हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

मायाजाल..

जीवन को समझाना चाहो तो , बूझो पहेली जीवन की ।
फिर मौत भले आ जाए मगर , डोर ना टूटे जीवन की ।
वो कौन यहाँ जिसने आकर , नीव रखा था इस जग का ।
सुनसान वीरानी धरती पर , अंकुर फोड़ा था जीवन का ।
कहाँ से लाया वो तारे , किससे उसने गगन बनाया ।
कैसे बिना सहारे के , ये धरती सूरज चाँद टिकाया ।

कहाँ ओर है इस जग का , और कहाँ छोर होगा इसका ।
ये सारी दुनिया कैसे बनी , कोई राज बताएगा इसका ।
कहाँ से आते हैं हम सब , फिर कहाँ अंत में जाते सब ।
जीवन मरण के चक्रव्यूह से , निकल नहीं क्यों पाते हम ।
जिसने सारे जग को बनाया , किसने उसको ईश्वर बनाया ।
किसने कैसे और किस कारण , ये सारा मायाजाल रचाया ।

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

आज का गब्बर....मच्छर !!

वो एक जमाना था पहले ,
लोग गब्बर के नाम से कांपते थे ।
दूर पचास पचास कोसों तक ,
गब्बर का नाम सुनकर छुप जाते थे ।
तब कहर हुआ करता था गब्बर का ,
हर गाँव-शहर हुआ करता था गब्बर का ।

समय बदला जमाना बदल गया ,
दिलों में खौफ का तराना बदल गया ।
अब है खौफ हर तरफ मच्छरों का ,
हर कोई शिकार होता आज मच्छरों का ।
हालत ये आज हर दवा बेअसर है ,
हर गोली , हर टिकिया सब बेअसर है । 

चीखता है गब्बर पागलों सा आज भी ,
सूअर के बच्चों गिनो कितने है मच्छर ?
कालिया कहता, सरदार गिने तो कैसे ,
जितनी आती है गिनती उससे ज्यादा हैं मच्छर ।
बहुत बेइंसाफी  है सरदार ! , मरते नहीं मच्छर ,
अकेली बची है टिकिया और अनगिनत हैं मच्छर ।

तो पचास पचास कोस दूर से ,
अब सुनकर आवाज मच्छरों की ।
छुप जाता है कहीं दुबककर गब्बर ,
बारीक़ जाली वाली मच्छरदानी के अन्दर ।
फिर भी कहाँ छूटता है मच्छरों से पीछा ,
खून के बदले खून ही मांगता है मच्छर ।।


© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 18 अगस्त 2010

एक स्वप्न

सोते सोते रात अचानक , जाग गया मै सपने में । 
देखा तो चहुँ- ओर घिरा था , कुहरा बहुत भयानक ।

दूर कहीं पर भौंक रहे थे , कुछ उल्लू पेड़ पर शायद ?
गरज रही थी कहीं निकट ही ,एक बिल्ली शेर पे शायद ?
इतने में चूहा आ धमका , बड़े जोर से फिर वो बमका ।
मच गई भगदड़ चारो और , भागे सब जन मांद  की और ।

मै भी चौंका बड़े जोर से , जंगल में मै पहुंचा कैसे ?
मै तो अपने घर में था , फिर नींद चल कर आया कैसे ?
चारो तरफ है फैला जंगल , होगा मचा शहर में दंगल ।
ढूंड रहे होंगे सब मुझको , कौन बचाएगा अब उनको ।


लभी भूँख मुझे तभी जोर की , खा गया कच्चा मै कई हाथी ।
हाहाकार मचा जंगल में , रोने लगे बचे हुए साथी ।
भूँख मिटी जब मेरी थोड़ी , नींद आ गयी मुझे जोर की ।
सो गया मै फिर वही अकेला , जंगल में था मेरा बसेरा ।

तभी हिलाया मुझे किसी ने , जाग गया मै अपनी नींद से ।
टूट गया फिर स्वप्न अधूरा , घर में था मै अपने पूरा ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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