हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 27 मई 2011

कौन हो ?

देख कर तुमको सदा  , 
मैं सोंचता हूँ कौन हो ?
अपनो से लगते मुझे ,
फिर भी नहीं तुम पास हो ।

क्यों देखकर तुम्हे सामने ,
मै भूल जाता स्वयं को भी ।
फिर नजर के सामने कुछ ,
और नहीं टिकता कभी ।

पर यूँ ही कब तक चलेंगे ,
अंजान से हम दोनों ही ।
है अभी मौसम सुहाना ,
चलो कर ले परिचय ही । 

जाने कब किस मोड़ पर ,
राह अलग हो जाये फिर ।
पर जहाँ तक साथ है क्यों ,
अंजान से चलते हैं फिर ?


 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

4 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति ..परिचय हुआ ?

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..अंतिम पंक्तियाँ तो लाज़वाब..बहुत सुन्दर..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

कोमल भाव....सुन्दर रचना

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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