हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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सोमवार, 2 जून 2014

यूँ ही टाइम पास..

लो चली आज फ़िर से आंंधी चली , राहे अपनी वो खाली कराती चली । 
शाखे सूखी हो या हो हरे पेड़ों की, तोड़ कर वो पीछे गिराती चली ।
फ़ूल पत्तो के बारे मे क्या मै कहूँ  , उनकी तो हस्ती पूरी मिटाती चली।
राह मे जो भी आयेगा मिट जायेगा , तिनके तिनके को देखो उडाती चली।
घाव मेरे भी दिल पर लगाती चली, जुल्मो सितम जब वो तुम पर ढाती चली।
आंसूओ की कहाँ है उसको कदर , वो तो सागर को पोखर से मिलाने चली ।

बात करते हो क्यों तुम अभी धूप की, वो तो दिनकर की सत्ता झुकाने चली ।
कुटियों की अब मांगें हम खैरात क्या, वो तो महलो को भी खण्डहर बनाने चली।
रोंक पाओ अगर तो अभी रोंक लो , वर्ना हस्ती वो तुम्हारी मिटाने चली ।
क्यों छिपाते हो अब तुम मेरे राज को , वो सारी दुनिया को हकीकत बताने चली।
आग दिल मे लगे चाहे बस्ती जले , वो तुमको फ़िर मुझसे मिलाने चली ।
क्यों दिखाते हो तुम खौफ़ बाहुबलियों का, वो तो सूबो की पलटन हराने चली।

थी मेरे भी मन मे हसरत कहीं , आओ तिनको को आंधी से लडाने चले ।
जो उठी थी आहें कभी मेरे दिल से ,वो ही बनकर के आंधी है देखो चली ।
न्याय सबको वो सबसे दिलाने चली , नयी बस्तियो को फ़िर से बसाने चली।
ढांंप दिनकर को रैना बनाने चली , तेज भारत का सबको दिखाने चली।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 11 मार्च 2014

श्रापित...

क्या कहे किससे कहें , क्यों कहे हम निज व्यथा। 
व्यर्थ है कहना यहाँ कुछ , जहाँ लोग सुनते हैं कथा। 
हाँ कथा ही सुन रहे सब , भूल कर निज संवेदना। 
हो गए जड़वत जहाँ सब , क्या वो समझेंगे वेदना। 
यदि सत्य को भी सत्य का , जब पड़े देना प्रमाण। 
समझ लीजै तब वहाँ , बस निकलने वाले हैं प्राण। 

आम क्या और खास क्या , जब यहाँ दोनों व्यथित। 
कौन पोंछे आँसू किसके , राज्य ही हो जैसे श्रापित। 
किस लिए किसके लिए , हम करें फिर कुछ यहाँ। 
मृत्यु का ही उत्सव मानते , लोग हों जब सब यहाँ। 
फिर कौन शोषित कौन शोषक , ये प्रश्न ही बेकार है। 
स्वछंदता से कर रहे जब , सब यहाँ व्याभिचार हैं। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG


रविवार, 12 जनवरी 2014

बकवास...

ओ मुसाफिर इस तरह तू , है यहाँ हैरान क्यों। 
लगता है पहली दफा , इस देश में आया है तू। 
दूध की ये नालियां जो , दिख रही बहती तुझे। 
ये हकीकत में लहू है , जो लाल रह पाया नहीं। 
दिख रही तुझको यहाँ जो , हर तरफ ही होलिका।
वो हकीकत में है जलती , नव बधुओं की डोलियां।  

दिख रही तुमको यहाँ जो, होलिहारियो की टोलियां। 
वो हकीकत में खेलकर , आ रहीं खून की होलियां।
और ये जो भद्र पुरुष , तेरी बाँह में बाँह डाल रहे।
वो हकीकत में तुम्हारी , गर्दन को नापने जा रहे। 
ओ मुसाफिर दिख रहा , क्यों हैरान है इस तरह। 
लिख रहा क्यों व्यर्थ में , बकवास मै  इस तरह। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 11 सितंबर 2013

मह्त्वकांक्षाये किसे प्रिय नहीं होती...

मह्त्वकांक्षाये किसे प्रिय नहीं होती , कौन रहना चाहता है उसके बिना ?
और बिना मह्त्वकांक्षाओं के कहो , मिला है किसी को कहाँ कुछ यहाँ ।
भले हो वो शासक किसी देश का , या हो वो सिपाही किसी भेष का ।
वो करता हो चाहे व्यापार कोई , या हो वो किसी का खरीददार कोई ।
देता भले हो जगत को वो शिक्षा , या लेने वो जाता हो स्वयं ही दीक्षा ।
चाहे लुटाता जगत को धरम हो , या अकेले निभाता अपना करम हो ।

अगर है जीवन में हमें कुछ करना , मह्त्वकांक्षी निश्चित ही होगा बनना ।
मगर ये तभी तक ख़ुशी हमको देती , जब तक गुलामी नहीं इसकी होती ।
बनता ये जिस दिन हमारा व्यसन है , उसी दिन गुलामी में शवसन है ।
फिर नचाने ये लगता पोरों पे अपनी , चलाने ये लगता राहों पे अपनी ।
जब हम लुटाते हैं आजादी अपनी , तभी हम बुलाते है बर्बादी अपनी ।
अच्छे और बुरे का हम अंतर भुलाते , किसी भी तरह से विजयश्री लाते ।

फिर मिटाते उन्ही को जो कल थे अपने , हमारे लिए जो बुनते थे सपने ।
फिर आता है वो पल हमारे लिए भी , जहाँ हम अपने किये को जिए भी ।
अच्छा है होना मह्त्वकांक्षी यारो , मगर उतना ही जो हित में हमारे ।
तभी हमको मिलती उससे ख़ुशी है , वही सबको देती सच्ची ख़ुशी है ।
उसी से हमारा वा जगत में सभी का , होता है सच में कल्याण थोड़ा ।
वरना भुलाकर हमको हमी से , मह्त्वकांक्षाये ही याद रहती है सारी ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 12 मई 2013

सफल बे-ईमान...

