हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

वाह क्या हुनर है......?

वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?
पोर-पोर उँगलियों के भरे है अनुभव से ।
और क्यों ना हों ऐसा जब वर्षों से ,
आपको महारथ है हवाई किले बनाने में ।

पहले भी बहुत से फर्जी रजवाड़ों के , बनाये थे ठेके पे किले आपने हवावों के ।
आज भी अपने नेता और युवराज से  , मिले हैं ठेके हवाई किले बनाने के ।
आपके बनाये किले सब अनोखे हैं , उनमे हवा के ईंटो की हवा से चुनाई है ।
हवा के दरवाजे पर हवा की सफाई है , हवा के कमरों में हवा की रंगाई है ।

कोई भी चले हवा , किले को ना छु पाई है ।
अंदर और बाहर की हवा , आपस में ना मिल पाई है ।
भेद सब हवा के , हवा ही समेटे है ।
हवाई किलो में देखो , हवा के ही बेटे हैं ।
निश्चित ही किसी दिन आपको , निशाने पाक भी मिल जायेगा ।
आपके मकबरे पर एक ना एक दिन , लादेन भी फातिया पढने आएगा ।
महाराज जयचंद जैसा ही , आदर से आपका नाम जग में लिया जायेगा ।
अफ़सोस मगर तब तक आप जैसों के कारण , यह देश कई टुकड़ों में बँट जायेगा  ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

जय जवान-जय किसान

जय जवान-जय किसान , कभी नारा था ये महान ।
लाल बहादुर 'लाल' था ,  तब भारत देश का प्रधान ।
जीवन भर उसे प्यारा था , अपना भारत देश महान ।
भूल गए हम दोनों को , रखने में अपनो का ध्यान ।

जय जवान-जय किसान , अब के नेता नहीं किसान ।
कफन बेंचते सीमा पर , और फूँक रहे हैं खलिहान ।
केवल भाषण में खुलकर , करते तेरा वो गुणगान ।
चंद कागजी टुकड़ों पर , तुम्हे बेंचते वह बेईमान ।
जय जवान - जय किसान , हैवान हो गया है इन्सान ।
वादों की फसलों को देखो , खून से सींचता है शैतान ।
है एक प्रधान एक निशान , पर खंड खंड हैं यहाँ विधान ।
फिर भी शान से कहता नेता , मेरा भारत देश महान ।

जय जवान-जय किसान , जो तेरा गाते प्रशस्तिगान ।
वो खून चूसने वाले ही , कहलातें है आज महान ।
भूँखा नंगा रखकर तुझको , वो होतें है मालामाल ।
तेरे खून पसीने के बल , शासन करते चंद दलाल ।

जय जवान-जय किसान , तुम ना बेंचना अपना ईमान ।
तुम दोनों के कंधो पर , टिका देश का भविष्य महान ।
तेरे श्रम के बल पर ही , भारत है अब भी बलवान ।
आवाहन तेरा करते हैं , भारत मा के 'लाल' महान ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रुपये का स्वरुप

मित्रों

लीजिये आपके अवलोकन हेतु प्रस्तुत है नए पहचान चिन्ह के साथ जारी होने वाले रुपये का स्वरुप :-

रविवार, 15 अगस्त 2010

किसका होता जयघोष यहाँ ?

किसका होता जयघोष यहाँ , जिससे गुंजित है दशो दिशा ?
किसके स्वागत में फूलों से , पटी  हुयी है समस्त धारा ?
किसकी अगवानी करने को , कतार बद्ध है लोग यहाँ ?
किसकी आरती करने को , व्याकुल हैं सब लोग यहाँ ?
दशों दिशाओं कहो जरा , है कौन बीर जो वहां खड़ा ?
क्या विजयी होकर आता है , या रण-भूमि को जाता है ?

