हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 5 जून 2014

समय फिर लौट आता है...

समय सदैव ही अपने को दोहराता है ,
हमारा अतीत फिर भविष्य बन कर सामने आता है ।
जो बोया था हमने हमारे भूत काल में ,
वो ही आगे नयी पौध बनकर लहलहाता है ।

जो नापसंद था हमें हमारे अतीत में हमेशा ,
कि कोई क्यों वैसा करता है जो हमें नहीं भाता है ,
वही बाते वही आदते काल पात्र स्थान बस बदल कर ,
ये समय किसी और के लिए हमसे भी करवाता है ।

और देखो तमाशा समय का यारो हमेशा ही ,
कौन सही था कौन गलत अतीत में ,
ये वर्तमान ही हमें बता पाता है और ,
यूँ ही समय हमसे हमारे भावनाओं से खेलता जाता है ।

समय अपने बीतने के साथ साथ ,
हमें तमाम नए सबक सिखाता है ,
और यूँ ही कभी पछतावा तो कभी ,
एक नयी संतुष्टि का एहसास कराता है ।

जो बीता था अतीत जब फिर वर्तमान बन कर सामने आता है ,
बस एक ही अफसोस दिल में रह जाता है ,
हम बदल नहीं सकते उसे जो अतीत बन जाता है ,
भले ही समय काल-पात्र-स्थान-चाल-चरित्र-चेहरा बदल कर फिर लौट आता है ।

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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

रूठ कर जब मै चला...

रूठ कर जब मै चला , कुछ दूर तक चलता रहा। 
चोट दिल पर थी लगी , और घाव था रिसता रहा। 
मन था आहत मेरा , तेरे तीखे पैने कटाक्ष से। 
साथ ही अफसोस था , तेरे मूर्खतापूर्ण बात से। 
फिर अचानक रुक गया , मै ठिठक कर राह में। 
मन में आया देख लूँ , थोड़ा पलट कर राह में। 

क्या तुम्हे अफसोस है , अपने किये पर कुछ अभी। 
या अभी भी व्याप्त है , अहंकार तुममे अभी। 
देखा पलट कर मैंने जब , तुम थे वापस जा रहे। 
फिर अचानक यूँ लगा , कदम तेरे लड़खड़ा रहे। 
रोक ना पाया मै स्वयं को , तुम्हे डगमगाते देख कर। 
फिर चल पड़ा तेरी तरफ , तुझको अकेला देख कर। 

कैसे मै उसको छोड़ देता , जिसको सँभाला था सदा। 
तूने नादानियाँ पहले भी की , मै माफ़ करता रहा सदा। 
फिर आज भी तो है वही , हालात जाने पहचाने से। 
अपना तुझे माना सदा , कैसे रुक जाऊ फिर अपनाने से। 
लो लौट मै फिर आया अभी , भुला कर बीती बातो को। 
बस हो सके तो फिर न कहना , तीखी कडुवी बातो को। 

फिर ना हो हालात यूँ , फिर ना टूटे दिल कभी। 
रिश्ते तोड़ना आसान है , पर निभाना मुश्किल सभी। 

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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

ये जरुरी तो नहीं..

ये जरुरी तो नहीं , 
हर बात तुम्हे समझायी जाय। 
और वो भी तब ,
जब तुम खुद समझदार हो ,
और यह जताने का कोई मौका नहीं गँवाते। 

फिर बताओ कैसे तुम चूक जाते हो ?
दिलो में धड़कते एहसासो को समझ नहीं पाते हो।
साथ ही तुम समझ क्यों नहीं पाते ,
रिश्तो को चलाने और मिठास बनाये रखने को ,
हमें कई बार वैसा कुछ करना होता है ,
जो सामान्यतया करना हमारी फितरत नहीं होता है।

और ये सब बाते ,
ना जाने कितनी बार समझायी है मैंने तुम्हे। 
कभी प्यार से ,
कभी उलाहने से ,
तो कभी तुमसे झगड़ कर ,
तुम्हे रिश्तो की कगार से वापस केंद्र में लाते हुए। 

