हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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बुधवार, 29 जनवरी 2014

करते रहेंगे नौटंकी यार...

एक था राजा एक प्रजा थी , 
प्रजा पर सदा राजा की कृपा थी। 
यूँ राजा से पहले भी प्रजा थी , 
पर भूंखी नंगी वो सदा थी। 
था राजा का एक राजकुमार , 
जो था राजा से भी ज्यादा सुकमार। 
यूँ वो सदा विदेश ही दौड़ा करता , 
पर कभी कभी जनकल्याण का भी दौरा पड़ता। 
फिर जब देख प्रजा को उसे आता तरस , 
लगता जैसे स्वाती नक्षत्र में पड़े बादल बरस। 

जब भाव-विभोर हो जाता वो , 
समरसता लाने गरीबो के घर जाता वो। 
भूंखी-नंगी खानदानी प्रजा को ,
फिर आकर गले लगाता वो। 
खाना खाकर उनके घर में ,
लेकर डकार भूल सब जाता वो। 
चेले-चापड़ कलछुल-चमचे ,
जब जय-जयकार मचाते थे। 
देख कुँवर की पप्पूगिरी ,
राजा-रानी संग मंत्री हर्षाते थे। 

तभी ना जाने कहाँ किधर से ,
एक नया बहुरुपिया देश में आया। 
स्वॉँग बनाकर तरह तरह का ,
जनता के दिल को हर्षाया। 
बोला ख़तम करेंगे हम ,
राजा-रानी मंत्री-संतरी का भ्रष्टाचार। 
फिर बीच सड़क पर चलाएंगे ,
हम जनता की चुनी सरकार। 
लोक-लुभावन नारे देकर ,
सदा करते रहेंगे नौटंकी यार। 

यूँ जनता तो जनता ही है ,
सदा बनना मूर्ख भाग्य में है। 
करे विधाता भी क्या तब ,
जब चूतिया नन्द,चन्द,घोड़ी सब। 
अब आगे की क्या कहें कहानी ,
घाल-मेल ज्यों दूध और पानी। 
आप-साँप की जोड़ी मिलकर ,

करते है देखो मनमानी। 
यही दुआ है देश की खातिर ,
जनता हो जाये थोड़ी सयानी। 


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 23 जनवरी 2011

भारत सरकार कितनी महान हैं

भड़ास blog: भारत सरकार कितनी महान हैं

दोस्तों क्या आप लोग जानना चाहते हैं की भारत सरकार कितनी महान हैं और वो गरीबो के लिए कितना करती हैं अगर आपको नहीं पता तो एक बार जरा नीचे दिए गए चार्ट को पढिये आप भी जान जायेंगे की बाहर सरकार एक समग्र निरपेक्ष सरकार हैं जो गरीबो के लिए कितना करती हैं

क्या आप जानते है भारत का वह स्थान जहाँ सबसे सस्ता भोजन उपलब्ध हैं? ............

चाय = 1 रूपया प्रति चाय
सूप = 5.50 रुपये
दाल = 1.50 रूपया
शाकाहारी थाली (जिसमे दाल, सब्जी 4 चपाती चावल/पुलाव, दही, सलाद) = 12.50 रुपये
मांसाहारी थाली = 22 रुपये
चिकन बिरयानी = 34 रुपये
शाकाहारी पुलाव = 8 रुपये
दही चावल = 11 रुपये
फिश कर्री और चावल = 13 रुपयेराजमा चावल = 7 रुपयेटमाटर चावल = 7 रुपये
चिकन करी = 20 .50 रुपये
चिकन मसाला = 24 .50 रुपये
बटर चिकन = 27 रुपयेचपाती = 1 रूपया प्रति चपाती
एक प्लेट चावल = 2 रुपयेडोसा = 4 रुपयेखीर = 5.50 रुपये प्रति कटोरी
फ्रूट केक = 9 .50 रुपयेफ्रूट सलाद = 7 रुपये

यह वास्तविक मूल्य सूची है

ऊपर बताई गई सारी मदें "गरीब लोगों" केवल और केवल के लिए है जो कि भारत के संसद की केन्टीन में ही उपलब्ध है..............
और इन गरीब लोगों की तनख्वाह 80,000 रुपये प्रति माह

अब आप लोग ही निर्णय ले की हमारी सरकार का रवैया कितना स्पष्ट हैं गरीब लोगो के लिए.

