हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

मेरे मुखौटे...

कुछ लोग मुखौटे पहन रहे ,
कुछ लोग मुखौटा जीते हैं ।
जो लोग जमीं को तरस रहे ,
वही लोग आसमां जीते हैं ।

कुछ लोग सियासत करते हैं ,
कुछ लोग सियासत पहन रहे ।
कुछ लोग नजाकत रखते हैं ,
कुछ लोग नजाकत  ओढ़ रहे ।

यूँ हम भी अपने चहरे पर , कुछ एक मुखौटे रखते हैं ।
जिसने जैसा चाहा हमसे , वैसा ही हम उसे दिखते हैं ।
क्यों जिद करते हो तुम मुझसे, मेरे किसी और ही चेहरे को ।
तुम अभी गुलाब के आदी हो , मत माँगो के कमल फूलों को ।
इसको ही तो कहता हूँ  मै , सज्जनता सादगी मेरे जीवन की ।
एक बार जो तुमने देख लिया, वह मुखौटा न बदलेगा पुन: कभी ।

तुम चाहे जो भी नाम रखो , मै तो गिरगिट कहता हूँ ।
जो भी जैसी शाख मिली , मै वैसा ही रंग रखता हूँ ।

 सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 20 सितंबर 2010

आँधियों का दौर है

आँधियों का दौर है , सर झुकाकर चलने दो ।
आँधियों के बाद भी , सर उठाकर चलना है ।
जग भले कहे इसे कायरता , कौटिल्य की ये कूटनीति ।
इसके बिना सफल कब , होती कोई युद्ध नीति ।

हर सर की होती मर्यादा , हर दर पे झुकना ठीक नहीं ।
लेकिन बिना सबब के कोई , शीश गवाँना उचित नहीं ।
वो वृक्ष उखड जाते है जो , हर छण तन कर रहते है ।
जीवित रहते वृक्ष वही जो , कुछ पल नम्र भी रहते हैं ।

है आज अगर सत्ता उनकी , मदमस्त उन्हें तुम और करो ।
तुम शीश झुकाकर भले चलो , मठ्ठे से जड़े उनकी भरो ।
फिर जब होगा अंतिम फैसला , सीने पर तीर चलाना तुम ।
विस्मित करके अरि-दल को , फिर विजयी शीश उठाना तुम ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 18 अगस्त 2010

क्या कमी थी दुश्मनों की, फिर दोस्ती करने चले ?

क्या कमी थी दुश्मनों की , फिर दोस्ती करने चले ?
क्या पीठ में थे घाव कम ,  तुम   गले   मिलने  चले ?

इससे अच्छा था कि तुम, दुश्मनों को खोजते ।
कम से कम धोखे से वो , दोस्ती करते नहीं ।

दुश्मनी कैसी भी हो , कुछ दोस्त रहते है वहां ।
दुश्मनी की ओट में  , अक्सर वफ़ा करते यहाँ  ।
तुम ना यू हैरान हो , क्या ये उल्टा राग है ।
दोस्ती बिन स्वार्थ के ,  कौन   करता आज है ।

कौन कहता है कि दुश्मन , दोस्त से अच्छा नहीं  ।
कम से कम दिल पे हमारे ,  घाव तो करता नहीं ।

क्या कमी है दोस्तों की ,  दुश्मनों के बीच भी  ।
बस एक नजर देखो जरा  , दुश्मनों के बीच भी ।


 हित सधे अपना अगर , दोस्ती दुश्मन करे ।
जग के दिखावे के लिए , दुश्मनी करता रहे ।
स्वार्थ हो अपना अगर, दोस्त है दुश्मन बने ।
बस दिखावे के लिए , वो दोस्ती करता रहे ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

जल में रहकर मगर से बैर ?

