हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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रविवार, 7 अगस्त 2011

क्या है वश में आपके...

आप भले समझा करे , आप खुदा से कम नहीं ।
मैंने तो माना सदा , आप खुदा हो सकते नहीं ।

आप भले लगते हो सबको , लोगों के हैं भाग्य विधाता ।
आप भले ही दिखते हो , इस जग में अतुलित बलधामा ।
भले आपकी वाणी से , कम्पित होती धरती हो ।
भले आपकी इच्छा से , परिवर्तित होती सत्ता हो ।
लेकिन क्या है वश में आपके , गति रोंक सको दिवाकर की?
बदल सको दिशा काल की , पलट सको तुम लेख भाल की ।

जो भी हो तुम मानव हो , मत मानो स्वयं को खुदा अभी ।
मानवता भी पूरा पाए नहीं , दानवता ही जीते आये अभी ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

क्यों बात घुमाते हो यारा..

जो बात है कहनी कह दो तुम , क्यों बात घुमाते हो यारा ।
जो बात जुबां पर मचल रही , क्या है वो कोई अफसाना ।
कुछ खास है शायद कहने को , बेचैन हो रहा तेरा चेहरा ।
ठण्ड से कांपती शाम में भी , क्यों लाल हो रहा है चेहरा ।
धड़क रहा है दिल तेरा जो , पहुँच रही है मुझ तक गूँज ।
कह दो जो कुछ कहना है , शब्दों को क्यों करते महरूम ।

यूँ जितना ज्यादा सोंचोगे , तुम उसमे उलझते जाओगे ।
मन की बातो में उलझे तो , तो दिल की ना कह पाओगे ।
दिल की बात सुनी जो ज्यादा ,  मन की ना कर पाओगे ।
जो बात हो कहने आये तुम ,  बात ना तुम कह पाओगे ।
समझ रहा हूँ तेरी व्यग्रता , पर क्यों हो तुम यूँ संशय में ।
किस बात के कारण जुबां तेरी , लरज रही सच कहने में ।

अब तो मै भी आतुर हूँ , है लगी फड़कने आँख मेरी ।
तेरे मन की सुनने को , व्याकुल है अब साँस मेरी ।
अच्छा-ख़राब है जो भी , सुनने को मै व्याकुल हूँ ।
तेरी व्यग्रता कम करने को , दोस्त मेरे मै आतुर हूँ ।
कह दो बिना भूमिका के , बात जो तुमको कहना है ।
मेरे दिल के मंदिर में , निश्चिन्त रहो तुम्हे रहना है ।

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शनिवार, 6 अगस्त 2011

पहेलियाँ..

जाने कब से मेरे मन के , अतृप्त किसी किनारे पर ।
आकर बैठ गयी है देखो , चाहत कोई अनजानी पर ?
यूं तो लगाती है वो मुझको, कुछ जानी पहचानी सी ।
शायद है वो मेरे मन  की ,  कोई अतृप्त  कहानी सी  ?
हाँ वही पुरानी अभिलाषाए , वही पुरानी चाहत फिर ।
लेकिन फिर भी शब्द नहीं , ना भाव वही पुराने फिर ?

मन के आँगन में निशदिन, कुछ बादल बन घुमड़ता  है ।
मन में उठती चाहत से , अब दिल भी बहुत झुलसता है ।
कैसी अजब कहानी है , ज्यों बिन वर्षा के बरसे पानी है ।
लगाती बहुत पुरानी है , पर अब भी अनकही कहानी है ।
 अपनो सी जब लगाती है वो , फिर भी क्यों अनजानी है  ।
समझ के भी मै समझ न पाता, अब यही मेरी कहानी है ।

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

राज...

तुम लाख छिपाओ राज मगर , जग को पता चल जायेगा ।
आदर्शो का तेरा आडम्बर अब , अधिक नहीं चल पायेगा ।
जो कदम तुम्हारे भटक रहे , वो अपना बयां कह जायेंगे ।
तेरे पाखंडो के अवशेषों से , हम राज तुम्हारा पाएंगे ।

तुमने चुने जो सिपहसलार , वो ही तुम्हे भटकायेंगे ।
जब फंसेगी उनकी गर्दन तब , वो ही तुम्हे फंसायेंगे ।
अपनी जान बचाने के हित , बकरा तुम्हे बनायेंगे ।
तेरे पाप की सभी गगरिया , चौराहे पर लायेंगे ।

ये मत सोचो जग में तुम , सदा रहोगे अपराजित ।
शीश कटा कर औरों का , सदा रहोगे कालविजित ।
एक दिन वो भी आएगा, जब जग तुमको बिसरायेगा।
भूली बिसरी बातों में ही , फिर नाम तुम्हारा आएगा ।

(मूलतः अपने कार्य क्षेत्र में किसी को लक्ष्य कर कभी लिखा था इसे )
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शराफत की सीमा ?

मुझसे पूँछा किसी ने शरारत में .. 
क्या है मेरी शराफत की सीमा ?

