हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

हम साथ तेरे हमसफ़र...

हार कर तुम जिंदगी से , लौटना ना हमसफ़र ।
जब तलक है जिंदगी , हम साथ तेरे हमसफ़र ।
हम तुम्हे दिखलायेंगे , कैसे पलटती बाजियां ।
हम तुम्हे सिखलाएंगे , कैसे बनाते हैं किला ।

       साथ जो चलते यहाँ , निश्चित नहीं सब मित्र हों ।
       दूर जो दिखते तुम्हे , निश्चित नहीं सब शत्रु हों ।
       पहचानना सीखो जरा  , चाले जो यहाँ चल रहीं ।
       साथ ही तुम यह भी देखो , शह कहाँ से हो रही ।

               यूँ तो अक्सर प्यांदे भी , हैं बना देते नजीर ।
               गफलत में पिट जाते है , हाथी-घोड़े-ऊँट-वजीर ।
               तो जरा तुम सीख लो , करना सुरक्षा अपनो की । 
               फिर तोड़ भी सीख लेना , दूसरो के चक्रव्यूह की ।

                      गर कभी थकने लगाना , मुश्किलों के मोड़ पर । 
                      बस पलट कर देख लेना ,  जिंदगी के छोर पर । 
                      जब तलक है जिंदगी , हम साथ तेरे हमसफ़र ।
                      हार कर तुम जिंदगी से , लौटना ना हमसफ़र ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

त्रिकाल

१. 


अब मनमोहन 'सिंह' जैसे प्रधान मंत्री से यही सुनना बाकि रह गया था ..
" अन्ना के अनशन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है.." 
अरे मै यह नहीं कहता कि यह असंभव है, कुछ भी हो सकता है....
मगर अगर एसा है तो बात गंभीर है , इसे साबित करो ना प्रधानमंत्री जी...
केवल जुबानी जमाखर्च क्यों ?
अरे तुम्हारी दर्जन भर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसिया क्या हिजड़ो कि तरह से अपना हाथ ताली बजाने में लगाये हुए है...जो उन्हें आपकी विदेशी हाथ के बात को प्रमाण सहित साबित करने के लिए सबूत नहीं मिल रहा है ?

२. 

देखा आदरणीय योग गुरु बाबा रामदेव जी...
अगर आप उस दिन डरकर "सलवार समीज" पहन कर महिलाओं के झुण्ड में न भागते
और अपनी गिरफ़्तारी होने देते तो जो हाल आज दिल्ली का है और जो जन-सैलाब उमड़ा हुआ है..
वो तब उसी दिन आपके गिरफ़्तारी के साथ हो जाता और आपको भी यू बे-आबरू होकर अपना अनसन न तोड़ना पड़ता...
आपकी ये एक छोटी सी भूल आपके राजनैतिक कैरियर और आपके दम-ख़म पर हमेशा एक बदनुमा दाग की तरह रहेगा इसका मुझे हमेशा अफसोस होगा..पर क्या करे.. आपमें वो नैतिक बल नहीं था जो पहले "महात्मा गाँधी और जे.पी" में था और अब अन्ना हजारे में है...

३.



बाबा तुलसीदास ने सही कहा था...
"विनय न मानत जलधि जड़,गए तीन दिन बीत..
बोले राम सकोपि तब , भय बिन होय न प्रीति "
तो लीजिये आज फिर
रामलीला मैदान की साफ सफाई हो रही है..
जिनके अहंकार को फूँका जाना है वो अपने पुतलो के साथ तैयार खड़े है...
और जिन्हें फूँकना है वो भी धनुष बाण लेकर दल-बल के साथ आने ही वाले है...
जनता भी आ रही है...
संग
जनता जनार्दन भी आ रहे है...
देखते है ये आग कितने देर धधकती है और अपनी लपटों में कितनो को जलाती और झुलसाती है...