और हर बार ,
हर एक बार तुमने ,
कभी भी अपनी कमियों का एहसास ना करते हुए ,
यही कहा सदा ही तुमने,
कि तुम ही सही थे हमेशा ,
क्योंकि दुनियादारी तुम मुझसे ज्यादा समझते हो। 

तो फिर ऐसे समझदार इंसान को ,
ये जरुरी तो नहीं की हर बात समझायी जाय। 
या खुद से समझने वाली ,
हर एक छोटी छोटी बात बार बार बतायी जाय। 

और अब भी अगर तुम मुझको ,
समझ पाने से चूक जाओ ,
तो ये जरूरी तो नहीं हमेशा ,
अपनी ही भावनाओं की बलि चढ़ायी जाय। 

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रविवार, 23 मार्च 2014

क्यों आती है याद तेरी...

क्यों आती है याद तेरी , इतनी ज्यादा मुझको आज। 
आस-पास ही है तू मेरे , फिर क्यों मै इतना आज उदास । 
याद आ रहे है वो पल , जो हमने साथ बिताये थे । 
हाथो में था  हाथ तेरा , धड़क रहे थे दो दिल पास।  
ओंठो पर एक प्यारी सी , तपिश जो मैंने जानी थी। 
तेरे दिल की धड़कन को , बस मैंने अपनी मानी थी। 

खोया था जब ख्वाबों में , कोई जाग रहा था मेरे पास। 
फिर से जी पाऊँ वो पल , बस मन में मेरे यही है आस। 
इसी लिए मुझे आती है , हर पल तेरी इतनी याद। 
तेरे बिना हो रहा है देखो , मेरा दिल आज उदास। 
चुभ रहा कहीं अंदर मेरे , एकाकीपन का एहसास। 
आ जाओ फिर पास मेरे , क्यों तड़फ़ाते इतना आज। 

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शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

चार दिनों की बाते...

चार दिनों की मींठी बाते , प्यार मोहब्बत रिश्ते नाते। 
और भुला देते है वो फिर , दो पल में ही सारी बाते। 
याद नहीं रह पाता उनको , अपनो का दिल से अपनापन।
याद भले रहता है उनको , कटु क्षण के कुछ तीखे पल।
उन्हें कहें हम क्या यारो , संवेदन शून्य है जो यारो। 
उनका संग साथ में होना क्या , उन्हें पाना क्या और खोना क्या। 

वो भटक रहे ज्यों कटी पतंग , कभी लटके यहाँ कभी लिपटे वहाँ। 
कभी हवा के झोंको में बह निकले , कभी गिरे यहाँ कभी उड़े वहाँ। 
तुम भी क्या दिल पर ले बैठे , गैरो की बे-गैरत को। 
तुम जियो शान से यारा , अपनो में अपनी खुद्दारी को। 
ये कोई चार दिनों की बात नहीं , ये जीवन भर की कहानी है। 
यहाँ अपना पराया कोई नहीं,  सब मतलब की दुनियादारी है। 

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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

यादों के पुल पर अकेले..

ये सच है तुम्हारी यादों में ,
बिखर जाता हूँ कई बार। 
ये भी सच है रह रह कर ,
साथ बिताये लम्हे याद आते है बार बार।
ये भी सच है कि याद आते ही ,
खो जाता हूँ उन्ही खट्टे मीठे लम्हो में हर बार। 

मगर यह भी सच है ,
तुम भुला चुके हो अपना अतीत मेरे यार। 
और जब यादों की एक छोर टूट जाए ,
या पुल की रस्सियों की एक तरफ गाँठ खुल जाए। 
तो मुश्किल हो जाता है अकेले ,
यादों के पुल को बिना चोट खाये पार कर पाना। 

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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

क्या फर्क पड़ता है ?

मै क्यों तुम्हे खोजूं यूँ ही अपने से हर बार ?
मै क्यों तुम्हे बताऊ अपने से अपने मन का हाल ?
मै क्यों तुमसे पूंछू घेरकर तुम्हारा हाल-चाल ?
मै क्यों करूँ तुमसे जबरन सुख-दुःख का व्यपार ?
मै क्यों करूँ तुमको याद कर के परेशान बार-बार ?
जब नही है तुम्हे फुरसत अपनेपन को निभाने का यार ?