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

Making Of A New Kalidas

भड़ास blog: कांग्रेस का राजनीति के लिए देशद्रोह को संरक्षण



कालिदास जैसा अपने को महान बनाने के लिए 'मूर्ख' होना कोई आर्हता नही है , और ना ही ये आवश्यक है की उसके लिए मूर्खों सा अपने ही घर के आँगन में लगे फलदायी वृक्षो की शाखाएं या उससे भी भी अधिक मूर्खता करते हुए समूचे वृक्ष को ही कटाने पर जुटे रहें ।
पर
अफसोसजनक विडम्बना यह है की आज भी कुछ मूर्ख अपने को कालिदास साबित करने हेतु पूर्णतया विचार करके योजनाबद्ध तरीके से पेड़ की उन्ही शाखों को जिस पर आज वो बैठे हुए है , इस आस में कटाने में लगे है कि किसी ना किसी दिन उस पेड़ के नीचे सुसताते पथिक और पेड़ के ऊपर बसेरा करने वाले पंछी भयवस ही सही उन्हें कालिदास के नाम से संबोधित करेंगें ।

वाह क्या हुनर है......?

वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?
पोर-पोर उँगलियों के भरे है अनुभव से ।
और क्यों ना हों ऐसा जब वर्षों से ,
आपको महारथ है हवाई किले बनाने में ।

पहले भी बहुत से फर्जी रजवाड़ों के , बनाये थे ठेके पे किले आपने हवावों के ।
आज भी अपने नेता और युवराज से  , मिले हैं ठेके हवाई किले बनाने के ।
आपके बनाये किले सब अनोखे हैं , उनमे हवा के ईंटो की हवा से चुनाई है ।
हवा के दरवाजे पर हवा की सफाई है , हवा के कमरों में हवा की रंगाई है ।

कोई भी चले हवा , किले को ना छु पाई है ।
अंदर और बाहर की हवा , आपस में ना मिल पाई है ।
भेद सब हवा के , हवा ही समेटे है ।
हवाई किलो में देखो , हवा के ही बेटे हैं ।
निश्चित ही किसी दिन आपको , निशाने पाक भी मिल जायेगा ।
आपके मकबरे पर एक ना एक दिन , लादेन भी फातिया पढने आएगा ।
महाराज जयचंद जैसा ही , आदर से आपका नाम जग में लिया जायेगा ।
अफ़सोस मगर तब तक आप जैसों के कारण , यह देश कई टुकड़ों में बँट जायेगा  ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

जय जवान-जय किसान

जय जवान-जय किसान , कभी नारा था ये महान ।
लाल बहादुर 'लाल' था ,  तब भारत देश का प्रधान ।
जीवन भर उसे प्यारा था , अपना भारत देश महान ।
भूल गए हम दोनों को , रखने में अपनो का ध्यान ।

जय जवान-जय किसान , अब के नेता नहीं किसान ।
कफन बेंचते सीमा पर , और फूँक रहे हैं खलिहान ।
केवल भाषण में खुलकर , करते तेरा वो गुणगान ।
चंद कागजी टुकड़ों पर , तुम्हे बेंचते वह बेईमान ।
जय जवान - जय किसान , हैवान हो गया है इन्सान ।
वादों की फसलों को देखो , खून से सींचता है शैतान ।
है एक प्रधान एक निशान , पर खंड खंड हैं यहाँ विधान ।
फिर भी शान से कहता नेता , मेरा भारत देश महान ।

जय जवान-जय किसान , जो तेरा गाते प्रशस्तिगान ।
वो खून चूसने वाले ही , कहलातें है आज महान ।
भूँखा नंगा रखकर तुझको , वो होतें है मालामाल ।
तेरे खून पसीने के बल , शासन करते चंद दलाल ।

जय जवान-जय किसान , तुम ना बेंचना अपना ईमान ।
तुम दोनों के कंधो पर , टिका देश का भविष्य महान ।
तेरे श्रम के बल पर ही , भारत है अब भी बलवान ।
आवाहन तेरा करते हैं , भारत मा के 'लाल' महान ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

राजनीत

अपनो पर करम गैरों पर सितम , यही राजनीत बतलाती है ।
जो भी मिले बस लूटे रहो , ये बात हमें सिखलाती है ।
क्या अपना क्या औरों का , जो हाथ लगा ले चलना है ।
अभी हाथ में अवसर है , फिर जाने कब ये मिलना है ।
जो चीज बिके वो बेंचे चलो , जो नहीं बिका उसे लेते चलो ।
ना होगा कबाड़ी वाले को , औने पौने में देते चलो ।
चौराहे जितने खाली हो , बुत अपना वहां लगाते रहो ।
पैसे देकर चमचों से , जिंदाबाद कहलाते रहो ।
रोजी रोटी भले ना दो , हवा में तीर चलाते रहो ।
सत्ता स्थिर रखनी हो , सत्ता के दलाल बनाते रहो ।
अपनो पर करम गैरों पर सितम , ये मूल मन्त्र अपनाते रहो ।
जो भी हो बिरोधी उसके मुख पर , कालिख सदा लगाते रहो ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