बुधवार, 17 अगस्त 2011

प्रश्नकाल...अन्ना अन्ना

मित्रो अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो केवल दूसरो के भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखने चिल्लाने और कानून बनवाने भर से  यह कार्य पूरा नहीं हो सकता जब तक सबसे पहले इसकी शुरुवात हम अपने आप से नहीं करते है, आत्मिक रूप से स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं करते है.. ।

तो क्यों ना सबसे पहले स्वयं शपथ लीजिये कि.... 
हम आज से अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में ना तो शामिल होंगे ना हीं उसका कारण बनेगे । भले ही उससे हमारा किसी भी प्रकार का हित क्यों न प्रभावित होता हो....।

मै शपथ पूर्वक पूरी तरह से तैयार हूँ......।
पर क्या आप सचमुच पूरी तरह तैयार है ?    
या सिर्फ टाइम पास करने के लिए, दूसरो पर रोब डालने के लिए "पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तरह  से बस " हम अन्ना अन्ना चिल्ला रहे है  ।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

दोस्ती और दुश्मनी..

दोस्ती और दुश्मनी , दोनों को निभाने के लिए दिल में जज्बा , दिमाग में पैनापन और हौसले (जिगर) में मजबूती की जरूरत होती है..।

दोस्ती और दुश्मनी दोनों सीखने के लिए , महसूस करने के लिए और निभाने के लिए हमें एक दूसरे के नजदीक जाना पड़ता है , बीच की दूरियों को मिटाना पड़ता है और अपने दिल , दिमाग और नजर में उसे बसाना पड़ता है।

अगर दोस्ती दो दिलो को मिलाती है , दो जज्बातों के बीच एक पुल बनाती है........ तो दुश्मनी दो दिमागों को नजदीक लाती है और उनके इरादों के बीच की दीवार गिराती है।

जहाँ एक अच्छी दोस्ती कभी कभी हमारी रातो की नींद हराम करती है... वही एक बेहतरीन दुश्मनी अक्सर हमें चैन की नींद उपहार में देती है ।

ये हो सकता है कि आपके अच्छे दोस्त भी आपका साथ बुरे दिनों में छोड़ दे.... पर यह कभी नहीं होता है कभी आपके दुश्मन आपको भूल जाये ।

दोस्ती एक कमजोर और खोखली नींव पर भी खड़ी हो जाती है पर ... दुश्मनी सदैव एक मजबूत आधार पर ही टिकती है ।

दोस्ती में लोग अपनी आदतों को दूसरे पर थोपने की कोशिश करने लगते है और दुश्मनी में खुद से दूसरो की आदतों को जानने की कोशिश करते हैं ।

दोस्ती की चाहत रखना सरल है , करना आसान है पर वास्तव  में उसे निभाना कठिन है पर ..दुश्मनी की चाहत रखना कठिन है , करना आसान है और निभाना अत्यंत ही सरल है ।


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सोमवार, 15 अगस्त 2011

राष्ट्र का वही पुराना पर्व...

लो फिर आ गया मौसम , राष्ट्र के लिए नया कुछ कर जाने का ।
पुराने हो चुके भूले-बिसरे , चित्रों को साफ कर फिर लगाने का ।
पुरानी धूल-धूसरित मालाओं को , बदलकर फिर नयी लगाने का ।
खोजकर सिकुड़े-गुमचे पड़े झंडे को , धुलाकर फिर इस्त्री कराने का ।
कटे फटे बदरंग झंडे की जगह , गाँधी आश्रम से एक नया मंगाने का ।
और इस तरह राष्ट्रीयता से सराबोर , राष्ट्र का वही पुराना पर्व मनाने का ।

ये मत पूछो किस कारण से , ये पर्व आज मनाया जाने लगा ।
आजाद हुआ था गुलाम राष्ट्र , या संविधान नया बनाया गया ।
गड-मड हो गए हैं अंतर , परिभाषाये नव जनमानस भूल गया ।
छब्बीस जनवरी पंद्रह अगस्त , बस झंडा-रोहण  में बदल गया ।
उठे जागे और तैयार हुए , रो-गाकर पहुँच गए ध्वज-स्थल पर ।
फहराया झंडा गाया जन-गण-मन , आ गए पुन: वापस घर पर ।

