हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

ये मान्यता है...पर मै इससे कदापि सहमत नहीं।

मान्यता है और मीडिया के लोग कहते हैं ये तस्वीर राम भक्त हनुमान जी के पैरों की है श्रीलंका में.... 

पर मै इससे कदापि सहमत नहीं कि ये तस्वीर राम भक्त हनुमान जी के पैर हैं


अगर ये निशान हनुमान जी के पैरों का होता तो अकेला नहीं होता..वरन दूसरे पैर का निशान या और भी पदचिन्ह होते वहां पर क्योंकि हनुमान जी केवल एक पैर पर तो खड़े नहीं रहे होंगे लंका में।


निश्चित तौर पर यह बाली पुत्र और वानर सेना के सेनापति महाबली अंगद के पैर के निशान हैं।

और ये तब के हैं जब वो भगवान् राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए थे और रावण के ललकारने के जबाब में अपना "एक पैर जमा कर" वहीँ राजसभा में खड़े हो गए थे और समस्त राक्षस जाति को ललकार कर बोले थे कि यदि कोई मेरा एक पैर भी हिला दे तो भगवान् राम अपनी हार बिना युद्ध के मान लेंगे...

और कहते हैं कि महाबली अंगद ने अपना पैर भूमि में इतना तगड़ा जमाया था कि दशानन रावण के दरबार का कोई भी बलशाली राक्षस और यहाँ तक उसका इंद्र तक को बंदी बना लेने वाला पुत्र इन्द्रजीत भी अंगद के एक पैर को हिला नहीं पाया था।

तो यह सत प्रतिशत निश्चित तौर पर अगर है किसी के पैरों का निशान तो महाबली बालि पुत्र अंगद का ही।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

शनिवार, 12 जुलाई 2014

वास्तव में...

ज्ञान प्राप्त करने हेतु अच्छा गुरु नितांत आवश्यक है 
परन्तु
गुरु के देने मात्र से ही शिष्य को ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता है ,
वरन 
सजगता से शिष्य के प्रयत्न कर लेने से ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है। 

यूँ तो 
गुरु के पास रहकर बहुत बार मन में भ्रम पैदा हो जाता है कि हमें बहुत कुछ मिल रहा है ,
परन्तु 
यदि हम पहले से ही भरे हुए पात्र  अथवा बिना पेंदी के बर्तन के समान हैं तो गुरु की ज्ञान वर्षा भी व्यर्थ है। 
वास्तव में 
गुरु तो सहज भाव से ही अपने समस्त शिष्यों को अपना ज्ञान लुटाता रहता है ,

जो अयोग्य होते हैं वो चूक जाते है। 
जो योग्य शिष्य होते हैं वो संगृहीत कर लेते हैं ,
और महान शिष्य, महान गुरुओ का नाम रोशन कर जाते है। 

"कोहिनूर सा बनने के लिए जितना महत्वपूर्ण ये है कि हीरे के टुकड़े को परख कर बेहतरीन तरीके से तराशने वाला मिले उतना ही महत्वपूर्ण ये भी है कि उस हीरे के टुकड़े में भी तराशने योग्य संभावना और क्षमता होनी चाहिए अन्यथा कोई भी जौहरी कोयले के टुकड़े को हीरा नहीं बना सकता। "


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG 

शनिवार, 4 जनवरी 2014

होना न होना..

कुछ होना या ना होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है , जितना यह महत्वपूर्ण है कि आप को उसका पता है या नहीं।
क्योंकि यदि आपको कुछ होने का वास्तविक ज्ञान नहीं है तो वह होना ही व्यर्थ है , 
और यदि कुछ ना होने का आपको पता है , ज्ञान है , आभास है , तो वह ना होना भी आपके लिए महत्वपूर्ण है। 


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 12 मई 2013

सफल बे-ईमान...

जब बेईमान व्यक्ति सफल होता है तो यह उसकी बेईमानी की सफलता नहीं वरन यह उसमे पाए जाने वाले अच्छे  गुणों की सफलता होती है ।

यह जरूरी नहीं है की एक ईमानदार आदमी सभी योग्यताओं से युक्त हो । हो सकता है की कोई व्यक्ति सिर्फ ईमानदार हो पर साथ में कमजोर,हिम्मत हीन , अव्यवहार कुशल या कायर हो । तो अगर एक ईमानदार व्यक्ति असफल होता है तो ज्यादा संभावना होती है कि वह अपनी ईमानदारी के वजह से नही वरन अपनी अन्य कमजोरियों के वजह से असफल है 

वही एक बेइमान व्यक्ति साहसी,बुद्धिमान,संगठन क्षमता युक्त,भविष्य का अनुमान करने वाला,पहल करने वाला आधि उच्च गुणों से युक्त हो सकता है और इन सारे गुणों की वजह से वो आसानी से सफलता प्राप्त कर लेता है । जैसे चोरी भी एक जटिल विग्ज्ञान है , इसमे बडे गुण चाहिए । एक सफल चोर में एक सैनिक के समान हिम्मत , एक संत के समान शांति और एक ज्ञानी के समान अन्तर्दृष्ट होनी चाहिए अन्यथा ना तो वो चोरी करने की हिम्मत जुटा पायेगा और अगर जाएगा भी तो पकड़ा  जायेगा ।

चोरी या बेइमानी सफलता नही लाती है क्योंकि वो तो अपने आप में असफल होने को आबद्घ है । हाँ अगर उसमे अन्य योग्यताये जुड जाए तो वह सफल हो सकती है । वही अगर ये सारे गुण किसी अ-चोर में हो तो उसकी सफलता के क्या कहने ।

वास्तव में दुनिया के बुरे से बुरे व्यक्ति की सफलता के पीछे वही गुण होते है जो दुनिया के अच्छे से अच्छे व्यक्ति की सफलता के पीछे होते है और इसका उल्टा  असफलता के लिए लागू होता है ।

तो व्यर्थ में किसी बे-ईमान सफल व्यक्ति से सिर्फ इस लिए इर्ष्या ना करे की वो बे-ईमान है , पहले उसकी सफलता के अन्य कारणो को भी समझे

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

त्रिकाल

१. 


अब मनमोहन 'सिंह' जैसे प्रधान मंत्री से यही सुनना बाकि रह गया था ..
" अन्ना के अनशन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है.." 
अरे मै यह नहीं कहता कि यह असंभव है, कुछ भी हो सकता है....
मगर अगर एसा है तो बात गंभीर है , इसे साबित करो ना प्रधानमंत्री जी...
केवल जुबानी जमाखर्च क्यों ?
अरे तुम्हारी दर्जन भर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसिया क्या हिजड़ो कि तरह से अपना हाथ ताली बजाने में लगाये हुए है...जो उन्हें आपकी विदेशी हाथ के बात को प्रमाण सहित साबित करने के लिए सबूत नहीं मिल रहा है ?

२. 

देखा आदरणीय योग गुरु बाबा रामदेव जी...
अगर आप उस दिन डरकर "सलवार समीज" पहन कर महिलाओं के झुण्ड में न भागते
और अपनी गिरफ़्तारी होने देते तो जो हाल आज दिल्ली का है और जो जन-सैलाब उमड़ा हुआ है..
वो तब उसी दिन आपके गिरफ़्तारी के साथ हो जाता और आपको भी यू बे-आबरू होकर अपना अनसन न तोड़ना पड़ता...
आपकी ये एक छोटी सी भूल आपके राजनैतिक कैरियर और आपके दम-ख़म पर हमेशा एक बदनुमा दाग की तरह रहेगा इसका मुझे हमेशा अफसोस होगा..पर क्या करे.. आपमें वो नैतिक बल नहीं था जो पहले "महात्मा गाँधी और जे.पी" में था और अब अन्ना हजारे में है...

३.



बाबा तुलसीदास ने सही कहा था...
"विनय न मानत जलधि जड़,गए तीन दिन बीत..
बोले राम सकोपि तब , भय बिन होय न प्रीति "
तो लीजिये आज फिर
रामलीला मैदान की साफ सफाई हो रही है..
जिनके अहंकार को फूँका जाना है वो अपने पुतलो के साथ तैयार खड़े है...
और जिन्हें फूँकना है वो भी धनुष बाण लेकर दल-बल के साथ आने ही वाले है...
जनता भी आ रही है...
संग
जनता जनार्दन भी आ रहे है...
देखते है ये आग कितने देर धधकती है और अपनी लपटों में कितनो को जलाती और झुलसाती है...


मंगलवार, 16 अगस्त 2011

दोस्ती और दुश्मनी..

दोस्ती और दुश्मनी , दोनों को निभाने के लिए दिल में जज्बा , दिमाग में पैनापन और हौसले (जिगर) में मजबूती की जरूरत होती है..।

दोस्ती और दुश्मनी दोनों सीखने के लिए , महसूस करने के लिए और निभाने के लिए हमें एक दूसरे के नजदीक जाना पड़ता है , बीच की दूरियों को मिटाना पड़ता है और अपने दिल , दिमाग और नजर में उसे बसाना पड़ता है।

अगर दोस्ती दो दिलो को मिलाती है , दो जज्बातों के बीच एक पुल बनाती है........ तो दुश्मनी दो दिमागों को नजदीक लाती है और उनके इरादों के बीच की दीवार गिराती है।

जहाँ एक अच्छी दोस्ती कभी कभी हमारी रातो की नींद हराम करती है... वही एक बेहतरीन दुश्मनी अक्सर हमें चैन की नींद उपहार में देती है ।

ये हो सकता है कि आपके अच्छे दोस्त भी आपका साथ बुरे दिनों में छोड़ दे.... पर यह कभी नहीं होता है कभी आपके दुश्मन आपको भूल जाये ।

दोस्ती एक कमजोर और खोखली नींव पर भी खड़ी हो जाती है पर ... दुश्मनी सदैव एक मजबूत आधार पर ही टिकती है ।

दोस्ती में लोग अपनी आदतों को दूसरे पर थोपने की कोशिश करने लगते है और दुश्मनी में खुद से दूसरो की आदतों को जानने की कोशिश करते हैं ।

दोस्ती की चाहत रखना सरल है , करना आसान है पर वास्तव  में उसे निभाना कठिन है पर ..दुश्मनी की चाहत रखना कठिन है , करना आसान है और निभाना अत्यंत ही सरल है ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

एक तथ्य..