मित्रों      
आप सभी ने एक कहावत बहुत बार सुनी होगी :-
 
"जल में रहकर मगर से बैर"
अर्थात
जल में रहने पर मगर से बैर मोल नहीं लिया जा सकता है ।
क्यों ?
अरे आप नहीं जानते क्या ?
मगर जल का सबसे ताकतवर प्राणी होता है , उसके आगे जल में हाथी भी कमजोर पड़ जाता है ( वैसे सार्क और व्हेल और भी ताकतवर होती है मगर वो नदी , नालों में नहीं पाई जाती है , जिसके आसपास मनुष्य ही अपने दैनिक कार्य हेतु ज्यादा घूमता है) ।

तो कहते है कि :-  एक बार तो स्वं भगवान विष्णु को अपने प्रिय भक्त "गजराज" को बचाने की आकस्मिक आवश्यकता के तहत नंगे पाँव ही दौड़ कर आना पड़ा था तब जाकर वो मगर से बच पाया था ।

तो अब तो आप समझ ही गए होंगे ।

क्या कहा ?
ये सब तो आप पहले से जानते है !
तो मैंने कब कहा कि मै अब तक कुछ नया बता रहा था ।

जो नया है, वो अब आने जा रहा है, विशुद्ध रूप से मेरी शोध।

तो दिल थम कर बैठे ..!
क्षमा कीजियेगा मेरे कहने का अर्थ है आँख फाड़ कर पढ़े  और मेरे प्रवचनों को अपने दिल, दिमाग में बिठाकर अपने अंतर्मन से गुने ...........   

" जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "


अब जो मेरी जीव्हा  से निकल गया उसे खरा भी साबित करना होगा वर्ना कौन मानेगा ..?
आजकल तो वैसे भी मुफ्त की सलाह पर कोई ध्यान नहीं देता है , भले ही वो कितने ही काम की क्यों ना हो ।
तो चलिए अपने कथन को विसुद्ध तार्किक रूप से किसी निर्मेय , प्रमेय की तरह साबित करता हूँ  :-

कथन :- " जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "
अर्थ    :- जल में सुरक्षित रहना हो तो मगर से बैर करके रहो ।
कारण :- मगर अपनी आदत से मजबूर है । अगर आप उससे दोस्ती भी कर लो या नहीं करके गुटनिरपेक्षता का राग अलापो ,  तो भी वो ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है क्योंकि जिस दिन उसे कहीं और से कुछ खाने को नहीं मिलेगा वो घास खाकर या केवल जल पीकर व्रत  रहने वाला नहीं है । उस समय उसके सबसे नजदीक (दोस्ती की है तो),  या आसपास (अगर गुटनिरपेक्ष  है तो) जल में कौन होगा ?  आप !
और आप अनजाने में, प्यार मोहब्बत में , गुटनिरपेक्षता में या कहें कि मगर के प्रति अपने गफलत में होंगे।
तो फिर समझ लीजिये कि आप का काम तमाम !!!
पढ़ा है ना आपने बचपन में "मगर और बन्दर वाली कहानी" जिसमें मगर की सह्धर्मनी  जिद कर बैठती है कि आपके मित्र का कलेजा बहुत मीठा है , आज वो उसी की दावत करेगी और मजबूरन ही सही मगर बन्दर को मारने के लिए उसे धोखे से अपने घर ले आता है । (वैसे यहाँ मै मगरानी  को दोष नहीं दूंगा क्योकि ज्यादातर स्त्रियाँ स्व्भावगत रूप से या किसी अनजाने जलन के कारण अपने पतियों को उनके मित्रों से किसी ना किसी बहाने अलग करना ही चाहती है।..इस पर फिर कभी अपनी शोध प्रकाशित करूँगा )
और
अगर आप उससे बैर करके रहेंगे अर्थात सदा उससको अपना दुश्मन मान कर रहेंगे तो खुदा कसम दुनिया जानती है कि लोग अपने दुश्मनों को ज्यादा गहराई से जानते है मुकाबिल अपने  दोस्तों के ।
तो उस हालत में आप उससे सोते - जागते सदैव सावधान रहेंगे और हो सकता है कि आप अपने सामर्थ भर उससे निपटने का इन्तिजाम भी कर लें। इस तरह शायद आप ज्यादा देर सुरक्षित रह सकें ।
निष्कर्ष :-  यदि कोई यह सोंचता है कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं करना चाहिए तो  उसे जल को छोड़ कर कहीं और निवास-प्रवास करना चाहिए वर्ना आपकी जान को ज्यादा जोखिम होगा ।
[ इत-श्री ]
नोट :- वैसे यह बहुत ही गूढ़ और गुप्त सिद्धांत था जिसको सभी के सामने तो नहीं प्रकट करना चाहता था मगर जन-कल्याण हेतु मुझे त्याग करना ही पड़ा ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG ।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

पांडव बन कर रहें....

