हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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बुधवार, 14 अगस्त 2013

बाजी..

मैंने सुना कुछ लोग यहाँ , हर सांस में बाजी चलते है ।
चौपड़ के पासो के बदले , इंसानों की बाजी चलते हैं ।
वो दांव लगते जीवन का , जो होता नहीं उनका कभी ।
वो हर गोट फँसते ऐसी है , बच के कोई निकले ही नहीं ।
वो घेर कर बाजी चलते है , कोई घर नहीं खाली रखते है ।
वो रिश्तो का दांव चलाते है , सच झूंठ की गोट बढ़ाते है । 
बलि देकर प्यांदो के अरमां , सतरंज के वजीर बचाते है ।
सदा आड़ी-तिरछी चालो से , वो खेल का मजा उठाते है ।
सोंची-समझी चालो से वो , स्वयं की पहचान छिपाते है ।
गिरगिट जैसा रंग बदल कर , सबको धोखा देते जाते है ।
यूँ खेल बहुत ही अच्छा वो , आदतन खेलते जाते है ।
मगर कभी कभी वो भी , प्रतिद्वंदी गलत चुन जाते है । 
फिर चाहे जितने अज्ञाकारी , उनके विसात के प्यांदे हो ।
जब खुल कर सामने हम होंगे , किला बिखर ही जायेगा ।
साथ रहा हूँ जिनके सदा  , खेल उन्ही से उनका सीखा है ।
देख देख कर बाजी उनकी , हर दांव का तोड़ भी सीखा है ।
तो बेहतर है कह दो उनसे , ना मुझको ही गोट बनाये वो ।
चाल चलेगे जब हम अपनी , ना सहन मात कर पाएंगे वो ।
(पूर्व में कार्य-क्षेत्र से जुड़े हुए उदगार..)


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शनिवार, 3 अगस्त 2013

जीवन है माटी का लोंदा..

जीवन है माटी का लोंदा , पल पल रूप बदलता है ।
कभी ठोस चट्टान सा , कभी पल में ये बिखरता है ।
कभी ये गीली मिटटी सा , तृप्त स्वयं में रहता है ।
कभी आकाल की मिटटी सा , तकलीफों को सहता है ।
कभी आंधियां इसे उड़ा कर , दूर छोड़ कर आती हैं ।
कभी बाढ़ का पानी इसको , दूर देश ले जाती हैं ।

कभी किसी उपजाऊ मिट्टी , जैसा ये हो जाता है ।
कभी रेत के ढेर के जैसा , बंजर ये हो जाता है ।
अगर मिल गया इसे चतुर , सुघढ़ कुम्हार का हाथ  ।
रूप बदल कर वो इसको , सिखलाता जीवन की आश  ।
वर्ना किसी धूल के कण सा , मारा मारा फिरता है ।
इधर उधर सब के द्वारे , बस दुत्कारा फिरता है ।

जितना ज्यादा इसे तपाते , उतना ही यह चलता है  ।
वर्ना भीगी मिटटी सा , हर ठोकर में यह गिरता है ।
माटी जैसा जीवन इसका , फिर माटी में मिलता है ।
माटी से पैदा होकर ये , माटी का लोंदा रहता है ।

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सोमवार, 29 जुलाई 2013

मेरा पता..?

क्यों पूँछते हो तुम हवाओ से मेरे आशियाने को ,
गर पूंछना ही है तो पूँछो आंधियो से मेरा पता ।
ये हवाए जो तुम्हे मिलती हैं अक्सर राहों में ,
वो गुजराती है मेरे घर के कई कोसो से दूर ।
तो जाकर पूँछो तुम किसी आँधी से मेरा पता ,
वो आंधिया ही है जो गुजराती है मेरे दरवाजे से ।

हाँ अगर तुम्हे चाहिए मेरे घर के अन्दर का निशा ,
तो बता पाएंगे तुमको केवल बवंडर ही सही पता ।
क्योंकि अक्सर राहों पर,
 जब थक जाते है कई बवंडर ,
तब आकर सुस्ताते है वो,
 अक्सर मेरे घर के अन्दर ।
और जानना चाहो जो तुम मेरे स्वाभाव के बारे में ,
उसको जाकर पूँछो तुम कुछ गिने चुने तूफानों से ।

वो तूफां ही है जिनको आगे बढ़कर गले लगाता हूँ ,
पास बिठाकर उनको अपने दिल का हाल सुनाता हूँ ।
बाकी तो बस यूँ ही मेरे घर तक आते जाते है ,
कुछ दरवाजे के अन्दर कुछ बाहर ही रह जाते हैं ।
अन्दर जो भी आता है वो मेरा होकर जाता है ,
बाकी तो बस बेगानों सा बाहर ही रह जाता है । 

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शनिवार, 27 जुलाई 2013

समय...

