हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हाहाकार मचा है जग में..

हाहाकार मचा है जग में , चारो तरफ अँधेरा है ।
चाँद सो रहा अपने घर में , कोसो दूर सबेरा है ।
हर एक पल यूँ बीत रहे , जैसे मास गुजरते हैं ।
लम्हों की बात ही क्या , वो वर्षो जैसे लगते हैं ।

सिसक रहीं है कलियाँ सारी , फूल सभी मुरझाये हैं ।
डालो का कहना ही क्या , पत्तो पर काँटे उग आये हैं ।
ताल तलैया सूख गयी हैं , नदियां रेत उड़ती है ।
सागर का अब हाल देख , बादल तक घबड़ाते हैं ।

खाली हो गए खेत सभी , खलिहानों में है आग लगी ।
गाँवों के भी आँगन में , नव-बधुओं की है चिता सजी ।
सत्य अहिंसा की बोली , अब डगर डगर पर लगती है ।
रक्षक ही भक्षक बन कर , अब चला लूटने डोली है ।

कुछ खद्दरधारी नागों के संग , वर्दीधारी साँप मिलें हैं ।
न्यायपालिका के अन्दर , देखो अजगर पहुँच गए हैं ।
जिसको भी ये डस लेते हैं , मृत्यु नहीं वो पाता है ।
बन कर वो भी दानव दलय , अजर यहाँ हो जाता है ।

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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

आखिर कब तक,,

बाँटते-बाँटते खंडित हो गया, खंड खंड में अखंड भारत ।
अब भी क्या तुम चाह रहे, और खंडित हो जाए भारत ?
हम कब कहते कोई धर्म सम्प्रदाय, होता है सम्पूर्ण बुरा ।
हम कब कहते एकाधिकार हो, भारत पर केवल अपना ?
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, हैं भारत में सब भाई-भाई ।
जो भी माने भारत माँ को , उससे कब है कोई लड़ाई ?

पर इसका यह अर्थ नहीं , हम बस बँटवारा करते जाए ।
क्या आस्तीन में पालें साँप, सर ना उनके कुँचले जाए ?
मानवता आदर्श हमारा , भाई चारा हमको अति प्यारा 
पर क्या उसके खातिर यूँ ही , बाँटने दें भारत हम प्यारा ?
आखिर कब तक खामोशी से, चुपचाप तमाशा देखा जाए ।
क्यों ना खोदकर जड़ दुश्मन की, मठ्ठा उसमे डाला जाए ?

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बुधवार, 29 जनवरी 2014

करते रहेंगे नौटंकी यार...

एक था राजा एक प्रजा थी , 
प्रजा पर सदा राजा की कृपा थी। 
यूँ राजा से पहले भी प्रजा थी , 
पर भूंखी नंगी वो सदा थी। 
था राजा का एक राजकुमार , 
जो था राजा से भी ज्यादा सुकमार। 
यूँ वो सदा विदेश ही दौड़ा करता , 
पर कभी कभी जनकल्याण का भी दौरा पड़ता। 
फिर जब देख प्रजा को उसे आता तरस , 
लगता जैसे स्वाती नक्षत्र में पड़े बादल बरस। 

जब भाव-विभोर हो जाता वो , 
समरसता लाने गरीबो के घर जाता वो। 
भूंखी-नंगी खानदानी प्रजा को ,
फिर आकर गले लगाता वो। 
खाना खाकर उनके घर में ,
लेकर डकार भूल सब जाता वो। 
चेले-चापड़ कलछुल-चमचे ,
जब जय-जयकार मचाते थे। 
देख कुँवर की पप्पूगिरी ,
राजा-रानी संग मंत्री हर्षाते थे। 

तभी ना जाने कहाँ किधर से ,
एक नया बहुरुपिया देश में आया। 
स्वॉँग बनाकर तरह तरह का ,
जनता के दिल को हर्षाया। 
बोला ख़तम करेंगे हम ,
राजा-रानी मंत्री-संतरी का भ्रष्टाचार। 
फिर बीच सड़क पर चलाएंगे ,
हम जनता की चुनी सरकार। 
लोक-लुभावन नारे देकर ,
सदा करते रहेंगे नौटंकी यार। 

यूँ जनता तो जनता ही है ,
सदा बनना मूर्ख भाग्य में है। 
करे विधाता भी क्या तब ,
जब चूतिया नन्द,चन्द,घोड़ी सब। 
अब आगे की क्या कहें कहानी ,
घाल-मेल ज्यों दूध और पानी। 
आप-साँप की जोड़ी मिलकर ,

करते है देखो मनमानी। 
यही दुआ है देश की खातिर ,
जनता हो जाये थोड़ी सयानी। 


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बुधवार, 22 जनवरी 2014

रेखाओं में भविष्य...