दोस्तों यदि आपको अपने जीवन में सफल होना है तो आपको पांडव बनना होगा अर्थात :-
  1. युधिष्ठिर :- युद्ध में स्थिर रहने वाला धर्म ,विवेक , बैराग्य।
  2. भीम      :- दृढ संकल्प, बल ।
  3. अर्जुन    :- एकाग्रता, एकनिष्ठा ।
  4. नकुल    :- कुलहीन ज्ञान ।
  5. सहदेव  :- लगन (भक्ति) ।
इस प्रकार हम अपने अन्दर सभी पांडवों के प्रतीक धर्म , संकल्प , एकाग्रता , ज्ञान और लगन को वास्तविक अर्थो में समाहित करना होगा क्योंकि बिना इन सभी को सम्मलित किये आप राष्ट्र को रोकने वाले 'धृतराष्ट्र' और उसके 'दु: ' नामधारी पुत्रों से लोहा नहीं ले सकते है ।

"काल का चक्र जब,
                          रच रहा कुचक्र हो ।
और उससे बचने का ,
                          हो ना कोई रास्ता ।
द्वार सब बंद हो ,
                         और रास्ते भी तंग हों ।
बढ़ रहा कुचक्र हो ,  
                         चल रहा नित चक्र हो ।
                                           तब
बचने को काल से ,
                         दो ही हैं रास्ते ।
रोंक दो चक्र को ,
                        और तोड़ दो कुचक्र को।
या तोड़ दो चक्र को ,
                         और रोंक दो कुचक्र को ।
फिर ना कोई चक्र होगा ,
                          ना ही कुचक्र होगा ।।"
 ध्यान रहे कि कुरुक्षेत्र की लडाई केवल द्वापर तक सीमित ना रहकर आज भी हमारे जीवन की दिन प्रतिदिन की घटना है ।
  

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

खेल तुम्हारा, गणित हमारा

मित्रों ,
मेरे किसी गुरु को उनके किसी गुरु ने सिखाया था,
जो मुझको उन्होंने अनजाने में बतलाया था......
"If you want to Win them ,
Then Join them,
Learn their Game from them,
Get Mastership in there game,
Then,Beat them in their Game....!"
मगर मैंने उसे "एकलव्य" सा अपनाया था ,
पर दुख है, इसे सबसे पहले उनपर ही अजमाया था ।
तो आनंद लीजिये कूटनीति का.....
*===================================================* 
(१.)
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है । 
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर ही अजमाया है ।
सब गणित तुम्हारी अपनी , सब खेल वही पुराना है ।
मैंने चुने हैं अपने मोहरे , बाकी सब नियम तुम्हारा है ।
सतरंज बिछाकर औरों को , कैसे ललचाया जाता है ।
पहली चाल उन्हें देकर , उनसे शुरू कराया जाता है।
कैसे पिटवाकर अपने मोहरे , जाल बिछाया जाता है ।
कैसे अपने राजा का , किला बनाया जाता है ।
कैसे प्यादों की कमजोरी का , लाभ उठाया जाता है ।
कैसे घोड़ों के बल पर , टेढ़ी  चाल चला जाता है ।
कैसे तिरछी ऊँट चाल से , वजीर गिराया जाता है ।
कैसे हाथी के बल पर , दुश्मन को रौंदा जाता है ।
कैसे अपनी कमजोरी का , लाभ उठाया जाता है ।
कैसे वजीर सामने लाकर,शह मात बचाया जाता है।
कैसे एक चाल से केवल, बाजी को पलता जाता है।
कैसे प्यादों के बल पर , राजा को जीता जाता है ।

(२.)
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है ।
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर अजमाया है ।
सब पत्ते फेंटे तुमने है , और तुरप तुम्ही ने खोला है ।
मैंने चले है अपने पत्ते , बाकी ये खेल तुम्हारा है । 