क्या फर्क पड़ता है तुम क्या हो रिश्ते में यार ?
तुम दोस्त हो , मेरे भाई हो, या हो तुम प्यार ?
मुझ पर तुम्हारा और तुम पर मेरा कितना है अधिकार ?
या कितने सुख-दुःख हमने साझा किये है पहले हर बार ?
कहो क्या फर्क पड़ता है अब इन सब बीती बातो से यार ?
जब नही है तुम्हे चाहत अपनापन निभाने का लगातार ?

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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

प्रेम के विरागो पर...

प्रेम के विरागो पर , चाहे जितने लगाओ पहरे ।
प्रेम सदा होता ही रहा , प्रेम सदा होता ही रहेगा ।
लैला-मंजनू ,हीर और राँझा , प्रेम के ही दीवाने थे ।
दुनिया वाले कुछ भी कहें , वो प्रेम के ही परवाने थे ।
जो भी प्रेमी बन बैठा , जग की कहाँ उसको है खबर ।
प्रेम दीवानों की दुनिया में , बेगानों की कहाँ बसर ।

प्रेम के विरागो पर , जब जब पुष्प नया खिलता है ।
अपनी महक से वो , जग को सुगन्धित करता है ।
यूँ तो उगते रहते काँटे , प्रेम पुष्प संग डालो पर ।
नहीं रोंक पाते है वो , कलियों को मुस्काने पर ।
पूरे होते है वो ख्वाब , जो सच्चे दिल से देखे जाते ।
तुम भी थोड़ा प्रेम करो , इसका अवसर बिरले पाते ।

यदि राह रोंक कर बैठ गए , जिद पर अपनी अंटक गए ।
दरवाजे बंद करके अपने , कुछ हाँसिल ना कर पाओगे ।
पहले भी प्रेम विरागो पर , जग ने लगाये थे पहरे ।
जब जब प्रेम ने करवट ली , बिखर गए सारे पहरे।
जब प्रेम पुष्प मुस्काता है , शीश झुंकाना पड़ता जग को ।
भारी बोझिल मन से सही ,  प्रेम अपनाना पड़ता जग को ।

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शनिवार, 27 जुलाई 2013

समय...

समय बड़े बड़े घावो  को  भरने की सामर्थ रखता है ।
आज  जिन बातो से हम द्रवित एवं विचलित होते है कल वही बाते हमारे लिए सामान्य से भी कम महत्त्व की हो जाती है ।
यही मानव स्वभाव और संसार का नियम है ।

फिर चाहे वह सांसारिक रिश्ते हो या प्राणों से प्रिय प्रेम सम्बन्ध ,चाहे भौतिक सुख की चाह हो या मानसिक असंतुष्टिया ।
समय हर किसी के प्रति हमारी सोंच एवं एहसास को बदलता रहता है ।
और अंत में हमें उसके बिना या उसके साथ जीना सिखा ही देता है…!

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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

उड़ जहाज का पंछी..

आप यूँ दिल के करीब , जब नजर आने लगे ।
बात चुभी उनको ही पहले , जो दूर थे जाने लगे ।
शायद उन्हें था ये गुमान , हम बिखर जायेंगे यूँ ही ।
छोड़ कर दिल तोड़ कर , वो दूर जब जायेंगे यूँ ही ।
माना गलत थी सोंच पर , बात काफी हद तक सही थी ।
हमने ही उनसे कभी ये , कमजोरियाँ अपनी कही थी ।

पर गलत वो आँक बैठे , गलत चाल पर शह दे बैठे ।
बिखरा किला हमारा मगर , हम मात उन्हें ही दे बैठे ।
माना रिश्ते शतरंज नहीं , पर बाजी यहाँ भी लगती  है ।
शह और मात से भी आगे , कुछ बाते सदा ही चलती हैं ।
हाँ यहाँ सुधारा जा सकता , चाले गलत जो चल बैठे ।
ज्यों उड़ जहाज का पंछी , फिर जहाज पर जा बैठे ।

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सोमवार, 17 जून 2013

क्या लिखूँ ...

