हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

ये मान्यता है...पर मै इससे कदापि सहमत नहीं।

मान्यता है और मीडिया के लोग कहते हैं ये तस्वीर राम भक्त हनुमान जी के पैरों की है श्रीलंका में.... 

पर मै इससे कदापि सहमत नहीं कि ये तस्वीर राम भक्त हनुमान जी के पैर हैं।


अगर ये निशान हनुमान जी के पैरों का होता तो अकेला नहीं होता..वरन दूसरे पैर का निशान या और भी पदचिन्ह होते वहां पर क्योंकि हनुमान जी केवल एक पैर पर तो खड़े नहीं रहे होंगे लंका में।


निश्चित तौर पर यह बाली पुत्र और वानर सेना के सेनापति महाबली अंगद के पैर के निशान हैं।

और ये तब के हैं जब वो भगवान् राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए थे और रावण के ललकारने के जबाब में अपना "एक पैर जमा कर" वहीँ राजसभा में खड़े हो गए थे और समस्त राक्षस जाति को ललकार कर बोले थे कि यदि कोई मेरा एक पैर भी हिला दे तो भगवान् राम अपनी हार बिना युद्ध के मान लेंगे...

और कहते हैं कि महाबली अंगद ने अपना पैर भूमि में इतना तगड़ा जमाया था कि दशानन रावण के दरबार का कोई भी बलशाली राक्षस और यहाँ तक उसका इंद्र तक को बंदी बना लेने वाला पुत्र इन्द्रजीत भी अंगद के एक पैर को हिला नहीं पाया था।

तो यह सत प्रतिशत निश्चित तौर पर अगर है किसी के पैरों का निशान तो महाबली बालि पुत्र अंगद का ही।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

अयोध्या का सर्व-सम्मत हल न्याय-तन्त्र ने ही दिया है और आगे भी देगा...

मित्रों इलाहाबाद उच्च न्यायलय से अयोध्या समस्या का बहु प्रतिक्षित फैसला आ चुका है....जिसके लिए उच्च न्यायलय ने विभिन्न साक्ष्य,पुरातात्विक प्रमाण  और गवाहियां देखा है।
मगर अब इसकी अलग अलग व्यक्तियों, समुदायों, धार्मिक और राजनैतिक नेतावों और उनके दलों के द्वारा व्याख्या, समालोचना, प्रतिक्रियावों का दौर भी चालू हो गया है.... जो विभिन्न प्रिंट और लाइव मीडिया चैनलों के माध्यम से जनमानस के सामने आ रहा है ।
कोई कह रहा है कि यह बहुत ही बेहतर फैसला है, कोई कह रहा है कि यह फैसला कम एक समझौता ज्यादा है, कोई कह रहा है कि इसमे तर्क और साक्ष्य के मुकाबले आस्था को ज्यादा महत्व दिया गया, किसी को यह पूर्णतया मान्य है तो कोई उच्चतम न्यायलय जाने की बात कह रहा है।

चलिए उच्चतम न्यायलय भी देख लेते है वहां से भी देर सबेर आवश्यकतानुसार इसी से मिलता जुलता फैसला आने की ९९.९९ प्रतिशत उम्मीद है , कारण आगे समझ में आ जायेगा ।

वैसे यह आज के भारत के परिपक्व सोंच का ही नतीजा है कि ९९ प्रतिशत लोगों की प्रतिक्रिया सीधी साधी, एकदम संयत, सधी हुयी और भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने वाली ही है सिवाय वर्षों से पेट्रो डालर के बल पर फलने - फूलने वाले और अपनी राजनैतिक जमीन खो चुके कुछ तथाकथित ढोंगी राजनैतिक नेतावों  के जो महज अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के चक्कर में ना केवल न्यायिक अवमानना करने की मूर्खता कर रहें है वरन अपने आप को एक समुदाय विशेष का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की लालच में देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक देने का प्रयास कर रहे है।
इनसे सावधान रहने की जरुरत है......क्योंकि पुरखों ने कहा है कि जो अपनो का नहीं होता है वो कभी गैरों का नहीं हो सकता है।