अल्ला हो अकबर - जय श्रीराम ।

नफरत के जब बीज बो रहे , धर्म ध्वजा के लम्बरदार ।
प्रेम अहिंसा भाईचारा , कैसे बचायेंगे भगवान हर बार ।


रघुपति राघव राजा राम , जोर से बोलो जय श्रीराम ।
मंदिर वहीँ बनायेगे , चाहे देश में दंगा करवाएंगे ।
बच्चा बच्चा राम का , जन्मभूमि के काम का ।
सुलह नहीं हो पायेगी , रथ यात्रा फिर से आएगी ।
ये तो केवल झांकी है , अभी पूरा नाटक बाकी है ।
याचना नहीं अब रण होगा , संघर्ष बड़ा भीषण होगा ।
नीव खोद हम डालेंगे , मंदिर अवशेष निकालेंगे ।
सपथ तुम्हे श्रीराम की , अबकी बारी राम की ।
जन्म भूमि के काम ना आये , वो बेकार जवानी है ।
रक्त ना खौले इस पर भी, वो रक्त नहीं बस पानी है ।
राम लला हम आयेंगे , ढांचा सभी ढहायेंगे ।
मंदिर अबकी बनायेंगे , हम धर्म ध्वजा फहराएंगे ।
जो न्याय नहीं कर पाएंगे , हम उनको सबक सिखायेंगे ।
इतिहास के काले पन्नों को , हम केसरिया कर जायेंगे ।
तेरे नाम पर अपनी रोटी , सेंक सदा हम खायेंगे ।
भारत वर्ष को कैसे भी हम , हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे ।
बस ख़बरदार...........!!
अल्ला हो अकबर-अल्ला हो अकबर ,इस्लाम के काम हम आयेंगे ।
फतवा जारी करो इमाम , लड़ने हम सब जायेंगे ।
नमाज भले ना पढ़ पावे ,  हम मस्जिद वहीँ बनायेगे ।
आक्रमणकारी बाबर के , नाम को सदा बचायेंगे ।
क्या है साक्ष्य राम थे जन्मे , भारत वर्ष की भूमि में ।
हाँ बाबर निश्चित आया था , चढ़ भारत वर्ष के सीने पे ।
मंदिर बन गया अगर वहां , इस्लाम खतरे में पड़ जायेगा ।
हम मर कर जन्नत जायेंगे  , जिहाद के काम जो आयेंगे  ।
अगर बनी ना मस्जिद अपनी , खून खराबा हो जायेगा ।
कश्मीर से लेकर केरल तक , हर चप्पा-चप्पा थर्रायेगा ।
हमें ना समझो तुम कमजोर , पडोसी भाई भी आएगा ।
जो हमसे टकराएगा , वो दोजख में जायेगा ।
हँस कर लिया था पाकिस्तान , लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान ।
घास फूस जो खायेगा , वो क्या हमसे लड़ पायेगा ।
ये कैसे हो सकता है , सुलह करें हम काफ़िर से । 
कैसे माने उसे फैसला , जो ना हो मन माफिक से ।
प्रेम अहिंसा भाईचारा , कैसे बचायेंगे पैगम्बर ।
नफरत के जब बीज बो रहे , सब धर्मो के आडम्बर ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 18 अगस्त 2010

अथ नेता उवाच

आओ पापी जानो तुम्हे ,मै सारे पाप सिखाता हूँ ।
भारी भरकम जेबों को , मै हल्का करना बतलाता हूँ ।

उस से आगे बढ़ कर मै , चोरी की कला बताता हूँ ।
लूट-पाट करना जमकर , मै पल में ही सिखलाता हूँ ।
गला काट कर शीश सहित , गायब होना पढाता हूँ ।
ब्याभिचार की सभी कलाएं , सचित्र तुम्हे सिखाता हूँ ।

कैसे लेते रिश्वत है ? , कैसे उसे पचाते है ??
कैसे औरों का मॉल हड़प कर , अपना उसे बताते है ।

लोकतंत्र के नाम पर कैसे , हम मिलकर लूट मचाते है ।
हमसे ज्यादा कौन अनुभवी , होगा पाप की दुनिया में ।
हमसे ज्यादा कौन पतित , होगा पूरी दुनियां में ।
नेतागीरी करते हम , देखो सारी दुनिया में ।
इसीलिए तो जनता ने , नेता हमें बनाया है।
देख हमारे अनुभव को , हमें सत्ता में पहुँचाया है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

रविवार, 15 अगस्त 2010

फिर वही तिरंगा..!

