क्यों चाह रहे उस मंजिल को , जहाँ रूह नहीं बच पानी है ।
क्यों खोजो रहे वह प्यार पुन: , जो छल और कपट का सानी है ।
झूंठे सच्चे वादों में क्यों ,
फिर मन तेरा ललचाता है ?
वो है एक मृग मरीचका ,
जो मन तेरा भटकता है..!
यदि मिल ही जाये फिर से , छल और कपट में लिपटा प्यार ।
क्या खुश रह पावोगे जीवन भर , पूँछो अपने दिल से एक बार ।
मेरा तो कर्त्तव्य यही .....,
मै समझाऊंगा बारम्बार ।
जब जब व्याकुल होगे तुम ,
मै तुम्हे संभालूँगा हर बार ।
सच और झूँठ के अंतर को , मै तुम्हे बताऊंगा हर बार ।
वचन दिया है मैने , सत्य का साथ निभाऊंगा हर बार ।
फिर चाहे मुझको अपनो का ,
अर्जुन सा करना पड़े विरोध ।
दूर करूँगा हर बाधा को ,
जो बनना चाहेगा अवरोध ।
बस मुझको तुम दो इतना वचन , नहीं जीवन में निराशा लाओगे ।
तोडा है जिसने दिल तेरा , भुला उसे तुम जीवन में आगे जाओगे ।