दो और दो को पाँच बनाकर , कैसे पेश किया जाता है ।
नहले पर दहला देकर आगे , कैसे चाल चला जाता  है ।
कैसे गुलाम के जोर पर राजा , औरों का गिरवाते है ।
कैसे बदरंग रानियों को , रंग की दुग्गी से पिटवाते है ।
सत्ते पर सत्ता चलकर भी , कैसे रंग जमाते है ।
कैसे गिनकर औरों के पत्ते , अपनी गणित बिठाते है ।
कैसे  इक्के पर तुरुप चाल से , अपना हाथ बनाते है ।
कैसे पढ़कर चेहरों को ,  हम अपना जाल बिछाते है ।


बावन पत्तो के खेल में , कैसे अपनी धाक जमाते है ।
चुपचाप इशारों से केवल , कैसे साथी को समझते  है ।
कैसे कमजोर पत्तों से , सेंध लगाया जाता है ।
कैसे तुरुप के इक्के से , धाक जमाया जाता है ।
नाराज ना हों तुम अपने पर , क्यों खेल मुझे बताया है ।
यूँ तुमने सिखाया नहीं मुझे , अनुभव से ज्ञान ये पाया है ।
सत्ता का था घमंड तुम्हे , आँखों पर तेरे पर्दा था  ।
बदला लेना है तुमसे , ये मेरा बरसों का सपना था।
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है ।
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर ही अजमाया है ।
जब आज फंसे हों बुरे यहाँ , क्यों व्याकुल होते हों इतना ।
याद करो तुम थोड़ा सा , तुमने औरों को लूटा कितना !
(original - १६/०७/२००४, Modified टुडे)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 17 जुलाई 2010

साम दाम और दंड भेद - प्रबंधन के चार सूत्र

"साम दाम और दंड भेद, हैं  चार विधाए संचालन की
इनसे ही चलता आया , मानव सदा पुरातन से ।"

वेदों में लिखा है "साम दाम और दंड भेद" वह अचूक मन्त्र हैं जिससे तीनों लोकों के महिपलों , दसों दिशावों के लोकपाल , समस्त महिपाल एवं उनके अधीन समस्त भू-पाल एवं सामान्य जान को अपने अधीन करने में समर्थ है।
जी हाँ मनु कि समस्त सन्ताने चाहे वो हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों, यहूदी हों, जैन  हों, बौध हो या उनका कोई भी धर्म ना हों और वो परम नास्तिक ही क्यों ना हों और उनकी संख्या कुछ भी हों सभी पुरातन काल से वर्तमान तक इन्ही चार विधावों से सदा संचालित और नियंत्रित होते आयें है।

यह सत्य है कि हर काल खंड और देश-काल का अलग रहन सहन और नियम विधान होता है मगर चाहे वो भूत काल रहा हों या वर्तमान हों चाहे वो भारत हों या पाकिस्तान , चाहे अमेरिका हों या यूरोप 'साम दाम और दंड भेद' ही समस्त जन और समाज को नियंत्रित और संचालित करता आया है और करता रहेगा। 

"साम दाम और दंड भेद हैं चार विधाए शासन की
ये अमोघ अस्त्र है जन मानस के संचालन की । "

इसमें कुछ भी नया नहीं है, ये चिर पुरातन नियम है ।

मगर

"साम दाम और दंड भेद" चतुर्मुखी हथियार है जो जन मानस के संचालन हेतु तभी अमोघ है जब इनका प्रयोग सजगता से किया जाय। ये मानव द्वारा प्रयोग किये जाने के अस्त्र हैं ना कि किसी मशीन के द्वारा। इसका प्रयोग कब, कहाँ,किस पर और किसके द्वारा किया जा रहा है उसके आधार पर निर्धारित किया जाता है कि इसके किस मुखाग्र से प्रहार किया जाय। इन्हें अचूक बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि इनका प्रयोग किये जाते समय काल पात्र और स्थान का ध्यान रखा जाय। क्योंकि ये चारो अस्त्र सदैव एक सामान सभी पर प्रभावी नहीं होते है ना ही सभी व्यक्ति इसे समस्त रूपों में चलने के योग्य होते है ।
यदि 'साम' से कोई समाज संचालित होता है तो कभी उसपर नियंत्रण हेतु 'भेद' का नियम अपनाना होता है ,
कभी 'साम और भेद' का प्रयोग असफल होने पर 'दाम' का लोभ दिखाना पड़ता है तो कभी "साम दाम और भेद" तीनो के असफल होने पर दंड का भय दिखाना पड़ता है।

