हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

खेल तुम्हारा, गणित हमारा

मित्रों ,
मेरे किसी गुरु को उनके किसी गुरु ने सिखाया था,
जो मुझको उन्होंने अनजाने में बतलाया था......
"If you want to Win them ,
Then Join them,
Learn their Game from them,
Get Mastership in there game,
Then,Beat them in their Game....!"
मगर मैंने उसे "एकलव्य" सा अपनाया था ,
पर दुख है, इसे सबसे पहले उनपर ही अजमाया था ।
तो आनंद लीजिये कूटनीति का.....
*===================================================* 
(१.)
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है । 
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर ही अजमाया है ।
सब गणित तुम्हारी अपनी , सब खेल वही पुराना है ।
मैंने चुने हैं अपने मोहरे , बाकी सब नियम तुम्हारा है ।
सतरंज बिछाकर औरों को , कैसे ललचाया जाता है ।
पहली चाल उन्हें देकर , उनसे शुरू कराया जाता है।
कैसे पिटवाकर अपने मोहरे , जाल बिछाया जाता है ।
कैसे अपने राजा का , किला बनाया जाता है ।
कैसे प्यादों की कमजोरी का , लाभ उठाया जाता है ।
कैसे घोड़ों के बल पर , टेढ़ी  चाल चला जाता है ।
कैसे तिरछी ऊँट चाल से , वजीर गिराया जाता है ।
कैसे हाथी के बल पर , दुश्मन को रौंदा जाता है ।
कैसे अपनी कमजोरी का , लाभ उठाया जाता है ।
कैसे वजीर सामने लाकर,शह मात बचाया जाता है।
कैसे एक चाल से केवल, बाजी को पलता जाता है।
कैसे प्यादों के बल पर , राजा को जीता जाता है ।

(२.)
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है ।
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर अजमाया है ।
सब पत्ते फेंटे तुमने है , और तुरप तुम्ही ने खोला है ।
मैंने चले है अपने पत्ते , बाकी ये खेल तुम्हारा है । 


दो और दो को पाँच बनाकर , कैसे पेश किया जाता है ।
नहले पर दहला देकर आगे , कैसे चाल चला जाता  है ।
कैसे गुलाम के जोर पर राजा , औरों का गिरवाते है ।
कैसे बदरंग रानियों को , रंग की दुग्गी से पिटवाते है ।
सत्ते पर सत्ता चलकर भी , कैसे रंग जमाते है ।
कैसे गिनकर औरों के पत्ते , अपनी गणित बिठाते है ।
कैसे  इक्के पर तुरुप चाल से , अपना हाथ बनाते है ।
कैसे पढ़कर चेहरों को ,  हम अपना जाल बिछाते है ।


बावन पत्तो के खेल में , कैसे अपनी धाक जमाते है ।
चुपचाप इशारों से केवल , कैसे साथी को समझते  है ।
कैसे कमजोर पत्तों से , सेंध लगाया जाता है ।
कैसे तुरुप के इक्के से , धाक जमाया जाता है ।
नाराज ना हों तुम अपने पर , क्यों खेल मुझे बताया है ।
यूँ तुमने सिखाया नहीं मुझे , अनुभव से ज्ञान ये पाया है ।
सत्ता का था घमंड तुम्हे , आँखों पर तेरे पर्दा था  ।
बदला लेना है तुमसे , ये मेरा बरसों का सपना था।
हतप्रभ ना हों तुम इतना , जो बोया था वो पाया है ।
तुमसे सीखे दाँव सभी , मैंने तुम पर ही अजमाया है ।
जब आज फंसे हों बुरे यहाँ , क्यों व्याकुल होते हों इतना ।
याद करो तुम थोड़ा सा , तुमने औरों को लूटा कितना !
(original - १६/०७/२००४, Modified टुडे)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

बुधवार, 21 जुलाई 2010

धर्म, कर्म और भाग्य त्रिकोण

कर्म के सिद्धांत में , ना धर्म को जोड़ो कभी । 
धर्म की राह से, ना कर्म को मोड़ो कभी ।