फिर आज चले लहराने तुम , लालकिले पर वही तिरंगा ।
जिसकी कसमें खाकर जाने , कितने क्रांति के बीज उगे ।
जिसकी छवि आँखों में रखकर ,  बेंत चंद्रशेखर ने खाए ।
जिसकी खातिर असेम्बली में , भगतसिंह बटुकेश्वर ने पर्चे लहराए ।
जिसकी खातिर बिस्मिल ने , काकोरी में लूटा था ट्रेन ।
जिसकी खातिर असफाक ने , दे दी  यौवन की क़ुरबानी ।  

जिसकी खातिर भेष बदल कर , जीने को विवश सुभाष हुए ।
जिसकी खातिर सर्वस लुटाकर, गोली अपनों की खायी गाँधी ने ।
बोलो क्या अब तक हम कर पाये , पूरे उनके सपनो को ???
या फिर पाल कर भ्रम को केवल , जीते रहे हम सपनों को ???
है भले देश में अपनी सत्ता , लेकिन हम क्या कर पाये है ?
भूँख , अशिक्षा, बेरोजगारी,बीमारी  का, क्या हम हल दे पाये है ?

लुटी जाती अस्मत अब भी , अब भी जलती बहुएं है ।
भींख मांगता बचपन है , और वही अपाहिज बुढ़ापा है ।
सौतेली है अब भी वो भाषा , जो राष्ट्र भाषा कहलाती है । 
सत्ता के चारो खम्भों पर , भारत मां रोती जाती  हैं ।
लूट घसोट मची है हर दिन, भ्रस्टाचार में सब कोई रंगा।
फिर भी देखो फहराने चले, लाल किले पर आज तिरंगा ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 14 अगस्त 2010

क्षमा करो 'आजाद' हमें

15 अगस्त की पूर्व संध्या पर आजादी के दीवानों को समर्पित

क्षमा करो 'आजाद' हमें , आजादी हमने अपनी बेंची ।
दुनिया के रखवालों से ,   हमने अपनी शांति खरीदी ।

भुला दिया पौरुष अपना , बाट जोहते औरों की ।
जिनसे तुमने संघर्ष किया , हम गले लगाते उनको ही ।

आन देश की बेंच कर हमने , शान बढाई है तन की ।
शान देश की बेंच कर हमने , जान बचाई है अपनी ।

भूल गए हम स्वप्नों को , अंतिम समय जो तुमने देखे ।
मिटा दिये सब आदर्शों को , जो तुमने हमको थे भेजे ।

वैश्वीकरण का युग आया , सत्ता में घुस गए दलाल ।
अपनों के सीनों पार ताने ,  संगीने  अपने ही लाल।

परिभाषा भले 'आजाद' हो , अब कहाँ देश आजाद है ?
स्वाधीन था जो पहले , सब पराधीन अब आज है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

दयनीय भाजपा के दया के पात्र गडकरी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी "भारतीय जनता पार्टी" बनाम  भाजपा की पिछले कुछ दिनों की गृह-दशा ओर चाल-चलन  ने आज इसे दूसरे नंबर की पार्टी से नंबर दो (कांग्रेस) पार्टी या दो नम्बरी पार्टी बना दिया है ।

आज भाजपा अत्यंत ही दयनीय हालत में है भले ही कुछ राज्यों में इसकी अभी भी सरकार  है  और इसके नए-नवेले राष्टीय अध्यक्ष वास्तव में उससे भी ज्यादा दया के पात्र लगने  लगे  है । 


"दयनीय भाजपा के दया के पात्र गडकरी" - गडकरी जी  यह मै किसी प्रतिशोध में नहीं कह रहा हूँ ना ही व्यंग कर रहा हूँ क्योंकि ना तो मै कांग्रेसी हूँ, ना वामपंथी, ना मेरा लालू और मुलायम यादव से कोई नाता है, ना बुआ मायावती से निकट भविष्य में कोई लाभ प्राप्त होने की आशा है (बुआ  मायावती इसलिए कहा क्योकि मेरे पिता और चाचा भी मतदाता है और वो उन्हें बहन मायावती कहते है) ।