क्या लिखू क्या ना लिखूँ  , कुछ समझ पाता नहीं । 
भाव हैं मन में बहुत , पर  उन्हें समेट पाता नहीं ।
कुछ भाव हैं बस प्यार के , कुछ है तेरे अहंकार के ।
कुछ भाव तुझसे लगाव के, कुछ रिश्तो के बिखराव के ।
कुछ भाव हैं निर्द्वन्द से , कुछ उलझे है अंतर्द्वंद से  ।
कुछ मुस्कुराहट ला रहे , कुछ फिर दुखी कर जा रहे ।

क्या लिखूँ  क्या ना लिखूँ , चलो तुम ही बताओ मै क्या लिखूँ ।
वो बसंत ऋतु की बात लिखूँ, या ये पतझड़ का बिखराव लिखूँ ।
गैरों का बनना अपना लिखूँ  , या अपनो का बनना गैर लिखूँ  ।
है भूल-भुलैया भावों  की , कोई राह मिले तब तो मै लिखूँ ।
यहाँ अपना पराया कोई नहीं , फिर बात कहो मै किसकी लिखूँ ।
मकड़जाल  में उलझा  मन , चलो उलझन को सुलझाना लिखूँ ।

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शुक्रवार, 14 जून 2013

बीता हुवा कल...

सिलसिले जो आपने , शुरू बेबफाई के किये ।
बनकर वो काँटे नुकीले , राहों में मुझको मिले ।
आपने सोंचा भी है , हम क्यों वफ़ा करते रहे ?
यार भले नाखुश रहे , याराना तो चलता रहे ।
आप भले नाराज रहे , दूर भले ही आज रहे ।
हमको वचन निभाना है , संग चलते जाना है।

यदि समझ सको बात मेरी , फिर शुरु करो आज अभी ।
दिल में चुभोये तीरों पर , तुम वापस ले लो आज अभी ।
वो बदकिस्मत होते है , जो अपनो की वफ़ा ना पाते है ।
लेकिन उनसे ज्यादा वो , जो साथ निभा नहीं पाते है ।
मत बाँधो दिल के भावो को , अविरल इनको बहने दो ।
भले काँटो  से नाराज रहो , पर फूलो को तो मिलने दो ।


तुम आज भले ना साथ चलो , रूठे ही मुझसे आज रहो ।
मत छोड़ो कुछ मुलाकातों को , रिस्तो को तो चलने दो ।

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मंगलवार, 7 मई 2013

रिश्तो की डोर...

रिश्तो की डोर कोई , उलझ गयी ऐसी ,
ना तोडे से टूटे , ना सुलझाई जाए ही..

रिश्ता भी ऐसा , जिसे दिल ही निभाए ,
ना छोड़े से छूटे , ना अपनाया जाए ही.. 

सांप और छछुंदर सी , हो गयी स्थिति ,
ना निगल ही सके , ना उगला जाए ही..  

रिश्तो की डोर जब , उलझ जाए ऐसी ,
कितना ही बचाओ , गाँठ लग जाए ही..

जितना ही समझो , ना बात समझ आये ,
सुलझाते सुलझाते , बात उलझ जाए ही..

अटक गयी बात जो , वो दिल से ना जाय ,
कितना ही भुलाओ , फिर से याद आये ही..

गैर कोई हो तो , कुछ बतलाया जाए भी ,
अपनो को यारो , ना कुछ कहा जाए ही..

रिश्तो की डोर एक , उलझ गयी ऐसी ,
ना तोडे से टूटे , ना सुलझाई जाए ही..

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रविवार, 5 मई 2013

अब भी है समय...

जीवन में कभी कभी , कुछ पल ऐसे आते है ।
जहाँ हम प्रायः: अपनी , मर्यादाओ को भूल जाते है ।
और भुलाकर मर्यादाओ को , जो कुछ भी हम करते है ।
आज नहीं तो कल हम , कही न कही उसकी भरपाई करते है ।
और अगर हमको कभी , होता नहीं गलती का एहसास ।
तो किसी अपने के दिल पर , निश्चित होता है बज्रपात ।

तो 

अब भी है समय , संभल जा ओ राहगीर ।
फिर ने नए भरोसे को , बना तू आस-पास ।
वो गलतिया तुम्हारी , जो तुमने की थी कभी ।
गर हो सके मानो , तुम जाकर उसके पास ।
जिसको लगी थी चोट , मूर्खता से त्तुम्हारी ।
शायद इसी तरह से , फिर बने नया विशवास ।

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रविवार, 31 मार्च 2013

एक पाती..