इसके अलावां कुछ लोगों ने फैसले का स्वागत तो किया है मगर उनके द्वारा कहा जा रहा है कि "अयोध्या समस्या का सर्व-सम्मत हल न्यायिक-तन्त्र नहीं दे सकता और इसके लिए दोनों समुदायों को आपस में वार्ता करके कोई सर्व-सम्मत हल निकलना होगा" यह भी निहायत ही मूर्खता पूर्ण तर्क है क्योंकि यदि ऐसा होना होता तो पिछले २००-२५० सालों में हो गया होता ।

अब कुछ अन्य बातें
१. सारे पौराणिक ग्रन्थ और समस्त जनमानस  मानता हैं कि भारत वर्ष में अयोध्या ही भगवान् श्री रामचंद्र जी की जन्म-भूमि है और इस देश में कोई दूसरी अयोध्या भी नहीं है तो भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में जन्म लिया था इसमे कोई शंका ना है ना ही किया जा सकता है।  हाँ काल की गणना पर अलग अलग धर्मो के लोग हिन्दू गणना पद्धति पर प्रश्न लगा सकतें है मगर मूल विषय निर्विवाद ही है , और आप विवाद तब ही खड़ा कर सकते है जब आप की उपस्थिति विवादित विषय के प्रारम्भ समय से ही हो । और हिन्दू धर्म ने जब अपना दो तिहाई से अधिक समय पूर्ण कर लिया तब वर्तमान के धर्म प्रतिपादित हुए है तो यदि वो ये कहें की आप भगवान राम का जन्म प्रमाणित करें तो यह वैसा ही है जैसे कोई बच्चा कहे मै परदादा को नहीं जानता आप प्रमाणित करें ।

२. मगर भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में किस स्थान पर जन्म लिया था इसका साक्ष्य वास्तव में नहीं है  अर्थात भगवान राम की जन्म स्थान/भूमि तो प्रमाणित है मगर जन्म स्थान आज हिन्दू धर्म या कोई भी इतिहास प्रमाणिक तौर पर नहीं बता सकता है और बताये भी कैसे......आज उस समय का कोई  भी नक्शा किसी के पास नहीं है तब से ना जाने कितनी बार अयोध्या बसी है, उजड़ी है, जाने कितने बार सरयू नदी ने अपना प्रवाह मार्ग परिवर्तित किया है तो यह असंभव है, और ये बात ना केवल भगवान राम हेतु लागू है वरन भगवान कृष्ण, देव-दूत ईशा मसीह, और पैगम्बर साहेब हेतु भी लागू है ।

३. उक्त विवादित परिसर पर मस्जिद बाबर के सेनापति मीर बांकी खां ने बनाया था इस पर दोनों पक्ष सहमत हैं । इस तथ्य पर विवाद हो सकता है कि मस्जिद मंदिर को गिरा कर बनाया गया या मंदिर के भग्नावशेष पर ? मस्जिद बनाये जाने हेतु भूमि स्वामी से अनुमति ली गयी या नहीं ?
४. हुमायु, शाहजहाँ,अकबर, और औरंगजेब जैसे शाशक भले ही विसुद्ध रूप से भारत वासी हों मगर बाबर निश्चित रूप से बाहरी और आक्रमणकारी ही था इसमे कोई शंका नहीं है।

5. अगर सामान्य आक्रमणकारी मनोविज्ञान से सोंचे तो आज भी हमला करने वाला ना केवल अपने पराजित शत्रु के जन-धन की हानि करता है वरन उसके मनोबल को भी हर तरह से तोड़ने का प्रयास करता है क्योंकि तभी उसकी विजय ज्यादा स्थाई रह सकती है । तो परिस्थिति जन्य साक्ष्य यही है कि बाबर ने मंदिर ( अयोध्या में था तो राम मंदिर ही होगा, अब यह कैसा मंदिर था ? जन्म भूमि थी या कोई सामान्य विशेष पूज्य मंदिर था यह तो उस ज़माने के लोग ही जाने या भगवान राम जाने ) को ध्वस्त कराकर ही वहां मस्जिद बनवाई और वहां के हिन्दू निवासियों का मान मर्दन किया ( अगर खंडहर पर बनाना होता तो उस ज़माने में भूमि की कोई कमी नहीं थी वह उसे किसी खाली जगह पर भी बनवा सकता था। और उसने जो किया कहीं से गलत नहीं किया।

