हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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शनिवार, 3 अगस्त 2013

जीवन है माटी का लोंदा..

जीवन है माटी का लोंदा , पल पल रूप बदलता है ।
कभी ठोस चट्टान सा , कभी पल में ये बिखरता है ।
कभी ये गीली मिटटी सा , तृप्त स्वयं में रहता है ।
कभी आकाल की मिटटी सा , तकलीफों को सहता है ।
कभी आंधियां इसे उड़ा कर , दूर छोड़ कर आती हैं ।
कभी बाढ़ का पानी इसको , दूर देश ले जाती हैं ।

कभी किसी उपजाऊ मिट्टी , जैसा ये हो जाता है ।
कभी रेत के ढेर के जैसा , बंजर ये हो जाता है ।
अगर मिल गया इसे चतुर , सुघढ़ कुम्हार का हाथ  ।
रूप बदल कर वो इसको , सिखलाता जीवन की आश  ।
वर्ना किसी धूल के कण सा , मारा मारा फिरता है ।
इधर उधर सब के द्वारे , बस दुत्कारा फिरता है ।

जितना ज्यादा इसे तपाते , उतना ही यह चलता है  ।
वर्ना भीगी मिटटी सा , हर ठोकर में यह गिरता है ।
माटी जैसा जीवन इसका , फिर माटी में मिलता है ।
माटी से पैदा होकर ये , माटी का लोंदा रहता है ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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