हे भगवान,

हे भगवान,
इस अनंत अपार असीम आकाश में......!
मुझे मार्गदर्शन दो...
यह जानने का कि, कब थामे रहूँ......?
और कब छोड़ दूँ...,?
और मुझे सही निर्णय लेने की बुद्धि दो,
गरिमा के साथ ।"

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा एवं प्रतिक्रिया हेतु मेरी डायरी के कुछ पन्ने

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रविवार, 12 जनवरी 2014

बकवास...

ओ मुसाफिर इस तरह तू , है यहाँ हैरान क्यों। 
लगता है पहली दफा , इस देश में आया है तू। 
दूध की ये नालियां जो , दिख रही बहती तुझे। 
ये हकीकत में लहू है , जो लाल रह पाया नहीं। 
दिख रही तुझको यहाँ जो , हर तरफ ही होलिका।
वो हकीकत में है जलती , नव बधुओं की डोलियां।  

दिख रही तुमको यहाँ जो, होलिहारियो की टोलियां। 
वो हकीकत में खेलकर , आ रहीं खून की होलियां।
और ये जो भद्र पुरुष , तेरी बाँह में बाँह डाल रहे।
वो हकीकत में तुम्हारी , गर्दन को नापने जा रहे। 
ओ मुसाफिर दिख रहा , क्यों हैरान है इस तरह। 
लिख रहा क्यों व्यर्थ में , बकवास मै  इस तरह। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

सोमवार, 6 जनवरी 2014

एहसान फरामोश कठपुतलिया...

ये दौर है एहसान फरामोश कठपुतलियों का ?
या बागी होने को बेताब कठपुतलियों का ?

कल तक जिनके दामन में , मैंने फूल बरसाए थे। 
वो देखो आज बिछाते है , मेरी राहो में अब अंगारे। 
कल तक मेरी नूर से जो , रोशन हो बने सितारे थे।
वो देखो आज बुझाते है , मेरी राहों के ही उँजियारे।
कल तक जिनकी राहें मै , समतल करता चलता था। 
वो देखो आज बनाते है , अब मेरी राहों को ही पथरीले। 

कल तक मेरी साँसों से , जो राहत की साँसे पाते थे। 
वो देखो बोझिल करने को , तत्पर है मेरी साँसों को। 


कल तक मेरी नीयति से जो , अपनी शाख चलाते थे। 
वो देखो आज उठाने लगे , अब उंगली मेरे दामन पर। 

कल तक पाला था जिनको , अपनी ही अस्तीनो में।
वो देखो आज चुभोने को , हैं करते जहरीले दांतो को। 


क्या भूल गए वो मेरी क्षमता , या मद में आकर बौराये है ?
अपनी कठपुतली की डोरो को , शायद वो भाँफ ना पाये है ? 

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शनिवार, 4 जनवरी 2014

होना न होना..

कुछ होना या ना होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है , जितना यह महत्वपूर्ण है कि आप को उसका पता है या नहीं।
क्योंकि यदि आपको कुछ होने का वास्तविक ज्ञान नहीं है तो वह होना ही व्यर्थ है , 
और यदि कुछ ना होने का आपको पता है , ज्ञान है , आभास है , तो वह ना होना भी आपके लिए महत्वपूर्ण है। 


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बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्वागत है नव वर्ष २०१४ … तुम्हारा स्वागत है

पुरानी डायरी के पन्नो से निकली "नये साल १९९८ के स्वागत में लिखी गयी कुछ पंक्तिया" जो शायद आज पुन: २०१४ में मेरे लिए फिर से उतनी ही मायने हो गयी है जितनी आज से १६ साल पहले वो मेरे लिए जवान थी.....

लक्ष्यहीन हो जायें उससे पहले हमें पहुँचना है ,
कर्महीन हो जायें उससे पहले हमें बदलना है। 
कांतिहीन हो जायें उससे पहले हमें चमकना है,
भावहीन हो जायें उससे पहले हमें निखरना है। 
दयाहीन हो जायें उससे पहले हमें सिसकना है ,
महत्वहीन हो जायें उससे पहले हमें निकलना है। 

खण्ड-खण्ड हो जायें उससे पहले हमें सिमटना है ,
प्राणहीन हो जायें उससे पहले हमें सम्भलना है। 
हाँ केवल बाते कहने से अब काम नहीं चलना है ,
संकल्पहीन हो जायें उससे पहले कर्म को करना है। 
पथहीन हो जायें उससे पहले नयी राह पर चलना है ,
नववर्ष के इन संकल्पो को संकल्पित हो करना है। 

आप सभी को नववर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाए …। 

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रविवार, 1 दिसंबर 2013

अचानक...