किसी ने क्या खूब सच कहा है ...
"आप जिस कसौटी पर परखते हैं हमको ,
गर आपको परखें तो अंजाम क्या होगा ?"

हम इस संसार में , मानवीय रिश्तो के मायाजाल में , और शुद्ध व्यवसायिक उतार चढाव में जिन कसौटियों पर दूसरों को परखते हैं और उनके बारे में जितनी सरलता से कोई भी निष्कर्ष निकाल लेते हैं....

उतनी ही सहजता से हमने , आपने क्या कभी यह सोचने की जरुरत महसूस की कि अगर हमें भी कोई दूसरा अथवा स्वयं हमी अपने को उन्ही कसौटियों पर परखे तो वास्तव में क्या निष्कर्ष होगा ?

शायद वही जो प्राय: हम दूसरों के लिए निकलते हैं ,

और अगर यह मानने को हमारा मन तैयार नही हो रहा है तो इसका अर्थ शायद यह है कि हमारे अंतर्मन का अभिमान झुंकने  को तैयार नही हो रहा है ।

तो केवल यह मत कहें कि अगर उस जगह पर मै होता तो ऐसा नही करता ।

यह कहने के पहले आप स्वयं को उन्ही मान्यताओं , आकांक्षाओं , सम्बन्धों और परिस्थितियों के मध्य ईमानदारी से स्थापित करें और फिर तथस्त / निर्विकार भाव से किसी दृष्टा की  तरह से देखें और फिर कुछ कहें ।

आपका अपना

                       विवेक.....

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

रविवार, 23 जनवरी 2011

आवो तुम्हे पालतू बनायें...

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।

हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।

परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है ।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी तक ।

ना ना .... जरा दो मिनट रुक जाइये  
पोस्ट पढ़े बिना सिर्फ टाइटिल देख कर यह मत सोंच लीजिये कि मैं किसी हालीवुड की  'XX' या 'XXX' श्रेणी की फिल्म का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहा हूँ या किसी भोजपुरिया फिल्म का शीर्षक अपने ब्लाग पर लगा दिया है।

वैसे भी मै वही कहता या लिखता हूँ जो मेरे दिल की बात होती है और दिल की बात कहते समय मै शब्दों पर कम अपने भावों पर ही ध्यान देता हूँ , तो जो दिल में बात उठती है वो लगभग वैसी की वैसी ही सामने प्रगट हो जाती है बिना सेंसर हुए ...
सुना है ना आपने " पर्दा नही जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या ...."

और आज तो मै "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" के मध्य देश और समाज में हुए विकास की भी बात करने जा रहा हूँ ....
अब आप भी सोच रहे होंगे कि "लौंडा बदनाम हुआ....से मुन्नी बदनाम हुयी" तक के जुमले का देश और समाज के विकास से क्या वास्ता....?
चलिए ज्यादा भूमिका बाँधे बिना पहले यह बताता हूँ कि आज अचानक यह विषय लेकर मै क्यों बैठ गया...

हुआ यह कि आज मै इतना त्रस्त हो गया कि मजबूरन यह पोस्ट लिखने के लिए बैठ गया....
और त्रस्त भी क्यों हुआ... हर पाँच मिनट पर मुन्नियों के बदनाम होने से ।

क्या ? आप सोच रहे है कि मै फिर शब्द जाल में उलझाने लगा...
नही नही ऐसा कदापि नही है...
वास्तव में यदि काल पात्र समय का सही से विवरण ना दिया जाय और बात को सन्दर्भ से अलग कर के एकतरफा देखा या प्रस्तुत किया जाय तो अर्थ का अनर्थ होने लगता है । और मै तो वैसे ही अनर्थकारी चर्चा छेड़ने जा रहा हूँ इसीलिए  प्रयास कर रहा हूँ कि इसमे अनर्थ की जगह अर्थ ही आप के समक्ष प्रस्तुत हो ..

आगे आपका विचार , उस पर मेरा नियंत्रण नही है ,

[ अरे जब लोकतंत्र के ज़माने के ऐ. राजा और स्थायी रोजगार की तलाश में लगे अंग्रेजो के ज़माने के दिग्गी राजा पर आज देश के सर्वश्रेष्ट शक्तिमान व्यक्तियों में शामिल सोनिया जी और मनमोहन जी का नियंत्रण नही है और जिसके जो मन में आ रहा है वो अनाप सनाप तरीके से बेधड़क  होकर कर रहा है या रात नशे में किसी पुरातन धटना से सम्बन्धित कोई सपना देख कर देश का लाभ-हानि विचारे बिना सुबह महज अपनी कब्जियत दूर करने के लिए और अपना तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने हेतु कुछ भी बेशर्मो की तरह बक दे रहा हो और वो दोनों चुपचाप तमाशबीन बने रह जाय वहां हमारा आपका एक दूसरे पर क्या नियंत्रण...? ]

तो फिर चलिए " लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक.... हुए देश और समाज के विकास" पर सीधी बात...
आज १५ दिसम्बर की रात थी , और हिन्दू धर्म के लिए इस माह की यह आखिरी रात थी जब भोले-भाले नवयुवको को बलि-वेदी पर चढ़ाया जा सकता हो मतलब विवाह-वेदी पर बैठाया जा सकता हो, भोले-भाले नवयुवको की बात इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि आजकल बेचारे भोले-भाले नवयुवक ही घर परिवार,धर्म और समाज के कहने (उकसाने) पर बेदी पर बैठते है वरना जो भोले-भाले नहीं है वो घर-परिवार और समाज को ठेंगा दिखाकर ठसके से "लिव-इन" जैसे सम्बन्ध को अपनाने लगे हैं (हमारे ज़माने में तो जीवन साथी पाने का यह तरीका केवल अमेरिका जैसे देशो में ही था और बेचारा अपना मुल्क तब बहुत पिछड़ा हुआ था.., यह मत सोंचिये की अगर तब सुविधा होती तो मै क्या करता, यहाँ सवाल सुविधा होने और ना होने का है ) ।

तो समाज में रहने के कारण मुझे भी आज तीन-चार शादियों में शामिल होने का निमंत्रण मिला था, कहीं निमंत्रण वर पक्ष से था तो कहीं कन्या पक्ष से ।
हालाँकि आज मै अपनी रोजी-रोजगार के कार्य से कुछ ज्यादा ही थका था , साथ ही कुछ एसिडिटी की समस्या भी शायद ठण्ड की वजह से पैदा हो गयी थी और कुछ मौसम भी सर्द था जिसके कारण कुछ भी खाने का मन भी नही था तो पहले सोचा कि कहीं ना जाऊं और बाद में ना आ पाने का कोई उचित कारण खोज कर क्षमा मांग लूँगा (क्योंकि मात्र थका होना,एसिडिटी होना और मौसम सर्द होना जैसे कुल तीन कारण किसी को ????-वेदी पर चढ़ाये जाने के अवसर पर ना शामिल होने हेतु शायद पर्याप्त नही है ) मगर फिर ख्याल आया कि कम से कम कन्या पक्ष के निमंत्रण का तो आदर किया ही जाना चाहिए तो मै तैयार हो गया ।

संयोग से कार्यालय की कार और उसका चालक भी अभी साथ ही था जिससे मुझे स्वयं से ज्यादा तकलीफ भी नही करनी थी बस अपना भार उस पर ( कार पर भौतिक रूप से और उसके चालक पर मानसिक रूप से ) लाद देना था और एक जगह से दूसरी जगह उपस्थिति दर्ज कराकर वापस आ जाना था । और संयोग से मेरे एक अजीज बड़े भाई साहबान  भी साथ ही थे तो सफर में बात करने वाला भी मिल गया,फिर क्या था चल पड़े सवार और सवारी।

यात्रा की शुरुवात करते समय तक जो दुश्वारियां गिनाई वो तो थी ही अब गोरखपुर जैसे पुराने शहर की असली समस्या सामने आने लगी कि,  हर सड़क-हर गली और शायद पूरा शहर आज बारात और उसके बारातियों से जाम है , तो कार से किया जाने वाला सफ़र भी पैदल यात्रा के समान ही था और फिर जैसे ही एक बारात या मैरज-हॉउस से आगे बढ़े वैसे ही फिर अगला मिल जाय.... 

आखिर कुछ खींझ कर और कुछ अपनी बोरियत मिटाने हेतु मैंने भाई साहेब को छेड़ा "देख रहे है भाई साहेब आज भाई-बंधू और समाज के लोग कितने स्वार्थी और दूसरों के भावी दुःख में खुश होने वाले हो गए है कि बेदी पर चढ़ने जाते हुए एक मासूम के भावी परिणाम को सोच कर मारे ख़ुशी के नाच- नाच कर "चांस पे डांस" का अवसर नही खोना चाहते है ।
भाई साहेब ने भी मेरे बे-सिर पैर के दर्शन पर बजे कोई सीधी प्रतिक्रिया देने के अपने चुटीले अंदाज में एक नया ही राग छेड़ दिया कि, ध्यान दो ..! आजकल कोई बारात बिना "यह देश है बीर जवानो का,अलबेलों का,मस्तानो का..... यहाँ  चौड़ी छाती बीरो की... इस देश का यारों क्या कहना ..." जैसा जोशीला गाना सुने बिना जोश में आती ही नही है ? और कम से कम एक बार यह गाना हर बारात में बजता जरुर है ।

मै इससे पहले इसपर अपनी कोई प्रतिक्रिया देता, मुझे ध्यान आया कि पिछले पौन घंटे से हर पाँच मिनट पर जो गाना सबसे ज्यादा, बार-बार बज रहा है वो तो "मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए" है । और यह ध्यान आते ही मेरे मन में ख्याल आया कि पहले तो बचपन में मै जब किसी शादी-बारात में जाता था तो ज्यादातर लोग "बारात में नाचने गाने वाली नचनियों की पार्टी जिसमे शामिल महिलाओं को उस ज़माने में 'पतुरिया' कहा जाता था" को ले जाते थे और फिर पूरी रात नाच गाना चलता रहता था, वर और कन्या पक्ष दोनों तरफ के लोग खा-पी कर शुरू से अंत तक नाच गाना देख-सुन कर आनंदित होते रहते थे और उस ज़माने में वो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त मर्यादित आचरण ही था हाँ नचनियों को ना लाना जरुर वर पक्ष को अपमानजनक स्थित में पहुंचा देता था ....