जब बेईमान व्यक्ति सफल होता है तो यह उसकी बेईमानी की सफलता नहीं वरन यह उसमे पाए जाने वाले अच्छे  गुणों की सफलता होती है ।

यह जरूरी नहीं है की एक ईमानदार आदमी सभी योग्यताओं से युक्त हो । हो सकता है की कोई व्यक्ति सिर्फ ईमानदार हो पर साथ में कमजोर,हिम्मत हीन , अव्यवहार कुशल या कायर हो । तो अगर एक ईमानदार व्यक्ति असफल होता है तो ज्यादा संभावना होती है कि वह अपनी ईमानदारी के वजह से नही वरन अपनी अन्य कमजोरियों के वजह से असफल है 

वही एक बेइमान व्यक्ति साहसी,बुद्धिमान,संगठन क्षमता युक्त,भविष्य का अनुमान करने वाला,पहल करने वाला आधि उच्च गुणों से युक्त हो सकता है और इन सारे गुणों की वजह से वो आसानी से सफलता प्राप्त कर लेता है । जैसे चोरी भी एक जटिल विग्ज्ञान है , इसमे बडे गुण चाहिए । एक सफल चोर में एक सैनिक के समान हिम्मत , एक संत के समान शांति और एक ज्ञानी के समान अन्तर्दृष्ट होनी चाहिए अन्यथा ना तो वो चोरी करने की हिम्मत जुटा पायेगा और अगर जाएगा भी तो पकड़ा  जायेगा ।

चोरी या बेइमानी सफलता नही लाती है क्योंकि वो तो अपने आप में असफल होने को आबद्घ है । हाँ अगर उसमे अन्य योग्यताये जुड जाए तो वह सफल हो सकती है । वही अगर ये सारे गुण किसी अ-चोर में हो तो उसकी सफलता के क्या कहने ।

वास्तव में दुनिया के बुरे से बुरे व्यक्ति की सफलता के पीछे वही गुण होते है जो दुनिया के अच्छे से अच्छे व्यक्ति की सफलता के पीछे होते है और इसका उल्टा  असफलता के लिए लागू होता है ।

तो व्यर्थ में किसी बे-ईमान सफल व्यक्ति से सिर्फ इस लिए इर्ष्या ना करे की वो बे-ईमान है , पहले उसकी सफलता के अन्य कारणो को भी समझे

रविवार, 6 मई 2012

मूक, बधिर, वाचाल..

लोग कहते है ये इन्सान कितना बोलता है ?
शब्दों को शब्दों से ये काटता है ,
अपने ही बातों की रट लगाता है ।

सीखा नहीं इसने कभी, चुप हो रहना ।
ना जाने क्यों ये इतना बोलता है ?
तो जाकर पूंछा मैंने ये सवाल उसी से ,

बताया फिर हकीकत भी उसने बोलकर ही ।
ये दुनिया अजब मूर्खो की है दुनिया ,
सभी दूसरो को हैं बस उपदेश देते ।
उपदेश तो चलो हम चुप रहकर भी सुन लें ,
मगर तोहमते भी आदतन लगाते रहते सभी ।
शुरू के दिनों में मै सुनता था केवल  ,
मगर मेरी हद भी गुजरने लगी फिर ।
तो मैंने कहा अब बनकर दर्पण सा रहूँगा ,
जो जैसा कहेगा उससे वैसा कहूँगा ।

मगर इस जहां में है सभी वाचाल ही ,
फिर कैसे रहूँ मै जग में चुपचाप ही ।
अगर ना बोलो तो सब कहते यही ,
देखो वो डरकर कैसा खड़ा है अभी ।
अगर कुछ  बोलो तो कहते सभी ,
देखो ये रहता नही चुपचाप कभी ।

अगर सच वो बोले तो सुन लूँ मै केवल ,
मगर झूँठ का साथ नहीं होता मुझे बर्दास्त।
है अगर गर्ज, मर्ज दुनिया की गप्पे लड़ना,
तो सुनना पड़ेगा उसे मेरा भी अफसाना ।
सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

दोस्ती और दुश्मनी..

दोस्ती और दुश्मनी , दोनों को निभाने के लिए दिल में जज्बा , दिमाग में पैनापन और हौसले (जिगर) में मजबूती की जरूरत होती है..।

दोस्ती और दुश्मनी दोनों सीखने के लिए , महसूस करने के लिए और निभाने के लिए हमें एक दूसरे के नजदीक जाना पड़ता है , बीच की दूरियों को मिटाना पड़ता है और अपने दिल , दिमाग और नजर में उसे बसाना पड़ता है।

अगर दोस्ती दो दिलो को मिलाती है , दो जज्बातों के बीच एक पुल बनाती है........ तो दुश्मनी दो दिमागों को नजदीक लाती है और उनके इरादों के बीच की दीवार गिराती है।

जहाँ एक अच्छी दोस्ती कभी कभी हमारी रातो की नींद हराम करती है... वही एक बेहतरीन दुश्मनी अक्सर हमें चैन की नींद उपहार में देती है ।

ये हो सकता है कि आपके अच्छे दोस्त भी आपका साथ बुरे दिनों में छोड़ दे.... पर यह कभी नहीं होता है कभी आपके दुश्मन आपको भूल जाये ।

दोस्ती एक कमजोर और खोखली नींव पर भी खड़ी हो जाती है पर ... दुश्मनी सदैव एक मजबूत आधार पर ही टिकती है ।

दोस्ती में लोग अपनी आदतों को दूसरे पर थोपने की कोशिश करने लगते है और दुश्मनी में खुद से दूसरो की आदतों को जानने की कोशिश करते हैं ।

दोस्ती की चाहत रखना सरल है , करना आसान है पर वास्तव  में उसे निभाना कठिन है पर ..दुश्मनी की चाहत रखना कठिन है , करना आसान है और निभाना अत्यंत ही सरल है ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 28 मार्च 2011

रिश्ते...नाते

'अनंत' तुम्हे समझाता हूँ , 
थोड़ा सा चालाक बनो ।
है दुनिया अपने मतलब की ,
ज्यादा न बेताब बनो ।
यहाँ खून के रिश्ते भी ,
अपना मतलब ढोते हैं ।
बिना किसी मतलब के यहाँ ,
कब कोई रिश्ते होते हैं ।
है हाल बुरा सम्बन्धों  का , 
नातों को सब भूले हैं ।
ठोक-बजाकर,मोल-भाव कर ,
रिश्तों को सब जीते हैं ।
दिल में कुछ चेहरे पर कुछ ,
भाव सदा सब रखते हैं ।
भूले-भटके गलती से ही ,
कुछ रिश्ते सच्चे होते हैं ।
वो भाग्यवान होते हैं जिनको ,
सच्चे रिश्ते मिलते हैं ।
रिश्तो के बाजार में जिनको ,
काँच में हीरे मिलते हैं ।


© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

कुछ राजा भोज बाकी गंगू तेली ?

कुछ लोग पदों पर शोभित हैं ,
कुछ लोंगो से पद सुशोभित हैं ।
कुछ पहुँचे अथक परिश्रम से ,
कुछ पहुँचाये गए परिश्रम से ।
ये तो किस्मत है कुर्सी की ,
वह पैदा करती नित नयी कुर्सी ।
वर्ना एक बेचारी कुर्सी ,
किस किस की पूरी करती खुश्की ?

पद की शोभा है जिनसे ,
उनको कुछ भी कहना क्या ?
पद पर शोभित हैं जो भी ,
उनके बारे में कहना क्या ?

कुछ राजा भोज के जैसे हैं ,
बाकी सब गंगू तेली हैं ।
कुछ लोग पदों पर शोभित हैं ,
बाकी पद से सुशोभित हैं ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

रविवार, 23 जनवरी 2011

आवो तुम्हे पालतू बनायें...

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।

हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।

परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है ।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 22 जनवरी 2011

हम सच मा झूठै कवितायित है...

मित्रों
आज किसी ब्लाग पर कुछ पढ़ते हुए एक संदर्भित लाइन "हम झूठै-मूठे गायित है, आपन जियरा बहलायित है| " पढ़ने को मिली
हालाँकि पूरी रचना तक मै नही पहुँच पाया मगर यही एक लाईन  सीधे दिल में उतर गयी...
फिर कुछ इन्ही शब्दों और भाव में (हालाँकि यह बोलचाल की भाषा मेरी लिए थोड़ी असहज है क्योंकि इसे सुनने और बोलने का अवसर नहीं मिला और आदत भी नहीं है मगर यह थोड़ी परिचित भी है क्योंकि है तो हिंदी ही और वो भी उत्तर प्रदेश के ही किसी क्षेत्र की।) लिखने को मन बैचैन होने लगा...

फिर देखते है कि मेरा मन अपने मन की कितना कर पाता है........ ?

तौ देखा समझा जाई , कुछ गलती होई तो बतावा जाई ...

 [ हमका ना समझौ तुम ब्लागर , हम झूठै ब्लाग पे आयित है ।
आपन जियरा बहलावे का , हम कबो-कबो ब्लागियायित है ।
सोंचित है हमहूँ मन मा , कुछ दुसरेव के ब्लाग पर पढ़ी लेई ।
जे जे हमरेप किहिस टिप्पणी है , कुछ उनहुक टीका कई देई । 
पै का कही ससुर नौकरी का , हमै टैमवै नाहि मिलि पावत है ।
टैम मिळत है जब कबहू , तब सार नेटे नाहि चलि पावत है ।

हमका ना समझेव तुम कवित्त , हम सच मा झूठै-मूठे कवितायित है ।
आपन जियरा बहलावे का , हम कबो-कबो ब्लाग पै लिख जायित है ।
फिर लिख देयित है सब वहै पुँराना , जो अपने डायरी मा पायित है ।
अब तो ताजा कुछ लिखै का , ससुर मौके नाहि निकारि पायित है ।
कबहूँ सोंचित है हम करब का , जब कुल संचित कविता चुकि जाई ?
प्यासे लगे पै लंठन सा का , तुरंतै नवा कवित्त कुवाँ खोदा जाई ??

हमका ना समझैव तुम लेखक , हमहू झूठै बहाँटियायित है ।
अनाप सनाप लिखिकै बस , हम आपन जियरा बहलायित है ।
पूजा करी भले ना कबहूँ , टीका लम्बा सदा लगायित है ।
कोई भले लपेटे मा आवै ना , हम तो भौकाल बनायित है ।
सीधे सपाट हम बोलित है , लल्लो चप्पो नाहि कै पायित है ।
दुसरेक छोड़ो अपनेव कबहूँ , हम ना तेल लगाय पायित है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 3 जनवरी 2011

चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी..

मित्रो
नव-वर्ष २०११ की आप सभी को शुभ-कामनाये,
आशा करता हूँ कि यह वर्ष सभी को ज्यादा सुख , ज्यादा कमाई (सफ़ेद और काली दोनों मलाई ) का अवसर देगा ,
जो किन्ही भी कारणों से नही खा पा रहे हो सफ़ेद के संग काली मलाई , उन्हें अवश्य सर्वजन हित में संसद से गैर-भ्रष्टाचार  कानून पास कराकर उठा ले जाय सी.बी.आई.........!!

खैर मुद्दे पर आता हूँ...
वर्षों पहले जब कुछ काल-पात्र-स्थान मुझको दुखित कर रहे थे तो उन्ही परिस्थित जन्य कारणों से उपजे आवेग में उक्त पंक्तिया मेरी डायरी के पन्नो में संकलित हुयी थी , और उस समय की अपनी ज्यादा लपलपाती जिह्वा से मैंने इसका बहुत बार प्रसार कर काफी तारीफे भी बटोरी थीं (अपने जैसे ही प्रताणित जनो से), शायद इसी कारण से ये पंक्तिया बार बार मेरे मानस पटल छाई रहती हैं ।
पर जब मैंने ब्लॉग लिखने का फैसला किया तो सबसे पहले मुझे सलाह दिया गया कि ब्लॉग पर कुछ भी लिखना मगर चंद नन्द और घोड़ी या उसके जैसा और कुछ मत लिखना... और मैंने भी उक्त सलाह को गाँठ बांध कर रख ली थी... मगर देश-समाज-धर्म-राजनीति और रोजी-रोटी से जुड़े हालात को देखते देखते ना जाने कब और कैसे वो गाँठ कहीं चुपके से खुल गयी...
तो अंतत: आज आपके समक्ष ब्लाग पर भी प्रस्तुत है... "चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी जनाब"
वैसे आपको सजग कर दूँ कि "चूतिया" शब्द हमारे लखनऊ में सामान्यतया मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाता है  पर जिस जगह पर रहकर मै ब्लाग अपडेट कर रहा हूँ वहां के लोग इसका मनमाना संधि-विच्छेद कर के इसे गाली में गिनते है .. अब आप चाहे जो समझे एक चूतिया की घोड़ी के हाथो तीर कमान से निकल रहा है.......तो आप मेरे तीर पर अपनी नजरे इनायत कीजिये.....

