हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

आखिर कब तक,,

बाँटते-बाँटते खंडित हो गया, खंड खंड में अखंड भारत ।
अब भी क्या तुम चाह रहे, और खंडित हो जाए भारत ?
हम कब कहते कोई धर्म सम्प्रदाय, होता है सम्पूर्ण बुरा ।
हम कब कहते एकाधिकार हो, भारत पर केवल अपना ?
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, हैं भारत में सब भाई-भाई ।
जो भी माने भारत माँ को , उससे कब है कोई लड़ाई ?

पर इसका यह अर्थ नहीं , हम बस बँटवारा करते जाए ।
क्या आस्तीन में पालें साँप, सर ना उनके कुँचले जाए ?
मानवता आदर्श हमारा , भाई चारा हमको अति प्यारा 
पर क्या उसके खातिर यूँ ही , बाँटने दें भारत हम प्यारा ?
आखिर कब तक खामोशी से, चुपचाप तमाशा देखा जाए ।
क्यों ना खोदकर जड़ दुश्मन की, मठ्ठा उसमे डाला जाए ?

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

रविवार, 11 मई 2014

ओ राही दिल्ली जाना तो ..."गोपाल सिंह नेपाली"

यह कविता प्रसिद्ध कवि "गोपाल सिंह नेपाली" ने 
"चीन के युद्ध में हमारी करारी हार" के बाद 
"पंडित नेहरु की कायरता पूर्ण नीतियों से क्षुब्ध होकर" लिखी थी 

पर इस कविता को पढ़कर लगता है जैसे यह कविता मनमोहन सरकार के लिए लिखी गयी हो.... 
कितनी सटीक पंक्तियाँ आज भी कितनी प्रासंगिक....................

ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।
चरखा चलता है हाथों से, शासन चलता तरवार से ।
यह राम-कृष्ण की जन्मभूमि, पावन धरती सीताओं की ।
फिर कमी रही कब भारत में सभ्यता, शांति, सदभावों की ।
पर नए पड़ोसी कुछ ऐसे, गोली चलती उस पार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।

तुम उड़ा कबूतर अंबर में संदेश शांति का देते हो ।
चिट्ठी लिखकर रह जाते हो, जब कुछ गड़बड़ सुन लेते हो ।
वक्तव्य लिखो कि विरोध करो, यह भी काग़ज़ वह भी काग़ज़ ।
कब नाव राष्ट्र की पार लगी यों काग़ज़ की पतवार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।

तुम चावल भिजवा देते हो, जब प्यार पुराना दर्शाकर ।
वह प्राप्ति सूचना देते हैं, सीमा पर गोली-वर्षा कर ।
चुप रहने को तो हम इतना चुप रहें कि मरघट शर्माए ।
बंदूकों से छूटी गोली कैसे चूमोगे प्यार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।

नहरें फिर भी खुद सकती हैं, बन सकती है योजना नई ।
जीवित है तो फिर कर लेंगे कल्पना नई, कामना नई ।
घर की है बात, यहाँ 'बोतल' पीछे भी पकड़ी जाएगी ।
पहले चलकर के सीमा पर सर झुकवा लो संसार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।

हम लड़ें नहीं प्रण तो ठानें, रण-रास रचाना तो सीखें ।
होना स्वतंत्र हम जान गए, स्वातंत्र्य बचाना तो सीखें ।
वह माने सिर्फ़ नमस्ते से, जो हँसे, मिले, मृदु बात करे ।
बंदूक चलाने वाला माने बमबारी की मार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।

सिद्धांत, धर्म कुछ और चीज़, आज़ादी है कुछ और चीज़ ।
सब कुछ है तरु-डाली-पत्ते, आज़ादी है बुनियाद चीज़ ।
इसलिए वेद, गीता, कुर‍आन, दुनिया ने लिखे स्याही से ।
लेकिन लिक्खा आज़ादी का इतिहास रुधिर की धार से ।
ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।
चर्खा चलता है हाथों से, शासन चलता तलवार से ।।


गुरुवार, 12 जनवरी 2012

शत - शत नमन...!!

अभिनन्दन है , वंदन है तेरा ।
हे राष्ट्र पुरुष , हे महापुरुष ।
सामर्थ नहीं हम में इतना ,
कर पाए तेरा समुचित गुणगान ।
गुंजित है ये धरती सारी ,
गूँज रहा नभ में तेरा यशोगान।

स्वामी विवेकानंद जी की "जयंती"
'युवा दिवस’ (१२ जनवरी)
पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से
शत - शत नमन...!!

सोमवार, 15 अगस्त 2011

राष्ट्र का वही पुराना पर्व...

लो फिर आ गया मौसम , राष्ट्र के लिए नया कुछ कर जाने का ।
पुराने हो चुके भूले-बिसरे , चित्रों को साफ कर फिर लगाने का ।
पुरानी धूल-धूसरित मालाओं को , बदलकर फिर नयी लगाने का ।
खोजकर सिकुड़े-गुमचे पड़े झंडे को , धुलाकर फिर इस्त्री कराने का ।
कटे फटे बदरंग झंडे की जगह , गाँधी आश्रम से एक नया मंगाने का ।
और इस तरह राष्ट्रीयता से सराबोर , राष्ट्र का वही पुराना पर्व मनाने का ।

ये मत पूछो किस कारण से , ये पर्व आज मनाया जाने लगा ।
आजाद हुआ था गुलाम राष्ट्र , या संविधान नया बनाया गया ।
गड-मड हो गए हैं अंतर , परिभाषाये नव जनमानस भूल गया ।
छब्बीस जनवरी पंद्रह अगस्त , बस झंडा-रोहण  में बदल गया ।
उठे जागे और तैयार हुए , रो-गाकर पहुँच गए ध्वज-स्थल पर ।
फहराया झंडा गाया जन-गण-मन , आ गए पुन: वापस घर पर ।

