हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

मेरा सच

आग और पानी का , नहीं मेल होता है ।
सदा सच बताना , नहीं खेल होता है ।
 दिलों में सभी के , कुछ अरमान होते हैं ।
कौन कहता है यहाँ , सब बेईमान होते है ।
मिलन क्या जरुरी है , अगर साथ चलना हो ?
शब्द क्या जरुरी है , अगर बात कहना हो ?

नदी के तटों का  , होता एक रिश्ता है ।
भावना के तल पर , नहीं कोई पिसता है ।  
बराबर का दोनों को , अधिकार होता है ।
आपस में उनके भी , कुछ प्यार होता है ।
कुछ ऐसा ही मेरे मन में , उदगार होता है ।
मेरी नज़रों में जिसका , सदा इजहार होता है ।

अगर तुम समझ पाओ , रिश्तों की जटिलता ।
नहीं तुम कहोगे इसे , मन की मेरे कुटिलता ।
मुझे मेरी सीमाओं का , एहसास है सदा ही ।
मगर क्या तुम्हे मुझपर , विश्वास है जरा भी ।
करके साहस तुम सदा , खुला सच मुझसे कहना ।
नजरें बचाकर मुझसे तुम , ना कभी संग मेरे रहना ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण


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