चंद लोग चूतिया होते है ,
उनसे आगे चूतिया-नन्द भी होते है ,
और जब-जब ऐसे चंद चूतिया ,
या फिर उनके नन्द चूतिया ,
तलवे चाटकर या किस्मत से ,
भूले भटके सत्ता में होते है ,
तो फिर चारो तरफ जहाँ तक ,  
उनकी भूंखी-नंगी दृष्टि पसरती है ,
और फिर जिनकी किस्मत के ,
वो बन जाते है भाग्य विधाता ,
वो सब जन आखिर मजबूरन या ,
स्वयं अपनी इच्छा से जुटते है ,
जब जब उनके रथ के आगे ,
तो फिर हाल देखकर उनका ,
जग देता है उन्हें एक ख़िताब ,
है अगर चूतिया स्वामी तेरा ,
तो फिर क्यों ना हुए आप
चूतिया की घोड़ी जनाब ।।
 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी तक ।

ना ना .... जरा दो मिनट रुक जाइये  
पोस्ट पढ़े बिना सिर्फ टाइटिल देख कर यह मत सोंच लीजिये कि मैं किसी हालीवुड की  'XX' या 'XXX' श्रेणी की फिल्म का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहा हूँ या किसी भोजपुरिया फिल्म का शीर्षक अपने ब्लाग पर लगा दिया है।

वैसे भी मै वही कहता या लिखता हूँ जो मेरे दिल की बात होती है और दिल की बात कहते समय मै शब्दों पर कम अपने भावों पर ही ध्यान देता हूँ , तो जो दिल में बात उठती है वो लगभग वैसी की वैसी ही सामने प्रगट हो जाती है बिना सेंसर हुए ...
सुना है ना आपने " पर्दा नही जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या ...."

और आज तो मै "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" के मध्य देश और समाज में हुए विकास की भी बात करने जा रहा हूँ ....
अब आप भी सोच रहे होंगे कि "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" तक के जुमले का देश और समाज के विकास से क्या वास्ता....?
चलिए ज्यादा भूमिका बाँधे बिना पहले यह बताता हूँ कि आज अचानक यह विषय लेकर मै क्यों बैठ गया...

हुआ यह कि आज मै इतना त्रस्त हो गया कि मजबूरन यह पोस्ट लिखने के लिए बैठ गया....
और त्रस्त भी क्यों हुआ... हर पाँच मिनट पर मुन्नियों के बदनाम होने से ।

क्या ? आप सोच रहे है कि मै फिर शब्द जाल में उलझाने लगा...
नही नही ऐसा कदापि नही है...
वास्तव में यदि काल पात्र समय का सही से विवरण ना दिया जाय और बात को सन्दर्भ से अलग कर के एकतरफा देखा या प्रस्तुत किया जाय तो अर्थ का अनर्थ होने लगता है । और मै तो वैसे ही अनर्थकारी चर्चा छेड़ने जा रहा हूँ इसीलिए  प्रयास कर रहा हूँ कि इसमे अनर्थ की जगह अर्थ ही आप के समक्ष प्रस्तुत हो ..

आगे आपका विचार , उस पर मेरा नियंत्रण नही है ,

[ अरे जब लोकतंत्र के ज़माने के ऐ. राजा और स्थायी रोजगार की तलाश में लगे अंग्रेजो के ज़माने के दिग्गी राजा पर आज देश के सर्वश्रेष्ट शक्तिमान व्यक्तियों में शामिल सोनिया जी और मनमोहन जी का नियंत्रण नही है और जिसके जो मन में आ रहा है वो अनाप सनाप तरीके से बेधड़क  होकर कर रहा है या रात नशे में किसी पुरातन धटना से सम्बन्धित कोई सपना देख कर देश का लाभ-हानि विचारे बिना सुबह महज अपनी कब्जियत दूर करने के लिए और अपना तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने हेतु कुछ भी बेशर्मो की तरह बक दे रहा हो और वो दोनों चुपचाप तमाशबीन बने रह जाय वहां हमारा आपका एक दूसरे पर क्या नियंत्रण...? ]

तो फिर चलिए " लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक.... हुए देश और समाज के विकास" पर सीधी बात...
आज १५ दिसम्बर की रात थी , और हिन्दू धर्म के लिए इस माह की यह आखिरी रात थी जब भोले-भाले नवयुवको को बलि-वेदी पर चढ़ाया जा सकता हो मतलब विवाह-वेदी पर बैठाया जा सकता हो, भोले-भाले नवयुवको की बात इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि आजकल बेचारे भोले-भाले नवयुवक ही घर परिवार,धर्म और समाज के कहने (उकसाने) पर बेदी पर बैठते है वरना जो भोले-भाले नहीं है वो घर-परिवार और समाज को ठेंगा दिखाकर ठसके से "लिव-इन" जैसे सम्बन्ध को अपनाने लगे हैं (हमारे ज़माने में तो जीवन साथी पाने का यह तरीका केवल अमेरिका जैसे देशो में ही था और बेचारा अपना मुल्क तब बहुत पिछड़ा हुआ था.., यह मत सोंचिये की अगर तब सुविधा होती तो मै क्या करता, यहाँ सवाल सुविधा होने और ना होने का है ) ।

तो समाज में रहने के कारण मुझे भी आज तीन-चार शादियों में शामिल होने का निमंत्रण मिला था, कहीं निमंत्रण वर पक्ष से था तो कहीं कन्या पक्ष से ।
हालाँकि आज मै अपनी रोजी-रोजगार के कार्य से कुछ ज्यादा ही थका था , साथ ही कुछ एसिडिटी की समस्या भी शायद ठण्ड की वजह से पैदा हो गयी थी और कुछ मौसम भी सर्द था जिसके कारण कुछ भी खाने का मन भी नही था तो पहले सोचा कि कहीं ना जाऊं और बाद में ना आ पाने का कोई उचित कारण खोज कर क्षमा मांग लूँगा (क्योंकि मात्र थका होना,एसिडिटी होना और मौसम सर्द होना जैसे कुल तीन कारण किसी को ????-वेदी पर चढ़ाये जाने के अवसर पर ना शामिल होने हेतु शायद पर्याप्त नही है ) मगर फिर ख्याल आया कि कम से कम कन्या पक्ष के निमंत्रण का तो आदर किया ही जाना चाहिए तो मै तैयार हो गया ।

संयोग से कार्यालय की कार और उसका चालक भी अभी साथ ही था जिससे मुझे स्वयं से ज्यादा तकलीफ भी नही करनी थी बस अपना भार उस पर ( कार पर भौतिक रूप से और उसके चालक पर मानसिक रूप से ) लाद देना था और एक जगह से दूसरी जगह उपस्थिति दर्ज कराकर वापस आ जाना था । और संयोग से मेरे एक अजीज बड़े भाई साहबान  भी साथ ही थे तो सफर में बात करने वाला भी मिल गया,फिर क्या था चल पड़े सवार और सवारी।

यात्रा की शुरुवात करते समय तक जो दुश्वारियां गिनाई वो तो थी ही अब गोरखपुर जैसे पुराने शहर की असली समस्या सामने आने लगी कि,  हर सड़क-हर गली और शायद पूरा शहर आज बारात और उसके बारातियों से जाम है , तो कार से किया जाने वाला सफ़र भी पैदल यात्रा के समान ही था और फिर जैसे ही एक बारात या मैरज-हॉउस से आगे बढ़े वैसे ही फिर अगला मिल जाय.... 