हाँ मेरे जानने वाले अच्छे से जानते है कि अगर किसी के प्रति मुझमें ज्यादा अपनापन रहा है तो वो भाजपा ही है पर यह अपनापन कब तक चल पायेगा भगवान ही जाने क्योंकि भाजपा का मतदाता होने का अर्थ यह तो कदापि नहीं है कि मै भाजपा का अंध-भक्त हूँ ।
खानदानी तौर पर मै कांग्रेसी हूँ, बोफोर्स घोटाले ने मेरे पिता और उनके चलते पूरे गावं  को को जनता दल का समर्थक बनाया फिर राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद प्रकरण ने हमारे गाव-घर वालो को भाजपाई बनाया।
जनता दल के सम्बन्ध में  एक घटिया जुमला आपने सुना होगा जिसका मर्यादित रूप आप को यहाँ बता देता हूँ "मुलायम सिंह यादव कि बुद्धि, वी पी सिंह का बल, मिटटी में मिल गया जनता दल"।
(अ-मर्यादित नाम की जगह जातिवाचक शब्द वाला और मिटटी की जगह जननांग वाला भी आप जानते ही होंगे मुझसे क्यों सीधे लिखवाकर मेरी छवि  ख़राब कराएँगे)।
पर मै कभी धर्म जाति के भावनाओं में बहकर किसी दल का समर्थ नहीं रहा,जो दल तुष्टिकरण से हटकर राष्ट्र हित में लगा दिखा वही मेरा दल रहा।
वैसे सारे दल वास्तव में दल-दल ही है जहाँ भूले से ही कभी-कभी कमल रूपी नेता खिलते है मगर नेता तो  नेता  होतें है जो 'अशोक चक्रधर' जी के अनुसार नजराना,हकराना,शुकराना और जबराना चारो तरह से घोटास में सक्षम होते है।


लगता है मै भटक रहा हूँ ...
खैर मेरा और भाजपा का सम्बन्ध औरों की तरह सीधा साधा भी नहीं है। 
मेरा इससे जुडाव एक मजेदार तरीके से है। 
मै  पिछले  १५ वर्षो से सोने की एक अंगूठी बहुत ही चाव से पहनता रहा हूँ जिस पर केसरिया और हरे रंगों से सुसज्जित एक बेहतरीन कमल का फूल बना था जो किसी भाजपाई नेता ने ही सुनार को बनाने के लिए कहा था मगर जब तक वह बनकर तैयार हुयी शायद फिर वो राजनैतिक रूप से भाजपाई नहीं रह गया और बेचारी अंगूठी सुनार के पास ही अपने ले जाने वाले का तब तक इंतजार  करती रह गयी जब तक एक दिन उसे देख कर मेरा दिल उसपर नहीं आ गया ।
अब कमल के फूल वाली अंगूठी  मेरी उंगली में देखकर लोग  मुझे अपने से भाजपाई मान लेते थे और उनके मुँह से यह सुनकर मै अच्छा महसूस करता था क्योंकि तब भाजपा की पहचान श्री अटल बिहारी बाजपेयी का नेतृत्व और श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के "एक देश में एक विधान एक प्रधान" जैसे कुछ राष्ट्रवादी नारों से होती थी।

मेरी  अंगूठी और भाजपा का सम्बन्ध भी बहुत निराला था।
मै उसे कभी अपनी उंगली से किसी भी हालत में नहीं निकालता था जिसके सम्बन्ध में पूछने  पर अगर पूछने वाला भाजपाई होता तो मै उससे मजा लेने  के लिए  कहता कि यार आप अपने सोंच का दायरा कुछ बड़ा करो, कमल का पुष्प केवल चुनाव चिन्ह नहीं  भारतवर्ष का राष्ट्रीय फूल भी  है और इसी कारण मै इसे पहने हूँ।
मगर जब पूछने वाला गैर-भाजपाई होता तो उससे मजा लेने के लिए मै शान से कहता  था कि ये अंगूठी मुझे एक बड़े भाजपा नेता ने मेरी भाजपा के प्रति लगाव को देखकर उपहार में दिया है और  इससे भाजपा का भाग्य जुड़ा है।
हाँ सच में उससे भाजपा का भाग्य जुड़ा था.......!! जो लोग मित्र और सहयोगी  मुझे पिछले १५ वर्षो से निकटता से जानते है उन्हें मेरे कथन की सच्चाई पता है। 