सोंच रहा हूँ लिख डालूं , प्रियवर को अपने एक पाती ।
अपने मन का हाल लिखू , कह डालू दिल की सब बात ।
बहुत दिनों से मिले नहीं , न लिखी प्रेम की कोई पाती ।
कैसे बीते है ये दिन और , कैसे होगी आगे मुलाकात ।

वो भी क्या दिन थे जब , हम घंटो बाते करते थे ।
बिना बात की बात पर , हम अक्सर रूठा करते थे ।
फिर घंटो एक दूजे की , हम मान-मनोवल करते थे ।
रोज सबेरे एक दूजे से , हम सपनों की बाते करते थे ।

फिर ये कैसे दिन आये जब , दूर दूर हम रहते है ।
एक दूजे की यादो को क्यों , भुला कर यो जीते है ।
चलो नहीं लिखी जो तुमने , मुझको पाती मेरे यार ।
मै ही लिख डालूं अब अपने , दिल की बातो का सार ।

होली की शुभ कामनाओ के साथ.....

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

सोंचने की है जरूरत..

चाहतो का एक पुल था , जो मिलाता था हमें ।
सब व्यस्तताओ के बाद भी , वो जोड़ता था हमें ।
यादो में एक दूसरे के , सदा बने रहते थे हम ।
दूर भले रहे मगर , पास बने रहते थे हम ।
फिर वक्त ने बदली जो करवट ,दूरियाँ बड़ने लगी ।
ना चाहते हुए भी देखो , नजदीकिया घटने लगी ।

चाहतो का पुल शायद , जर्जर है होने लगा ।
आपसी सौहाद्र भी , शायद कहीं घटने लगा ।
कमियां एक दूसरे की, क्यों हमें दिखने लगी ।
प्यार भरी बाते भी , दिल में कहीं चुभने लगीं ।
एक दूसरे की जरुरत , क्या ख़त्म होने लगी ।
या मनोभावों पर हमारे , धूल है ज़मने लगी ।

सोंचने की है जरूरत , बदलाव ये क्या हो रहा ।
रिश्तो की डोर में ये , उलझाव है क्यों हो रहा ।
बाते है वो कौन सी , जो बदलाव ये ला रहीं ।
ना चाहते हुए दिल में , क्यों दूरियां बढ़ा रहीं ।
गर समझ पायें इसे , टूटने से बच जाए पुल ।
रिश्तो की प्यारी डगर , जोड़े रह जाये ये पुल ।

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गुरुवार, 28 जून 2012

रिक्तता…


मनुष्य की इच्छाओ का , कभी अंत नही होता है ।
कितना ही मिले सुख , वो अनन्त नही होता है ।
दुख भले ही छोटा हो , सदा विशाल लगता है ।
बीत जाये वर्ष कितने , मन मे कसक रहता है ।
हर बार सोंचता है मन , आज मिले वरदान बस ।
फ़िर ना हम माँगेगे कुछ , जो मिलेगा रहेंगे खुश ।

फ़िर जैसे पूरी होती आशा , मन मे उठती नयी अभिलाषा ।
जो कुछ मिला उसे भुलाकर , जो मिला नही उसको पछताता ।
जन्म से लेकर पुनर्जन्म तक , व्याकुल होकर समय गँवाता ।
खोकर स्वप्नो की दुनिया मे , जीवन मृगमारीचका बनाता ।
अपनी अनन्त इच्छाओ का , वो अंत नही कर पाया है ।
पशु से मानव भले बना , महा मानव नही बन पाया है ।

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मंगलवार, 12 जून 2012

जो मैंने थोड़ी सी पी ली..