मैंने मुस्कराकर जबाब दिया.. 
गोया अब क्या कहे अपने मुह से हम...
लोग कहते है.... 
शरीफ हूँ मै इतना कि.. 
शराफत मेरे चेहरे पर झलकती ही नहीं चेहरे से टपकती भी है ।

सुनकर वो मुस्कुराये और बोले , 
यार तब तो बड़ी मुश्किल होती होगी गुजर बसर करना....!
मैंने कहा... 
खुदा का शुक्र है यारों.. ,
शराफत अपने से टपक जाती है सारी , 
और फिर आप जैसो से निपटने में मुझे नहीं होती है लाचारी ।

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

जीवन की परिभाषाएँ...

जीवन की परिभाषाएँ जब , समझ नहीं हमें आती हैं ।
करती हैं बेचैन हमें , मन को विह्वल कर जाती हैं । 
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ अत्यंत सरल सी होती हैं ।
हम वैसा ही फल पाते है , जैसे बीजो को हम बो आते हैं ।
कब देखा हमने जीवन में , काँटों के बीच हो आम लगा ।
बिन बोये खेत में बीजों को , कभी अपने से धान उगा ।
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ बहुत जटिल भी होती हैं ।
अंगारों में तप कर निखरना , फौलाद की किस्मत होती है । 
पर ज्यों ज्यों तपता है सोना , कोमल निर्मल होता जाता है ।
एक ही जैसे तपते दोनों , फिर क्यों उलटा असर हो जाता है
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ अत्यंत ही सुन्दर होती हैं ।
सागर के बदरंग सीप में , सुन्दर मोती की रचना होती है ।
कीचड़ के ही मध्य सदा , खिलते है कमल मुस्काते हुए ।
घटाटोप अँधेरी रातों में ही , दिखते है तारे टिमटिमाते हुए ।
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ बदरंग सी भी होती हैं ।
अपनो को अपने ठगते है , फिर अपनो से गैर बचाते है ।
काँटों के ही मध्य सदा , किसलय गुलाब खिल पाते हैं ।
बिना दंड के मानव भी , स्वयं अनुशासित नहीं रह पाते हैं ।
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ अत्यंत सुरीली होती हैं ।
कोयल की कूक जब आती है , तन मन को हर्षा जाती है ।
अदल बदल कर आते मौसम , मन को सदा लुभाते हैं ।
संतति के हर अरमानो को , माता पिता सदा निभाते हैं ।
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ बहुत ही कर्कश होती हैं ।
कुछ क्षण पहले उत्सव था , क्षण में प्रलय हो जाती है ।
पल में होता जन्म यहाँ , पल में अर्थी सज जाती है ।
रिस्तो में मधुरता आये , उससे पहले डोर टूट जाती है ।
यूँ जीवन की परिभाषाएँ , कुछ अलग अलग सी होती हैं ।
जिसने जैसे कर्म किये , उसको वैसी अक्सर दिखाती है ।
ये कभी लुभाती जीवन को , तो मन को कभी दुखाती है ।
लेकिन हर एक कठिन मोड़ पर , नूतन राह दिखाती है ।
जीवन की परिभाषाएँ जब,  अपना रूप दिखाती हैं ।
मानव को मानव सा , जीने का मार्ग बताती हैं ।
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सोमवार, 1 अगस्त 2011

आओ मै प्रेम सिखाता हूँ...

आओ मै प्रेम सिखाता हूँ , तुम्हे प्रेम के रूप बताता हूँ ।
कहते हो तुम जिसे प्रेम , उसका विस्तार बताता हूँ ।

जैसे बहती नदिया का , लगता हमको है जल प्यारा ।
पर जब वह रुक जाती है , दूषित हो जाता जल सारा ।
वैसे ही है प्रेम की धारा , रुकते ही हो कलह पुराना ।
बहती है जब इसकी धारा , सारा जब हमें लगता प्यारा । 

प्रेम नहीं है कभी सपाट , तीन कोण में उसका वास ।
काया , मन और अंतरात्मा , इनमे प्रेम का होता वास ।
काया करता जब भी प्रेम , प्रेम की होती केवल भ्रान्ति ।
शोषण होता बस औरों का , मन को नहीं मिलती शांति ।

काया से जब प्रेम करोगे , मन में घृणा वैमनस्य भरोगे ।
लालच वासना और लिप्सा , इनको ही तुम प्रेम कहोगे ।
फिर पाकर कष्ट प्रेम में तुम , जीते जी मर जाओगे  ।
या कायरता में होकर विरक्त , साधू सन्यासी हो जाओगे  ।

जब प्रेम जायेगा मन के तल पर , मन मयूर हो जायेगा ।
स्वाद मिलेगा तुम्हे अनोखा , पर स्वाद न थिर रह पायेगा ।
कभी बनेगा शिखर प्रेम का , कभी विषाद का छण भी आएगा ।
फिर प्रेम की इस छणभंगुरता से , एक नया द्वार खुल जायेगा ।

प्रेम युक्त जब होगी आत्मा , द्वव का भेद मिट जायेगा ।
छोड़ भरोसा किसी और का , स्वयं से प्रेम हो जायेगा ।
सच्चा प्रेम वही है जब , तेरा-मेरा भेद मिट जायेगा ।
यही प्रेम सभी कष्टों से , तुम्हे भवसागर पार ले जायेगा ।

तो आओ मै प्रेम सिखाता हूँ , पर मृत्यु का पाठ पढाता हूँ ।
है प्रेम गली अति सांकरी , उससे गुजरना तुम्हे बतलाता हूँ ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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