छोड़ो तुम जयघोष करो , मै स्वयं  ही देखता हूँ जाकर ।
निश्चय ही भारत मां का वो , होगा कोई बीर सपूत ।
हर लाल प्रतिज्ञाबद्ध यहाँ , माता की शान बढ़ाने को ।
अपना शीश कटाकर भी , माता की आन बचाने को ।
फिर चाहे आता होकर विजित, या जाता हो रण करने को ।
चरण-धूलि पाने को उसकी , है आतुर  आज मेरा मन भी ।






© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

धरती का बंटवारा

["संगीनों के साये में सन्नाटा" ,  यही कहता है आज-कल का अखबार "कश्मीर" के लिए]
तो हम कहना चाहते है इस देश में छुपे 'कुछ दोगले नापाक लोगों' के आका 'पाकिस्तान' से

'ईश्वर'   ने   इस   दुनियां   में ,   'धरती'    एक    बनायीं     थी ।
जब तुमने उसको बाँट लिया, फिर उसका दोष कहाँ है भाई ।

फिर भी  तुमको  चैन  नहीं ,   हक़  छीन   रहे   तुम   औरों  का ।
अपने  घर  में अँधियारा है  पर , चिंता  सता रही है गैरों का ।

प्यार से मांगो आकर अगर ,  हम  अपना  सर्वस   लुटा  देंगे ।
ताकत  से  कुछ छीनोगे तो  ,   घुटनों  पर  तुमको   ला   देंगे ।

शांति  हमें  प्यारी  है  लेकिन ,  रण   से   ना   हम   कभी  डरेंगे ।
अपने   जान   की   बाजी लगा  ,   हम   जान  तुम्हारी  हर  लेंगे ।

बेहतर है तुम  दूर  रहो ,  अपने 'घटिया नापाक इरादों' से ।
'भाईचारे'   को  दफनाकर  तुम ,  ना ललकारो रण भूमि में ।

हमको    है   'संतुष्टि'  सदा  ,  जो   हिस्सा   हमको  तुमने  दिया ।
तुमको    अभी   सीखना  है ,   'बँटवारे'  ने  क्या   सिला  दिया ।

हमें    नहीं   चाहिए   ऐसा   कुछ ,   जो   तेरे   हिस्से   आया   है ।
हमने चाहा   था   कभी नहीं , ये बटवारा तुमने करवाया है ।

हम 'भारत माँ'  के बेटे है , यह जननी सिंह जन्मती है ।
वह कोख अभागी होगी जो , तुम सा सियार जन्मती है ।

तुम   दूर   रहो   इस  धरती   से ,  हम  इसकी पूजा करते  है ।
अपनी  जान निछावर कर , हम इसके मान को रखते है ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 14 अगस्त 2010

क्षमा करो 'आजाद' हमें

15 अगस्त की पूर्व संध्या पर आजादी के दीवानों को समर्पित

क्षमा करो 'आजाद' हमें , आजादी हमने अपनी बेंची ।
दुनिया के रखवालों से ,   हमने अपनी शांति खरीदी ।

भुला दिया पौरुष अपना , बाट जोहते औरों की ।
जिनसे तुमने संघर्ष किया , हम गले लगाते उनको ही ।

आन देश की बेंच कर हमने , शान बढाई है तन की ।
शान देश की बेंच कर हमने , जान बचाई है अपनी ।

भूल गए हम स्वप्नों को , अंतिम समय जो तुमने देखे ।
मिटा दिये सब आदर्शों को , जो तुमने हमको थे भेजे ।

वैश्वीकरण का युग आया , सत्ता में घुस गए दलाल ।
अपनों के सीनों पार ताने ,  संगीने  अपने ही लाल।

परिभाषा भले 'आजाद' हो , अब कहाँ देश आजाद है ?
स्वाधीन था जो पहले , सब पराधीन अब आज है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