तो उस ज़माने कुछ प्रचलित गानों में में जो गाना सबसे ज्यादा प्रचलित था वो "लौंडा बदनाम हुवा नसीबन तेरे लिए" था क्योंकि वो आज भी मुझे याद है, और मुझे यह भी याद है की बचपन में मैंने किसी से इस गाने का अर्थ जब पूंछा था तो जबाब में शायद डांट ही सुनने को मिला था, गाने का अर्थ तो समय ने समझाया ।

तो दोनों गानों के बोल एक साथ जेहन में आते ही एकाएक मुझे ख्याल आया कि मेरे बचपन से लेकर अब तक वास्तव में देश और समाज ने क्या क्या प्रगति कर ली है और क्या क्या परिवर्तन हो चुके हैं ? मैंने भाई साहेब से कहा देखिये पहले की शादी-बारात और आज की शादी-बारात में क्या क्या अंतर आ गया है ...

पहली प्रगति:- पहले लौंडा बदनाम होता था और अब मुन्नी बदनाम होने लगी है ....  अर्थात पुरुष वर्चस्व समाप्त हो गया , महिला वर्ग की भी खुले आम भागेदारी सामने आने लगी है ।

दूसरी प्रगति:- 'सट्टा बंधा कर' अनावश्यक 'पतुरियों' पर पैसा खर्च कर एक-दो नाचने वालियों की जगह समाज में आये ज्यादा खुलेपन,आत्मनिर्भरता और सहयोग की भावना  के कारण अब घर-परिवार, दोस्तों के परिवार और मोहल्ले से बारात में शामिल होने हेतु सज-धज कर आने वाली भांति-भांति के उम्र की महिलाएं ही बारात में नाच कर बराती,घराती और मार्ग पर चलने वाले यात्रियों के मनोरंजन की जिम्मेदारी अपने कंधो (मतलब अपने कमर पर) ले चुकी हैं ,जिसका एक सामाजिक प्रभाव यह हुआ है कि पतुरिया जैसा भौड़ा शब्द भी कहीं ना कही अपनी मान्यता खो चुका है, और उस विरादरी को अपनी रोजी रोटी हेतु भले ही लाले पड़ गए हों पर वर पक्ष का खर्चा कम हो गया है क्योंकि नाच गाने हेतु किराये के नचनियों पर निर्भरता समाप्त हो गयी है । इस प्रगति से कृपया महिलाएं नाराज ना हों क्योंकि पुरुष तो पहले भी जन्मजात नचनिया था आज भी है ।

तीसरी प्रगति :- पहले प्राय: बेचारे घराती अपना पेट पकडे  और मुह बाँधे चुप-चाप तब तक इंतिजार करते थे जब तक बाराती ना डकार ले लें , मगर अब ज्यादातर बारात आने के पहले ही घराती डकारता है फिर जूठे-कूठे मेज , स्टाल पर बेचारा बराती भोजन करता है अर्थात घरातियों पर बारातियों की श्रेष्ठता लगभग समाप्त हो गयी है

चौथी प्रगति :- पहले बिकाऊ दुल्हे के पिता द्वारा दहेज़ मांगे जाने पर और उसे उचित मूल्य ना चुका पाने पर ना केवल कन्या का पिता वरन कन्या पक्ष के अन्य सम्मानितगण भी वर पक्ष को रिझाने-मानाने के लिए अपना शीश नवाने लगते थे, अपनी पगड़ी उतरने लगते थे, मगर अब ज्यादा मोल भाव करने पर दुल्हे, उसके पिता, भाई-बंधू और लगे हाथ बारात में शामिल बे-सहारा बाराती ( बाराती सदैव बेसहारा ही होते है.. उनका मोल केवल तब तक होता है जब तक बारात दुल्हन के घर ना पहुँच जाय, फिर सड़क के कुत्ते और लौटे बाराती में कोई अंतर नही रह जाता) भी दो पल में लतिया-जुतिया दिये जा रहे हैं , और जो मौके से भाग नहीं पाते उनका आगे का सत्कार सरकारी ससुराल में होने लगता है , तो दहेज़ की समस्या का भी कुछ-कुछ निदान हो रहा है

पाँचवी प्रगति :- जैसा की पहले ही कह चुका हूँ कि जो लोग भोले-भाले नही है, उनको इन सब बन्धनों से दूर कहीं शांति और ज्यादा खुलेपन से अभी तो भारत के मेट्रो शहरों में ही लागू लिव इन रिलेशन को अपना लेने की सुविधा मिलने लगी है, और आगे उम्मीद है कि जल्द ही पूरे देश में इसकी मान्यता मिल ही जाएगी ।

और सबसे अंत में
छठवीं प्रगति :- अब तो भारत में भी शादी करने और हनीमून मनाने हेतु एक कन्या और एक युवक के जोड़े के होने की बाध्यता समाप्त हो रही है , राजधानी के एक अदालत के मध्यम से कुछ माह पहले कानूनन अप्रत्यक्ष  रूप से सहमति देश का विधान दे ही चुका है , आगे भारत के भावी कर्णधार पूत और कुछ समाज सेवी पेट दर्द से परेशान एन.जी.ओ. उसे नवीन दिशा और मंजिल दे ही देंगे, तो पूरब और पश्चिम का अधिकांश अंतर समाप्त हो गया है और जो शेष रह गया है वो भी जल्दी ही समाप्त हो जायेगा और फिर पूरब पश्चिम से निश्चित ही हर मामले में आगे होगा

तो चलिए बात समाप्त करता हूँ , आगे मुझसे सहमत होना ना होना आपकी मर्जी ... वैसे भी मुझे इससे कभी फर्क नही ही पड़ता है.. क्योंकि मेरे कहने के पूर्व ही हम जैसो के लिए ओशो ने कह दिया था " मुझे सही समझे जाने की कोई जिज्ञासा नहीं। यदि कोई सही नहीं समझता तो यह उसकी समस्या है,उसका दुख है। मैं अपनी नींद नहीं खराब करूंगा "

अब रात भी बहुत ज्यादा हो गयी है, साथ ही कई शादियों में शामिल होने के बाद भी मुझे भूंखे पेट (एसिडिटी के कारण) सोना भी है ।..... तो नमस्कार , शुभ रात्रि

आपका अपना (यही लिखा जाता है कूटनीतिक तौर पर जबरदस्ती अपनापन दिखने के लिए)
विवेक (मिश्र..अनंत)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 1 नवंबर 2010

एकै साधे सब सधे

साथियों
              आज हर तरफ भ्रष्टाचार,लूट-घसोट  का बोलबाला है, हर कोई इससे व्यथित है। जिसको देखो वही कहता है कि फलां विभाग में बड़ा भ्रष्टाचार,लूट-घसोट का बोलबाला है मगर उसी व्यक्ति जब उसके अपने कार्य-क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार,लूट-घसोट के बारे में पूंछो तो वो अपना मुह घुमा लेता है या मात्र मुस्कुराकर रह जाता है ।

प्रशासन से लेकर शासन तक के सभी जिम्मेदार अधिकारी,पदाधिकारी सदैव यही कहते है कि वो लगातार (नीचे व्याप्त) भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयास कर रहें है मगर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं लेता है।
आखिर क्यों ?
कहाँ किस स्तर पर कमी रह जा रही है भ्रष्टाचार का नाश करने में ?
कहीं हमारा प्रयास " पर उपदेश कुशल बहुतेरे " वाला तो नहीं है ?

तो जनाब
ये जगत का नियम है कि धारा प्रवाह की दिशा सदैव ऊपर से नीचे की तरफ होती है।

अत: यदि श्रोत निष्कलंक हो तो मध्य या अंत में चाहे जितना मिलावट क्यों ना हो जाय , पूरी धारा को कभी पूर्णतया कलुषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि पवित्र उदगम लगातार नयी उर्जा , नयी शक्ति और पवित्रता का प्रवाह करता रहता है जिसके संचरण से मार्ग में होने वाले परिवर्तन कभी स्थाई स्वरुप नहीं लेने पाते है ।

परन्तु

यदि उदगम ही दूषित,जहरीला हो जाय तो पूरी धारा दूषित हो जाएगी और कोई लाख कोशिश  करे,वो कछारों पर पवित्रता नहीं बनाये रख सकता क्योंकि वो उदगम का स्वरुप नहीं बदल पायेगा ।

और ये सिद्धांत केवल नदी, झरनों पर ही नहीं वरन मानव समाज पर भी लागू होती है ।

अत: यदि भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो देश,समाज,धर्म  के शीर्ष  शिखर पर बैठे लोगों को पहले अपनी पवित्रता बनाये रखना होगा और फिर कहा गया है कि "एकै साधे सब सधे,सब साधे सब जाय" ।


                                                     © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

अयोध्या का सर्व-सम्मत हल न्याय-तन्त्र ने ही दिया है और आगे भी देगा...