कर्म है तन की जरुरत, धर्म मन की भूँख है ।
कौन है इसमें बड़ा, ये प्रश्न ही एक भूल है ।

वृक्ष पहले था यहाँ, या बिज से है वृक्ष बना ।
धर्म सिखलाता कर्म है, या कर्म से है धर्म बना ।

भाग्य को ना कर्म से, ना धर्म से तोलो कभी ।
वो कर्म का अवशेष है , और धर्म में ही शेष है ।

है जटिल सिद्धांत ये , यदि तुम इसे समझो नहीं ।
तीन दिशाएं त्रिभुज की , बीच में हों तुम कहीं । १६/०६/२००४

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

सन्नाटा....

रात का सन्नाटा ख़ामोशी से,जब चारो तरफ पसरता है। बस्तियां सुनसान कर, जंगलों को आबाद करता है।
भेड़ बकरियों की खोज में, भेडियों का दिल मचलता है।
इनके पीछे पीछे कुछ, गीधड़ो का झुण्ड भी चलता है।
इनका पेट भले ही भर जाये, मन नहीं कभी भरता है।
इन्सान के अन्दर छुपा,शैतान नहीं कभी मरता है।

रात के सन्नाटे का, अपना ही नशा होता है।
सफेद्पोस लोगों के, काली करतूते छुपा लेता है।
जुल्म और बेईमानी की, रंगत को बढा  देता है ।
कमजोर और कायरों को, बहादुर मर्द बना देता है।
बेबस लाचार शिकारों को, दुल्हन सा सजा देता है।
मन में छिपी कुंठाओ को, भरपूर मजा देता है।

रात के सन्नाटे का, यह असर भी होता है।
भीड़ के सूरमाओ की, रोंगटे खड़ा कर देता है।
अपनी ही परछाहियो से, लोगों को डरा देता है।
स्वयं इंसाफ करने वालो को, मौका ये दिला देता है।
कभी जुल्म करने वालो की, बस्तियां जला देता है।
कभी रातो रात ये, राजाओ की सत्ता बदल देता है। (१०/०२/२००४)

सोमवार, 19 जुलाई 2010

झूंठा सच्चा, सच्चा झूंठा

लोग कहते हैं झूंठ के , पैर नहीं होते हैं ।

सच है, मैंने उसे घिसटते हुए देखा है ।
लोग कहते हैं  झूंठ, सच के बल पर चलता है ।
झूंठ है, मैंने उसे सच को चलाते देखा है ।
लोग कहते हैं अंत में, सच की जीत होती है ।
सच है, खरगोस को मैंने रस्ते में सोते देखा है ।

ऊपर के शब्दों में मैंने, कुछ झूंठ कहा बाकी सच है ।
ये बात जान लो फिर भी तुम, झूंठ का हिस्सा इसमें कम है ।
तुमको जैसा भाए वैसा, तुम इसको स्वीकार करो ।
सच झूंठ अलग करने में, ना व्यर्थ कोई विवाद ।
क्या कहते है जग वाले , ना अपना समय बर्बाद करो ।
बस अपने मन की सुनकर तुम , अपने मन की बात करो ।
०५/०५/२००४

रविवार, 18 जुलाई 2010

नक्कारखाने में तूती की आवाज

नक्कारखाने में तूती की आवाज भले दब कर रह जाती हो,
भीड़ के शोर में लूटे-पिटे लोगों की चीख न सुनी जाती हो ।

रात के अँधेरे में कुछ काले साये नजर बचाकर निकल जाते हों,
झूंठ को बचाने की जद्दोजहद में सच को भले लोग भूल जाते हों।

परोपकार का मुलम्मा लगाकर स्वार्थी अपना भला करते जाते हों, 
बेंचकर अस्मिता देश की नित नेता अपनी राजनीत चमकाते हो।

साधुवों के भेष में चोर-डाकू लम्पट छुप जाते हों,
बेचने को ईमान अपना  लोग बाजार सजाते हों।

