्मभूमि और तेरा नाम ।

जनता पिसती दो पाटों में , दोनों तरफ है तेरा नाम ।
एक बिरोधी दल के नेता , एक बोलते जय श्री राम ।

एक जुए में बाजी लगाता , एक नग्न करता है राम ।
परदे के पीछे जाकर सब , भूल हैं जाते तेरा नाम ।

किसे कहें अब पांडव और , किसे कहें कौरव हम राम ।
अंतर नहीं रहा दोनों में , दोनों बेंच रहे हैं तेरा नाम ।

अब तो तुम ही न्याय करो , अवधपुरी के राजा राम ।
बिस्मिल्लाह करना है सबको , या कहना है जय श्री राम ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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