6. मै सपथ पूर्वक कहता हूँ कि अगर मै आक्रान्ता बाबर होता तो  निश्चित तौर पर अपने विजित स्थानों पर अपनी जीत को चिर स्थायी बनाने और अपने दुश्मनों के मनोबल का दमन करने हेतु उनके महत्वपूर्ण स्थलों सहित उनके पूजा स्थल को भी खंडित कराता और वहां अपना कुछ बनाता और सारे विश्व में विजेता सम्राट यही करते है , यह ना पाप है ना अधर्म है यही विजेता की मानसिकता है  । और अगर कोई तथाकथित महान सज्जन पुरुष,महिला अथवा दोनों के बीच वाला प्राणी यह कहें कि वो अगर बाबर होते तो एसा नहीं करते तो या तो वो झूंठ बोलेंगे या वास्तव में यह बात कहते समय अपने अन्दर एक आक्रामक सेनापति के भाव नहीं ला पा रहे होंगे।

५. और जब मस्जिद बनी होगी तो निश्चित तौर पर वहां नमाज भी पढ़ी जाती रही होगी हाँ समय के साथ जैसे-जैसे स्थानीय हिन्दुवों ने अपनी शक्ति वापस पायी वो अपनी खोई हुयी जमीन को वापस पाने हेतु प्रयासरत हुयी यह भी कहीं से गलत नहीं है फिर चाहे वहां राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए , दोनों ही उचित है आखिर वो स्थल छीना  हुवा ही था और पराजित को हक़ है कि वो अपनी सम्पत्ति को वापस पाने का जैसे भी हो सके प्रयास करे । और अगर ये अनुचित है तो सबसे पहले तो आज वक्फ बोर्ड को भंग कर देना चाहिए।

६. और जब राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए तो वहां पूजा अर्चना भी हुयी ही और वो हिन्दू स्थल कि गरिमा पुन: पाया भले ही बंद रहकर ही सही ।
७.  हाँ उक्त विवादित परिसर को गिराया जाना  जरुर अनुचित और गैर क़ानूनी कहा जा सकता है मगर जरा विचार करें कि क्या आज भी सामान्य जन अपने भाई-भतीजों, पट्टीदारों या किसी बाहरी कब्जेदारों से निपटने के लिए ये तरीके नहीं अपनाता है ?

८. पहले भी बातचीत का प्रयास किया गया मगर जहाँ एक तरफ हिन्दू कहता था कि हमें गर्भ गृह ही चाहिए ( मेरे अनुसार यह आस्था से ज्यादा जैसे आत्म सम्मान का विषय था , सोंचे क्या हम आज भी हम लोग पूरी तरह से अंग्रेजों की गुलामी से उबर पाये है ? ) तो दूसरी तरफ मुस्लमान कहता था अगर उसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद चाहिए तो मुख्य गुम्बद के के नीचे ही चाहिए वर्ना नहीं चाहिए ( यह भी आस्था से ज्यादा विजेता के गुरुर का ही मामला था वर्ना क्या मक्के और मदीने जैसे पवित्र स्थलों के शहर में कुछ मस्जिदों को केवल शहर के विकास के नाम पर अलग स्थानांतरित नहीं किया गया ? तो भारत में क्यों नहीं हो सकता था ?)