खींच कर दो-चार लाइन, और बनाकर एक चतुर्भुज। 
देखता हूँ  बाँचते है , वो ना जाने क्या-क्या भविष्य। 
वो जिन्हे खुद का अभी तक , है पता मालूम नहीं। 
वो बताते है आसमानी , शक्तियों के हमको पते। 
वो जो शायद पढ़ सके ना , श्याह-सफ़ेद अक्षरो को। 
वो शान से है पढ़ रहे , हाथों पर उभरी इबारतो को । 

वो जिन्हे शायद पता हो , कैसी होगी आज की रात।  
वो हमें बतला रहे है , जन्म जन्मान्तरो की बात । 
ना मै नहीं कहता कभी , विद्या ये पूरी पाखण्ड है। 
पर मै ये कहता मित्र , अब शेष इसके कुछ खंड है। 
अब ये है प्यारी धरोहर , अभिलेखो और स्मारको में।  
मत सजाओ तुम इसे  , निज पुरषार्थ की दीवार में । 

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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

क्या फर्क पड़ता है ?

मै क्यों तुम्हे खोजूं यूँ ही अपने से हर बार ?
मै क्यों तुम्हे बताऊ अपने से अपने मन का हाल ?
मै क्यों तुमसे पूंछू घेरकर तुम्हारा हाल-चाल ?
मै क्यों करूँ तुमसे जबरन सुख-दुःख का व्यपार ?
मै क्यों करूँ तुमको याद कर के परेशान बार-बार ?
जब नही है तुम्हे फुरसत अपनेपन को निभाने का यार ?

क्या फर्क पड़ता है तुम क्या हो रिश्ते में यार ?
तुम दोस्त हो , मेरे भाई हो, या हो तुम प्यार ?
मुझ पर तुम्हारा और तुम पर मेरा कितना है अधिकार ?
या कितने सुख-दुःख हमने साझा किये है पहले हर बार ?
कहो क्या फर्क पड़ता है अब इन सब बीती बातो से यार ?
जब नही है तुम्हे चाहत अपनापन निभाने का लगातार ?

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रविवार, 1 सितंबर 2013

मेरा क्या मै तो हूँ मुसाफिर..?

सब उसका है , जग जिसका है ।
जीवन उसकी , मृत्यु भी उसकी ।
सुख भी उसका , दुःख भी उसका ।
धूप भी उसकी , छाँह भी उसकी ।
जल भी उसका , थल भी उसका ।
नगर भी उसका , गाँव भी उसका ।

मेरा क्या मै तो हूँ मुसाफिर , लेकर क्या मै आया था ?
मेरी सारी सुख सुविधा को , उसने ही तो जुटाया था ।
बिना दिए कुछ मूल्य किसी का , सब कुछ उससे पाया था ।
अफसोस उसे ही भुला दिया , जिसने सब कुछ लुटाया था ।
माया ठगनी है ही ऐसी , लोभ मोह में उलझाया था  ।
यहाँ अपना पराया कोई नहीं , सबने बस भरमाया था  ।

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सोमवार, 17 जून 2013

क्या लिखूँ ...