ध्यान रखें :-  'साम' श्रेष्टतम है , 'दाम और भेद' मध्यम और 'दंड' निकृष्टतम कोटि का अस्त्र है। 

जो समूह 'साम' से संचालित हों रहा हो  वहां अन्य का प्रयोग करने से साम धीमे-धीमे अप्रभावी होने लगता है।
जहाँ 'दाम' का लोभ देने पर समाज पतित होता है, 'भेद'  से समाज विघटित होता है और  लम्बे अवधि के 'दंड' से बिद्रोही हो जाता है।

और जब 'साम' अप्रभावी हों जाय तो पहले भेद को अपनाया जाना चाहिए (जिससे दाम भी बचा रहे और समाज पतित भी ना हो) क्योंकि विघटित समूह और समाज प्राय: तेज प्रगति करते है और उनके आगे पुन: एक होने कि संभावना बनी रहती है मगर पतित तेजी से और पतन की और बढता है और उसका वापस लौट पाना मुश्किल होता है।

और अंत में जब पूर्व के तीनो से काम ना बने तो... दंड है ही।

और कुछ लोग दंड भय से ही चलते है जैसे - बाबा तुलसीदास जी ने कहा है-
'सूद्र,गंवार,ढोल,पशु,नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी'
हालाँकि कुछ लोग उपरोक्त पाँच में सूद्र और नारी के नाम पर नाराज हो जाते है और कहते है की वास्तव में सूद्र और गंवार दो ना होकर एक ही अर्थात गँवार-सूद्र (सूद्र जो पड़ा लिखा ना हो) एवं पशु नारी अलग-अलग ना होकर 'पशु नारी' है अर्थात वो नारी जो पशु सामान हो 'जैसे रामचंद्र जी के ज़माने की ताड़का' समझा जाना चाहिए। इस प्रकार इनकी संख्या पाँच से तीन ही रह जाती है। मगर पुन: कुछ लोग को इसमे पशुवों को हटाने और किसी भी प्रकार की  नारी को शामिल करने पर आपत्ति है और वो पशु को अलग और नारी का संधि बिच्छेद कर नार+अरि=जो नारी का शत्रु हो कहते है। खैर अभी इस विवाद पर विस्तार से चर्चा करने का मन नहीं है अतः: जो  बाबा ने कहा हो वो जाने जो , जो बच्चो को समझाना हो वो समझे ..........!
समूह के साथ ही "साम दाम और दंड भेद" के व्यक्तिगत प्रयोग में भी उपरोक्त सावधानी बरती जानी आवश्यक है क्योकि-
प्रत्येक व्यक्ति एक समान नही होते है, भगवान ने सभी को अलग-अलग बनाया है, भले ही हम उन्हें समूह में कितना ही अभ्यास कराकर एक जैसा बनाने की कोशिश करें मगर आतंरिक मनोभाव, आचार विचार और सोंचने का तरीका अलग-अलग ही रहता है। कौन सा व्यक्ति किस प्रकार के अस्त्र और उसकी कितनी मात्र के प्रयोग से नियंत्रित होगा और किस मात्रा और किस अस्त्र के प्रयोग के बाद वो पूरी तरह से अनियंत्रित, बिद्रोही, पशु समान अथवा मूक बधिर, निर्जीव  बन जायेगा इसका ध्यान रखा जाना जरुरी है और एक बेहतर शाशक/प्रबंधक वही है जिसको इस बात का सदैव घ्यान रहता है ना की वो जो अपने सत्ता के घमंड में जबरन एक ही तरह से सबको हांकने की कोशिश करता रहे।
अतः प्रबंधन के चार सूत्र 'साम दाम और दंड भेद' का प्रयोग करें परन्तु संयम और सजगता के साथ....!


आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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