९. तो इस तरह से हिन्दू और मुस्लमान दोनों के दावे उक्त स्थल हेतु अलग अलग काल खंड के अनुसार सत्य हैं  , जो लोग चिल्ला रहे है कि उनके तर्कों और साक्ष्य  को पूरी तरह से नहीं देखा गया वो वास्तव में अनर्गल प्रलाप कर रहें है । अरे अदालत और क्या देखती ? केवल तुम्हारी एकतरफा सुनती तभी सही थी ? उसने सब तर्कों और साक्ष्य  को वास्तव में ईमानदारी से देखा तभी तो दोनों पक्ष का अधिकार माना और भूमि को १/३,१/३,१/३ के अनुसार बँटा । और यही उचित भी था वर्ना अगर वो किसी भी पक्ष को पूरी तरह से भूमि दे देता तब वास्तव में अन्याय करता।

१०. अब मान लेते है कि अगर पूरी भूमि मुसलमानों को ही अदालत देने का कागजी  आदेश जारी कर देती तो जरा सोंच कर देखें कि प्रदेश के मुख्य मंत्री , देश के प्रधानमंत्री, तीनो सेना के सेनापति, सभी धर्म गुरुवों से लेकर राजनेतावों तक किसकी सामर्थ है कि वहां वर्तमान में स्थापित राम लला को हटवा देता और वहां मस्जिद बनवा देता ? अगर ऐसा हो सकता तो पहले के पदों पर पद-स्थापित लोग ऐसा अपनी ताकत और सत्ता का प्रयोग कर के ना कर देते फिर चाहे वो नेहरू हो, इंदिरा जी हों, राजीव गाँधी हो, बाबा अटल बिहारी हो, चंद्रशेखर हो, या मनमोहन सिंह हो, आडवाणी हो, कल्याण सिंह हो, मुलायम सिंह हो, बुखारी हो, जिलानी हो या मोहन भागवत हो ?

११. और ये बात केवल राम लला बिराजमान हेतु ही नहीं लागू होती है यही बात बात दुसरे पक्ष हेतु भी लागू है , पूरी भूमि हिन्दुवों को ही अदालत द्वारा देने का कागजी आदेश जारी हो गया होता और वहां पुराना वाला ढांचा आज भी होता तो  किसकी औकात थी कि वहां उसे गिराकर वहां मंदिर बनवा देता ?

१२. कुछ भी कहना आसान है मगर उसे जमीनी धरातल पर कार्य करना मुश्किल होता है ? तो अगर वो ढांचा गिरा तो मै तो यही कहूँगा कि ईश्वर और पैगम्बर की यही इच्छा थी जिससे कम से कम आज खाली जगह का बँटवारा तो दीवानी मामले की तरह से हो सके ?

१३. तो अब क्यों नहीं दोनों पक्ष के लोग उसी जगह पर मंदिर मस्जिद एक साथ अपने अपने मिले जगह पर बना लेते है ?

१४. और अगर अब भी दोनों पक्ष के कुछ स्वार्थी, चोर, बेईमान, लालची, मक्कार, पापी, अधर्मी, अज्ञानी , राजनैतिक रोटी सेंकने की चाहत वाले लोग झगड़ना चाहते है तो स्वागत है, मगर जन सामान्य को बक्स दो भैया !! मेरी राय है की जैसे डब्लू डब्लू एफ होता है या फ्री स्टाइल की कुस्ती होती है वैसे ही हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्ष के लोग दो अलग अलग झगडालू दल बना ले और उसमे मार करने वाले स्वयं सेवको, जिहादियों को आमंत्रित कर ले, और इसमे सामिल होना वाला एक घोषणा पत्र भर के दे कि वो अपने पूरे होशो हवास में अपने प्राणों कि बाजी लगाने जा रहा है और यदि उसके प्राण जाते है तो इसके लिए किसी भी व्यक्ति, समुदाय को जिम्मेदार ना माना जाय ना ही उसके परिवार को इसका कोई मुवावजा ही चाहिए ना उन्हें भारत का नागरिक माना जाय, और फिर मरने दो, दोनों तरफ के पागलों को, शायद इसी तरह कुछ शांति आ जाय और देश कि जनसंख्या भी कम हो जाय । मेरा दावा है कि झगडालू दल से कोई भी दावेदार जीवित नहीं बचेगा क्योंकि यहाँ कोई किसी से कम नहीं है।
जरा यहाँ भी देखे http://vivekmishra001.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html 
१५. दोनों पक्ष ने कहा था कि कोर्ट का फैसला मानने के लिए बाध्य होगे....तो अब क्यों किस मुह से बेमतलब में सुप्रीम-कोर्ट की रट लगा रहे हैं अब जो फैसला अदालत ने दिया है उसे चुप-चाप शराफत से सभी लोग माने और इस देश को आगे जाने दें । इस देश की अदालत के अलावां और कोई भी इसका समाधान नहीं कर सकता है और जो फैसला आया है उससे बेहतर कोई और फैसला नहीं हो सकता है भरोसा ना हो तो नये सिरे से वार्ता का नाटक कर के देख लीजिये या उच्चतम न्यायलय में भी जाकर अपना सर पटक लीजिये आपको अपने आप पता चल जायेगा।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