मित्रों इलाहाबाद उच्च न्यायलय से अयोध्या समस्या का बहु प्रतिक्षित फैसला आ चुका है....जिसके लिए उच्च न्यायलय ने विभिन्न साक्ष्य,पुरातात्विक प्रमाण  और गवाहियां देखा है
मगर अब इसकी अलग अलग व्यक्तियों, समुदायों, धार्मिक और राजनैतिक नेतावों और उनके दलों के द्वारा व्याख्या, समालोचना, प्रतिक्रियावों का दौर भी चालू हो गया है.... जो विभिन्न प्रिंट और लाइव मीडिया चैनलों के माध्यम से जनमानस के सामने आ रहा है ।
कोई कह रहा है कि यह बहुत ही बेहतर फैसला है, कोई कह रहा है कि यह फैसला कम एक समझौता ज्यादा है, कोई कह रहा है कि इसमे तर्क और साक्ष्य के मुकाबले आस्था को ज्यादा महत्व दिया गया, किसी को यह पूर्णतया मान्य है तो कोई उच्चतम न्यायलय जाने की बात कह रहा है।

चलिए उच्चतम न्यायलय भी देख लेते है वहां से भी देर सबेर आवश्यकतानुसार इसी से मिलता जुलता फैसला आने की ९९.९९ प्रतिशत उम्मीद है , कारण आगे समझ में आ जायेगा ।

वैसे यह आज के भारत के परिपक्व सोंच का ही नतीजा है कि ९९ प्रतिशत लोगों की प्रतिक्रिया सीधी साधी, एकदम संयत, सधी हुयी और भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने वाली ही है सिवाय वर्षों से पेट्रो डालर के बल पर फलने - फूलने वाले और अपनी राजनैतिक जमीन खो चुके कुछ तथाकथित ढोंगी राजनैतिक नेतावों  के जो महज अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के चक्कर में ना केवल न्यायिक अवमानना करने की मूर्खता कर रहें है वरन अपने आप को एक समुदाय विशेष का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की लालच में देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक देने का प्रयास कर रहे है।
इनसे सावधान रहने की जरुरत है......क्योंकि पुरखों ने कहा है कि जो अपनो का नहीं होता है वो कभी गैरों का नहीं हो सकता है

इसके अलावां कुछ लोगों ने फैसले का स्वागत तो किया है मगर उनके द्वारा कहा जा रहा है कि "अयोध्या समस्या का सर्व-सम्मत हल न्यायिक-तन्त्र नहीं दे सकता और इसके लिए दोनों समुदायों को आपस में वार्ता करके कोई सर्व-सम्मत हल निकलना होगा" यह भी निहायत ही मूर्खता पूर्ण तर्क है क्योंकि यदि ऐसा होना होता तो पिछले २००-२५० सालों में हो गया होता

अब कुछ अन्य बातें
१. सारे पौराणिक ग्रन्थ और समस्त जनमानस  मानता हैं कि भारत वर्ष में अयोध्या ही भगवान् श्री रामचंद्र जी की जन्म-भूमि है और इस देश में कोई दूसरी अयोध्या भी नहीं है तो भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में जन्म लिया था इसमे कोई शंका ना है ना ही किया जा सकता है।  हाँ काल की गणना पर अलग अलग धर्मो के लोग हिन्दू गणना पद्धति पर प्रश्न लगा सकतें है मगर मूल विषय निर्विवाद ही है , और आप विवाद तब ही खड़ा कर सकते है जब आप की उपस्थिति विवादित विषय के प्रारम्भ समय से ही हो । और हिन्दू धर्म ने जब अपना दो तिहाई से अधिक समय पूर्ण कर लिया तब वर्तमान के धर्म प्रतिपादित हुए है तो यदि वो ये कहें की आप भगवान राम का जन्म प्रमाणित करें तो यह वैसा ही है जैसे कोई बच्चा कहे मै परदादा को नहीं जानता आप प्रमाणित करें ।

२. मगर भगवान राम ने त्रेता युग में अयोध्या नगरी में किस स्थान पर जन्म लिया था इसका साक्ष्य वास्तव में नहीं है  अर्थात भगवान राम की जन्म स्थान/भूमि तो प्रमाणित है मगर जन्म स्थान आज हिन्दू धर्म या कोई भी इतिहास प्रमाणिक तौर पर नहीं बता सकता है और बताये भी कैसे......आज उस समय का कोई  भी नक्शा किसी के पास नहीं है तब से ना जाने कितनी बार अयोध्या बसी है, उजड़ी है, जाने कितने बार सरयू नदी ने अपना प्रवाह मार्ग परिवर्तित किया है तो यह असंभव है, और ये बात ना केवल भगवान राम हेतु लागू है वरन भगवान कृष्ण, देव-दूत ईशा मसीह, और पैगम्बर साहेब हेतु भी लागू है ।

३. उक्त विवादित परिसर पर मस्जिद बाबर के सेनापति मीर बांकी खां ने बनाया था इस पर दोनों पक्ष सहमत हैं । इस तथ्य पर विवाद हो सकता है कि मस्जिद मंदिर को गिरा कर बनाया गया या मंदिर के भग्नावशेष पर ? मस्जिद बनाये जाने हेतु भूमि स्वामी से अनुमति ली गयी या नहीं ?
४. हुमायु, शाहजहाँ,अकबर, और औरंगजेब जैसे शाशक भले ही विसुद्ध रूप से भारत वासी हों मगर बाबर निश्चित रूप से बाहरी और आक्रमणकारी ही था इसमे कोई शंका नहीं है

5. अगर सामान्य आक्रमणकारी मनोविज्ञान से सोंचे तो आज भी हमला करने वाला ना केवल अपने पराजित शत्रु के जन-धन की हानि करता है वरन उसके मनोबल को भी हर तरह से तोड़ने का प्रयास करता है क्योंकि तभी उसकी विजय ज्यादा स्थाई रह सकती है । तो परिस्थिति जन्य साक्ष्य यही है कि बाबर ने मंदिर ( अयोध्या में था तो राम मंदिर ही होगा, अब यह कैसा मंदिर था ? जन्म भूमि थी या कोई सामान्य विशेष पूज्य मंदिर था यह तो उस ज़माने के लोग ही जाने या भगवान राम जाने ) को ध्वस्त कराकर ही वहां मस्जिद बनवाई और वहां के हिन्दू निवासियों का मान मर्दन किया ( अगर खंडहर पर बनाना होता तो उस ज़माने में भूमि की कोई कमी नहीं थी वह उसे किसी खाली जगह पर भी बनवा सकता था। और उसने जो किया कहीं से गलत नहीं किया।

6. मै सपथ पूर्वक कहता हूँ कि अगर मै आक्रान्ता बाबर होता तो  निश्चित तौर पर अपने विजित स्थानों पर अपनी जीत को चिर स्थायी बनाने और अपने दुश्मनों के मनोबल का दमन करने हेतु उनके महत्वपूर्ण स्थलों सहित उनके पूजा स्थल को भी खंडित कराता और वहां अपना कुछ बनाता और सारे विश्व में विजेता सम्राट यही करते है , यह ना पाप है ना अधर्म है यही विजेता की मानसिकता है  । और अगर कोई तथाकथित महान सज्जन पुरुष,महिला अथवा दोनों के बीच वाला प्राणी यह कहें कि वो अगर बाबर होते तो एसा नहीं करते तो या तो वो झूंठ बोलेंगे या वास्तव में यह बात कहते समय अपने अन्दर एक आक्रामक सेनापति के भाव नहीं ला पा रहे होंगे।

५. और जब मस्जिद बनी होगी तो निश्चित तौर पर वहां नमाज भी पढ़ी जाती रही होगी हाँ समय के साथ जैसे-जैसे स्थानीय हिन्दुवों ने अपनी शक्ति वापस पायी वो अपनी खोई हुयी जमीन को वापस पाने हेतु प्रयासरत हुयी यह भी कहीं से गलत नहीं है फिर चाहे वहां राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए , दोनों ही उचित है आखिर वो स्थल छीना  हुवा ही था और पराजित को हक़ है कि वो अपनी सम्पत्ति को वापस पाने का जैसे भी हो सके प्रयास करे । और अगर ये अनुचित है तो सबसे पहले तो आज वक्फ बोर्ड को भंग कर देना चाहिए।

६. और जब राम स्वयं से पुन: २२/२३ की रात में प्रगट हुए या प्रगट किये गए तो वहां पूजा अर्चना भी हुयी ही और वो हिन्दू स्थल कि गरिमा पुन: पाया भले ही बंद रहकर ही सही ।
७.  हाँ उक्त विवादित परिसर को गिराया जाना  जरुर अनुचित और गैर क़ानूनी कहा जा सकता है मगर जरा विचार करें कि क्या आज भी सामान्य जन अपने भाई-भतीजों, पट्टीदारों या किसी बाहरी कब्जेदारों से निपटने के लिए ये तरीके नहीं अपनाता है ?

८. पहले भी बातचीत का प्रयास किया गया मगर जहाँ एक तरफ हिन्दू कहता था कि हमें गर्भ गृह ही चाहिए ( मेरे अनुसार यह आस्था से ज्यादा जैसे आत्म सम्मान का विषय था , सोंचे क्या हम आज भी हम लोग पूरी तरह से अंग्रेजों की गुलामी से उबर पाये है ? ) तो दूसरी तरफ मुस्लमान कहता था अगर उसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद चाहिए तो मुख्य गुम्बद के के नीचे ही चाहिए वर्ना नहीं चाहिए ( यह भी आस्था से ज्यादा विजेता के गुरुर का ही मामला था वर्ना क्या मक्के और मदीने जैसे पवित्र स्थलों के शहर में कुछ मस्जिदों को केवल शहर के विकास के नाम पर अलग स्थानांतरित नहीं किया गया ? तो भारत में क्यों नहीं हो सकता था ?)