चलिए आपको एक सच्ची कहानी सुना देता हूँ  फिर अपने वास्तविक मुद्दे पर वापस आऊंगा :- 
उस ज़माने के कार्यालय के मैनेजर जो निजी तौर पर ज्योतिषी और तंत्र के ज्ञाता भी थे प्राय: मजाक में कहते कि मेरी इस बात में दम नहीं है कि भाजपा का भाग्य मेरी अंगूठी से जुड़ा है और वो कहते कि इसे साबित करने के लिए मै इसे उतार कर इसका असर भाजपा पर दिखाऊ और मै कहता कि एसा घातक प्रयोग मै नहीं करने वाला।
इसी हंसी मजाक में एक दिन वो और कार्यालय के अन्य स्टाफ जबरदस्ती मेरी अंगूठी उतरने लगे और मै उन्हें रोक रहा था कि अंगूठी मेरी उंगली से निकल कर फर्स पर गिर गयी जिससे उस पर नगीने से बने कमल की एक पंखुड़ी का सिरा टूट गया।
उन्होंने अफसोस जाहिर किया क्योकि अब अंगूठी चोटिल हो गयी थी। शाम ढले जब कार्यालय  बंद हुवा और मेरे आफिस के लोगो ने जब अपने घर जाकर टी वी खोला तो जो समाचार ब्रेकिंग न्यूज था वो था "मायावती ने अचानक भाजपा से समर्थन वापस लिया, कल्याण की सरकार डांवाडोल "।
और फिर रातो-रात जगदम्बिका पाल ने एक गैर भाजपाई मुख्यमंत्री के रूप में सपा के समर्थन से सपथग्रहण  भी कर लिया। तो अगली सुबह जब मै कार्यालय पंहुचा तो यह देख कर हैरान हो गया कि लोग सिर्फ मेरा इंतिजार कर रहे है,मुझे भी इसका अनुमान था तो मैंने अंगूठी जेब में रख रखा था।
लोगो ने पूंछा अंगूठी कहा है तुरंत पहनो ,मैंने कहा कि अब क्या होगा जो होना था वो तो कल आप लोगों ने अंगूठी गिरा कर कर ही दिया। फिर भी लोग आशान्वित थे और मै भी जबरदस्ती का भाव खा रहा था तो मैंने भी लोगों से माफ़ी मंगवाते हुए उसे जेब से निकल कर पहन लिया और लोगो को भरोसा दिलाया लो मै हूँ ना सब ठीक हो जायेगा।
उधर अटल बाबा दिल्ली में धरने पर जा चुके थे, इधर इलाहाबाद हाई कोर्ट के विशेष जज ने सरकार के मुद्दे पर सुनवाई प्रारंभ कर दिया था।
"जगदम्बिका पाल एक दिन के राजा रहे और अफसोस वो दिल्ली के एक दिन के बादशाह की तरह चमड़े का सिक्का या कपडे का नोट भी नहीं जारी कर पाए"
और अगले ही दिन भाजपा फिर सत्ता में वापस। हुर्रे......................कमाल हो गया अचानक रातो-रात अप्रत्याशित रूप से सत्ता गयी और अप्रत्याशित रूप से एक दिन में ही वापस। तो मुझे जानने वाले भाजपा समर्थक मित्र यार और कार्यालय सहयोगियों ने मुझसे वचन लिया कि मै उस अंगूठी की आगे से हिफाजत करूँगा।
हालाँकि आगे भी अनजाने में जब जब दुर्घटना वश  अंगूठी चोटिल होती रही तब तब तत्काल ही  भाजपा को क्षति पहुंचती रही।  कभी कल्याण ने पार्टी छोड़ी तो कभी १३ दिन तो कभी १३ माह की सरकार गिरी।  


चलिए अब  वापस अपने मूल विषय पर आता हूँ ...........
अफ़सोस इस संसार में यह सब अनंत तक स्थायी नहीं रह सका और जहाँ एक तरफ समय के साथ-साथ मेरी सोने की अंगूठी घिसती गयी और उसमे दरार आने लगी (सोना जल्दी धिसता भी है और अगर उसमे मिलावट कम हो तब तो और भी जल्दी) वही दूसरी तरफ भाजपा भी घिसती गयी  और उसमे दरार आने लगी ।

फिर जहाँ एक तरफ मेरी वह सोने अंगूठी टूट गयी और मुझे उसे भारी मन से उतार कर रखना  पड़ा....,वही दूसरी तरफ सुनहरी भाजपा भी घिस कर कई जगह से टूट गयी और उसके जाने कितने टुकड़े टूट कर इधर उधर  गिरने लगे,कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा, जिसमे से कुछ याद रहे  कुछ भूल गए (कल्याण सिंह, उमा भारती, मदनलाल, जसवंत सिंह.... लम्बी सूची है ) इसमे  कुछ वापस जुड़े  कुछ जबरन वापस लाये गए मगर वो सब फिर किसी टायर के बने हुए पंचर के दाग  ज्यादा लगने  लगे जिसके कारण आखिर भारतीय जनता (जिसमे ज्यादातर भाजपाई जनता ही थी) ने भारतीय जनता पार्टी को भारी मन से भारत की गद्दी से उतार कर किनारे रख दिया और अडवानी जी का भारत उदय या इण्डिया शायनिंग सपना ही रह गया  ।

आज अगर भाजपा अत्यंत ही दयनीय हालत में है तो यह भारत का दुर्भाग्य ही है:- इसलिए नहीं कि भाजपा भारत को फिर सोने की चिड़िया बनाने वाली थी या बनाने की योग्यता रखती है वरन इसलिए कि अभी भारत में कोई दूसरी पार्टी शक्तिशाली विपक्ष बनने के हालत में नहीं है और बिना शक्तिशाली विपक्ष के सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है.....!