रघुपति राघव राजा राम

रघुपति राघव राजा राम , कलियुग व्यापा है श्री राम ।
राजनीति का बना अखाडा , जन्मभूमि और तेरा नाम ।

जनता पिसती दो पाटों में , दोनों तरफ है तेरा नाम ।
एक बिरोधी दल के नेता , एक बोलते जय श्री राम ।

एक जुए में बाजी लगाता , एक नग्न करता है राम ।
परदे के पीछे जाकर सब , भूल हैं जाते तेरा नाम ।

किसे कहें अब पांडव और , किसे कहें कौरव हम राम ।
अंतर नहीं रहा दोनों में , दोनों बेंच रहे हैं तेरा नाम ।

अब तो तुम ही न्याय करो , अवधपुरी के राजा राम ।
बिस्मिल्लाह करना है सबको , या कहना है जय श्री राम ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 25 सितंबर 2010

कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो....?

पहले उच्चतम न्यायलय की लखनऊ बेंच में अनावश्यक अडंगेबाजी का प्रयास और वहां असफल होने के बाद अब सर्वोच्च न्यायलय के मध्यम से अनावश्यक अडंगेबाजी ।

कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो और इस देश में एक नासूर हमेशा हमेशा बना रहे......
क्या ये मीडिया में अनावश्यक प्रचार पाने के लिए लालयित लोग हैं या अपने को जरुरत से ज्यादा समझदार समझने वाले लोग हैं ?
इस देश में सभी को आजादी है मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि आप दूसरों की आजादी में जबरदस्ती दखल देने लगें  ।

राजनीति , धर्म , समाजसेवा के ठेकेदारों की रोजी रोटी चलने के लिए आवश्यक है कि कोई ना कोई समस्या बनी रहे, और अगर एक समस्या  समाप्त हो रही है तो तुरंत दूसरी समस्या उत्पन्न की जाय ।
यहां मूर्ख बनाने और बनने वालों की भी कमी नहीं है ....
मीडिया चैनल समझा रहें है कि ये मंदिर , मस्जिद का फैसला नहीं है , ये तो केवल भूमि के स्वामित्त्व का फैसला है ।
क्या ये इतना ही सीधा है ?
अरे अगर भूमि का स्वामित्त्व उस पक्षकार के तरफ जाता है जो हिन्दू है तो जाहिर सी बात है कि वो कहेगा कि अब ये मेरी जमीन है तो यहाँ मंदिर बनेगा और ये मंदिर वालों की ही जीत है और अगर भूमि स्वामित्त्व उस पक्षकार की तरफ जाता है जो मुस्लिम है तो वो कहेगा कि मेरी जमीन खाली करो यहाँ मेरी मस्जिद बनेगी और ये ममजिद वालों की जीत है ।
तो सीधे सीधे यह मानना चाहिए की अदालत यह निर्धारित करेगी कि वहां क्या बनना चाहिए ।