क्या लिखू क्या ना लिखूँ  , कुछ समझ पाता नहीं । 
भाव हैं मन में बहुत , पर  उन्हें समेट पाता नहीं ।
कुछ भाव हैं बस प्यार के , कुछ है तेरे अहंकार के ।
कुछ भाव तुझसे लगाव के, कुछ रिश्तो के बिखराव के ।
कुछ भाव हैं निर्द्वन्द से , कुछ उलझे है अंतर्द्वंद से  ।
कुछ मुस्कुराहट ला रहे , कुछ फिर दुखी कर जा रहे ।

क्या लिखूँ  क्या ना लिखूँ , चलो तुम ही बताओ मै क्या लिखूँ ।
वो बसंत ऋतु की बात लिखूँ, या ये पतझड़ का बिखराव लिखूँ ।
गैरों का बनना अपना लिखूँ  , या अपनो का बनना गैर लिखूँ  ।
है भूल-भुलैया भावों  की , कोई राह मिले तब तो मै लिखूँ ।
यहाँ अपना पराया कोई नहीं , फिर बात कहो मै किसकी लिखूँ ।
मकड़जाल  में उलझा  मन , चलो उलझन को सुलझाना लिखूँ ।

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शुक्रवार, 3 मई 2013

विशवास...

जब कभी होगी जरूरत , फिर नए विशवास  की ।
जिन्दगी को उलझनों के , जाल में हम डाल देंगे ।

उलझनों के जाल से , जब निकल कर आयेंगे ।
एक नए विशवास का , आधार लेकर आयेंगे ।   

जब कभी होगी परिक्षा , फिर मेरे विशवास की ।
जिन्दगी खुद ही रचेगी , नीव नए निष्ठाओ की ।

कौन कहता है कि जलता , स्वर्ण भी है आग  में ।
वो सदा तपकर निखरता , आग  के ही खाक से ।

और अगर उलझने ही , ना घेरे हमारी राहो को ।
तो करे क्यों हम इकट्ठा , इतनी सब निष्ठाओ को ।

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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

कैसे दिल की बात कहूँ..

चाह रहा हूँ जो कहना , क्यों वो शब्द नहीं मै पाता  हूँ ।
निज भावों को बिना व्यक्त किये , अतृप सदा रह जाता हूँ ।
क्या करूँ कहूँ मै  कैसे वो , जो दिल में दबा रह जाता है ।
यूँ ही उम्र बीतती जाती है , मन उसे समझ नहीं पाता है ।
चलते चलते देर हो गयी , अब वापस जाया नहीं जाता है ।
क्या सोंचेगे दुनियावाले , ये सोंच के भी मन भरमाता है ।

बुद्धि नहीं देती है साथ , वह दिल को समझे कहाँ बिसात ।
अंतरतम कर सके प्रगट , कोरे शब्दों में है नहीं बिसात ।
प्रतिपल सदा सरोवर ही , बनकर रहने का है अभिशाप ।
नदी बने बिना घुट-घुट कर , मर जाने का शायद है श्राप ।
रुंधे कंठ बेकल नयनो में , है भटक रही अश्रु की धारा ।
दोष किसी को मै  दूँ कैसे , शायद अवरोध भी मुझको प्यारा ।


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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

सोंचने की है जरूरत..

चाहतो का एक पुल था , जो मिलाता था हमें ।
सब व्यस्तताओ के बाद भी , वो जोड़ता था हमें ।
यादो में एक दूसरे के , सदा बने रहते थे हम ।
दूर भले रहे मगर , पास बने रहते थे हम ।
फिर वक्त ने बदली जो करवट ,दूरियाँ बड़ने लगी ।
ना चाहते हुए भी देखो , नजदीकिया घटने लगी ।

चाहतो का पुल शायद , जर्जर है होने लगा ।
आपसी सौहाद्र भी , शायद कहीं घटने लगा ।
कमियां एक दूसरे की, क्यों हमें दिखने लगी ।
प्यार भरी बाते भी , दिल में कहीं चुभने लगीं ।
एक दूसरे की जरुरत , क्या ख़त्म होने लगी ।
या मनोभावों पर हमारे , धूल है ज़मने लगी ।

सोंचने की है जरूरत , बदलाव ये क्या हो रहा ।
रिश्तो की डोर में ये , उलझाव है क्यों हो रहा ।
बाते है वो कौन सी , जो बदलाव ये ला रहीं ।
ना चाहते हुए दिल में , क्यों दूरियां बढ़ा रहीं ।
गर समझ पायें इसे , टूटने से बच जाए पुल ।
रिश्तो की प्यारी डगर , जोड़े रह जाये ये पुल ।

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मंगलवार, 5 जून 2012

भूँख..