९. तो इस तरह से हिन्दू और मुस्लमान दोनों के दावे उक्त स्थल हेतु अलग अलग काल खंड के अनुसार सत्य हैं  , जो लोग चिल्ला रहे है कि उनके तर्कों और साक्ष्य  को पूरी तरह से नहीं देखा गया वो वास्तव में अनर्गल प्रलाप कर रहें है । अरे अदालत और क्या देखती ? केवल तुम्हारी एकतरफा सुनती तभी सही थी ? उसने सब तर्कों और साक्ष्य  को वास्तव में ईमानदारी से देखा तभी तो दोनों पक्ष का अधिकार माना और भूमि को १/३,१/३,१/३ के अनुसार बँटा । और यही उचित भी था वर्ना अगर वो किसी भी पक्ष को पूरी तरह से भूमि दे देता तब वास्तव में अन्याय करता।

१०. अब मान लेते है कि अगर पूरी भूमि मुसलमानों को ही अदालत देने का कागजी  आदेश जारी कर देती तो जरा सोंच कर देखें कि प्रदेश के मुख्य मंत्री , देश के प्रधानमंत्री, तीनो सेना के सेनापति, सभी धर्म गुरुवों से लेकर राजनेतावों तक किसकी सामर्थ है कि वहां वर्तमान में स्थापित राम लला को हटवा देता और वहां मस्जिद बनवा देता ? अगर ऐसा हो सकता तो पहले के पदों पर पद-स्थापित लोग ऐसा अपनी ताकत और सत्ता का प्रयोग कर के ना कर देते फिर चाहे वो नेहरू हो, इंदिरा जी हों, राजीव गाँधी हो, बाबा अटल बिहारी हो, चंद्रशेखर हो, या मनमोहन सिंह हो, आडवाणी हो, कल्याण सिंह हो, मुलायम सिंह हो, बुखारी हो, जिलानी हो या मोहन भागवत हो ?

११. और ये बात केवल राम लला बिराजमान हेतु ही नहीं लागू होती है यही बात बात दुसरे पक्ष हेतु भी लागू है , पूरी भूमि हिन्दुवों को ही अदालत द्वारा देने का कागजी आदेश जारी हो गया होता और वहां पुराना वाला ढांचा आज भी होता तो  किसकी औकात थी कि वहां उसे गिराकर वहां मंदिर बनवा देता ?

१२. कुछ भी कहना आसान है मगर उसे जमीनी धरातल पर कार्य करना मुश्किल होता है ? तो अगर वो ढांचा गिरा तो मै तो यही कहूँगा कि ईश्वर और पैगम्बर की यही इच्छा थी जिससे कम से कम आज खाली जगह का बँटवारा तो दीवानी मामले की तरह से हो सके ?

१३. तो अब क्यों नहीं दोनों पक्ष के लोग उसी जगह पर मंदिर मस्जिद एक साथ अपने अपने मिले जगह पर बना लेते है ?

१४. और अगर अब भी दोनों पक्ष के कुछ स्वार्थी, चोर, बेईमान, लालची, मक्कार, पापी, अधर्मी, अज्ञानी , राजनैतिक रोटी सेंकने की चाहत वाले लोग झगड़ना चाहते है तो स्वागत है, मगर जन सामान्य को बक्स दो भैया !! मेरी राय है की जैसे डब्लू डब्लू एफ होता है या फ्री स्टाइल की कुस्ती होती है वैसे ही हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्ष के लोग दो अलग अलग झगडालू दल बना ले और उसमे मार करने वाले स्वयं सेवको, जिहादियों को आमंत्रित कर ले, और इसमे सामिल होना वाला एक घोषणा पत्र भर के दे कि वो अपने पूरे होशो हवास में अपने प्राणों कि बाजी लगाने जा रहा है और यदि उसके प्राण जाते है तो इसके लिए किसी भी व्यक्ति, समुदाय को जिम्मेदार ना माना जाय ना ही उसके परिवार को इसका कोई मुवावजा ही चाहिए ना उन्हें भारत का नागरिक माना जाय, और फिर मरने दो, दोनों तरफ के पागलों को, शायद इसी तरह कुछ शांति आ जाय और देश कि जनसंख्या भी कम हो जाय । मेरा दावा है कि झगडालू दल से कोई भी दावेदार जीवित नहीं बचेगा क्योंकि यहाँ कोई किसी से कम नहीं है।
जरा यहाँ भी देखे http://vivekmishra001.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html 
१५. दोनों पक्ष ने कहा था कि कोर्ट का फैसला मानने के लिए बाध्य होगे....तो अब क्यों किस मुह से बेमतलब में सुप्रीम-कोर्ट की रट लगा रहे हैं अब जो फैसला अदालत ने दिया है उसे चुप-चाप शराफत से सभी लोग माने और इस देश को आगे जाने दें । इस देश की अदालत के अलावां और कोई भी इसका समाधान नहीं कर सकता है और जो फैसला आया है उससे बेहतर कोई और फैसला नहीं हो सकता है भरोसा ना हो तो नये सिरे से वार्ता का नाटक कर के देख लीजिये या उच्चतम न्यायलय में भी जाकर अपना सर पटक लीजिये आपको अपने आप पता चल जायेगा।

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शनिवार, 25 सितंबर 2010

कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो....?

पहले उच्चतम न्यायलय की लखनऊ बेंच में अनावश्यक अडंगेबाजी का प्रयास और वहां असफल होने के बाद अब सर्वोच्च न्यायलय के मध्यम से अनावश्यक अडंगेबाजी ।

कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो और इस देश में एक नासूर हमेशा हमेशा बना रहे......
क्या ये मीडिया में अनावश्यक प्रचार पाने के लिए लालयित लोग हैं या अपने को जरुरत से ज्यादा समझदार समझने वाले लोग हैं ?
इस देश में सभी को आजादी है मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि आप दूसरों की आजादी में जबरदस्ती दखल देने लगें  ।

राजनीति , धर्म , समाजसेवा के ठेकेदारों की रोजी रोटी चलने के लिए आवश्यक है कि कोई ना कोई समस्या बनी रहे, और अगर एक समस्या  समाप्त हो रही है तो तुरंत दूसरी समस्या उत्पन्न की जाय ।
यहां मूर्ख बनाने और बनने वालों की भी कमी नहीं है ....
मीडिया चैनल समझा रहें है कि ये मंदिर , मस्जिद का फैसला नहीं है , ये तो केवल भूमि के स्वामित्त्व का फैसला है ।
क्या ये इतना ही सीधा है ?
अरे अगर भूमि का स्वामित्त्व उस पक्षकार के तरफ जाता है जो हिन्दू है तो जाहिर सी बात है कि वो कहेगा कि अब ये मेरी जमीन है तो यहाँ मंदिर बनेगा और ये मंदिर वालों की ही जीत है और अगर भूमि स्वामित्त्व उस पक्षकार की तरफ जाता है जो मुस्लिम है तो वो कहेगा कि मेरी जमीन खाली करो यहाँ मेरी मस्जिद बनेगी और ये ममजिद वालों की जीत है ।
तो सीधे सीधे यह मानना चाहिए की अदालत यह निर्धारित करेगी कि वहां क्या बनना चाहिए ।

और जो लोग कहते है कि आपसी बातचीत से मामले को हल करने का समय दिया जाना चाहिए तो वो लोग अब तक कहाँ थे ?
अपने घरों में बैठे अपने बच्चों , नाती , पोतों को गोद में खिलाने में व्यस्त थे अब तक ?
इतने वर्षों से क्या कर रहे थे वो लोग ?
अब अचानक कौन सा सुलह कर लेंगे ?
और जो महानुभाव लोग इसके पैरोकार हैं उनसे ये भी पूंछा जाना चाहिए कि उनके पास सुलह की क्या योजना है ?
उनकी और उनके योजना की देश में स्वीकारिता कितनी है ?
और सत्ता और धर्म के दलालों पर उनकी पकड़ कितनी है ?

मजाक बना दिया है लोगों ने देश में ।
ना खुद कोई फैसला कर सकते है , ना देश के विधान को कोई फैसला करने दे रहे है ?
कोई कह रहा है कि इस फैसले से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ जायेगा ।
अरे फैसला ना आने से कौन सा बड़ा भाईचारा पनपा जा रहा है । हाँ एक घाव नासूर बनकर अन्दर ही अन्दर टीसता जरुर जा रहा है दोनों सम्प्रदायों में , जो भाईचारे के लिए अनंत तक अवरोध हो सकता है ।
मानव जाति बड़े से बड़े दुःख और क्षति को बर्दास्त कर लेता है फिर चाहे वो उसके किसी अपने के जीवन समाप्त हो जाने का दुःख हो या अपना सर्वस खो देने की क्षति ।

तो क्यों नहीं जो कल होना है उसे आज होने देते है......
जो होना है हो जाने दो , आग लगनी है लग जाने दो , कम से कम जो राख बचेगी उसपर तो नयी इबारत लिखी जा सकेगी ...
और जमाना भी देख और पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो आग लगाने वाले है । जो अपने आप को देश के न्यायालय से ऊपर मानते है , देश के विधान को दर-किनार कर अपनी रोटी सेंकने को तत्पर है ।

अगर हम विकसित हो गए है , समझदार हो गए है , सहनशील हो गएँ है तो जो होनी है और उसे अनंत काल तक नहीं टाल सकते है उसे आज क्यों नहीं होने दे रहे है...क्यों अपने संतानों का जीवन भी अँधेरे के गर्त में धकेलने को तत्पर हैं । जब सभी तथाकथित राजनेता , धर्म गुरु , समाजसेवक और जनता स्वयं से कोई समाधान नहीं खोज पा रही है तो अंतिम विकल्प न्यायालय में अनावश्यक की अडंगेबाजी क्यों की जा रही है ?
और विवादित ढांचा गिरने से ज्यादा बवाल तो अब नहीं ही होगा ये निश्चित है फिर अगर किसी एक की एक उंगली काटकर दो पूरे शरीर बच सकते है तो उसे बचा लेने हेतु आपरेशन करने की अनुमति चिकित्सक को क्यों नहीं दी जा रही है , क्यों नासूर पाल कर पूरा शरीर बर्बाद करने पर हम उतारू हैं ।

तो जो कल होना है उसे आज होने दो ...............जिससे कम से कम आने वाला कल तो सही हो सके ।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

आइये अभिवादन करें

         मित्रों महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम किसका अभिवादन करें , महत्वपूर्ण यह है कि हम वास्तविक अर्थों में अभिवादनशील बनें क्योंकि एक अभिवादनशील व्यक्ति ही अहंकार को छोड़ कर सच्चे अर्थों में झुंक सकता है वरना आज हमारा झुंकना भी एक व्यवसाय हो गया है जिसके मध्यम से हम किसी से कुछ पाने की , कुछ खोने के भाव से बचने की, दूसरों की चापलूसी कर उसे प्रशन्न करने की अथवा भविष्य में किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर संबन्धों की बुनियाद रखने हेतु एक निवेश करने जैसा प्रयास करने लगते है । और तब हम मन में भले सामने वाले को गलियां दे रहे हो, उसकी पीठ पीछे उसे भला-बुरा कहते हो उसके परन्तु सामने ऐसा दर्शाते है कि जैसे हमसे ज्यादा आदर भाव किसी और में हो ही नहीं सकता । और सबसे बड़ी बात इन हालातों में यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम जिसका अभिवादन कर रहे है उसकी औकात , अधिकार , पहुँच कितनी है ? और वो हमारे बारे में क्या सोंचता है ?

मैंने देखा है यह संसार ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्हें अपने माता-पिता,भाई,गुरुजन आदि का होली , दीपावली, ईद , बकरीद जैसे पर्वों पर भी अभिवादन करने कि फुर्सत और तमीज नहीं है मगर अपने लोभ , लालच में वो अपने अधिकारियों , नेतावों , दलालों का प्रतिदिन अभिवादन करते रहते हैं  ।

मगर जब हम अभिवादनशील होते है तब यह फर्क नहीं पड़ता कि हमारे अभिवादन को स्वीकार करने वाला कौन है , उसका सामर्थ्य  क्या है, उसने हमें कोई लाभ पहुँचाया है या नहीं,  और उसके सामने झुंकने पर हमारा मान घट रहा है या बढ रहा है ।

इस प्रकार जिस अभिवादन में कोई लोभ, आकांक्षा, चतुराई, भय अथवा स्वयं के अहम् का तुष्टिकरण नहीं होता है, और जो काल,पात्र,स्थान को देख  कर निर्धारित नहीं होता है वही सच्चे अर्थों में हमारा अभिवादन होता है , हमारी कृतज्ञता होती है उस सबके लिए जो हमें कहीं से भी प्राप्त हुआ है या होना है ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 22 सितंबर 2010

इस १००वे पोस्ट पर आप सभी से पुन: अनुरोध है..

प्रिय स्नेहीजन ,
       आप सभी के द्वारा प्रदान मनोबल से मै ९९ के फेर से निकल कर अपनी १००वी  पोस्ट आपके समक्ष ब्लागजगत पर प्रस्तुत करने जा रहा हूँ , पूर्व की ९९ पोस्टों में कुछ ब्लाग पर सीधे लिखी गयी नयी रचनाएँ थी तो शेष मेरी डायरी  के पन्नो से सीधे निकलकर आपके सामने आयी थीं
इनमे से कुछ आपको पसंद आयी होंगी, कुछ नहीं पसंद आयी होंगी, और कुछ तो हवा में ही बिखरी-बिखरी नजर आयीं होगी और इसका मुझे भली भांति एहसास है क्योंकि पहले लिखी गयी मेरी कई रचनाये तो आज स्वयं मुझे भी ज्यादा नहीं भाती है मगर क्या करू किस समय क्या लिखता हूँ वो इस बात पर निर्भर होता है की उस समय मेरी मन: स्थित या मनोदशा कैसी है और सामान्यतया किसी दायरे में बँध कर रहना या सोंचना मुझे भाता नहीं तो अपना मान बनाये रखने के लिए अपने मन  से अन्याय नहीं कर सकता , इसी लिए जो भी था, जैसा भी था वो वैसा ही आपके सामने ले आया, और आगे भी यही करता रहूँगा ।
इस अवधि में साथी ब्लागरों एवं  प्रिय स्नेहीजनो ने सदैव मेरा मनोबल बढाया मगर मुझे किसी ने कभी मेरी कमियों पर मेरा ध्यान नहीं दिलाया। चलिए जीवन चलते रहने का ही नाम है ।

आज अपने इस १००वे पोस्ट पर आप सभी से पुन: अनुरोध है कि :-

शब्दों पर ना जाये मेरे, बस भावों पर ही ध्यान दें ।
अगर कहीं कोई भूल दिखे, उसे भूल समझकर टाल दें ।
खोजें नहीं मुझे शब्दों में, मै शब्दों में नहीं रहता हूँ ।
जो कुछ भी मै लिखता हूँ, उसे अपनी जबानी कहता हूँ ।

ये प्रेम-विरह की साँसे हो, या छल और कपट की बातें हो ।
सब राग-रंग और भेष तेरे, बस शब्द लिखे मेरे अपने है ।
तुम चाहो समझो इसे हकीकत, या समझो तुम इसे फ़साना ।
मुझको तो जो लिखना था, मै लिखकर यारो हुआ बेगाना ।

आप चाहे जब परख लें, अपनी कसौटी पर मुझे ।
मै सदा मै ही रहूँगा, आप चाहे जो रहें ।
मुझको तो लगते है सुहाने, इंद्र धनुष के रंग सब ।
आप कोई एक रंग, मुझ पर चढ़ा ना दीजिये ।

मै कहाँ कहता की मुझमें, दोष कोई है नहीं ।
आप दया करके मुझे, देवत्व ना दे दीजिये ।
मै नहीं नायक कोई, ना मेरा है गुट कोई ।
पर भेड़ो सा चलना मुझे, आज तक आया नहीं ।

यूँ क्रांति का झंडा कोई, मै नहीं लहराता हूँ ।
पर सर झुककर के कभी, चुपचाप नहीं चल पाता हूँ ।
आप चाहे जो लिखे, मनुष्य होने के नियम ।
मै मनुष्यता छोड़ कर, नियमो से बंध पाता नहीं ।

आप भले कह दें इसे, है बगावत ये मेरी ।
मै इसे कहता सदा, ये स्वतंत्रता है मेरी ।
फिर आप चाहे जिस तरह, परख मुझको लीजिये ।
मै सदा मै ही रहूँगा, मुझे नाम कुछ भी दीजिये ।

हो सके तो आप मेरी, बात समझ लीजिये ।
यदि दो पल है बहुत, एक पल तो दीजिये ।
तारीफ करें ना केवल मेरी , कमियों पर भी ध्यान दें ।
अगर कहीं कोई भूल दिखे, संज्ञान में मेरी डाल दें ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 8 सितंबर 2010

कल्कि पुराण

 हे कलियुग के दीन दुखी प्राणियों , तुम्हारे कल्याण और आत्मा की शांति हेतु मै 'भगवान कल्कि' का मानव दूत तुम्हे चारो युगों की सम्पूर्ण कथा समय कम होने के कारण संक्षेप में सुनाता हूँ ,जिसे समझ पाना तो तर जाना वर्ना फिर व्यर्थ में मुझे ना सताना ।"     श्री श्री १००००८ महर्षि विवेक

 प्रथम अध्याय

           हे मूर्ख दीन दुखी प्राणियों ! जैसा कि तुम जानते हो पर मानते नहीं हो यह संसार अजर अमर अविनाशी नहीं है , यहाँ काल चक्र का पहिया निरंतर घूमता रहता है । ना यह संसार पहले था , ना फिर आगे होगा, यह तो मात्र क्षणिक युगों के लिए निर्मित हुआ है और फिर नष्ट हो जायेगा ।
         
           तुम जिसे सूर्य कहते हो वैसे ना जाने कितने ख़रब सूर्य आज भी तुम्हारे सामने चमक रहें है और ना जाने कितने प्रतिपल नष्ट होकर पुन: जन्म ले रहें है जिनमे से कुछ को तुम तारों के रूप में देखते हो और कुछ को देखने की अभी तुम्हारी सामर्थ नहीं विकसित हो पायी है । और तुम जिसे धरती कहते हो ऐसी कई संख-पद्म धरती अपने चन्द्रमा आदि के साथ इन सूर्यो के चारो तरफ अखिल ब्रम्हाण्ड में भरी पड़ी हैं और उसमे तुम्हारी भाषा के अनुसार ना जाने कितने तरह के सीधे , गोल मटोल , चौकोर , टेड़े-मेड़े,छोटे-बड़े प्राणियों का जीवन बिखरा पड़ा है । 
       
            तुम्हारी तरह ही प्रत्येक धरती का हर प्राणी अपने भगवान को सबसे बड़ा और अपने आप को ही सर्वश्रेष्ट प्राणी मानता है और अपनी जाति को ही अपने भगवान की सबसे सुंदर रचना मानता है । मगर अफ़सोस आज तक किसी भी संसार का कोई भी धर्म अथवा विज्ञानं उस अथाह गहराई को नहीं पा सका है जहाँ से यह सब अरबो-खरबों संसार प्रतिपल जन्म ले रहें है और नष्ट होकर पुन: अनंत अंधकार में समा रहें है ।
- अथ प्रथमो अध्याय: समापनं ।
 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

शनिवार, 7 अगस्त 2010

कौन हूँ मै ?