आप इशारो से मुझको बुलाने लगे , मेरे सपनो में फिर आप आने लगे। 
मैंने सोंचा था थोडा सो लूँ मगर , आप मुझको फिर आकर जगाने लगे। 
अपने नाजुक हाथो के एहसास से , मेरे तन मन में सिरहन उठाने लगे।
मेरी सांसो में अपने बदन की महक , आप चुपके से आकर मिलाने लगे।
अपना मुखड़ा छुपाकर परदे में जब , आप नजदीकतर मेरे आने लगे। 
छिप गया चाँद बादलों की ओंट में , इसका दीदार मुझको कराने लगे। 

मेरे चहरे पर तेरी बिखरी लटे, जब घटाओं सी आकर छाने लगी। 
आने वाला है कोई तूफान अब , ये एहसास मुझको कराने लगी। 
सम्भलने की कोशिश करता मगर , झोंके बारिस की मुझको भिगाने लगी। 
किसी बेकाबू लहरो की भँवर सी , वो बहाकर मुझको ले जाने लगी। 
मेरे ओंठो पर दहकते लावे सा जब , तेरे ओंठो की  छुवन आने लगी। 
सपनो की दुनिया में नहीं हूँ मै , तू हकीकत में संग ये बताने लगी। 

आँखे खोली तो मै था तेरी बाँह में , मेरी बाँहो में फिर आप समाने लगी। 
मेरे सपनो में आप आती ही थी , अब हकीकत में भी पास आने लगी। 

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शनिवार, 30 नवंबर 2013

ना बेकल हो मेरे मन...

ना बेकल हो मेरे मन तू  इतना , समय की धारा  बहने दे। 
जो चीज लिखी जिस समय तुझे , वो समय पास तो आने दे। 
तेरे बस में केवल इतना , कर्तव्य निभाता अपना चल।
कंकर पत्थर काँटों को हटा , तू राह बनाता अपना चल।
है फूलो से जो प्यार तुझे , कलियो को ना मुरझाने दे। 
डाल से तोड़ कर उनको तू , राहों में कुचल ना जाने दे। 

हो अगर जरूरी तेरे लिए , कुछ मोहरों को पिट जाने दे। 
दो कदम हटा कर पीछे तू , फिर अपनी बारी आने दे। 
मोर्चे पर डटे रहना ही सदा , नहीं समय की होती माँग कभी। 
हो अगर जरूरी पीछे हट , दुश्मन को पहले पहचान अभी।   
मत जोश में खोना होश कभी , हर शब्द तौल कर तुम कहना। 
हर शब्द के कितने अर्थ यहाँ , तुम उसका ध्यान सदा रखना। 

क्या मिला है किसको अब तक , इससे तुमको लेना क्या ?
जो तुम्हे चाहिए उसके लिए , सोंचो तुमको करना क्या ?
तैयार रहो हर पल के लिए , कब कैसी समय की धार बहे। 
मझधार में नाव को खेने का , तुमसे समय की मांग रहे। 
ना बेकल हो मेरे मन तू  इतना , समय की धारा बहने दे। 
जो चीज लिखी जिस समय तुझे , वो समय पास तो आने दे। 

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बुधवार, 27 नवंबर 2013

कृपा करो...

चाह  रहा हूँ लिखना कुछ , अंत काल तक साथ रहे । 
बनकर वो इतिहास सदा , सदियो तक याद रहे। 
हर एक शब्द अनमोल रहे , हर शब्दो से नव प्राण जगे।
धूसर हो चुकी व्यवस्था में , हर एक शब्द नव क्रांति बने।
हर एक शब्द जो लिखे लेखनी , वो मेरी आत्मा से निकले। 
मानव मन के सभी भावो की , युगो युगो की प्यास बुझे। 

शोषित पीड़ित मानव की , वह एक सशक्त आवाज बने। 
देश काल  की सीमा से हट , वह सबका अधिकार बने। 
खण्ड-खण्ड कर दे वह जग में , फ़ैल रहे पाखण्डों को। 
झाड़ पोंछ कर करे सुसंस्कृत , सब धर्मो के पण्डो को। 
दे वह नूतन परिभाषाये , सब जीर्ण हो चुके ग्रंथो को। 
छाँट अलग कर दे सारे , कुत्सित जोड़े गए छेपक को। 

हर एक शब्द में प्राण रहे , हर एक शब्द में धड़कन हो। 
हर एक शब्द स्वयं गीत बने , हर शब्दो में संगीत बसे। 
हर एक शब्द स्वयं गोचर हो , हर शब्दो से नव राह दिखे। 
हर राह में वो सहयात्री बने , हर पथ के वो अन्वेषक हो। 
है यही चाह मेरे मन में अब , हे मातु सरस्वती कृपा करो। 
मुझ जैसे तुच्छ विचारक पर , तुम अपने अभय हाथ धरो। 

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

आपके पठन-पाठन,परिचर्चा,प्रतिक्रिया हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से,प्रस्तुत है- मेरा अनन्त आकाश

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आभार..

मैंने अपनी सोच आपके सामने रख दी.... आपने पढ भी ली,
आभार.. कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें,
आप जब तक बतायेंगे नहीं..
मैं कैसे जानूंगा कि... आप क्या सोचते हैं ?
हमें आपकी टिप्पणी से लिखने का हौसला मिलता है।
पर
"तारीफ करें ना केवल, मेरी कमियों पर भी ध्यान दें ।

अगर कहीं कोई भूल दिखे ,संज्ञान में मेरी डाल दें । "

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