कौन  कहता है क़ि उसे भूँख नहीं लगती ,
रोटी कपड़ा और मकान की ।
जायज या नाजायज प्यार और रिस्तो की ,
उचित या अनुचित धन और सम्पत्ति की ।
पद बैभव और उसके आडम्बर की ,
स्त्री, पुरुष या दोनों के रूप आकर्षण की ।

कभी न्याय तो कभी अन्याय करने की ,
औरो के मुख से अपनी बड़ाई सुनाने की ।
ताकत को अपने मुठ्ठी में रखने की ,
औरो को भेड़ो सा हाँक कर ले चलने की ।
सिद्धांतो का सच्चा अनुगामी दिखने की ,
नियमो को  चौखट के बाहर ही रखने की ।

कौन कहता है उसे भूंख नहीं लगती ,
मनुष्यगत स्वभावो की हूँक नहीं उठती ।
परे है वो मानवीय कमजोरियों से ,
और करता नहीं वो दिखावा कभी भी ।
अगर है कोई हमें भी बताओ ,
उस झूँठ के पुलिंदे से हमें भी मिलाओ ।

हमें भी लगाती है कई बार भूँख ये ,
अन्दर हो कुछ पर बाहर दिखे कुछ वो ।

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रविवार, 6 मई 2012

क्यो होते बेकल रे मनवा…

क्यो होता बेकल रे मनवा , जग तो रिश्तो का मेला है ।
आज यहां कल वहां पर डेरा , ये जग बस रैन बसेरा है ।
आज तेरे जो संगी-साथी , कल होंगे किसी और के वो ।
आज शान जिनकी तुझसे , कल होंगे किसी और के वो ।

रोज बदलता जल नदिया का , रोज बदलती राह नदी ।
रोज पूर्व मे सूरज उगता , मगर नही टिकता है कभी ।
मौसम आते जाते हैं , नित नयी छ्टा वो लाते हैं ।
चाहे जितना चले पथिक , राह बदल ही जाते हैं ।

मत हो यूँ बेकल तू मनवा , यह तो जग का खेला है ।
आज अमावस रात अगर , कल पूर्णमासी का मेला है ।
कितना ही प्यारा हो तुमको , वस्त्र पुराना होगा ही ।
कितना ही तुम उसे सहेजो , उसको फ़टना होगा ही ।

इसी तरह जीवन के रिश्ते , जीर्ण उन्हे भी होना है ।
आज भले वो साथ तुम्हारे , कल तो उनको खोना है ।
मत सोंचो बाते कल की , देखो आज जो मेला है ।


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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

तू कब तक आएगी ...

तू चैन है मेरे दिल की और , हमराज है मेरे राजो की ।
फिर भी तू मुझे सताती है , क्यों दूर यूँ मुझसे जाती है ।
तू पल दो पल को आती है , पल भर में गायब हो जाती है ।
मुझे तडफता देख के शायद , तू कहीं मंद मंद मुस्काती है ।
मै तो तेरी आहत से भी , हर पल चौकन्ना रहता हूँ ।
पलक पावड़े बिछा कर , सदा तेरी राह ही तकता हूँ ।

शाम ढले ही मै अपना , बिस्तर रोज सजाता हूँ ।
प्यारी भीनी खुशबू से , फिर उसको महकाता हूँ ।
नजर बचाकर सबकी , खिड़की से झांक भी आता हूँ ।
तेरी खातिर दरवाजो को , मै खुला छोड़ कर आता हूँ ।
रोज यही करता सदा , फिर मुश्किल से मिल पाता हूँ ।
करते करते इंतिजार तेरा , वो बेवफा मै थक जाता हूँ ।

यदि नहीं मै तुझको भाता हूँ , क्यों तू आस जगाती है ।
तड़फ उठा कर दिल में ,  क्यों तू मुझको ललचाती है ।
देर रात जब आती है तू , मुझे सुबह देर हो जाती है ।
तेरे कारण मेरी जग में , बदनामी बहुत हो जाती है ।
यूँ रोज रात दो-तीन बजे , तू कब तक पास मेरे आएगी ।
मेरी 'नींद' तू होकर भी , क्यों समय से न मुझे सुलायेगी ।



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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

तारतम्य कुछ टूट गया..