आखिर कुछ खींझ कर और कुछ अपनी बोरियत मिटाने हेतु मैंने भाई साहेब को छेड़ा "देख रहे है भाई साहेब आज भाई-बंधू और समाज के लोग कितने स्वार्थी और दूसरों के भावी दुःख में खुश होने वाले हो गए है कि बेदी पर चढ़ने जाते हुए एक मासूम के भावी परिणाम को सोच कर मारे ख़ुशी के नाच- नाच कर "चांस पे डांस" का अवसर नही खोना चाहते है ।
भाई साहेब ने भी मेरे बे-सिर पैर के दर्शन पर बजे कोई सीधी प्रतिक्रिया देने के अपने चुटीले अंदाज में एक नया ही राग छेड़ दिया कि, ध्यान दो ..! आजकल कोई बारात बिना "यह देश है बीर जवानो का,अलबेलों का,मस्तानो का..... यहाँ  चौड़ी छाती बीरो की... इस देश का यारों क्या कहना ..." जैसा जोशीला गाना सुने बिना जोश में आती ही नही है ? और कम से कम एक बार यह गाना हर बारात में बजता जरुर है ।

मै इससे पहले इसपर अपनी कोई प्रतिक्रिया देता, मुझे ध्यान आया कि पिछले पौन घंटे से हर पाँच मिनट पर जो गाना सबसे ज्यादा, बार-बार बज रहा है वो तो "मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए" है । और यह ध्यान आते ही मेरे मन में ख्याल आया कि पहले तो बचपन में मै जब किसी शादी-बारात में जाता था तो ज्यादातर लोग "बारात में नाचने गाने वाली नचनियों की पार्टी जिसमे शामिल महिलाओं को उस ज़माने में 'पतुरिया' कहा जाता था" को ले जाते थे और फिर पूरी रात नाच गाना चलता रहता था, वर और कन्या पक्ष दोनों तरफ के लोग खा-पी कर शुरू से अंत तक नाच गाना देख-सुन कर आनंदित होते रहते थे और उस ज़माने में वो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त मर्यादित आचरण ही था हाँ नचनियों को ना लाना जरुर वर पक्ष को अपमानजनक स्थित में पहुंचा देता था ....

तो उस ज़माने कुछ प्रचलित गानों में में जो गाना सबसे ज्यादा प्रचलित था वो "लौंडा बदनाम हुवा नसीबन तेरे लिए" था क्योंकि वो आज भी मुझे याद है, और मुझे यह भी याद है की बचपन में मैंने किसी से इस गाने का अर्थ जब पूंछा था तो जबाब में शायद डांट ही सुनने को मिला था, गाने का अर्थ तो समय ने समझाया ।

तो दोनों गानों के बोल एक साथ जेहन में आते ही एकाएक मुझे ख्याल आया कि मेरे बचपन से लेकर अब तक वास्तव में देश और समाज ने क्या क्या प्रगति कर ली है और क्या क्या परिवर्तन हो चुके हैं ? मैंने भाई साहेब से कहा देखिये पहले की शादी-बारात और आज की शादी-बारात में क्या क्या अंतर आ गया है ...

पहली प्रगति:- पहले लौंडा बदनाम होता था और अब मुन्नी बदनाम होने लगी है ....  अर्थात पुरुष वर्चस्व समाप्त हो गया , महिला वर्ग की भी खुले आम भागेदारी सामने आने लगी है ।

दूसरी प्रगति:- 'सट्टा बंधा कर' अनावश्यक 'पतुरियों' पर पैसा खर्च कर एक-दो नाचने वालियों की जगह समाज में आये ज्यादा खुलेपन,आत्मनिर्भरता और सहयोग की भावना  के कारण अब घर-परिवार, दोस्तों के परिवार और मोहल्ले से बारात में शामिल होने हेतु सज-धज कर आने वाली भांति-भांति के उम्र की महिलाएं ही बारात में नाच कर बराती,घराती और मार्ग पर चलने वाले यात्रियों के मनोरंजन की जिम्मेदारी अपने कंधो (मतलब अपने कमर पर) ले चुकी हैं ,जिसका एक सामाजिक प्रभाव यह हुआ है कि पतुरिया जैसा भौड़ा शब्द भी कहीं ना कही अपनी मान्यता खो चुका है, और उस विरादरी को अपनी रोजी रोटी हेतु भले ही लाले पड़ गए हों पर वर पक्ष का खर्चा कम हो गया है क्योंकि नाच गाने हेतु किराये के नचनियों पर निर्भरता समाप्त हो गयी है । इस प्रगति से कृपया महिलाएं नाराज ना हों क्योंकि पुरुष तो पहले भी जन्मजात नचनिया था आज भी है ।

तीसरी प्रगति :- पहले प्राय: बेचारे घराती अपना पेट पकडे  और मुह बाँधे चुप-चाप तब तक इंतिजार करते थे जब तक बाराती ना डकार ले लें , मगर अब ज्यादातर बारात आने के पहले ही घराती डकारता है फिर जूठे-कूठे मेज , स्टाल पर बेचारा बराती भोजन करता है अर्थात घरातियों पर बारातियों की श्रेष्ठता लगभग समाप्त हो गयी है

चौथी प्रगति :- पहले बिकाऊ दुल्हे के पिता द्वारा दहेज़ मांगे जाने पर और उसे उचित मूल्य ना चुका पाने पर ना केवल कन्या का पिता वरन कन्या पक्ष के अन्य सम्मानितगण भी वर पक्ष को रिझाने-मानाने के लिए अपना शीश नवाने लगते थे, अपनी पगड़ी उतरने लगते थे, मगर अब ज्यादा मोल भाव करने पर दुल्हे, उसके पिता, भाई-बंधू और लगे हाथ बारात में शामिल बे-सहारा बाराती ( बाराती सदैव बेसहारा ही होते है.. उनका मोल केवल तब तक होता है जब तक बारात दुल्हन के घर ना पहुँच जाय, फिर सड़क के कुत्ते और लौटे बाराती में कोई अंतर नही रह जाता) भी दो पल में लतिया-जुतिया दिये जा रहे हैं , और जो मौके से भाग नहीं पाते उनका आगे का सत्कार सरकारी ससुराल में होने लगता है , तो दहेज़ की समस्या का भी कुछ-कुछ निदान हो रहा है

