मेरी डायरी के पन्ने....

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

बेसहारा...

जीवन संघर्षो की बनी दुधारी , लगते घाव हैं बारी बारी ।
जायें किधर समझ ना आये ,आगे कुआँ और पीछे खाई ।
एक तरफ आदर्शो का अब , कटु कोरापन हो रहा प्रगट ।
ठोस धरातल था कल तक , दलदल बन वो रहा विकट ।
परीलोक की गल्प कथाएं , प्रेतलोक का भय दिखलाये ।
कलियों पर मंडराते भौरे , दूर दूर तक नजर ना आयें ।

ठकुरसुहाती सुनने वाले , सोहर सुन कर भी मुस्काए ।
आवारो सा भटके जीवन , कोई सहारा नजर ना आये ।
इनकी टोपी उनके सर , मंत्र भी देखो काम ना आये ।
नजर घुमाओ जिस भी ओर , हाहाकार नजर में आये ।
भागम भाग है चूहों की , और सागर में कश्ती बौराये ।
दरक रहा जलयान पुराना , खेवनहार नजर ना आये ।

मृगतृष्णा सा था जीवन , जीवन भर अब तक ललचाए ।
टूटा पौरुष ढली जवानी , चलने को सहारा नजर ना आये ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2014 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG