हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

राज...

तुम लाख छिपाओ राज मगर , जग को पता चल जायेगा ।
आदर्शो का तेरा आडम्बर अब , अधिक नहीं चल पायेगा ।
जो कदम तुम्हारे भटक रहे , वो अपना बयां कह जायेंगे ।
तेरे पाखंडो के अवशेषों से , हम राज तुम्हारा पाएंगे ।

तुमने चुने जो सिपहसलार , वो ही तुम्हे भटकायेंगे ।
जब फंसेगी उनकी गर्दन तब , वो ही तुम्हे फंसायेंगे ।
अपनी जान बचाने के हित , बकरा तुम्हे बनायेंगे ।
तेरे पाप की सभी गगरिया , चौराहे पर लायेंगे ।

ये मत सोचो जग में तुम , सदा रहोगे अपराजित ।
शीश कटा कर औरों का , सदा रहोगे कालविजित ।
एक दिन वो भी आएगा, जब जग तुमको बिसरायेगा।
भूली बिसरी बातों में ही , फिर नाम तुम्हारा आएगा ।

(मूलतः अपने कार्य क्षेत्र में किसी को लक्ष्य कर कभी लिखा था इसे )
सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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