पाँचवी प्रगति :- जैसा की पहले ही कह चुका हूँ कि जो लोग भोले-भाले नही है, उनको इन सब बन्धनों से दूर कहीं शांति और ज्यादा खुलेपन से अभी तो भारत के मेट्रो शहरों में ही लागू लिव इन रिलेशन को अपना लेने की सुविधा मिलने लगी है, और आगे उम्मीद है कि जल्द ही पूरे देश में इसकी मान्यता मिल ही जाएगी ।

और सबसे अंत में
छठवीं प्रगति :- अब तो भारत में भी शादी करने और हनीमून मनाने हेतु एक कन्या और एक युवक के जोड़े के होने की बाध्यता समाप्त हो रही है , राजधानी के एक अदालत के मध्यम से कुछ माह पहले कानूनन अप्रत्यक्ष  रूप से सहमति देश का विधान दे ही चुका है , आगे भारत के भावी कर्णधार पूत और कुछ समाज सेवी पेट दर्द से परेशान एन.जी.ओ. उसे नवीन दिशा और मंजिल दे ही देंगे, तो पूरब और पश्चिम का अधिकांश अंतर समाप्त हो गया है और जो शेष रह गया है वो भी जल्दी ही समाप्त हो जायेगा और फिर पूरब पश्चिम से निश्चित ही हर मामले में आगे होगा

तो चलिए बात समाप्त करता हूँ , आगे मुझसे सहमत होना ना होना आपकी मर्जी ... वैसे भी मुझे इससे कभी फर्क नही ही पड़ता है.. क्योंकि मेरे कहने के पूर्व ही हम जैसो के लिए ओशो ने कह दिया था " मुझे सही समझे जाने की कोई जिज्ञासा नहीं। यदि कोई सही नहीं समझता तो यह उसकी समस्या है,उसका दुख है। मैं अपनी नींद नहीं खराब करूंगा "

अब रात भी बहुत ज्यादा हो गयी है, साथ ही कई शादियों में शामिल होने के बाद भी मुझे भूंखे पेट (एसिडिटी के कारण) सोना भी है ।..... तो नमस्कार , शुभ रात्रि

आपका अपना (यही लिखा जाता है कूटनीतिक तौर पर जबरदस्ती अपनापन दिखने के लिए)
विवेक (मिश्र..अनंत)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

जो गिद्ध हैं प्रसिद्ध हैं, हम इन्सान हैं इसलिये परेशान हैं।

दोस्तों,
कुछ साल पहले की बात है, मै कुछ परेशान था, कुछ हैरान था, काम मै करता हूँ प्रसिद्ध कोई और पा जाता है। और फिर एक दिन मुझे मेरे गुरु ने बताया :-

जो गिद्ध हैं प्रसिद्ध हैं, हम इन्सान हैं इसलिये परेशान हैं"

उक्त गिद्ध ज्ञान को जान कर वास्तव में मेरी सभी चिंता परेशानी तिरोहित हो गयी और फिर मैंने तत्काल जगत कल्याण हेतु, गिद्ध ज्ञान साहित्य में इजाफा करने एवं माननीय गिद्धजनो से अपने राजनय सम्बन्ध मधुर करने हेतु कुछ लिखने का प्रयास किया था उसे पुन: आप लोगों के सामने इस आशय से प्रस्तुत कर रहा हूँ-

"भले ही एस.एम.कृष्णा एवं शाह महमूद कुरैशी आज तक 'भारत' और 'ना-पाक'के मध्य बेहतर राजनय सम्बन्ध बना पाने में अ-सफल रहे हो" पर शायद इससे हमारे और आपके राजनय सम्बन्ध बेहतर हो सकें -

जब जान रहे हो तुम जग में , गिद्ध ही होता सदा प्रसिद्ध ।
पूंछ रहे हो फिर क्यों मुझसे, क्यों सबसे ज्यादा गिद्ध प्रसिद्ध ?

लो सुनो आज बतलाता हूँ , मै तुमको राज सुनाता हूँ।
है गिद्ध की दृष्टि बहुत प्रबल , वह मौका सदा ताकता है।

मौका मिलते ही सबको , निश्चल मन से खा जाता है ।
बैर भाव या मैत्री जैसे , मन में भाव नहीं वो लाता है ।

उसके लिए जगत के सारे, प्राणी सब एक समान हैं ।
उसके लिए दुखों के क्षण भी, सुख के ठीक समान हैं।

लाभ अगर दिख जाय उसे, वह आगे सबसे आ जाता है ।
मौका मिलते ही वह पूरा, कूरा(हिस्सा) चट कर जाता है ।

बाट जोहने वालो को वह , खाली ठेंगा दिखलाता है ।
पता निशां भी पीछे अपने , नहीं छोड़ कर जाता है ।

अंतर्यामी होता हैं वह , और तीनो कालों का वो स्वामी ।
भूत भविष्य और वर्तमान का , मानव केवल अनुगामी ।

पहले भी बतलाया था , फिर से गिद्ध राग सुनाता हूँ ।
देकर ज्ञान सभी को यूँ ही , जग में प्रसिद्ध करवाता हूँ ।

सुनकर गिद्ध ज्ञान मानव , मुक्त दुखों से हो जायेगा ।
पुनर्जन्म लिए बिना जब , मानव-तन में गिद्ध समाएगा ।
जय हो बाबा गिद्धनाथ की............

गिद्ध साहित्य का प्रचार प्रसार पुन: आगे फिर होगा..
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

रविवार, 19 सितंबर 2010

ताश के गुलाम

ताश के खिलाडियों को समर्पित......