फिर भी कभी महत्व तूती का नहीं मिट जाता है, 
ना ही सच की जगह, झूंठ दूर तक चल पाता है।

लगे भले ही देर मगर इन्साफ मिल ही जाता है, 
अंत में! सुखद अंत देर से ही सही पर आता है......।। 22/01/2005

शनिवार, 17 जुलाई 2010

साम दाम और दंड भेद - प्रबंधन के चार सूत्र

"साम दाम और दंड भेद, हैं  चार विधाए संचालन की
इनसे ही चलता आया , मानव सदा पुरातन से ।"

वेदों में लिखा है "साम दाम और दंड भेद" वह अचूक मन्त्र हैं जिससे तीनों लोकों के महिपलों , दसों दिशावों के लोकपाल , समस्त महिपाल एवं उनके अधीन समस्त भू-पाल एवं सामान्य जान को अपने अधीन करने में समर्थ है।
जी हाँ मनु कि समस्त सन्ताने चाहे वो हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों, यहूदी हों, जैन  हों, बौध हो या उनका कोई भी धर्म ना हों और वो परम नास्तिक ही क्यों ना हों और उनकी संख्या कुछ भी हों सभी पुरातन काल से वर्तमान तक इन्ही चार विधावों से सदा संचालित और नियंत्रित होते आयें है।

यह सत्य है कि हर काल खंड और देश-काल का अलग रहन सहन और नियम विधान होता है मगर चाहे वो भूत काल रहा हों या वर्तमान हों चाहे वो भारत हों या पाकिस्तान , चाहे अमेरिका हों या यूरोप 'साम दाम और दंड भेद' ही समस्त जन और समाज को नियंत्रित और संचालित करता आया है और करता रहेगा। 

"साम दाम और दंड भेद हैं चार विधाए शासन की
ये अमोघ अस्त्र है जन मानस के संचालन की । "

इसमें कुछ भी नया नहीं है, ये चिर पुरातन नियम है ।

मगर

"साम दाम और दंड भेद" चतुर्मुखी हथियार है जो जन मानस के संचालन हेतु तभी अमोघ है जब इनका प्रयोग सजगता से किया जाय। ये मानव द्वारा प्रयोग किये जाने के अस्त्र हैं ना कि किसी मशीन के द्वारा। इसका प्रयोग कब, कहाँ,किस पर और किसके द्वारा किया जा रहा है उसके आधार पर निर्धारित किया जाता है कि इसके किस मुखाग्र से प्रहार किया जाय। इन्हें अचूक बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि इनका प्रयोग किये जाते समय काल पात्र और स्थान का ध्यान रखा जाय। क्योंकि ये चारो अस्त्र सदैव एक सामान सभी पर प्रभावी नहीं होते है ना ही सभी व्यक्ति इसे समस्त रूपों में चलने के योग्य होते है ।
यदि 'साम' से कोई समाज संचालित होता है तो कभी उसपर नियंत्रण हेतु 'भेद' का नियम अपनाना होता है ,
कभी 'साम और भेद' का प्रयोग असफल होने पर 'दाम' का लोभ दिखाना पड़ता है तो कभी "साम दाम और भेद" तीनो के असफल होने पर दंड का भय दिखाना पड़ता है।

ध्यान रखें :-  'साम' श्रेष्टतम है , 'दाम और भेद' मध्यम और 'दंड' निकृष्टतम कोटि का अस्त्र है। 

जो समूह 'साम' से संचालित हों रहा हो  वहां अन्य का प्रयोग करने से साम धीमे-धीमे अप्रभावी होने लगता है।
जहाँ 'दाम' का लोभ देने पर समाज पतित होता है, 'भेद'  से समाज विघटित होता है और  लम्बे अवधि के 'दंड' से बिद्रोही हो जाता है।

