हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

मैं तुम्हे कितना प्यार करता हूँ.....

लीजिये कई दिनों के बाद आज पुन: आप सभी के समक्ष गोविन्द जी के सौजन्य से एक रचना प्रस्तुत है...

मैं तुम्हे कितना प्यार करता हूँ
कोई जान नहीं पायेगा
ये राज़ तो मेरे मरने के साथ ही खत्म हो जायेगा।

ख़त्म होऊंगा मैं और ये राज़
खत्म न होगा मेरे दिल का प्यार
मेरा प्यार तो अमर होके सदा तुम्हरे साथ रह जायेगा।

सजा लेना तुम अपना आशियाँ
कर लेना अपनी दुनिया आबाद
कम से कम मेरे रूह को चैन मिल जायेगा।

गम न करना मेरे जाने पे
आंसू न बहाना याद आने पे
मुस्कुरा देना तुम देखकर में भी कही मुस्कुराऊंगा।

तुम मिले किसी और के होकर
किस्मत ने ही दी है ठोकर
मेरा प्यार मेरे दिल का राज़ बना रह जाएगा।
मैं तुम्हे कितना प्यार करता हूँ
कोई जान नहीं पायेगा.............

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★ गोविन्द पांडे ★彡

गुरुवार, 30 जून 2011

हँस के हम सारे गम अब छुपाने लगे...

प्रिय गोविन्द जी के सौजन्य एवं उनसे जबरन प्राप्त अनुमति से आपके समक्ष प्रस्तुत है उनकी दूसरी रचना ...


हँस के हम सारे गम 
अब छुपाने लगे , 
हमसे वो अब 
बहुत दूर जाने लगे। 

भूल हमको
किसी से दिल वो लगाने लगे , 
हमी से मोहब्बत के 
किस्से सुनाने लगे। 

उनको हम अब तो
लगने बेगाने लगे ,
हमसे नज़ारे भी वो अब
चुराने लगे।

यादों में उनकी 
हम डूब जाने लगे , 
याद में उनकी 
आंसू बहाने लगे।

प्यार पाने की 
खुशियाँ वो मनाने लगे , 
प्यार खो के 
गम गले हम लगाने लगे।

सपने सारे हमारे 
टूट जाने लगे , 
वो तो औरो के 
सपने सजाने लगे।

वफ़ा कर के भी हम 
हार जाने लगे , 
हँस के आँसू भी हम 
पीते जाने लगे।

जिंदगी गम के साये में 
फिर बिताने लगे , 
हँस के हम 
सारे गम अब छुपाने लगे। 

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 ミ★गोविन्द पांडे ★彡

बुधवार, 29 जून 2011

हाथ की लकीरों में क्या लिखा है कौन जानता है?

प्रिये मित्रो एवं वरिष्ठ आदरणीय जन

आज मेरे एक बहुत ही अजीज मित्र और भाई गोविन्द ने मुझे अपनी लिखी एक रचना पढने के लिए भेजी जिसे कई बार पढने के बाद उनकी जबरदस्ती अनुमति प्राप्त करके अपने ब्लाग पर लगा रहा हूँ ताकि आप लोगो को भी उनने हुनर से वाकिफ कराया जाय...

तो आपके समक्ष प्रस्तुत है ....


हाथ की लकीरों में क्या लिखा है कौन जानता है?

तुम हमें मिलोगे,
अपना बनाओगे , हर पल
मेरा साथ निभाओगे, या
यादों के सहारे जिंदगी गुजर जाएगी,
कौन जानता है?

पेड़ से पत्तों की तरह,
बिखर जाती हैं खुशियाँ,
बस साख लिए खड़े हैं तपती धूप में,
इस पतझड़ के बाद बसंत आएगा
या नहीं, कौन जानता है?

उगा था एक पौधा,
कुछ हसरत लिए,
जुल्म सहता हुआ
खड़ा है वो, वो पेड़ बन पायेगा
या टूट जायेगा,
कौन जानता है?

जो सपने सजाये थे हमने,
तुम्हारे साथ दुनिया बसायेगे ,
सपने सच होंगे, या
एक अधुरा ख्वाब बन के रह जायेगे,
कौन जानता है?

संवर जाती जिंदगी हमारी,
तुम्हे भी दे सकूँ खुशियाँ सारी,
हासिल होगी कामयाबी,
या खुद लिखनी पड़ेगी
अपनी बरबादियों की कहानी,
कौन जानता है?\

जिंदगी में लोग आये,
सबसे हमने दिल लगाये,
उनकी तरह तुम भी छोड़ जाओगे,
या हमारी हाल पे मुस्कुराओगे,
कौन जानता है?

जीवन पे काली घटा छाई है,
सारी फिजा अँधेरे के
आगोश में समाई है,
इन अंधेरों में खो जायेगे हम,
या सुनहरा सवेरा होगा,
कौन जानता है?

जीवन के साथ खेल खेलती हैं ये लकीरें,
कभी सुख कभी दुःख देती हैं,
हर पल रंग बदलती हैं ये लकीरें,
क्या होगा अगले पल में,
कौन जानता है?

हाथ की लकीरों में क्या लिखा है कौन जानता है?

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 ミ★ गोविन्द पाण्डे ★彡

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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