और जो लोग कहते है कि आपसी बातचीत से मामले को हल करने का समय दिया जाना चाहिए तो वो लोग अब तक कहाँ थे ?
अपने घरों में बैठे अपने बच्चों , नाती , पोतों को गोद में खिलाने में व्यस्त थे अब तक ?
इतने वर्षों से क्या कर रहे थे वो लोग ?
अब अचानक कौन सा सुलह कर लेंगे ?
और जो महानुभाव लोग इसके पैरोकार हैं उनसे ये भी पूंछा जाना चाहिए कि उनके पास सुलह की क्या योजना है ?
उनकी और उनके योजना की देश में स्वीकारिता कितनी है ?
और सत्ता और धर्म के दलालों पर उनकी पकड़ कितनी है ?

मजाक बना दिया है लोगों ने देश में ।
ना खुद कोई फैसला कर सकते है , ना देश के विधान को कोई फैसला करने दे रहे है ?
कोई कह रहा है कि इस फैसले से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ जायेगा ।
अरे फैसला ना आने से कौन सा बड़ा भाईचारा पनपा जा रहा है । हाँ एक घाव नासूर बनकर अन्दर ही अन्दर टीसता जरुर जा रहा है दोनों सम्प्रदायों में , जो भाईचारे के लिए अनंत तक अवरोध हो सकता है ।
मानव जाति बड़े से बड़े दुःख और क्षति को बर्दास्त कर लेता है फिर चाहे वो उसके किसी अपने के जीवन समाप्त हो जाने का दुःख हो या अपना सर्वस खो देने की क्षति ।

तो क्यों नहीं जो कल होना है उसे आज होने देते है......
जो होना है हो जाने दो , आग लगनी है लग जाने दो , कम से कम जो राख बचेगी उसपर तो नयी इबारत लिखी जा सकेगी ...
और जमाना भी देख और पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो आग लगाने वाले है । जो अपने आप को देश के न्यायालय से ऊपर मानते है , देश के विधान को दर-किनार कर अपनी रोटी सेंकने को तत्पर है ।

अगर हम विकसित हो गए है , समझदार हो गए है , सहनशील हो गएँ है तो जो होनी है और उसे अनंत काल तक नहीं टाल सकते है उसे आज क्यों नहीं होने दे रहे है...क्यों अपने संतानों का जीवन भी अँधेरे के गर्त में धकेलने को तत्पर हैं । जब सभी तथाकथित राजनेता , धर्म गुरु , समाजसेवक और जनता स्वयं से कोई समाधान नहीं खोज पा रही है तो अंतिम विकल्प न्यायालय में अनावश्यक की अडंगेबाजी क्यों की जा रही है ?
और विवादित ढांचा गिरने से ज्यादा बवाल तो अब नहीं ही होगा ये निश्चित है फिर अगर किसी एक की एक उंगली काटकर दो पूरे शरीर बच सकते है तो उसे बचा लेने हेतु आपरेशन करने की अनुमति चिकित्सक को क्यों नहीं दी जा रही है , क्यों नासूर पाल कर पूरा शरीर बर्बाद करने पर हम उतारू हैं ।

तो जो कल होना है उसे आज होने दो ...............जिससे कम से कम आने वाला कल तो सही हो सके ।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?

नफ़रत के जब बीज बो रहे, धर्म ध्वजा के पहरेदार ।
कैसे बचेगी मानवता , यहाँ सब के सब हैं लम्बरदार ।
पहले तो दीवारें उठीं , सब धर्मो के बीचो बीच ।
फिर खिच गयी लकीरे देखो , जाति-पांति के बीचो बीच ।
शेष बचा था जो कुछ देखो , वर्गों में फिर बाँटा गया ।
चुन चुन कर इंसानों को , इंसानों से ही काटा गया ।

हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई , बौध-जैन-यहूदी भाई ।
सभी हैं ऊँचे एक दूजे से , सब के सब आवारा भाई ।
सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?
कौन बनाता किसे यहाँ , कौन चलता है इस जग को ?
शायद उनके मध्य भी हो , बँटवारा उनके कर्तव्यों का ।
कोई साझा सरकार बनाकर , सभी चलाते हो इस जग को ।

फिर भी कोई एक तो होगा , जिसने सबको पैदा किया ?
फिर जाने कब क्यों किसने , खायीं मध्य में खोद दिया ।
अब जो बीत गया सो बीत गया , जो आने वाला है वो देखो ।
सत्य गुनो मिल सब धर्मों का , आडम्बर को कचड़े में फेंको ।
काश अगर सब सुन पायें , बस अपने अंतरमन की बात ।
बच जाये ये धरती और , बच जाये मानवता की लाज ।
 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

अल्ला हो अकबर - जय श्रीराम ।

नफरत के जब बीज बो रहे , धर्म ध्वजा के लम्बरदार ।
प्रेम अहिंसा भाईचारा , कैसे बचायेंगे भगवान हर बार ।


रघुपति राघव राजा राम , जोर से बोलो जय श्रीराम ।
मंदिर वहीँ बनायेगे , चाहे देश में दंगा करवाएंगे ।
बच्चा बच्चा राम का , जन्मभूमि के काम का ।
सुलह नहीं हो पायेगी , रथ यात्रा फिर से आएगी ।
ये तो केवल झांकी है , अभी पूरा नाटक बाकी है ।
याचना नहीं अब रण होगा , संघर्ष बड़ा भीषण होगा ।
नीव खोद हम डालेंगे , मंदिर अवशेष निकालेंगे ।
सपथ तुम्हे श्रीराम की , अबकी बारी राम की ।
जन्म भूमि के काम ना आये , वो बेकार जवानी है ।
रक्त ना खौले इस पर भी, वो रक्त नहीं बस पानी है ।
राम लला हम आयेंगे , ढांचा सभी ढहायेंगे ।
मंदिर अबकी बनायेंगे , हम धर्म ध्वजा फहराएंगे ।
जो न्याय नहीं कर पाएंगे , हम उनको सबक सिखायेंगे ।
इतिहास के काले पन्नों को , हम केसरिया कर जायेंगे ।
तेरे नाम पर अपनी रोटी , सेंक सदा हम खायेंगे ।
भारत वर्ष को कैसे भी हम , हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे ।
बस ख़बरदार...........!!
अल्ला हो अकबर-अल्ला हो अकबर ,इस्लाम के काम हम आयेंगे ।
फतवा जारी करो इमाम , लड़ने हम सब जायेंगे ।
नमाज भले ना पढ़ पावे ,  हम मस्जिद वहीँ बनायेगे ।
आक्रमणकारी बाबर के , नाम को सदा बचायेंगे ।
क्या है साक्ष्य राम थे जन्मे , भारत वर्ष की भूमि में ।
हाँ बाबर निश्चित आया था , चढ़ भारत वर्ष के सीने पे ।
मंदिर बन गया अगर वहां , इस्लाम खतरे में पड़ जायेगा ।
हम मर कर जन्नत जायेंगे  , जिहाद के काम जो आयेंगे  ।
अगर बनी ना मस्जिद अपनी , खून खराबा हो जायेगा ।
कश्मीर से लेकर केरल तक , हर चप्पा-चप्पा थर्रायेगा ।
हमें ना समझो तुम कमजोर , पडोसी भाई भी आएगा ।
जो हमसे टकराएगा , वो दोजख में जायेगा ।
हँस कर लिया था पाकिस्तान , लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान ।
घास फूस जो खायेगा , वो क्या हमसे लड़ पायेगा ।
ये कैसे हो सकता है , सुलह करें हम काफ़िर से । 
कैसे माने उसे फैसला , जो ना हो मन माफिक से ।
प्रेम अहिंसा भाईचारा , कैसे बचायेंगे पैगम्बर ।
नफरत के जब बीज बो रहे , सब धर्मो के आडम्बर ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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