और जब 'साम' अप्रभावी हों जाय तो पहले भेद को अपनाया जाना चाहिए (जिससे दाम भी बचा रहे और समाज पतित भी ना हो) क्योंकि विघटित समूह और समाज प्राय: तेज प्रगति करते है और उनके आगे पुन: एक होने कि संभावना बनी रहती है मगर पतित तेजी से और पतन की और बढता है और उसका वापस लौट पाना मुश्किल होता है।

और अंत में जब पूर्व के तीनो से काम ना बने तो... दंड है ही।

और कुछ लोग दंड भय से ही चलते है जैसे - बाबा तुलसीदास जी ने कहा है-
'सूद्र,गंवार,ढोल,पशु,नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी'
हालाँकि कुछ लोग उपरोक्त पाँच में सूद्र और नारी के नाम पर नाराज हो जाते है और कहते है की वास्तव में सूद्र और गंवार दो ना होकर एक ही अर्थात गँवार-सूद्र (सूद्र जो पड़ा लिखा ना हो) एवं पशु नारी अलग-अलग ना होकर 'पशु नारी' है अर्थात वो नारी जो पशु सामान हो 'जैसे रामचंद्र जी के ज़माने की ताड़का' समझा जाना चाहिए। इस प्रकार इनकी संख्या पाँच से तीन ही रह जाती है। मगर पुन: कुछ लोग को इसमे पशुवों को हटाने और किसी भी प्रकार की  नारी को शामिल करने पर आपत्ति है और वो पशु को अलग और नारी का संधि बिच्छेद कर नार+अरि=जो नारी का शत्रु हो कहते है। खैर अभी इस विवाद पर विस्तार से चर्चा करने का मन नहीं है अतः: जो  बाबा ने कहा हो वो जाने जो , जो बच्चो को समझाना हो वो समझे ..........!
समूह के साथ ही "साम दाम और दंड भेद" के व्यक्तिगत प्रयोग में भी उपरोक्त सावधानी बरती जानी आवश्यक है क्योकि-
प्रत्येक व्यक्ति एक समान नही होते है, भगवान ने सभी को अलग-अलग बनाया है, भले ही हम उन्हें समूह में कितना ही अभ्यास कराकर एक जैसा बनाने की कोशिश करें मगर आतंरिक मनोभाव, आचार विचार और सोंचने का तरीका अलग-अलग ही रहता है। कौन सा व्यक्ति किस प्रकार के अस्त्र और उसकी कितनी मात्र के प्रयोग से नियंत्रित होगा और किस मात्रा और किस अस्त्र के प्रयोग के बाद वो पूरी तरह से अनियंत्रित, बिद्रोही, पशु समान अथवा मूक बधिर, निर्जीव  बन जायेगा इसका ध्यान रखा जाना जरुरी है और एक बेहतर शाशक/प्रबंधक वही है जिसको इस बात का सदैव घ्यान रहता है ना की वो जो अपने सत्ता के घमंड में जबरन एक ही तरह से सबको हांकने की कोशिश करता रहे।
अतः प्रबंधन के चार सूत्र 'साम दाम और दंड भेद' का प्रयोग करें परन्तु संयम और सजगता के साथ....!


शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

दयनीय भाजपा के दया के पात्र गडकरी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी "भारतीय जनता पार्टी" बनाम  भाजपा की पिछले कुछ दिनों की गृह-दशा ओर चाल-चलन  ने आज इसे दूसरे नंबर की पार्टी से नंबर दो (कांग्रेस) पार्टी या दो नम्बरी पार्टी बना दिया है ।

आज भाजपा अत्यंत ही दयनीय हालत में है भले ही कुछ राज्यों में इसकी अभी भी सरकार  है  और इसके नए-नवेले राष्टीय अध्यक्ष वास्तव में उससे भी ज्यादा दया के पात्र लगने  लगे  है  