दिल्ली चलो

दिल्ली चलो, दिल्ली चलो, दिल्ली अभी भी दूर है ।
जो मिली "आजादी" हमको , वो बड़ी मजबूर है ।
अब   भी   चलता है यहाँ , शासन  किसी और का ।
नेता हमारे  हैं   मगर ,  फैसला किसी   और का ।

रोज लहराते 'तिरंगा' ,  पर नहीं बनता निशां ।
हिंद को ही भूलकर , 'जै-हिंद' हम कहते यहाँ ।
आपस में ही लड़ रहे , फिर बाँटने को देश हम ।
क्या करे नेताओं को ,  रह गया है  काम कम ।
हों चुकी है हरित-क्रांति , सोना उगलते खेत है ।
फिर भी देखो भूँख से, मर रही जनता यहाँ की ।
कहीं उफनती है नदी ,   है कहीं पड़ा सूखा पड़ा ।
कौन लेगा देश हित मे , कब कोई फैसला कड़ा ।
दिल्ली चलो,दिल्ली चलो दिल्ली अभी भी दूर है ।
नारा दिया था जिसने हमको, वो कहीं अब दूर है।
माँगा था उसने हमसे तब, खून की कुछ चंद बूंदें।
पर बहाया उसको हमने ,  घर के आंगन में कहीं।
है यहाँ 'हिन्दू' कोई , कोई 'मुस्लिम' है यहाँ ।
सिख हैं कुछ लोग तो , 'ईसाई' भी रहते यहाँ ।
क्या जन्म लेगा देश में , कोई 'भारतीय' कभी?
या सोवियत-संघ  की तरह, देश बिखरेगा अभी ?

कब तलक सीमाओं पर, अपमान हम सहते रहेंगे।
कब तलक इस देश में, यूँ भष्टाचारी पलते रहेंगे ।
रोज अगणित ढल रही,टकसाल में मुद्रा यहाँ की।
फिर भी देखो चल रही,बाजार में मुद्रा कहाँ की ?
अफसोस है अफ़सोस है , देश फिर भी खामोश है।
मर गए है   लोग    सब ,  या हैं नशे में धुत पड़े ?
दिल्ली चलो, दिल्ली चलो, दिल्ली अभी भी दूर है।
जो मिली आजादी हमको ,   वो  बड़ी मजबूर है ।

आवो चल कर फिर करें  ,  हम इकठ्ठा  खून को ।
खेतो में फिर से उगायें   ,  क्रांति के नव-सूत्र को ।
झिझकोर कर हम जगाएं,फिर देश के नौजवाँ को।
क्रांति की घुट्टी पिलाये , देश के सब नौनिहाँ को।
माँगती है जन्मभूमि , फिर कुछ नए बलिदान को।
आवो मिलकर हम सजाये , फिर नए संग्राम  को ।
आगे बढ़कर हम बदल दें ,  विश्व के भूगोल को ।
और ढहा दे दासता के   , शेष बचे अवशेष को ।

पर ना देखो चूक जाना  , तुम कहीं  फिर भूल से ।
देश को रखना बचाकर , अब भेड़ियों के झुण्ड से ।
पहले भी जीती थी हमने , अपने जाँ पर बाजियां ।
अफ़सोस हमने सौंप दिया, कुछ गीधड़ो को हस्तियां।
हमने समझा था जिन्हें , ये देश के है पहरूवा ।
अब वतन आगे बढेगा ,    अब वतन आजाद है ।
रोंक पाये वो ना अपने  ,   अंतर्मन के लोभ को ।
देश को गिरवी रखा , बेंच कर स्वाभिमान को ।

तो चलो हम प्राण करें , अब वतन आजाद होगा ।
कौमें जो रहती यहाँ, उनको वतन पर नाज होगा ।
देश में मुद्रा हमारी और, फैसले सब अपने होंगे ।
फिर ना कोई संघर्ष होगा, ना कोई बलिदान होगा।
                                        
       (भारत को पुन: नवीन क्रांति की जरुरत है...........क्या आप तैयार हैं निडरता के साथ..? )
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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