क्यों नाहक ही नाराज हो तुम , जो मैंने थोड़ी सी पी ली ।
पल भर दिल के रिश्तो की , थोड़ी सी हकीकत तो जी ली ।
ये कागज़ के फूलो की दुनिया , लगती भले सलोनी है ।
लेकिन दिल के रिश्तो की , मुश्किल से सजती डोली है ।
मुझको आता नहीं दिखावा , करना जग में मेरे यार ।
चेहरा छुपाकर चुपके से , करना पीठ पर कोई वार ।

मै जो करता प्यार किसी से , उसे बताता हूँ खुल कर ।
करता जो दुश्मनी कभी मै  , वो भी निभाता हूँ खुल कर ।
दिल में कुछ और बोलू कुछ , ये करना मुझको आता नहीं ।
कोई लाग-लपेट में भरमाये मुझे ,  ये भी मुझको भाता नहीं ।
सच को सच झूँठे को झूँठा , निर्भय हो कहना आता मुझको ।
अपनी कमिया आगे बढ , स्वीकार भी करना आता मुझको ।

जो बिना बात के बात बढाये , ईंट का जबाब पत्थर से पाए ।
दिल को जो भी मेरे दु:खाये , वो भी कष्ट प्रतिफल में पाए ।
जो एक कदम मेरे प्रति आता , मै आगे बढ़ सम्बन्ध निभाता ।
जो कदम हटाया तुमने पीछे , ततक्षण पीछे हटना मुझको आता ।
जो कहना है मै कह के रहूँगा , भले ही थोड़ी पी  ली है ।
तुम्हे भला लगे या लगे बुरा , मैंने तो हकीकत जी ली है ।


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शुक्रवार, 8 जून 2012

बंधन..

जो बोला तुमने सच ही बोला ,
सच के सिवा कहाँ कुछ बोला ।
क्यों  व्यर्थ मै  उससे आहत होऊ ,
जब तुमने अपने दिल से बोला ।
निश्चय ही हम सब आजाद है ,
इसका मुझको भी एहसास है ।
क्यों व्यर्थ सहे कोई बंधन पराये ,
स्वतंत्रता हम सबका अधिकार है ।

हाँ रिश्तो में यदि अपनापन हो ,
प्रेम समर्पण  सच्चे मन से हो ।
तो प्रेम का बंधन प्यारा लगता ,
सदा जीवन में व्यापकता लाता ।
पर प्रेम का पथ होता है संकरा ,
एक से ज्यादा सदा उसको अखरा । 
वही सफल हो पाया उस पर ,
जिसने त्यागा स्वयं को उस पर ।

यूँ तुम भी थे जिस बंधन में ,
वो प्रेम का ही बंधन था प्रिये ।
मैंने भुला दिया था स्वयं को ,
पर भुला ना पाए तुम स्वयं को ।
इसीलिए तुम्हे चुभता था बंधन ,
आहत करता था जबरन समर्पण ।
तो तुम्हे मुबारक हो आजादी ,
मै देता हूँ तुम्हे सम्पूर्ण आजादी ।


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बुधवार, 6 जून 2012

तुम्हे एहसास तो होता होगा ही...

प्रिये सच क्या है मुझे पता नहीं,
पर मेरे दिल से माना सदा यही । 
तुम्हे एहसास तो होता होगा ही ,
क्या कहना चाहा मैने तुमसे सदा ।
कभी कहा उसे मैने शब्दों में ,
कभी समझाया तुम्हे संकेतो मे ।


कभी कहकर भी वो कहा नहीं ,
जो कहने को व्याकुल रहा अभी ।
कभी तुम्हे सुनाया कोई कहानी ,
कभी पहेलियो में उलझाया हूँ ।
कभी कह्कर भी चुप रहता हूँ ,
कभी प्यार मे क्रोध जताया हूँ ।

कभी स्वयं रूठा पर तुम्हे मनाया ,
कभी तुम रुठे और मै झल्लाया हूँ ।
कुछ भी किया हो मगर सदा,
 तुम्हे अपना माना मैने सदा ।
क्या समझ सके हो तुम मेरे दिल को ,
या सब प्रयत्न व्यर्थ ही करता आया हूँ 
जो कहा अभी सब तुम्हे प्रिये ,
क्या समझ मे कुछ तुम्हे आया है ।

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आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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