"दयनीय भाजपा के दया के पात्र गडकरी" - गडकरी जी  यह मै किसी प्रतिशोध में नहीं कह रहा हूँ ना ही व्यंग कर रहा हूँ क्योंकि ना तो मै कांग्रेसी हूँ, ना वामपंथी, ना मेरा लालू और मुलायम यादव से कोई नाता है, ना बुआ मायावती से निकट भविष्य में कोई लाभ प्राप्त होने की आशा है (बुआ  मायावती इसलिए कहा क्योकि मेरे पिता और चाचा भी मतदाता है और वो उन्हें बहन मायावती कहते है) ।


हाँ मेरे जानने वाले अच्छे से जानते है कि अगर किसी के प्रति मुझमें ज्यादा अपनापन रहा है तो वो भाजपा ही है पर यह अपनापन कब तक चल पायेगा भगवान ही जाने क्योंकि भाजपा का मतदाता होने का अर्थ यह तो कदापि नहीं है कि मै भाजपा का अंध-भक्त हूँ ।
खानदानी तौर पर मै कांग्रेसी हूँ, बोफोर्स घोटाले ने मेरे पिता और उनके चलते पूरे गावं  को को जनता दल का समर्थक बनाया फिर राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद प्रकरण ने हमारे गाव-घर वालो को भाजपाई बनाया।
जनता दल के सम्बन्ध में  एक घटिया जुमला आपने सुना होगा जिसका मर्यादित रूप आप को यहाँ बता देता हूँ "मुलायम सिंह यादव कि बुद्धि, वी पी सिंह का बल, मिटटी में मिल गया जनता दल"।
(अ-मर्यादित नाम की जगह जातिवाचक शब्द वाला और मिटटी की जगह जननांग वाला भी आप जानते ही होंगे मुझसे क्यों सीधे लिखवाकर मेरी छवि  ख़राब कराएँगे)।
पर मै कभी धर्म जाति के भावनाओं में बहकर किसी दल का समर्थ नहीं रहा,जो दल तुष्टिकरण से हटकर राष्ट्र हित में लगा दिखा वही मेरा दल रहा।
वैसे सारे दल वास्तव में दल-दल ही है जहाँ भूले से ही कभी-कभी कमल रूपी नेता खिलते है मगर नेता तो  नेता  होतें है जो 'अशोक चक्रधर' जी के अनुसार नजराना,हकराना,शुकराना और जबराना चारो तरह से घोटास में सक्षम होते है।


लगता है मै भटक रहा हूँ ...
खैर मेरा और भाजपा का सम्बन्ध औरों की तरह सीधा साधा भी नहीं है। 
मेरा इससे जुडाव एक मजेदार तरीके से है। 
मै  पिछले  १५ वर्षो से सोने की एक अंगूठी बहुत ही चाव से पहनता रहा हूँ जिस पर केसरिया और हरे रंगों से सुसज्जित एक बेहतरीन कमल का फूल बना था जो किसी भाजपाई नेता ने ही सुनार को बनाने के लिए कहा था मगर जब तक वह बनकर तैयार हुयी शायद फिर वो राजनैतिक रूप से भाजपाई नहीं रह गया और बेचारी अंगूठी सुनार के पास ही अपने ले जाने वाले का तब तक इंतजार  करती रह गयी जब तक एक दिन उसे देख कर मेरा दिल उसपर नहीं आ गया ।
अब कमल के फूल वाली अंगूठी  मेरी उंगली में देखकर लोग  मुझे अपने से भाजपाई मान लेते थे और उनके मुँह से यह सुनकर मै अच्छा महसूस करता था क्योंकि तब भाजपा की पहचान श्री अटल बिहारी बाजपेयी का नेतृत्व और श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के "एक देश में एक विधान एक प्रधान" जैसे कुछ राष्ट्रवादी नारों से होती थी।

मेरी  अंगूठी और भाजपा का सम्बन्ध भी बहुत निराला था।
मै उसे कभी अपनी उंगली से किसी भी हालत में नहीं निकालता था जिसके सम्बन्ध में पूछने  पर अगर पूछने वाला भाजपाई होता तो मै उससे मजा लेने  के लिए  कहता कि यार आप अपने सोंच का दायरा कुछ बड़ा करो, कमल का पुष्प केवल चुनाव चिन्ह नहीं  भारतवर्ष का राष्ट्रीय फूल भी  है और इसी कारण मै इसे पहने हूँ।
मगर जब पूछने वाला गैर-भाजपाई होता तो उससे मजा लेने के लिए मै शान से कहता  था कि ये अंगूठी मुझे एक बड़े भाजपा नेता ने मेरी भाजपा के प्रति लगाव को देखकर उपहार में दिया है और  इससे भाजपा का भाग्य जुड़ा है।
हाँ सच में उससे भाजपा का भाग्य जुड़ा था.......!! जो लोग मित्र और सहयोगी  मुझे पिछले १५ वर्षो से निकटता से जानते है उन्हें मेरे कथन की सच्चाई पता है। 


चलिए आपको एक सच्ची कहानी सुना देता हूँ  फिर अपने वास्तविक मुद्दे पर वापस आऊंगा :- 
उस ज़माने के कार्यालय के मैनेजर जो निजी तौर पर ज्योतिषी और तंत्र के ज्ञाता भी थे प्राय: मजाक में कहते कि मेरी इस बात में दम नहीं है कि भाजपा का भाग्य मेरी अंगूठी से जुड़ा है और वो कहते कि इसे साबित करने के लिए मै इसे उतार कर इसका असर भाजपा पर दिखाऊ और मै कहता कि एसा घातक प्रयोग मै नहीं करने वाला।
इसी हंसी मजाक में एक दिन वो और कार्यालय के अन्य स्टाफ जबरदस्ती मेरी अंगूठी उतरने लगे और मै उन्हें रोक रहा था कि अंगूठी मेरी उंगली से निकल कर फर्स पर गिर गयी जिससे उस पर नगीने से बने कमल की एक पंखुड़ी का सिरा टूट गया।
उन्होंने अफसोस जाहिर किया क्योकि अब अंगूठी चोटिल हो गयी थी। शाम ढले जब कार्यालय  बंद हुवा और मेरे आफिस के लोगो ने जब अपने घर जाकर टी वी खोला तो जो समाचार ब्रेकिंग न्यूज था वो था "मायावती ने अचानक भाजपा से समर्थन वापस लिया, कल्याण की सरकार डांवाडोल "।
और फिर रातो-रात जगदम्बिका पाल ने एक गैर भाजपाई मुख्यमंत्री के रूप में सपा के समर्थन से सपथग्रहण  भी कर लिया। तो अगली सुबह जब मै कार्यालय पंहुचा तो यह देख कर हैरान हो गया कि लोग सिर्फ मेरा इंतिजार कर रहे है,मुझे भी इसका अनुमान था तो मैंने अंगूठी जेब में रख रखा था।
लोगो ने पूंछा अंगूठी कहा है तुरंत पहनो ,मैंने कहा कि अब क्या होगा जो होना था वो तो कल आप लोगों ने अंगूठी गिरा कर कर ही दिया। फिर भी लोग आशान्वित थे और मै भी जबरदस्ती का भाव खा रहा था तो मैंने भी लोगों से माफ़ी मंगवाते हुए उसे जेब से निकल कर पहन लिया और लोगो को भरोसा दिलाया लो मै हूँ ना सब ठीक हो जायेगा।
उधर अटल बाबा दिल्ली में धरने पर जा चुके थे, इधर इलाहाबाद हाई कोर्ट के विशेष जज ने सरकार के मुद्दे पर सुनवाई प्रारंभ कर दिया था।
"जगदम्बिका पाल एक दिन के राजा रहे और अफसोस वो दिल्ली के एक दिन के बादशाह की तरह चमड़े का सिक्का या कपडे का नोट भी नहीं जारी कर पाए"
और अगले ही दिन भाजपा फिर सत्ता में वापस। हुर्रे......................कमाल हो गया अचानक रातो-रात अप्रत्याशित रूप से सत्ता गयी और अप्रत्याशित रूप से एक दिन में ही वापस। तो मुझे जानने वाले भाजपा समर्थक मित्र यार और कार्यालय सहयोगियों ने मुझसे वचन लिया कि मै उस अंगूठी की आगे से हिफाजत करूँगा।
हालाँकि आगे भी अनजाने में जब जब दुर्घटना वश  अंगूठी चोटिल होती रही तब तब तत्काल ही  भाजपा को क्षति पहुंचती रही।  कभी कल्याण ने पार्टी छोड़ी तो कभी १३ दिन तो कभी १३ माह की सरकार गिरी।  