तारतम्य कुछ टूट गया ,
या लय ही शायद छूट गया  ।

या फिर शायद भूल गए हम ,
मन में आते बोलो को ।

शायद अब तक सीख ना पाए ,
शब्दों की परिभाषा हम ।

या फिर शायद समझ सके ना ,
मन के अपने भावो को हम । 

जो भी हो पर रूठ गया है ,
मन का मेरा भाव कोई....।

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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

जो देखा क्या वो सच ही था ?

एक नहीं अनेको बार मन में उठते हैं सवाल , जो देखा क्या वो सच था ?
या तपते हुए रेगिस्तान में , कोई मृग मारीचिका दिखने का भ्रम था ?
या थके हुए तन के मन का , वो देखा हुआ बस कोई स्वप्न था ?
जो भी था वो जैसा भी था , अभी निश्चय नहीं वो सच ही था ।
मन चाह रहा निश्चित कर लूं , तथ्य सभी सुनिश्चित कर लूं ।
भूले-विसरे घटनाक्रम को , मानस पटल पर स्मृति कर लूं  ।

पृष्टभूमि के सब रंगों को , नूतन कर फिर मै ताजा कर दूं ।
मृतप्राय हो चुके शब्दों को , स्वकंठ से फिर जीवित कर दूं ।
चहरे जिनकी पहचान नहीं , उस समय वहां हो पाई थी ।
या जिनके चेहरों पर , तथस्त भाव-भंगिमा बन आयी थी ।
उन सभी अब पहचान करूँ , कुछ के कल्पित नाम धरूँ । 
लेकिन आज सुनिश्चित कर लूं , जो भी था सबके मन में ।

जो घटित हुयी घटनाये थी , क्या उनका निश्चित क्रम था ?
फिर जो भी जैसी घटित हुयी , क्या सब पूर्व सुनिश्चित था ?
क्या वो था आघात कोई , जो मेरे लिए रचित था ?
या वो था अभिशाप कोई , जिसे मुझे देखना निश्चित था ?
जो भी था वो जैसा था , किसी दिवा-स्वप्न के जैसा था ।
निश्चित नहीं मुझे अब तक , जो देखा क्या वो सच ही था ।

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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

तेरी बाते तू ही जाने..

तेरी बाते तू ही जाने , मै तो अपनी कहता हूँ ।
दिल की बाते तुम समझो , मै तो शब्दों में कहता हूँ ।
तुम बाते रखते हो दिल में , मै बात जुबाँ पर रखता हूँ ।
तुम साथ निभाते हो छुपकर , मै महफ़िल में संग रहता हूँ ।
किस पल की बात कहें हम तुमसे , हर पल ही तुम संग रहते हो ।
फिर दिल की बात कहें क्या  उनसे , जो स्वयं ही दिल में रहते हो । 



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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अरे देखो रे देखो भैया..

अरे देखो रे देखो भैया , दस दिन बाद आज अचानक देश में राहुल गाँधी नजर आये है..... माँ  के आँचल से निकल कर लोकपाल पर संसद में जादू की छड़ी घुमाने आये है !

तो राहुल गाँधी कहते है संसद में...
अन्ना का अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है !अरे ये लोकतंत्र के लिए खतरा हो या न हो स्विस बैंक में खाता रखने वालो के लिए जरूर खतरा है।

लोकपाल को संविधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए !
अरे पहले लोकपाल बनाने की तो बात कीजिये राहुल बाबा... आगे का हाल आगे देखा जायेगा ।

संसद सर्वोपरि है !
कौन मना कर रहा है कि संसद सर्वोपरि नहीं है ? देश लोकपाल मांग रहा है और संसद में मात्र तफरीह हो रही है क्या ये साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संसद सर्वोपरि है ।

चुनी हुयी सरकार को अलग नहीं रखा जा सकता है !
अरे जनता की क्या औकात कि "सरकार" को अलग रखे... सरकार तो सरकार होती है । तभी तो अन्ना ने कहा है... " मॉल खाए मदारी , नाचे बन्दर "

अकेला लोकपाल भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं कर पायेगा , और लोकपाल भी भ्रष्ट हो सकता है !
अरे तो क्या यह सोंच कर भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए पहला कदम भी न उठाया जाय । और भ्रष्ट तो प्रधानमंत्री भी होते है तो क्यों नहीं उस पद को समाप्त कर देते हो ।

टैक्स चोरी रोंकने और राशन कार्ड, पेंशन आसानी से प्राप्त होने के लिए जैसे  भी ध्यान दिए जाने और कानून बनाये जाने की जरुरत है !
अरे राहुल बाबा सब सब चोरो का एक ही अब्बा...भ्रष्टाचार वही  ख़त्म करने का प्रयास करो सब अपने आप सही हो जायेगा  

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

क्या जन लोकपाल आ जाने से भ्रस्टाचार ख़त्म हो जायेगा..