जो अंतर है इन दोनों में , वो दूर-दर्शन पर जाकर सिमट गया ।
किसी एक में सज-धज कर , देखा दिल्ली में झांकी निकल गया ।
किसी एक में लाल किले से , देश के मुखिया का भाषण गुजर गया ।
और हमें नाहक क्या लेना-देना , जो इतिहास में पुराना बीत गाया ।
बस आज सबेरे सबको गाना , वही पुराना रटा रटाया भूला तराना ।
जनगणमन अधिनायक जय हे , आओ हमको देश की लाज बचाना ।

जल्दी करो देर हो रही जय है..., 
लड्डू तुरंत बंटाओ जय हे...।
कम से कम कुछ घंटों को जय हे.. ,
राष्ट्रीयता मिलकर निभाओ जय हे... ।
कल फिर करना काम हमें जय हे... ,
आज तो छुट्टी मनाये जय हे.....।

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शनिवार, 13 अगस्त 2011

नयी रीति नीति की बाते..

मुझे मिला था एक ज्योंतिषी  , 
जिसने भविष्य बताया मेरा ।
बोला जातक लिखा भाग्य में  ,
जल के प्राणी से अहित है तेरा ।
यूँ जल में रहते प्राणी बहुत ,  
मगर मगर सभी पर भारी है ।
तेरी किस्मत में शत्रु कई हैं , 
जो मगर के जैसे व्यवहारी है ।

तो बच के रहना जलाशय से , 
न अन्दर जाना उसके तुम ।
अगर कभी हो जाना जरूरी ,
मन में बैर न लाना तुम ।
दूर ही रहना सदा मगर से ,
ना उससे बैर निभाना तुम ।
कर सको अगर तो मगर से ,
सदा मित्रता निभाना तुम ।

मैंने कहा सुनो ऐ पंडित ,
रीत कहे तुम बहुत पुरानी ।
आवो तुम्हे बताता हूँ अब ,
नीति जो मैंने है अजमानी ।
प्रीति मुझे दिलवालो से है ,
नफ़रत दिल के कालो से है।
मगर भी उनमे ही आता है ,
मुझको कभी नहीं भाता है ।

आदत मगर की बहुत बुरी है ,
रिश्तो की उसे कहाँ पड़ी है ?
किया मित्रता अगर मगर से ,
मारे जाओगे तुम गफलत से ।
भूँख लगेगी जब उसे जोर से ,
खा जायेगा वो तुम्हे प्यार से ।
तुमको खाकर जब सुस्तायेगा ,
तेरी याद में झूंठे आंसू बहायेगा ।

तुम दूर ही रहना पानी से ,
हो डरते अगर दुश्मनी से ।
हो अगर जरुरी जल में जाना ,
तो मगर से सदा बैर निभाना ।
बैर करोगे जब तुम उससे ,
फिर सदा सचेत रहोगे उससे ।
फिर एक दिन वो भी आएगा ,
तेरे कारण परलोक वो पायेगा ।

जब कन्धा उसे लगाने जाना ,
चीख-चीख कर उसे मित्र बताना ।
हालाँकि है यह नीति उलट ,
पर देगी यही हालात पलट ।
कांटे का जबाब यह छूरी है ,
बल्लम का जबाब भाला है ।
कौटिल्य सानिध्य में रहकर ,
हाँ मैंने यह रीति निकाला है ।

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बुधवार, 10 अगस्त 2011

फिर साथ चले ?

खोल दो तुम द्वार दिल के , बाँह फैलावो जरा ।
तुमसे मिलने के लिए , द्वार पर हूँ मै खड़ा ।
तुमने भी सोचा न होगा , वापस मै फिर आऊंगा ।
भूल कर तेरी बेवफाई , तुझसे वफ़ा फिर चाहूँगा ।
क्या करूँ इन्सान हूँ , दिल से मै हैरान हूँ ।
आदते इन्सान की , पाकर मै बेहाल हूँ ।

जो हुआ वो भूल कर , क्यों न हम फिर साथ चले ?
क्या हुआ जो राह में , अवरोध है अब भी खड़े ।
तुमको लगता है अगर , तुम साथ मेरे चल पावोगे ।
हाथ में अपने सदा , तुम हाथ मेरा पावोगे ।
तो सोंच लो एक बार फिर , मै द्वार पर तेरे खड़ा ।
तुझको गले लगाने को , मै बाँह फैलाये खड़ा ।



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आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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