चलिए अब  वापस अपने मूल विषय पर आता हूँ ...........
अफ़सोस इस संसार में यह सब अनंत तक स्थायी नहीं रह सका और जहाँ एक तरफ समय के साथ-साथ मेरी सोने की अंगूठी घिसती गयी और उसमे दरार आने लगी (सोना जल्दी धिसता भी है और अगर उसमे मिलावट कम हो तब तो और भी जल्दी) वही दूसरी तरफ भाजपा भी घिसती गयी  और उसमे दरार आने लगी ।

फिर जहाँ एक तरफ मेरी वह सोने अंगूठी टूट गयी और मुझे उसे भारी मन से उतार कर रखना  पड़ा....,वही दूसरी तरफ सुनहरी भाजपा भी घिस कर कई जगह से टूट गयी और उसके जाने कितने टुकड़े टूट कर इधर उधर  गिरने लगे,कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा, जिसमे से कुछ याद रहे  कुछ भूल गए (कल्याण सिंह, उमा भारती, मदनलाल, जसवंत सिंह.... लम्बी सूची है ) इसमे  कुछ वापस जुड़े  कुछ जबरन वापस लाये गए मगर वो सब फिर किसी टायर के बने हुए पंचर के दाग  ज्यादा लगने  लगे जिसके कारण आखिर भारतीय जनता (जिसमे ज्यादातर भाजपाई जनता ही थी) ने भारतीय जनता पार्टी को भारी मन से भारत की गद्दी से उतार कर किनारे रख दिया और अडवानी जी का भारत उदय या इण्डिया शायनिंग सपना ही रह गया  ।

आज अगर भाजपा अत्यंत ही दयनीय हालत में है तो यह भारत का दुर्भाग्य ही है:- इसलिए नहीं कि भाजपा भारत को फिर सोने की चिड़िया बनाने वाली थी या बनाने की योग्यता रखती है वरन इसलिए कि अभी भारत में कोई दूसरी पार्टी शक्तिशाली विपक्ष बनने के हालत में नहीं है और बिना शक्तिशाली विपक्ष के सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है.....!

और अगर भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष दया के पात्र लग रहे है तो यह और भी चिंताजनक है, यूँ  तो जिस दिन मैंने गडकरी जी का चेहरा टीवी पर पहली बार उनके भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर समाचार चैनल में अत्यंत ही उत्सुकता से देखा था उसी समय  मै किसी मन पसंद जीवन साथी ना मिल पाने पर दुखी होने वाले नव-विवाहित की तरह से विषाद  में डूब गया था क्योंकि उनके व्यक्तित्व में पहले दिन ही किसी प्रकार का कोई आकर्षण नहीं था और मुझे इस पार्टी के लिए किसी आकर्षक करिश्माई नेता के आने का इंतिजार था (शायद मै किसी गोल मटोल और केवल तन से भारी भरकम अध्यक्ष की आशा नहीं कर रहा था )। व्यक्तिगत तौर पर गडकरी जी मै आपको आहत नहीं करना चाहता हूँ ना ही मेरा ये  इरादा है मगर मै अपनी दिल की बात कह रहा हूँ और यहाँ मै झूंठ भी नहीं कहना चाहता हूँ इसलिए मुझे क्षमाँ कीजियेगा... नहीं भी करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा मुझपर मानहानि का दावा ही करेंगे मगर तब आप बहुत बुरे फसेंगे इसलिए माफ़ ही कर दीजियेगा।

