हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

मन मेरा खाली-खाली है...

एक जाम तो पीने दो मुझको , मन मेरा खाली-खाली है ।
बेगानों सा लगता ये जग , यह रोज मनाता दिवाली है ।
मेरी समाधि मिटाकर के , वो चाह रहे हैं भवन बनाना ।
तुम उन्हें बता दो जाकर के , है शेष मुझे जग से जाना ।
पैमानों से क्या नाप रहे , बस जी भरकर मुझे पीने दो ।
मत रोंको टोंको मुझको , मुझे आज हकीकत कहने दो ।

जो नोंच रहे बेदर्दी से , अभी मेरे मण्डप के फूलो को ।
तुम उन्हें बता दो जाकर , मेरी डोली उठनी बाकी है ।
मेरे जाते ही मेरा सब कुछ , उनका ही होने वाला है ।
मयखाना देख मै ठहर गया , मुझको आगे जाना है ।
अपनी ही बगिया से क्यों , नफ़रत करता माली है ।
एक जाम पिला दो मुझको, मन मेरा खाली-खाली है ।


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रविवार, 7 अप्रैल 2013

भूँख है एक आइना ..

इन्सान की जिंदगी का ,भूँख  है एक आइना  ।
भूँख  चाहे पेट  की , या कहो उसे जिस्म की ।

भूँख  हो धन दौलत की , या फिर दर्शन की ।
भूँख  हो चाहे युद्ध की , या भूँख हो शक्ति की ।

भूँख बदल देती यहाँ , इन्सान की सोंच को ।
भूँख बना देती यहाँ , हैवान इंसानियत को ।

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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

सन्नाटा...

रात  का सन्नाटा ख़ामोशी से , जब चारो तरफ पसरता है ।
बस्तियों को सुनसान कर , वो जंगलो को आबाद  है ।
भेड़ बकरियों की खोज में , भेड़ियों  का दिल मचलता है ।
उनके पीछे पीछे ही कहीं , गीधड़ो  का झुण्ड भी चलता है ।
पेट भले ही भर जाये , मन नहीं कभी भी भरता है ।
इन्सान के अन्दर छुपा , शैतान कभी नही मरता है । 
रात के सन्नाटे का , यह फायदा भी होता है ।
सफेद्पोसो के सब , करतूतों को छुपा लेता है ।
जुल्म और बेईमानी की , रंगत को बढ़ा देता है ।
कमजोर और कायरो को , बहादुर मर्द बना देता है ।
बेबस लाचार शिकारों को , दुल्हन सा सजा देता है ।
मन में छुपी कुंठाओ को , भरपूर ये मजा देता है । 
रात के सन्नाटे का , अपना ही नशा होता है ।
भीड़ के सूरमाओ की , रोंगटों को कंपा देता है ।
अपनी ही परछाहियों से , बहुतो को डरा देता है ।
भेड़ियों और गीधडों के , झुण्ड ये बना देता है ।
बदला  लेने वालो को , मौका ये दिला देता है ।
जुल्म करने वालों के , हस्तियों को मिटा  देता है ।

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रविवार, 31 मार्च 2013

एक पाती..

सोंच रहा हूँ लिख डालूं , प्रियवर को अपने एक पाती ।
अपने मन का हाल लिखू , कह डालू दिल की सब बात ।
बहुत दिनों से मिले नहीं , न लिखी प्रेम की कोई पाती ।
कैसे बीते है ये दिन और , कैसे होगी आगे मुलाकात ।

वो भी क्या दिन थे जब , हम घंटो बाते करते थे ।
बिना बात की बात पर , हम अक्सर रूठा करते थे ।
फिर घंटो एक दूजे की , हम मान-मनोवल करते थे ।
रोज सबेरे एक दूजे से , हम सपनों की बाते करते थे ।

फिर ये कैसे दिन आये जब , दूर दूर हम रहते है ।
एक दूजे की यादो को क्यों , भुला कर यो जीते है ।
चलो नहीं लिखी जो तुमने , मुझको पाती मेरे यार ।
मै ही लिख डालूं अब अपने , दिल की बातो का सार ।

होली की शुभ कामनाओ के साथ.....

