हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

नादानों सा क्यों भटक रहे

नादानों सा भटक रहे , क्यों अंजानो सा अटक रहे ।
क्या आज हुआ तुमको मानव , क्यों अपने को तुम भूल रहे ।
तुम ईश्वर की सर्वश्रेष्ट कृति , आशाएं  तुमसे उसे बड़ी ।
पुरषार्थ की राह में आलस्य की , देखो क्यों है दीवार खड़ी ।
मानवता की बगिया में , दानवता कैसे पली बढ़ी ।
जहाँ प्रेम के फूल थे लगने ,  क्यों नफ़रत की है बाड़ खड़ी ।

सोचो हुयी कहाँ ये भूल , किसने चुभाये तुमको शूल ।
अपने मन का सागर मथ कर , खोजो क्या है इसका मूल ।
शायद कुछ रत्न मिले तुमको , अंतर्मन के मंथन से ।
या मुक्त हो सको तुम अपने , मन में घुले हलाहल से ।
रत्न तुम्हारे अपने होंगे , हैं नीलकंठ विष पीने को ।
कर्म तुम्हारे अपने होंगे , है भाग्य केवल फल देने को ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया...

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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