समय बड़े बड़े घावो  को  भरने की सामर्थ रखता है ।
आज  जिन बातो से हम द्रवित एवं विचलित होते है कल वही बाते हमारे लिए सामान्य से भी कम महत्त्व की हो जाती है ।
यही मानव स्वभाव और संसार का नियम है ।

फिर चाहे वह सांसारिक रिश्ते हो या प्राणों से प्रिय प्रेम सम्बन्ध ,चाहे भौतिक सुख की चाह हो या मानसिक असंतुष्टिया ।
समय हर किसी के प्रति हमारी सोंच एवं एहसास को बदलता रहता है ।
और अंत में हमें उसके बिना या उसके साथ जीना सिखा ही देता है…!

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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

सच ही कहा किसी ने...

सच ही कहा किसी ने , मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।
रहती अधूरी हसरते , कुछ भी बेइंतिहा नहीं मिलता ।
ऐसा नही है इस जहाँ में , कभी कुछ भी नहीं मिलता ।
लेकिन तड़फते जिसके लिए , वो अक्सर नहीं मिलता ।
यहाँ अनगिनत हैं चाहते , और अनगिनत है ख्वाहिशे ।
इल्तिजा सबकी करें , इतना भी समय नहीं मिलता ।

जी रहे मन मार कर , जीना कहें कैसे इसे ।
जाना था जिस राह पर , इत्तदा नहीं मिलता ।
ऐसा  नहीं संग साथ में , कोई नहीं चलता ।
साथ जिसका चाहिए , वो हमराह नहीं मिलता ।
जब तक जहाँ में हम हैं , हमें खुदा नहीं मिलता ।
सच ही कहा किसी ने , संग जमी आसमां नहीं मिलता ।

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रविवार, 14 जुलाई 2013

जो होना था वो हो ना सका..

जो होना था वो हो  ना सका , जो चाहा था वो मिला कहाँ ?
हम नियति नियंता बन बैठे , नियति को ना स्वीकार हुआ ?
छोटी सी नौका के बल पर , मझधार का वेग नापने को ।
हम प्रचण्ड नदी में थे उतरे , नाविक का भरोसा बस कर के ।
पर नियति को था स्वीकार नहीं , हम उसे चुनौती दे बैठें ।
धारा की दिशा पलट गयी , और नदी उलट कर बहने लगी ।

उस पार पहुँचना था हमको , इस पार ही नौका लौट पड़ी ।
मेरे मन की मन में रही , बस नियति की सब बात चली ।
इस बार चुनौती खाली गयी , अब मेरी चुनौती नियति ही है ।
जो मै भी नियति का हिस्सा हूँ , तो नियति ही मेरी धार बने ।
फिर से वो मुझे अवसर दे , फिर धारा नदी की बदले वो ।
इस बार बिना पतवार के मै , चाह रहा मझधार को मै ।

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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

उड़ जहाज का पंछी..

आप यूँ दिल के करीब , जब नजर आने लगे ।
बात चुभी उनको ही पहले , जो दूर थे जाने लगे ।
शायद उन्हें था ये गुमान , हम बिखर जायेंगे यूँ ही ।
छोड़ कर दिल तोड़ कर , वो दूर जब जायेंगे यूँ ही ।
माना गलत थी सोंच पर , बात काफी हद तक सही थी ।
हमने ही उनसे कभी ये , कमजोरियाँ अपनी कही थी ।

पर गलत वो आँक बैठे , गलत चाल पर शह दे बैठे ।
बिखरा किला हमारा मगर , हम मात उन्हें ही दे बैठे ।
माना रिश्ते शतरंज नहीं , पर बाजी यहाँ भी लगती  है ।
शह और मात से भी आगे , कुछ बाते सदा ही चलती हैं ।
हाँ यहाँ सुधारा जा सकता , चाले गलत जो चल बैठे ।
ज्यों उड़ जहाज का पंछी , फिर जहाज पर जा बैठे ।

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आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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