मगर जब मुझे बताया गया कि गडकरी जी एक बहुत ही काबिल मैनेजर है (अपने व्यापारिक संस्थान के) साथ में संघ का वरदह्स्थ भी उनपर है तो यह मान  कर मैंने अपने दिल को सांतवना  दिया कि चलो काबिल नेता ना सही काबिल मैनेजर तो है.
और आज भाजपा को वास्तव में पहले एक काबिल मैनेजर की जरुरत है जो उसे आतंरिक रूप से विघटित होने, और अपनो के ही हाथों से  बर्बाद होने से बचा सके, हालत को बेहतर मैनेज कर सके। 
अटल जी अब अपने स्वास्थ में अटल नहीं रहे अडवानी जी तो पाकिस्तान जाकर जिन्ना के मजार  पर पहले ही चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबे बन चुके है और पार्टी ने अपना दूसरे पीड़ी का  बेहतरीन हीरा  उसके अपने भाई के हाथों गोली मारे जाने से खो दिया है, मुरली मनोहर जी अब सन्यास आश्रम में है, राजनाथ काबिल है ( यू .पी. में उनके शासन काल में सब देख चुके है) मगर राष्ट्रिय व्यापकता नहीं है , मोदी जी जरुर श्रेष्ट  है मगर राजग को स्वीकार नहीं , बाकी सब नवसिखुए ही है।

मगर अफसोस हमेशा एक काबिल मैनेजर काबिल नेता नहीं होता है और राजनैतिक पार्टी को एक काबिल नेता ही चला सकता है  भले ही वो करिश्माई ना हो, करिश्माई तो वो बाद में  अपने आप हो जाता है । 

नेता के तौर पर गडकरी जी बच्चे है और वास्तव में भी अपने हाव भाव , अपने बयानों से मात्र अपना बचपना ही दिखा रहे है,
हम उनसे सत्ता पक्ष के नेतावों की वल्दियत पता कर के बताने की आशा नहीं करते है (एसे चुटीले कामों के लिए लालू जी काफी है) वरन गडकरी जी आपसे राष्ट्र और जनमानस के लिए कुछ ठोस रचनात्मक मुद्दों पर योगदान की आशा है जो केवल किसी नेता के बेहूदा बचकाने भाषणों से नहीं आने वाला है।

आज भारत बदल रहा है और भारत का जनमानस भी,
अब मेरे जैसा विदेशी नेताओं का धुर-विरोधी भी यह मानने लगा है कि आज अगर सोनिया जी सत्ता सीधे तौर पर अपने हाथ में ले ले तो शायद भारत का ज्यादा भला हो सके
(क्या करें जब अपने नालायक हों तो बाहर वालो पर ही भरोसा करना पड़ता है)
आवश्यक सूचना :-
१.  वर्त्तमान में मेरी अंगूठी टूटी हुयी मेरे मेज के दराज में रखी है जिसे मै अपने इस अन्धविश्वास के डर से वापस नया नहीं बनवाने की कोशिश कर  रहा हूँ कि कही इस प्रक्रिया में अगर सुनार ने उसे पूरी तरह से गला दिया तो भारत से मेरे दिल में बसी हुयी पार्टी भी विलुप्त ना हो जाय......और मात्र टांका लगवाकर जोड़ के साथ अब उसे पहनने की इच्छा नहीं हो रही है !
२. इस लेख के मध्य में भटक कर आई हुयी अंगूठी प्रकरण की कहानी पूरी तरह सत्य है और कहानी के पात्रो के नाम पते भी वास्तविक है। 
३. भाजपा यदि चाहे तो लेखक अंगूठी को उनके राष्टीय संग्रहालय में रखने को राजी है जिससे उनका भाग्य सही हो सके मगर सोने का वर्त्तमान दाम देना होगा।  
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

मेरे ब्लाग का मोबाइल प्रारूप :-http://vivekmishra001.blogspot.com/?m=1

आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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