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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

मायाजाल..

जीवन को समझाना चाहो तो , बूझो पहेली जीवन की ।
फिर मौत भले आ जाए मगर , डोर ना टूटे जीवन की ।
वो कौन यहाँ जिसने आकर , नीव रखा था इस जग का ।
सुनसान वीरानी धरती पर , अंकुर फोड़ा था जीवन का ।
कहाँ से लाया वो तारे , किससे उसने गगन बनाया ।
कैसे बिना सहारे के , ये धरती सूरज चाँद टिकाया ।

कहाँ ओर है इस जग का , और कहाँ छोर होगा इसका ।
ये सारी दुनिया कैसे बनी , कोई राज बताएगा इसका ।
कहाँ से आते हैं हम सब , फिर कहाँ अंत में जाते सब ।
जीवन मरण के चक्रव्यूह से , निकल नहीं क्यों पाते हम ।
जिसने सारे जग को बनाया , किसने उसको ईश्वर बनाया ।
किसने कैसे और किस कारण , ये सारा मायाजाल रचाया ।

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रविवार, 3 मार्च 2013

अनकही....

कहने को कोई बात नहीं , फिर भी तुमसे कुछ कहना है ।
तुम सुनो या कर लो कान बंद , कुछ बात तुम्ही से करना है ।
यूँ पहले भी मैंने तुमसे शायद , कहे कई अफ़साने है ।
पर आज तो तुमसे कहना है , वो बिलकुल नए फ़साने है ।

देखो कितना समय है बीता , हम दोनों को चुप-चुप रहते ।
मन के भावों को मन में रखकर , मूक इशारो में बाते करते ।
कुछ लोक लाज की बाते थी , कुछ हम दोनों सकुचाते थे ।
कुछ बात जुबां तक आकर भी , हम कहे बिना रह जाते थे ।

है याद मुझे अब भी प्रियतम , वो मधुर मिलन की सारी बाते ।
बोल रहा था मै अविरल , अविचल हो तुम मुझे सुनती थी ।
शब्द ख़त्म हो जाने पर भी , नयनो में बाते होती रही ।
बिना कहे एक शब्द भी ,  तुम दिल की बाते कहती रही ।

तो आवो मिलकर हम दोनों , फिर से  रचे एक नयी कहानी ।
अब तक के सारे सुख-दुःख , फिर से कहे हम अपनी जुबानी ।
लोक लाज की बाते छोड़ , और भुला कर जग के बंधन को ।
आवो कह दे अपनी बाते सब , शब्द दे दिल के स्पंदन को ।


        
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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

कैसे दिल की बात कहूँ..

चाह रहा हूँ जो कहना , क्यों वो शब्द नहीं मै पाता  हूँ ।
निज भावों को बिना व्यक्त किये , अतृप सदा रह जाता हूँ ।
क्या करूँ कहूँ मै  कैसे वो , जो दिल में दबा रह जाता है ।
यूँ ही उम्र बीतती जाती है , मन उसे समझ नहीं पाता है ।
चलते चलते देर हो गयी , अब वापस जाया नहीं जाता है ।
क्या सोंचेगे दुनियावाले , ये सोंच के भी मन भरमाता है ।

बुद्धि नहीं देती है साथ , वह दिल को समझे कहाँ बिसात ।
अंतरतम कर सके प्रगट , कोरे शब्दों में है नहीं बिसात ।
प्रतिपल सदा सरोवर ही , बनकर रहने का है अभिशाप ।
नदी बने बिना घुट-घुट कर , मर जाने का शायद है श्राप ।
रुंधे कंठ बेकल नयनो में , है भटक रही अश्रु की धारा ।
दोष किसी को मै  दूँ कैसे , शायद अवरोध भी मुझको प्यारा ।


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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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