और अगर भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष दया के पात्र लग रहे है तो यह और भी चिंताजनक है, यूँ  तो जिस दिन मैंने गडकरी जी का चेहरा टीवी पर पहली बार उनके भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर समाचार चैनल में अत्यंत ही उत्सुकता से देखा था उसी समय  मै किसी मन पसंद जीवन साथी ना मिल पाने पर दुखी होने वाले नव-विवाहित की तरह से विषाद  में डूब गया था क्योंकि उनके व्यक्तित्व में पहले दिन ही किसी प्रकार का कोई आकर्षण नहीं था और मुझे इस पार्टी के लिए किसी आकर्षक करिश्माई नेता के आने का इंतिजार था (शायद मै किसी गोल मटोल और केवल तन से भारी भरकम अध्यक्ष की आशा नहीं कर रहा था )। व्यक्तिगत तौर पर गडकरी जी मै आपको आहत नहीं करना चाहता हूँ ना ही मेरा ये  इरादा है मगर मै अपनी दिल की बात कह रहा हूँ और यहाँ मै झूंठ भी नहीं कहना चाहता हूँ इसलिए मुझे क्षमाँ कीजियेगा... नहीं भी करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा मुझपर मानहानि का दावा ही करेंगे मगर तब आप बहुत बुरे फसेंगे इसलिए माफ़ ही कर दीजियेगा।

मगर जब मुझे बताया गया कि गडकरी जी एक बहुत ही काबिल मैनेजर है (अपने व्यापारिक संस्थान के) साथ में संघ का वरदह्स्थ भी उनपर है तो यह मान  कर मैंने अपने दिल को सांतवना  दिया कि चलो काबिल नेता ना सही काबिल मैनेजर तो है.
और आज भाजपा को वास्तव में पहले एक काबिल मैनेजर की जरुरत है जो उसे आतंरिक रूप से विघटित होने, और अपनो के ही हाथों से  बर्बाद होने से बचा सके, हालत को बेहतर मैनेज कर सके। 
अटल जी अब अपने स्वास्थ में अटल नहीं रहे अडवानी जी तो पाकिस्तान जाकर जिन्ना के मजार  पर पहले ही चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबे बन चुके है और पार्टी ने अपना दूसरे पीड़ी का  बेहतरीन हीरा  उसके अपने भाई के हाथों गोली मारे जाने से खो दिया है, मुरली मनोहर जी अब सन्यास आश्रम में है, राजनाथ काबिल है ( यू .पी. में उनके शासन काल में सब देख चुके है) मगर राष्ट्रिय व्यापकता नहीं है , मोदी जी जरुर श्रेष्ट  है मगर राजग को स्वीकार नहीं , बाकी सब नवसिखुए ही है।

मगर अफसोस हमेशा एक काबिल मैनेजर काबिल नेता नहीं होता है और राजनैतिक पार्टी को एक काबिल नेता ही चला सकता है  भले ही वो करिश्माई ना हो, करिश्माई तो वो बाद में  अपने आप हो जाता है । 

नेता के तौर पर गडकरी जी बच्चे है और वास्तव में भी अपने हाव भाव , अपने बयानों से मात्र अपना बचपना ही दिखा रहे है,
हम उनसे सत्ता पक्ष के नेतावों की वल्दियत पता कर के बताने की आशा नहीं करते है (एसे चुटीले कामों के लिए लालू जी काफी है) वरन गडकरी जी आपसे राष्ट्र और जनमानस के लिए कुछ ठोस रचनात्मक मुद्दों पर योगदान की आशा है जो केवल किसी नेता के बेहूदा बचकाने भाषणों से नहीं आने वाला है।

आज भारत बदल रहा है और भारत का जनमानस भी,
अब मेरे जैसा विदेशी नेताओं का धुर-विरोधी भी यह मानने लगा है कि आज अगर सोनिया जी सत्ता सीधे तौर पर अपने हाथ में ले ले तो शायद भारत का ज्यादा भला हो सके
(क्या करें जब अपने नालायक हों तो बाहर वालो पर ही भरोसा करना पड़ता है)।
आवश्यक सूचना :-
१.  वर्त्तमान में मेरी अंगूठी टूटी हुयी मेरे मेज के दराज में रखी है जिसे मै अपने इस अन्धविश्वास के डर से वापस नया नहीं बनवाने की कोशिश कर  रहा हूँ कि कही इस प्रक्रिया में अगर सुनार ने उसे पूरी तरह से गला दिया तो भारत से मेरे दिल में बसी हुयी पार्टी भी विलुप्त ना हो जाय......और मात्र टांका लगवाकर जोड़ के साथ अब उसे पहनने की इच्छा नहीं हो रही है !
२. इस लेख के मध्य में भटक कर आई हुयी अंगूठी प्रकरण की कहानी पूरी तरह सत्य है और कहानी के पात्रो के नाम पते भी वास्तविक है। 
३. भाजपा यदि चाहे तो लेखक अंगूठी को उनके राष्टीय संग्रहालय में रखने को राजी है जिससे उनका भाग्य सही हो सके मगर सोने का वर्त्तमान दाम देना होगा।  
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

माफ़ करो (मुलायम) सिंह

माफ़ करो (मुलायम) सिंह जी

बहुत हो गया स्वांग तुम्हारा !

पहले ठगते हो जन के मन को फिर कहते हो भूल हो गयी.. ?
फिर से दो मौका हमको अब निष्ठांपूर्वक करेंगे सेवा ..!

कौन सी सेवा,  किसकी सेवा , कैसी सेवा ? बना रहे हो मुर्ख किसे ?
स्वतंत्र धर्म-निरपेक्ष भारत को अस्थिर कर उसे जाति-पांति और संप्रदाय के खांचो में करने की सेवा....!
अहो पहले भी कहते थे कुछ लोग तुम्हे मुल्ला-आयाम सिंह !
क्यों जाति बदल ली तुमने जब साथ में आये कल्याण सिंह ?
तुम नेता हो हम जनता है, तुम नाटक हो हम दर्शक है, 
पर इससे तुमको यह अधिकार नहीं मिल जाता है, जब जो चाहो वो पाठ पडावो , जैसा तुमको भाए वैसा सत्ता पाने को स्वांग रचावो ।
जो करे स्वार्थ की पूर्ति तुम्हारी उसको जनता का हमदर्द बताओ,
मित्र बताकर  उसको अपना गलबहियां डाले फोटो खिचावाओ ।

रचो धर्म और धर्म-निरपेक्षता  की तुम मनमानी परिभाषा,
फिर जब चाहो जिसको चाहो सांप्रदायिक बतलाओ ।
यूँ  मूल रूप से तुम भी जन हो,
जन होने के नाते तुमको हक़ है जिसको चाहो मित्र बनाओ जिससे चाहो करो शत्रुता,
जैसा मन को भाए वैसा करते रहो संविधान की सीमा में।

पर क्या तुम भूल गए जिस क्षण कोई नेता होता है तब खो देता है अधिकार मनमाना स्वांग रचाने का।

पहले भी सुना गया है जग में - " मेरे मन को भय मैंने कुत्ता मार के खाया "
पर तब रजवाड़ो  की सत्ता थी जब राजा करते थे राज यहाँ ,
तब जनता नहीं हुआ  करती थी केवल रंक रहा करते थे।
तुम राज वंश के नहीं हो राजा ना बेटा तेरा राजकुवर है ,
हाँ घर की दुकान है सपा अभी यह अमर सिंह कह गए यहाँ ।
अब लोकतंत्र है नेता जी, है वो भी समझदार जिन्हें देनी  है मांफी 
और मन को भाना  कुत्ता मार के खाना नहीं रह गया है कृत्य मनमाना। ( परमिशन लेनी होगी जानवरों के सेवा दल से )

तब

थूको-चाटो , या पहले चाटो फिर थूको ! 
तुम स्वतंत्र हो,
मै कब कहता? कि पहले थूक के तुमने सही किया या गलत किया था, या अब चाट के तुमने सही किया या गलत किया ?
हाँ तुम स्वतंत्र हो,  है ये अधिकार तुम्हारा,
पर यह केवल तब तक है जब तक थूक के छींटे ना जाएँ औरों पर।

माफ़ करो कह देने भर से कोई कृत्य बदल नहीं जाता है,
"राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवादित परिसर"  तुम्हारे कहने से केवल मस्जिद नहीं हो जाता है ।
किसी एक साम्प्रदाय का पिछलग्गू , कभी जनमानस का नेता नहीं कहलाता है।
जोड़ तोड़ करके शायद फिर तुम सत्ता पा जाओ,
पर जनता का एक निष्ठ  सेवक होने का ना तुम झूंठा स्वांग रचावो ।

हम जनता है इसका मतलब हम मूर्ख हो गए ? ,
यह सत्य नहीं है नेता जी...!
मजबूरी है कुछ अपनी , कुछ संविधान में छेद रह गए ।
वर्ना तुम्हे बताते हम, नेताओं के बंजर कितने खेत हो गए ।


समझे कुछ नेता जी.......
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG


आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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