कौन हूँ मै ?   
यह सवाल मेरे मन में बचपन से आज तक लगातार घूमता रहता है ,और मै भी इसका विभिन्न कोणो से उत्तर पाने का लगातार प्रयास करता रहता हूँ , फिर चाहे वो मानव मनो-विज्ञानं का आयाम हो, धर्म का ध्यान हो, योग-भोग का संसार हो, या मेरे अंतर्मन के प्रबल,संतुलित अथवा दमित अहंकार का आयाम हो। यहाँ से मिलने वाले कुछ उत्तर कभी मुझे संतुष्ट करते है तो कभी और भी नए प्रश्न खड़े कर देतें है।

वैसे मित्रो सच कहे तो एक तरफ जहाँ अपने बारे में लिखने से ज्यादा मजेदार और रुचिकर कार्य और कुछ भी नहीं होता है वहीँ दूसरी तरफ अगर ईमानदारी से अपने बारे में कुछ लिखा जाना हो तो इससे ज्यादा लेखन क्षेत्र का कठिन कार्य भी कोई और नहीं है क्योंकि अगर आप केवल अपनी अच्छाईयाँ लिखेंगे तो आप की अंतर-आत्मा संतुष्ट नहीं होगी (यदि है तो) , और यदि वास्तविक स्थित लिखी जाय तो .......... आप जानते है।

मैंने बहुत बार अपने बारे में लिखने की कोशिश की मगर हर बार कलम रुक जाती है , "क्या कहू , कैसे कहू , क्या बताऊ , क्या छुपाऊ ।"

आज भी मेरी हालत कुछ ऐसी है :-

"चाह रहा हूँ लिखना कुछ , पर दिशा नहीं पाता हूँ ।
मन के भावों को शायद , मै पहचान नहीं पाता हूँ ।
बचपन से लेकर अपनी , युवावस्था तक आता हूँ ।
धर्म कर्म से लेकर अपनी , कूटनीति तक जाता हूँ ।
मन के भावों को लेकिन , मै शब्द नहीं दे पाता हूँ ।
शायद मन के भाव अभी , परिपूर्ण नहीं हो पाये है ।
या फिर शायद भाव सभी , परिपक्व नहीं हो पाये है।
जो भी हो लेकिन लिखने को, मै शब्द नहीं पाता हूँ।
चाह रहा हूँ लिखना कुछ, पर दिशा नहीं दे पाता हूँ।
भटक रहे अपने मन को, संयमित नही कर पाता हूँ।"

फिर भी चलिए अपने बारे में विभिन्न कोणों से कुछ कहने का प्रयास करता हूँ फिर आपसे मिली राय के आधार पर पुन: अपना विशलेषण करूँगा -

तो मेरा पहला परिचय है:-
"जाने कितने बादल आये , गरजे बरसे चले गए ।
मै भी एक छोटा सा बादल , बिन बरसे ही मै भटक रहा..।"
पर आपको सचेत कर दूँ की :-
"मै हूँ एक आईना केवल, जिसमे दिखोगे तुम ।
जैसे चाहोगे मुझे देखना, वैसा ही पाओगे तुम ।
मै ना बा-वफ़ा किसी का, ना होता बेवफा कभी ।
तुम जो भी चाहो समझो मुझे , मै हूँ खड़ा यहीं ।
यूँ मानव संग मै मानव हूँ, दानव मिले तो दानव हूँ ।
सज्जन हित सज्जनता है, दुर्जन की खातिर दुर्जनता ।
लोभी संग है लोभ जगे, त्यागी संग संसार त्याग दूँ । 
चोरों के संग चोर बनू , शाहों के घर का रखवाला।
कुटिलो हेतु कुटिलता है , अपनों हित है भाई-चारा ।
जो भी जैसा मिले मुझे , उसके जैसा रूप हमारा ।"
वैसे अध्यात्म से चलूँ तो :-
"देह दृष्ट तू दासो$हमं जीवदृष्टयात्वदंशका : आत्मदृष्टात्वैवाहमं"
अर्थात
मेरे प्रभु
"देह दृष्ट से अखिल जगत में, मै तेरा दास हूँ ।
तूने जग में मुझे बनाया, मैंने अपना पात्र निभाया
जीव दृष्ट से मै तेरा , बिखरा हुआ एक अंश हूँ ।
तूने श्रृष्टि की रचना की , मै तेरा ही वंश हूँ
आत्म दृष्ट से मै हूँ वही , जो तुम हो संसार में ।
तुम्ही आकर मुझे बताओ, कौन सा मै अवतार हूँ"
तो
"अहम् ब्रह्मास्मि"
तभी तो मै कहता हूँ कि..
"अहम् ब्रम्हा, अहम् विष्णु , अहम् देवो महेश्वरा ।
अहम् साक्षात परमब्रम्ह , नमो श्री विवेकाय नम:।"

कही ऐसा तो नहीं कि आपको मै बे-अंदाज लगने लगा  हूँ ?  अगर ऐसा है तो भी कोई बात नहीं क्योकि -

" यूँ और भी है इस दुनियां में , बे-अंदाज कई बड़के ।
कहते है विवेक मिश्र का , बे-अंदाजे बयां कुछ और है।" 

चलिए अब हिन्दू वर्गीकरण परिपाटी से चले तो :-
मै जन्म से ब्रह्मण हूँ, मन से क्षत्रिय, रोजगार से वैश्य हूँ और स्वाभाव (सेवा भाव) से सूद्र हूँ ।
ज्योतिष की बात करें तो :-




लग्न से वृश्चिक
राशी से वृष
वर्ण से वैश्य
वर्ग से मृग
योनी से सर्प
गण से मनुष्य हूँ।
अब मेरे बारे कुछ अन्य बातें :-
१.
"आप चाहे जब परख लें , अपनी कसौटी पर मुझे ।
मै सदा मै ही रहूँगा , आप चाहे जो रहें ।
मुझको आता है नहीं , मौसमो की तरह बदलना ।
आप चाहे रोज ही , मेरे कपड़ों को बदलिए ।
मै कहाँ कहता की मुझमें , दोष कोई है नहीं ।
आप दया करके मुझे , देवत्व ना दे दीजिये ।
मुझको लगते है सुहाने , इंद्र धनुष के रंग सब ।
आप कोई एक रंग , मुझ पर चढ़ा ना दीजिये ।
हो सके तो आप मेरी , बात समझ लीजिये ।
यदि दो पल है बहुत , एक पल तो दीजिये ।"
.
"मै नहीं नायक कोई , ना मेरा है गुट कोई ।
पर भेड़ो सा चलना मुझे , आज तक आया नहीं ।
यूँ क्रांति का झंडा कोई , मै नहीं लहराता हूँ ।
पर सर झुककर के कभी , चुपचाप नहीं चल पाता हूँ ।
आप चाहे जो लिखे , मनुष्य होने के नियम ।
मै मनुष्यता छोड़ कर , नियमो से बंध पाता नहीं ।
आप भले कह दें इसे , है बगावत ये मेरी ।
मै इसे कहता सदा , ये स्वतंत्रता है मेरी ।
फिर आप चाहे जिस तरह , परख मुझको लीजिये ।
मै सदा मै ही रहूँगा , मुझे नाम कुछ भी दीजिये ।"
 To Be Cont.........
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

जल में रहकर मगर से बैर ?

मित्रों      
आप सभी ने एक कहावत बहुत बार सुनी होगी :-
 
"जल में रहकर मगर से बैर"
अर्थात
जल में रहने पर मगर से बैर मोल नहीं लिया जा सकता है ।
क्यों ?
अरे आप नहीं जानते क्या ?
मगर जल का सबसे ताकतवर प्राणी होता है , उसके आगे जल में हाथी भी कमजोर पड़ जाता है ( वैसे सार्क और व्हेल और भी ताकतवर होती है मगर वो नदी , नालों में नहीं पाई जाती है , जिसके आसपास मनुष्य ही अपने दैनिक कार्य हेतु ज्यादा घूमता है) ।

तो कहते है कि :-  एक बार तो स्वं भगवान विष्णु को अपने प्रिय भक्त "गजराज" को बचाने की आकस्मिक आवश्यकता के तहत नंगे पाँव ही दौड़ कर आना पड़ा था तब जाकर वो मगर से बच पाया था ।

तो अब तो आप समझ ही गए होंगे ।

क्या कहा ?
ये सब तो आप पहले से जानते है !
तो मैंने कब कहा कि मै अब तक कुछ नया बता रहा था ।

जो नया है, वो अब आने जा रहा है, विशुद्ध रूप से मेरी शोध।

तो दिल थम कर बैठे ..!
क्षमा कीजियेगा मेरे कहने का अर्थ है आँख फाड़ कर पढ़े  और मेरे प्रवचनों को अपने दिल, दिमाग में बिठाकर अपने अंतर्मन से गुने ...........   

" जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "


अब जो मेरी जीव्हा  से निकल गया उसे खरा भी साबित करना होगा वर्ना कौन मानेगा ..?
आजकल तो वैसे भी मुफ्त की सलाह पर कोई ध्यान नहीं देता है , भले ही वो कितने ही काम की क्यों ना हो ।
तो चलिए अपने कथन को विसुद्ध तार्किक रूप से किसी निर्मेय , प्रमेय की तरह साबित करता हूँ  :-

कथन :- " जल में रहना हो तो मगर से बैर करके रहो "
अर्थ    :- जल में सुरक्षित रहना हो तो मगर से बैर करके रहो ।
कारण :- मगर अपनी आदत से मजबूर है । अगर आप उससे दोस्ती भी कर लो या नहीं करके गुटनिरपेक्षता का राग अलापो ,  तो भी वो ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है क्योंकि जिस दिन उसे कहीं और से कुछ खाने को नहीं मिलेगा वो घास खाकर या केवल जल पीकर व्रत  रहने वाला नहीं है । उस समय उसके सबसे नजदीक (दोस्ती की है तो),  या आसपास (अगर गुटनिरपेक्ष  है तो) जल में कौन होगा ?  आप !
और आप अनजाने में, प्यार मोहब्बत में , गुटनिरपेक्षता में या कहें कि मगर के प्रति अपने गफलत में होंगे।
तो फिर समझ लीजिये कि आप का काम तमाम !!!
पढ़ा है ना आपने बचपन में "मगर और बन्दर वाली कहानी" जिसमें मगर की सह्धर्मनी  जिद कर बैठती है कि आपके मित्र का कलेजा बहुत मीठा है , आज वो उसी की दावत करेगी और मजबूरन ही सही मगर बन्दर को मारने के लिए उसे धोखे से अपने घर ले आता है । (वैसे यहाँ मै मगरानी  को दोष नहीं दूंगा क्योकि ज्यादातर स्त्रियाँ स्व्भावगत रूप से या किसी अनजाने जलन के कारण अपने पतियों को उनके मित्रों से किसी ना किसी बहाने अलग करना ही चाहती है।..इस पर फिर कभी अपनी शोध प्रकाशित करूँगा )
और
अगर आप उससे बैर करके रहेंगे अर्थात सदा उससको अपना दुश्मन मान कर रहेंगे तो खुदा कसम दुनिया जानती है कि लोग अपने दुश्मनों को ज्यादा गहराई से जानते है मुकाबिल अपने  दोस्तों के ।
तो उस हालत में आप उससे सोते - जागते सदैव सावधान रहेंगे और हो सकता है कि आप अपने सामर्थ भर उससे निपटने का इन्तिजाम भी कर लें। इस तरह शायद आप ज्यादा देर सुरक्षित रह सकें ।
निष्कर्ष :-  यदि कोई यह सोंचता है कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं करना चाहिए तो  उसे जल को छोड़ कर कहीं और निवास-प्रवास करना चाहिए वर्ना आपकी जान को ज्यादा जोखिम होगा ।
[ इत-श्री ]
नोट :- वैसे यह बहुत ही गूढ़ और गुप्त सिद्धांत था जिसको सभी के सामने तो नहीं प्रकट करना चाहता था मगर जन-कल्याण हेतु मुझे त्याग करना ही पड़ा ।