सुनो ताश के सभी गुलामों , लाओ जाकर ताश के इक्के ।
बेगम/रानी के संग जाने को , तैयार हो रहे ताश के बदिश/राजे ।
महिफिल आज जमेगी देखो , जाओ सजाओ चिड़ी का बाग ।
मौज करेंगे हम सब आज , चलो जलाएं मिलकर आग ।
ईट का बदिश/राजा कानां है , ये राज छुपाये तुम रखना ।
हुकुम की बेगम/रानी सायानी है ,  ये बात ना खुलकर तुम कहना ।
नहले पर जब दहला गिरे , इक्के से देना तुम दाब ।
तुरुप/रंग की बाजी चलकर फिर , करना सबसे तुम आदाब ।
रंग में भंग अगर कोई डाले , बच कर ना वो जाने पाये ।
कोई चाहे जितना जोर लगाये , दहला ना ले जाने पाये ।
रोंक सके जो ट्रंप/तुरुप का इक्का , पहनायेगा तुमको ताज ।
बावन पत्ते ताश के होते , लेकिन वो सबका सरताज ।
बस ध्यान रहे केवल इतना , जोर ना उसका घटने पाये ।
उसके पीछे चलने वाली , चाल ना कोई कटने पाये ।
गिरे कौन से पत्ते अबतक , तुमको रखना होगा याद ।
हाथ में कौन से पत्ते किसके , जानोगे तुम उसके बाद ।
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शनिवार, 18 सितंबर 2010

अथ श्री//मती अफवाह ...


क्या कहना अफवाहों का , वो बेसिर पैर की होती है ।
कहाँ से उनका जन्म हुआ , ये बात छिपी ही रहती है ।
जन-मानस है संचरण मार्ग , और वायु वेग से चलती हैं ।
अल्प काल में सुरसा सा , सौ योजन का मुख करती हैं ।
अजर अमर अविनाशी होकर , झूंठ को सच में बदलतीं हैं ।
इनकी माया के आगे , दाल नहीं सच की गलती है ।
है शीश नहीं जिसे काट सकें , ना पैर हैं जिसको बांध सके ।
स्थूल नहीं काया इनकी , जिसको कैद में डाल सकें ।

विकसित हो मानव कितना , ना इसकी गति को थाम सके ।
हो नगर मोहल्ला चाहे गाँव , अफवाह का जन्म ना टाल सके ।
जितना ही प्रतिकार करो , उतनी यह बलवान बने ।
कार्य सिद्ध हो जाने पर , स्वयं से अंतर्धान बने ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

एतिहासिक घृणा

बचपन की कहानियों में , और जंतु बिज्ञान की किताबों में ।
इस बात का जिक्र होता है , आदमी का जानवरों से पुराना रिश्ता है ।
थे आदम के पुरखे जो , चार पैरों पर चलते थे ।
नोंच कर वो औरों को , अपना पेट भरते थे ।
घूमते थे नग्न वो , था नहीं रिश्ता कोई ।
मनुष्य को मनुष्य ही , था नहीं जँचता कोई ।


सदियों पहले की बात है , जानवर बन गया आदमी ।
दो पैरों पर चलने लगा , शिकार हाथ से करने लगा ।
जन्म शर्म को उसने दिया , वस्त्रों का अविष्कार किया ।
अपना अधिकार जताने को , परिवार का उसने रूप दिया ।
पूंछ छिपाकर अन्दर की , दांत घटाकर छोटा किया ।
मगर मिटा ना पाया वो , औरों के प्रति अपनी घृणा ।

गुजरी हुयी सदियों में , उसने बहुत कुछ सीखा है ।
कैसे सजाकर प्लेट में , माँस को चिचोड़ा जाता है ।
कैसे दिन-दहाड़े राह में , अस्मत को लूटा जाता है ।
कैसे पहनकर वस्त्रो को , नग्न दिखा जाता है ।
कैसे झुका कर घुटनों पर , औरों को जीता जाता है ।
कैसे आधुनिक रूपों में , घृणा छिपाया जाता है ।

अपनी घृणा छिपाने को , उसने तरकीबे खोजी बहुत ।
कपडे सुन्दर बनवाये , आभूषण तन पर सजवाये ।
बाल सवाँरे उसने अपने , धर्म चलाये उसने कितने ।
मानवता-भाईचारे का , स्वांग रचाया सबसे मिल कर ।
लेकिन अपने अंदर की , घृणा मिटा ना पाया वो ।
घृणा की आग में तपकर , पत्थर दिल बन पाया वो ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 23 अगस्त 2010

क्या खाएं ? , कैसे खाएं ? , कहो तो भूंखे ही मर जाये ।

क्या खाएं ? , कैसे खाएं ? , कहो तो भूंखे ही मर जाये ।
पैसा सबके हाथ में ,  शुद्ध भोज्य नहीं है पास में  ।
गेंहू , चावल दाल सभी , फूल रहे हैं उर्वरको  से ।
उपर से उसमे भी मिलावट , नहीं कहीं है कोई राहत ।
दूध में पानी और पावडर , मिला रहे थे वर्षो से ।
अब तो उसमे मिला रहे है ,  यूरिया, सर्फ और स्टार्च ।
पनीर कहाँ अब असली है?, दही भी मिलती नकली है ।
बना रहे है आइसक्रीम , वॉशिंग पाउडर, सैकरीन से ।
पहले घी में मिलता था , चर्बी मिला डालडा ही ।
अब तो घी को बना रहे , मुर्दों की हड्डी से हम ।
चीनी में मिला चॉक पाउडर , मिर्चे में है ईंट पाउडर ।
काली मिर्च है बीज पपीता , धनिये में पशुवों की लीद ।
हींग में मिटटी मिला रहे ,  हल्दी में जहरीला रंग ।
काफी में है मिला चिकोरी , चाय है पहले वाली उबली ।
नामक का मान रखेगा कौन, खिला रहे है व्हाइट पाउडर ।
है तिल का तेल पुरानी बात , अब उसमे सब नकली बात ।
कद्दू , कोहड़ा , लौकी सब , फूल रहे इंजेक्शन से ।
पल में छोटी सी बतिया , एक साथ की होती है ।
केला,आम,अनार,पपीता , पका रहे है जहर से हम ।
रंग में रंगी हुयी सब्जियां , बिकती है बाजार में ।
नकली कत्था और सुपाड़ी , है पान की दुकान में ।
जहरीली स्प्रिट है बिकती , मदिरा के नाम पे ।
कैचप,सास, और जैम भी , बनता नकली फैक्ट्रियों में ।
हर असली में मिला है नकली, आज यहाँ बाजार में ।
भरता पेट नहीं मानव का , लाभ कमाने के लोभ से ।
क्या खाएं?, कैसे खाएं ?, कहो तो भूंखे ही मर जाये ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

जल में रहकर मगर से बैर ?

