हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

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गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

प्रेम के विरागो पर...

प्रेम के विरागो पर , चाहे जितने लगाओ पहरे ।
प्रेम सदा होता ही रहा , प्रेम सदा होता ही रहेगा ।
लैला-मंजनू ,हीर और राँझा , प्रेम के ही दीवाने थे ।
दुनिया वाले कुछ भी कहें , वो प्रेम के ही परवाने थे ।
जो भी प्रेमी बन बैठा , जग की कहाँ उसको है खबर ।
प्रेम दीवानों की दुनिया में , बेगानों की कहाँ बसर ।

प्रेम के विरागो पर , जब जब पुष्प नया खिलता है ।
अपनी महक से वो , जग को सुगन्धित करता है ।
यूँ तो उगते रहते काँटे , प्रेम पुष्प संग डालो पर ।
नहीं रोंक पाते है वो , कलियों को मुस्काने पर ।
पूरे होते है वो ख्वाब , जो सच्चे दिल से देखे जाते ।
तुम भी थोड़ा प्रेम करो , इसका अवसर बिरले पाते ।

यदि राह रोंक कर बैठ गए , जिद पर अपनी अंटक गए ।
दरवाजे बंद करके अपने , कुछ हाँसिल ना कर पाओगे ।
पहले भी प्रेम विरागो पर , जग ने लगाये थे पहरे ।
जब जब प्रेम ने करवट ली , बिखर गए सारे पहरे।
जब प्रेम पुष्प मुस्काता है , शीश झुंकाना पड़ता जग को ।
भारी बोझिल मन से सही ,  प्रेम अपनाना पड़ता जग को ।

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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