 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG ।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

एक पड़ोसी जनता की पाती एक पड़ोसी जनसेवक के नाम

सेवा में 
स्वं-घोषित विकास पुरुष नितीश कुमार जी

वैसे तो आप मुझे जानते नहीं होंगे तो मै आपको बता दू कि मेरा आपका रिश्ता पड़ोसी जनता और पड़ोसी जनसेवक वाला है क्योंकि मै आपकी सीमा (सीमा का अर्थ दायरे से ले ना कि किसी महिला मित्र के नाम से ) से सटे उत्तर प्रदेश जिसका (इसका दूसरा नामकरण भैया प्रदेश के रूप में उन बीर मराठों ने किया  जिनके शासक के बारे में इतिहास बताता है की वो हमेशा मारो और भागो की नीति पर काम करते थे और एक बार पकड़ में आ जाने पर उनके एक राजा को औरंगजेब ने मरवाकर छोटे छोटे टुकड़ों में कटवाकर मांस कुत्तों को खिलाया था)  की जनता हूँ और आप इससे सटे-सताए दूसरे भैया प्रदेश के  राजा है।

पहले तो मुझे अपने व्यस्तताओं के कारण बिलम्ब से पत्र लिखने हेतु क्षमा कीजियेगा।
आशा है आपका स्वस्थ और हाल (हवाला)-चाल ठीक-ठाक ही होगा क्योंकि अभी तक तो सी.बी.आई आपका स्वस्थ पारीक्षण करने नहीं ही गयी है।

तो प्रिय 'जन सेवक' जी, कृपया आप इस 'जन सेवक' वाले संबोधन से नाराज ना होना क्योकि मूलत: जन सेवक पुराने बाबा-आदम के गाय और भैस के दूध से बने देसी घी वाले ज़माने में उसे कहते थे जो जनता की निश्वार्थ भाव से सेवा करते थे और बदले में कुछ भी नहीं लेते थे ।
परन्तु
आजकल हमारे-आपके ज़माने में जब जानवरों और इंसानों की हड्डियों को आग में तपाकर चर्बी से असली वाला नकली देसी घी बनाया जा रहा हो तो वो पुरानी बात कहाँ, अब तो वही असली जन सेवक है जो जनता से निश्वार्थ भाव से अपनी सेवा करवाए और बदले में उसको कुछ भी ना दे।

एक ब्रेक...........
                                 सीसी भरी गुलाब की , पत्थर पर पटक दिया।
                                 बेशर्म सीसी तो ना टूटी ,  पत्थर चटक गया ।।
नोट :- कुछ ऐसा ही दोहा  पहले के ज़माने के अधिकांश पत्रों में लिख जाता था मगर काल समय के अनुसार मैंने आज के स्वरुप के साथ लिखा है।

अब  पत्र आगे लिखता हूँ-
दो-चार दिन पहले अखबार के माध्यम से एक सचित्र समाचार छपा था जिसमे फोटो में एक महिला विधायक नचा-नचाकर, शब्दों पर जरा ध्यान दीजियेगा कहीं अर्थ का अनर्थ ना हो जाय, तो महिला विधायक नाच-नाच कर नहीं वरन नचा-नचाकर विधानसभा भवन के प्रवेश द्वार पर रखे गमलो को पटक रही थी और बाकी के  फोटास रोग (फोटो खिचवाने हेतु लालयित रहने वाला रोग) से पीड़ित सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायक (साथी गायक, वादकगण और दर्शकगण) उन्हें घेर कर तमाशा देख रहे थे।

हो सकता है कि दूरदर्शन चैनलों पर इस सब का सीधा प्रसारण भी आया हो क्योंकि आजकल बच्चो को बचपन से ही उच्च पेशेवर ज्ञान देने के लिए सदन की कार्यवाही कभी कभी सीधा प्रसारित भी किया जाता है पर मै अ-भागा कहीं और धान कूटने के चक्कर में उसे देखने से चूक गया।

खैर जब समाचार को देख कर मन भर गया (दुखी होने वाला नहीं वरन आँख सकने वाला) तो समाचार पढना शुरु किया तब ज्ञात हुआ कि असल मामला किसी बड़े संभावित  घोटाले का है जिसके कारण ये हंगामा हुवा। अब आप ही बताये बाढ़ जैसे आपदा के समय  जब राहत कार्य हेतु तत्काल चारा (मानवों का) ढोया जाना हो तो उसमें कौन बैठ कर पहले जांच करे कि गाड़ियों का नंबर, दो-पहिया वाहनों का है ना कि चार पहिया वाहनों का ?  और अगर दो-पहिया वाहनों का प्रयोग कर ही लिया गया तो यह तो अवसर के संवेदनशीलता  को देखते हुए राहत कर्मियों के तत्परता से निर्णय लेने का मामला है जिसके लिए उन्हें पुरस्कार ही मिलना चाहिए।

और आपके पहले के शासन में जानवरों के चारे का घोटाला हुआ था , तो आप तो विकास पुरुष है आपके राज में प्रगति तो होनी ही चाहिए ना , आखिर प्रगति कर के ही जानवर से मानव बना है ना।

और सदन के अन्दर सभापति पर जिस किसी नेता ने एक चप्पल फेंका था उसे उसका दंड भी मिल गया है, वो बेचारा सदन में मचे भागम भाग में अपनी मंदिर से चुरायी चप्पल को वापस भी नहीं प्राप्त कर सका और दुखी मन से दूसरी को रोड पर फेंककर बिना चप्पल के ही घर गया, हो गया गरीबी में आँटा  गीला ।
                                                 चप्पल चली बिहार में , हुवा सदन में हाहाकार।
 नेता को नेता ने पीटा , ये कैसा है अत्याचार ?
खुला पिटारा लूट का, मिला नहीं सबको हिस्सा।
मौसेरे भाई ने खोला, मजबूरन ये सारा किस्सा।

खैर अब जो हुआ सो हुआ पर मेरी तरफ से आपको मुक्त-कंठ से ढेर सारी बधाई स्वीकार हो।
बधाई इस बात की, कि अंतत: आपके शासन काल में एक लंबे अंतराल के बाद शायद बिहार पुन: अपना पुराना स्वरुप वापस पाने जा रहा है (यहाँ मै चक्रवर्ती महाराजा अशोक के ज़माने के बिहार के पुराने स्वरुप की बात नहीं कर रहा हू वरन आपके पुराने सखा आदरणीय लालू जी और जगन्नाथ मिश्र जी के ज़माने की बात कर रहा हूँ जिनके साथ आपने राजनीत का क , ख , ग सीखा था), और हम सभी नाहक ज्यादा दिन हैरान परेशान होने से बच गए कि क्या हो गया बिहार को, कैसे वो पलट गया मौसमों की तरह ।

और ये चप्पल वगैरा चलाने की तो आप चिता ही मत करियेगा, चप्पल वाले नेता लोग बेचारे अभी भी गरीबी की रेखा के नीचे ही जी रहे है और कभी कभी अपना दुःख इस तरह से प्रकट करते है वर्ना आजकल अमीर देशों के नेता लोग जूता पहनते है और उन पर जनता भी, जो ज्यादा ही अमीर है जूता ही फेंकती है। 
वैसे हमारे प्रदेश के सदन में तो कुछ साल पहले कुर्सी और माइक भी चल चुका है और बीर-मराठे तो सदन में थप्पड़ भी चलाते है।

वैसे विकास पुरुष जी आप तो अत्यंत ही समझदार है, (तभी मलाई खा लेने के बाद अब भाजपा से पिंड छुडाने की सोंच रहे है)  इसलिये आप को ज्यादा क्या कहना बस लगे रहिये आखिर आपको भी तो आगे चुनाव लड़ना है, उसका खर्च-पानी कहाँ से आएगा ? , जनता तो अपने मन से देने से रही, उसे जाति धर्म , भाषा के नाम पर मूर्ख बना कर धोखे से लूटना ही पड़ता है।
तो लगे रहे जन सेवक जी , डिगे ना अपने काम से।
"ईमान" का क्या है वो तो होता ही है बिकने के लिए वर्ना उसमे नमक , तेल , मसाला डालकर अंचार थोड़े ही बनाया जाता है । तभी तो मै कहता हूँ -
"जब पूंछते है लोग हमसे , कब बेंचना ईमान है ?
मै ये कहता हूँ सभी से , हर पल बिकाऊ ईमान है ।
शर्त ये जो भाव हो , पाया ना कोई आज तक ।
मेरा मोल दे दो मुझे , सब खोंल दूंगा राज तक । 
हर चीज बिकती है यहाँ , खेल है सब भाव का ।
कौन क्या ले पायेगा , ये खेल नहीं है ताव का ।
कौन देता दाम है , कुछ भी बिना जांचे यहाँ ।
तो क्यों कोई कुछ बेंच दे, घाटे में अपना यहाँ ।
जिस छण मुझे मिल जायेगा, मोल मेरे भाव का। 
सौदा करने को मै राजी , हो जाऊंगा ईमान का।
व्यर्थ झिकझिक ना करो, यदि दाम ना हो पास में । 
मुहमाँगा भाव ना मिला तो, इमानदार मै रहूँगा।।"

आप की एक पड़ोसी जनता

तो इन्ही शब्दों के साथ जय-राम जी की।

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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