जो अंतर है इन दोनों में , वो दूर-दर्शन पर जाकर सिमट गया ।
किसी एक में सज-धज कर , देखा दिल्ली में झांकी निकल गया ।
किसी एक में लाल किले से , देश के मुखिया का भाषण गुजर गया ।
और हमें नाहक क्या लेना-देना , जो इतिहास में पुराना बीत गाया ।
बस आज सबेरे सबको गाना , वही पुराना रटा रटाया भूला तराना ।
जनगणमन अधिनायक जय हे , आओ हमको देश की लाज बचाना ।

जल्दी करो देर हो रही जय है..., 
लड्डू तुरंत बंटाओ जय हे...।
कम से कम कुछ घंटों को जय हे.. ,
राष्ट्रीयता मिलकर निभाओ जय हे... ।
कल फिर करना काम हमें जय हे... ,
आज तो छुट्टी मनाये जय हे.....।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

वंदे मातरम

वंदे मातरम
वंदे मातरम,
वंदे मातरम
सुजला सुफला मलयज-शीतलाम
शश्य-शामलाम मातरम
वंदे मातरम
शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनी
फुललकुसुमित-द्रुमदल शोभिनी
सुहासिनीं सुमधुर भाषिनीं
सुखदां वरदां मातरम
वंदे मातरम
- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
राष्ट्रगान
जन गण मन अधि नायक जय हे!
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिंध गुजरात मराठा,
द्राविण उत्कल बंग।
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा,
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जय-गाथा।
जन-गण-मंगलदायक जय हे!
भारत भाग्य विधाता।
जय हे! जय हे! जय हे!
जय जय जय जय हे!
- रवींद्र नाथ ठाकुर
सारे जहाँ से अच्छा
सारे जहाँ से अच्छा
हिंदुस्तान हमारा
हम बुलबुलें हैं उसकी
वो गुलसिताँ हमारा।
परबत वो सबसे ऊँचा
हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा
वो पासबाँ हमारा।
गोदी में खेलती हैं
जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिनके दम से
रश्क-ए-जिनाँ हमारा।
मज़हब नहीं सिखाता
आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम वतन है
हिंदुस्तान हमारा।
- मुहम्मद इक़बाल
अरुण यह मधुमय देश
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।
- जयशंकर प्रसाद
उठो धरा के अमर सपूतों
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।
जन-जन के जीवन में फिर से
नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।
नई प्रात है नई बात है
नया किरन है, ज्योति नई।
नई उमंगें, नई तरंगें
नई आस है, साँस नई।
युग-युग के मुरझे सुमनों में
नई-नई मुस्कान भरो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।1।।

डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं।
गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें
मस्त उधर मँडराते हैं।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नव गान भरो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।2।।

कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है।
नूतन मंगलमय ध्वनियों से
गुँजित जग-उद्यान करो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।3।।

सरस्वती का पावन मंदिर
शुभ संपत्ति तुम्हारी है।
तुममें से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।4।।
- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो
ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में
संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो
तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो
वह भक्ति दे कि 'बिस्मिल' सुख में तुझे न भूले
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो
- रामप्रसाद बिस्मिल
ध्वजा वंदना
नमो, नमो, नमो।
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज - शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य - शक्ति - शील - धारिणी!
प्रणय - प्रसारिणी, नमो अरिष्ट - वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा - प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर-फहर ओ केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुँथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिंदुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
- रामधारी सिंह 'दिनकर'
भारती वंदना
भारति जय विजय करे!
कनक शस्य कमल धरे!
लंका पदतल – शतदल
गर्जितोर्मि सागर – जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बाहु अर्थ भरे!
तरु तृण वन लता वसन
अँचल में खचित सुमन
गंगा ज्योतिर्जल- कण
धवल धार हार गले!
मुकुट शुभ्र हिम – तुषार
प्राण प्रणव ओंकार
ध्वनित दिशाएँ उदार
शतमुख - शतरव मुखरे!
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

भारतवर्ष यह भारतवर्ष हमारा है!
हमको प्राणों से प्यारा है!!
है यहाँ हिमालय खड़ा हुआ,
संतरी सरीखा अड़ा हुआ,
गंगा की निर्मल धारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
क्या ही पहाड़ियाँ हैं न्यारी?
जिनमें सुंदर झरने जारी!
शोभा में सबसे न्यारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
है हवा मनोहर डोल रही,
बन में कोयल है बोल रही।
बहती सुगंध की धारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
जन्मे थे यहीं राम सीता,
गूँजी थी यहीं मधुर गीता।
यमुना का श्याम किनारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
तन मन धन प्राण चढ़ाएँगे,
हम इसका मान बढ़ाएँगे!
जग का सौभाग्य सितारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
- सोहन लाल द्विवेदी

विजय मिली विश्राम न समझो
ओ विप्लव के थके साथियों
विजय मिली विश्राम न समझो
उदित प्रभात हुआ फिर भी छाई चारों ओर उदासी
ऊपर मेघ भरे बैठे हैं किंतु धरा प्यासी की प्यासी
जब तक सुख के स्वप्न अधूरे
पूरा अपना काम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो
पद-लोलुपता और त्याग का एकाकार नहीं होने का
दो नावों पर पग धरने से सागर पार नहीं होने का
युगारंभ के प्रथम चरण की
गतिविधि को परिणाम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो
तुमने वज्र प्रहार किया था पराधीनता की छाती पर
देखो आँच न आने पाए जन जन की सौंपी थाती पर
समर शेष है सजग देश है
सचमुच युद्ध विराम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो
- बलवीर सिंह रंग

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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