बहुत से लोग पूंछते है....
क्या जन लोकपाल आ जाने से भ्रस्टाचार ख़त्म हो जायेगा...?
सारे लोग ईमानदार हो जायेंगे ?

तो मै इतना ही कहना चाहूँगा मेरे दोस्तों  यूँ तो सनातन काल से देश में पुलिस की भी व्यवस्था है तो क्या चोरी हत्या या बलात्कार रुक गया है......?
नहीं ना...!
मगर जिस दिन पुलिस  की व्यवस्था को ख़तम कर दिया जाय तो... सरे शाम चोरी होगी, सरे बाज़ार बलात्कार होगा...

तो जन लोकपाल भारत में राम राज्य या राजा हरिश्चंद्र का योग नहीं लायेगा मगर पता चलने पर भ्रष्टाचारियो के मुह में डंडा जरूर डाल कर जरूर उलट देगा.
और बाबा तुलसीदास ने भी भगवान रामचंद्र के हवाले से कहा है... "भय बिन होय ना प्रीत"

"मुह में डंडा" लिखने के लिए प्रबुद्ध जनो से आदर सहित खेद है.



अशोक रावत जी ने सच ही कहा है..
हम गुजरे कल की आँखों का सपना ही तो है....
क्यों माने सपना कोई साकार नहीं होता....

तो शिशुपाल सिंह जी की पंक्तियों के माध्यम से कहूँगा...
अगर चल सको साथ चलो तुम..
लेकिन मुझसे यह मत पूंछो , 
कितना चलकर आये हो तुम,
कितनी मंजिल शेष रह गयी.

बुधवार, 17 अगस्त 2011

प्रश्नकाल...अन्ना अन्ना

मित्रो अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो केवल दूसरो के भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखने चिल्लाने और कानून बनवाने भर से  यह कार्य पूरा नहीं हो सकता जब तक सबसे पहले इसकी शुरुवात हम अपने आप से नहीं करते है, आत्मिक रूप से स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं करते है.. ।

तो क्यों ना सबसे पहले स्वयं शपथ लीजिये कि.... 
हम आज से अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में ना तो शामिल होंगे ना हीं उसका कारण बनेगे । भले ही उससे हमारा किसी भी प्रकार का हित क्यों न प्रभावित होता हो....।

मै शपथ पूर्वक पूरी तरह से तैयार हूँ......।
पर क्या आप सचमुच पूरी तरह तैयार है ?    
या सिर्फ टाइम पास करने के लिए, दूसरो पर रोब डालने के लिए "पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तरह  से बस " हम अन्ना अन्ना चिल्ला रहे है  ।

शनिवार, 6 अगस्त 2011

पहेलियाँ..

जाने कब से मेरे मन के , अतृप्त किसी किनारे पर ।
आकर बैठ गयी है देखो , चाहत कोई अनजानी पर ?
यूं तो लगाती है वो मुझको, कुछ जानी पहचानी सी ।
शायद है वो मेरे मन  की ,  कोई अतृप्त  कहानी सी  ?
हाँ वही पुरानी अभिलाषाए , वही पुरानी चाहत फिर ।
लेकिन फिर भी शब्द नहीं , ना भाव वही पुराने फिर ?

मन के आँगन में निशदिन, कुछ बादल बन घुमड़ता  है ।
मन में उठती चाहत से , अब दिल भी बहुत झुलसता है ।
कैसी अजब कहानी है , ज्यों बिन वर्षा के बरसे पानी है ।
लगाती बहुत पुरानी है , पर अब भी अनकही कहानी है ।
 अपनो सी जब लगाती है वो , फिर भी क्यों अनजानी है  ।
समझ के भी मै समझ न पाता, अब यही मेरी कहानी है ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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