मित्रों      
आप सभी ने एक कहावत बहुत बार सुनी होगी :-
 
"जल में रहकर मगर से बैर"
अर्थात
जल में रहने पर मगर से बैर मोल नहीं लिया जा सकता है ।
क्यों ?
अरे आप नहीं जानते क्या ?
मगर जल का सबसे ताकतवर प्राणी होता है , उसके आगे जल में हाथी भी कमजोर पड़ जाता है ( वैसे सार्क और व्हेल और भी ताकतवर होती है मगर वो नदी , नालों में नहीं पाई जाती है , जिसके आसपास मनुष्य ही अपने दैनिक कार्य हेतु ज्यादा घूमता है) ।

तो कहते है कि :-  एक बार तो स्वं भगवान विष्णु को अपने प्रिय भक्त "गजराज" को बचाने की आकस्मिक आवश्यकता के तहत नंगे पाँव ही दौड़ कर आना पड़ा था तब जाकर वो मगर से बच पाया था ।

तो अब तो आप समझ ही गए होंगे ।

क्या कहा ?
ये सब तो आप पहले से जानते है !
तो मैंने कब कहा कि मै अब तक कुछ नया बता रहा था ।

जो नया है, वो अब आने जा रहा है, विशुद्ध रूप से मेरी शोध।

तो दिल थम कर बैठे ..!
क्षमा कीजियेगा मेरे कहने का अर्थ है आँख फाड़ कर पढ़े  और मेरे प्रवचनों को अपने दिल, दिमाग में बिठाकर अपने अंतर्मन से गुने ...........   

" जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "


अब जो मेरी जीव्हा  से निकल गया उसे खरा भी साबित करना होगा वर्ना कौन मानेगा ..?
आजकल तो वैसे भी मुफ्त की सलाह पर कोई ध्यान नहीं देता है , भले ही वो कितने ही काम की क्यों ना हो ।
तो चलिए अपने कथन को विसुद्ध तार्किक रूप से किसी निर्मेय , प्रमेय की तरह साबित करता हूँ  :-

कथन :- " जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "
अर्थ    :- जल में सुरक्षित रहना हो तो मगर से बैर करके रहो ।
कारण :- मगर अपनी आदत से मजबूर है । अगर आप उससे दोस्ती भी कर लो या नहीं करके गुटनिरपेक्षता का राग अलापो ,  तो भी वो ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है क्योंकि जिस दिन उसे कहीं और से कुछ खाने को नहीं मिलेगा वो घास खाकर या केवल जल पीकर व्रत  रहने वाला नहीं है । उस समय उसके सबसे नजदीक (दोस्ती की है तो),  या आसपास (अगर गुटनिरपेक्ष  है तो) जल में कौन होगा ?  आप !
और आप अनजाने में, प्यार मोहब्बत में , गुटनिरपेक्षता में या कहें कि मगर के प्रति अपने गफलत में होंगे।
तो फिर समझ लीजिये कि आप का काम तमाम !!!
पढ़ा है ना आपने बचपन में "मगर और बन्दर वाली कहानी" जिसमें मगर की सह्धर्मनी  जिद कर बैठती है कि आपके मित्र का कलेजा बहुत मीठा है , आज वो उसी की दावत करेगी और मजबूरन ही सही मगर बन्दर को मारने के लिए उसे धोखे से अपने घर ले आता है । (वैसे यहाँ मै मगरानी  को दोष नहीं दूंगा क्योकि ज्यादातर स्त्रियाँ स्व्भावगत रूप से या किसी अनजाने जलन के कारण अपने पतियों को उनके मित्रों से किसी ना किसी बहाने अलग करना ही चाहती है।..इस पर फिर कभी अपनी शोध प्रकाशित करूँगा )
और
अगर आप उससे बैर करके रहेंगे अर्थात सदा उससको अपना दुश्मन मान कर रहेंगे तो खुदा कसम दुनिया जानती है कि लोग अपने दुश्मनों को ज्यादा गहराई से जानते है मुकाबिल अपने  दोस्तों के ।
तो उस हालत में आप उससे सोते - जागते सदैव सावधान रहेंगे और हो सकता है कि आप अपने सामर्थ भर उससे निपटने का इन्तिजाम भी कर लें। इस तरह शायद आप ज्यादा देर सुरक्षित रह सकें ।
निष्कर्ष :-  यदि कोई यह सोंचता है कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं करना चाहिए तो  उसे जल को छोड़ कर कहीं और निवास-प्रवास करना चाहिए वर्ना आपकी जान को ज्यादा जोखिम होगा ।
[ इत-श्री ]
नोट :- वैसे यह बहुत ही गूढ़ और गुप्त सिद्धांत था जिसको सभी के सामने तो नहीं प्रकट करना चाहता था मगर जन-कल्याण हेतु मुझे त्याग करना ही पड़ा ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG ।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

नियम...वो, जो हम कहे

मित्रों,
      मैंने सुना है उदारीकरण के पहले जब ताकत कुछ लोगों की मुठ्ठियों में कैद थी और लाल-फीताशाही का जमाना था तो वही होता था जो कुछ गिने चुने लोग चाहते थे, फिर उदारीकरण का दौर और "कार्पोरेट कल्चर" का जमाना आया मगर क्या लाल-फीताशाही समाप्त हो गयी ?, हाँ कुछ हद तक मगर केवल उपभोक्ताओं के लिए , मगर उपभोक्ताओं की सेवा में तत्पर बेचारे सेवकों के लिए भी क्या यह सत्य है ? तो सुने .........

ये जरुरी नहीं , तुम सर झुकाकर चलो ।
केवल मेरी सुनो , ना कुछ अपनी  करो ।
मगर क्या करोगे? ,  है   व्यवस्था   यही ।
इसे  शासन   कहो ,   या   कहो   मज़बूरी ।

जो कहा मैंने तुमसे, बस वही है नियम ।
मुझसे ऊपर भी चलता , यही है नियम ।
जो कुछ लिखा है, काले अक्षरो में कहीं ।
हकीकत में होता यारों, वो नहीं है कहीं ।
लिखा है नियम सब ,   दिखावे के लिए ।
जैसे हाथी के दो दांत, सजावट के लिए ।
यूँ ही चलती है व्यवस्था , सदा से यहाँ ।
नींचे से ऊपर  कहीं भी ,  है राहत कहाँ ?
तुम कहो चाहे बनिया की, दुकान इसको ।
या कहो घर की खेती , हो हैरान इसको ।
तुमको करना पड़ेगा ,   हम जो भी कहे ।
तुमको सहना पड़ेगा ,   हम जो भी करें ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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