हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

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रविवार, 25 मार्च 2012

ऐसा क्यों होता है..?

ऐसा क्यों होता है अक्सर , जग सोता मै जागा करता  ।
नींद से बोझिल आँखों में , तेरा प्रतिबिम्ब सजाया करता ।
तुम तो मुझको भुला चुके , यादो को सब मिटा चुके ।
मेरे दिए सभी उपहार , वापस करके जा भी चुके ।
पर हाल बता दो पत्रों का , जो मैंने तुमको भेजे थे ।
अपने दिल के अरमानो को , शब्दों के मध्य समेटे थे ।

हर एक शब्द जो उसमे था , तुमपर अधिकार जताता था ।
मेरे व्याकुल मन को वो , थोडा सम्बल पहुँचाता था ।
तेरे बिना अकेले में , तेरा एहसास दिलाता था ।
तेरी बाँहों का झूला बन , सपनों में मुझे झुलाता था ।
तेरे कदमो को जबरन , वो मेरी तरफ बदता था ।
मेरी छाया प्रतिपल तेरे , चारो तरफ बनता था ।

तुम कहती थी पत्र मेरे , दिल को व्याकुल कर जाते है ।
तेरे तन-मन दोनों में , एक प्यास नयी जगाते है ।
लौटा दो मुझको पत्र मेरे , जो मैंने तुमको भेजे है ।
संबंधो का अंतिम बंधन , जो हम दोनों को लपेटे है ।
शायद मै भी भुला सकूँ  ,  समय जो साथ गुजारे है ।
सहेज सकूँ  उन टुकड़ो को , जो दिल के मेरे बिखरे है ।


सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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